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संस्मरण : गाेरखपुर में राजेंद्र यादव

नब्बे के दशक में वे एक बार गोरखपुर आए थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की स्थापना हुई थी। इसके निदेशक प्रो. परमानंद श्रीवास्तव ने प्रेमचंद और भारतीय उपन्यास पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी। इस संगोष्ठी में राजेंद्र यादव और नामवर सिंह दोनों उपस्थित थे। याद कर रहे हैं स्वदेश कुमार सिन्हा

राजेंद्र यादव (28 अगस्त, 1929 – 28 अक्टूबर 2013) पर विशेष

‘हंस‌’ पत्रिका 1986 में जबसे राजेंद्र यादव के संपादन में पुनः निकलने लगी थी, तभी से मैं उसका पाठक था। मेरी रुचि उसमें प्रकाशित कहानियों तथा लेखों से ज्यादा संपादकीय ‘तेरी‌-मेरी, उसकी बात’ में अधिक रहती थी। वह 1990 का दशक था। तब मैं गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर में एक वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा था। उसी समय मंडल कमीशन की‌ रिपोर्ट लागू हुई थी और सरकारी सेवाओं में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू किया गया था। इसने विश्वविद्यालय तथा समाज में अनेक परिचित मित्रों और प्रोफेसरों ने अपना सवर्ण चेहरा दिखा दिया था। उस समय मेरा और‌ मेरे मित्रों का एक विचारधारा से मोहभंग होने का दौर था। 

हमें ‌महसूस हो रहा था कि अभी भारतीय समाज को एक सामाजिक आधुनिकता और बहुजन नवजागरण की ज़रूरत है, तभी कोई भी ऐसा आंदोलन, जो व्यवस्था में समूल बदलाव चाहता है, खड़ा किया जा सकता है। इसी ‌संदर्भ में ‌हम लोगों के मन में प्रेमचंद साहित्य संस्थान की परिकल्पना आकार ले रही थी। इसी दौर में मेरी‌ मुलाक़ात पहली बार राजेंद्र यादव से हुई। मेरी एक महिला मित्र कात्यायनी हुईं। वहनारीवादी आंदोलन में सक्रिय थीं। उनकी कुछ कविताएं ‘हंस’ में प्रकाशित हुई थीं। उन्होंने मुझे अपने पारिश्रमिक के लिए राजेंद्र यादव जी से बात करने के लिए कहा था। उस समय मैं दिल्ली में स्थायी रूप से नहीं रहता था, लेकिन राजनैतिक कार्यों के सिलसिले में अक्सर दिल्ली, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मेरा आना-जाना लगा रहता था। 

संभवतः यह अक्टूबर या नवंबर का महीना था। एक दिन गुनगुनी धूप में बहुत खोजते हुए दरियागंज स्थित ‘हंस’ कार्यालय में मैं राजेंद्र जी से मिला। उनकी पहली छवि मेरे ऊपर एक अभिजात्य व्यक्ति की पड़ी, लेकिन बाद के मुलाक़ातों‌ में उनकी यह छवि मेरे मन में ध्वस्त होती चली गई।

संभवतः उनके पहनावे तथा बहुत स्टाइल से सिगार पीने के कारण यह छवि मेरे मन में पड़ी हो। रूसी उपन्यासों में अभिजात्यों का‌ सिगार पीने तथा फ्रेंच बोलने का वर्णन आता है। मुझे लगता है कि मेरे मन में उनकी यह छवि बनाने में इसका भी महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा। पहली मुलाक़ात में ही उन्होंने मुझे देखते हुए कहा– “अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आप स्वदेश हैं। आपको कात्यायनी ने भेजा है। उनका पत्र मुझे मिला था।” 

उन दिनों मोबाइल फोन नहीं होते थे तथा लैंडलाइन भी बहुत कम थे, इसीलिए पत्र-व्यवहार खूब होते थे। उन्होंने मुझसे गोरखपुर में आलोचक परमानंद श्रीवास्तव, कहानीकार मदनमोहन और बादशाह हुसैन रिज़वी के बारे में पूछा। लेकिन जब‌ उन्होंने कवि और गीतकार देवेंद्र कुमार बंगाली के बारे में पूछा तो मुझेआश्चर्य हुआ क्योंकि निस्संदेह दलित समुदाय से संबंध रखनेवाले देवेंद्र बंगाली एक बड़े कवि और गीतकार थे। बाद में उनकी तुलना सुदामा पांडेय ऊर्फ ‘धूमिल’ से भी की गई। लेकिन इसके बावजूद गोरखपुर से बाहर उस समय लोग उनको बहुत कम ही जानते थे।

राजेंद्र यादव मूलतः कहानीकार और उपन्यासकार थे। बाद की मुलाकातों में मुझे यह एहसास हुआ कि उनकी विश्व तथा भारतीय साहित्य के उपन्यास, कहानी, नाटक और कविताओं सहित सभी विधा में गहरी रुचि ‌थी। इस मुलाक़ात के बाद उनसे मेरी ‌बातचीत‌ चल निकली। पता नहीं कात्यायनी को पारिश्रमिक मिला कि नहीं, लेकिन उसके बाद दिल्ली आने पर ‘हंस’ का कार्यालय भी मेरी बैठकी का एक प्रमुख अड्डा बन गया। 

दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान नामवर सिंह और राजेंद्र यादव (फाइल फोटो)

दिल्ली का यह चरित्र है कि यहां पर लोग अकसर आपस में बहुत कम ही मिलते-जुलते हैं।‌ लेखक-कवि तो अकसर ही लोगों से दूरी बनाकर रखते हैं, लेकिन राजेंद्र जी ठीक इसके विपरीत थे। उन्हें गहमागहमी पसंद थी। वे भीड़ में जीने वाले आदमी थे। वे मुझे जहां कहीं भी मिले, चाहे वह गोष्ठी-सेमिनार हो या पुस्तक मेला हो, वे लोगों से घिरे ही रहते थे। उनमें नायकत्व था। 

मुझे संस्मरण याद है कि नामवर सिंह हों या परमानंद श्रीवास्तव हों, सभी अपने जीवन के अंतिम समय में बिलकुल अकेले पड़‌‌ गए थे, लेकिन राजेंद्र यादव अंतिम समय तक लोगों से घिरे रहे। सामान्य तौर पर ऐसा माना जाता है कि लेखक को अपनी रचनात्मकता को विकसित करने के लिए नितांत एकांत की जरूरत होती है। लेकिन राजेंद्र जी इसके अपवाद थे। 

मुझे याद आता है कि एक बार मैं उनके साथ ‘हंस’ कार्यालय में बैठा था। साथ में गिरिराज किशोर (‘पहला गिरमिटिया’ उपन्यास के लेखक) भी थे। बातों-बातों में राजेंद्र जी ने कहा– “हंस का नया अंक प्रेस में जाने वाला है। अभी तक संपादकीय नहीं लिखा गया।” उन्होंने फटाफट कागज़ निकाला और संपादकीय लिखने लगे। उन दिनों अभी के जैसे लिखने के लिए सीधे कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं किया जाता था। लोग आमतौर पर कागज़ कलम से ही लिखते थे। उन्होंने करीब आधे घंटे में एक ड्राफ्ट लिख लिया, साथ ही वे मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर भी हमसे बातचीत करते रहे। हालांकि उनका संपादकीय इस विषय पर नहीं था। उन्होंने यह ड्राफ्ट हमलोगों को पढ़कर सुनाया। संभवतः गिरिराज जी ने इसमें कुछ कमियों की ओर इशारा किया था। राजेंद्र जी ने उसे फाड़ दिया और करीब पौन घंटे में एक नया ड्राफ्ट लिखा और हमें पढ़कर सुनाया। उनकी इस विलक्षण क्षमता से मैं हमेशा चकित हो जाता था। उनके साथ कार्यालय में कला, साहित्य, विचार और राजनीति पर बातचीत तथा बहस करने के लिए दो-चार लोग हमेशा मौजूद रहते थे, उनमें गिरिराज किशोर जी से तो अकसर मेरी मुलाक़ात हो जाती थी। भीष्म साहनी और रमेश उपाध्याय जैसे लेखकों से मेरी पहली मुलाक़ात भी वहीं पर हुई थी।

यद्यपि राजेंद्र यादव एक पिछड़ी‌ जाति से आते थे, लेकिन उनके लेखन या उनके विचारों में यह कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। लेकिन मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने तथा उसके समानांतर हिंदू फासीवादी तत्वों के सिर उठाने के बाद उनके सोच-विचार में काफी फर्क नजर आया। विशेष रूप से मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के बाद जिस तरह से प्रबुद्ध सवर्ण तबका, जिसमें बड़ी संख्या में वामपंथी भी शामिल थे, इसका विरोध करते नज़र आए। इससे वे काफी उद्वेलित थे। इसकी झलक हम उस दौर के संपादकीय लेखों में देख सकते हैं। इसी दौर में उन्होंने स्त्री तथा दलित विमर्श को लेकर ‘हंस’ के अनेक दस्तावेजी विशेषांक निकाले। यह अपने आप में सुखद बात है कि उनके निधन के बाद उनकी बेटी रचना यादव ने उन सभी विशेषांकों तथा उनके महत्वपूर्ण संपादकीय को पुस्तककार रूप में प्रकाशित कर उपलब्ध करवा दिया है। 

एक बार ‘हंस’ के कार्यालय में ही गौतम नवलखा जी से‌ मुलाक़ात हुई। उन्होंने स्वीडन के मशहूर अर्थशास्त्री गुर्नर मिडले के निर्देशन में अर्थशास्त्र में पीएचडी की थी। बातचीत में मुझे पता लगा कि वे संभवतः राजेंद्र जी की पत्नी मन्नू भंडारी के दूर के रिश्तेदार थे। वे इतिहास, समाजशास्त्र तथा राजनीति पर केंद्रित एक हिंदी पत्रिका ‘सांचा’ निकालते थे, जो हंस के साथ प्रकाशित होती थी। यह पत्रिका ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी। उस समय दिल्ली के साहित्यिक हलकों में यह चर्चा खूब थी कि इसके बंद होने के पीछे राजेंद्र यादव और गौतम नवलखा के बीच कुछ विवाद प्रमुख कारण थे। लेकिन दोनों ने कभी भी इस बारे में मुंह नहीं खोला। 

राजेंद्र जी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता तथा उसकी अस्मिता के जबरदस्त हिमायती थे। वे कहा करते थे कि रूस, चीन जैसे समाजवादी समाजों में सामूहिकता के आगे व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और अस्मिता को कुर्बान कर दिया गया। मेरी उनसे इस बात को लेकर बहुत बहस होती थी। विशेष रूप से अज्ञेय के मूल्यांकन को लेकर। इस कारण से भी कि अज्ञेय की एक कृति ‘शेखर : एक जीवनी’ उन्हें बहुत पसंद थी। मैं उन दिनों वामपंथी विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण व्यक्ति की जगह समूह को ज्यादा महत्व देने की बात करता था। एक बार तो इस मुद्दे पर उनसे मेरी काफी तल्ख़ बहस हो गई, तब उन्होंने तुरंत मेरे लिए गाजर का जूस मंगवाया और कहा कि पहले कुछ ठंडे हो जाओ, फिर बात करते हैं। ऐसे ही थे राजेंद्र जी। वे कभी भी उग्र नहीं होते थे तथा आलोचनाओं का सम्मान करते थे। हालांकि उनके निधन के काफी समय बाद मैंने यह महसूस किया कि राजेंद्र जी सही थे। व्यक्ति की निजी अस्मिता का अपना महत्व है। कोई भी विचारधारा सामूहिकता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की निजी अस्मिता तथा रचनात्मकता को ख़ारिज़ नहीं कर सकती है। उदाहरण के लिए तोलोस्तोय, प्रेमचंद या‌ दोस्तोवस्की हों, उनकी रचनात्मकता को आप सामूहिकता की वेदी पर कुर्बान नहीं कर सकते। 

मुझे याद आता है कि नब्बे के दशक में वे एक बार गोरखपुर आए थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की स्थापना हुई थी। इसके निदेशक प्रो. परमानंद श्रीवास्तव ने प्रेमचंद और भारतीय उपन्यास पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी। इस संगोष्ठी में राजेंद्र यादव और नामवर सिंह दोनों उपस्थित थे। तब दोनों में तीखी नोंक-झोंक हुई थी। नामवर सिंह ने कथा साहित्य को मृत या मरणासन्न कह दिया था। इससे राजेंद्र यादव काफी ख़फा हुए थे। संगोष्ठी में ही दोनों एक-दूसरे पर खड्गहस्त थे और बाद में एक साथ बैठकर दोस्तों की तरह बातें करते नजर आए। इस पूरी घटना को कुछ लोगों ने भगवतीचरण वर्मा की कहानी ‘दो बांकों’ के मुख्य पात्रों के रूप में याद किया। असल में सामंती चेतना के लिए वैचारिक असहमति और व्यक्तिगत संबंध दोनों को एक साथ स्वीकार करना असंभव लग रहा था। राजेंद्र यादव जीवन भर इस सामंती चेतना के खिलाफ संघर्ष करते रहे।

गोरखपुर में राजेंद्र यादव का आना भले ही कम हुआ हो, लेकिन गोरखपुर से उनका साहित्यिक संबंध हमेशा बना रहा। वे प्रेमचंद साहित्य संस्थान के परामर्श मंडल में थे।‌ वे हमेशा संस्थान की गतिविधियों और प्रगति के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते थे। गोरखपुर के साहित्यकारों, युवा लेखकों और साहित्यिक गतिविधियों से वे बखूबी परिचित थे। बादशाह हुसैन रिज़वी, मदनमोहन और नवनीत मिश्र के साथ उन्होंने यहां के युवा लेखकों को भी प्रकाशित किया। 

लेखिकाओं के बारे में होने वाले प्रवादों को वे हमेशा पुरुष मन की कुंठाओं से जोड़कर देखने के हामी थे। उन्होंने हिंदी प्रदेश की सामंती चेतना के खिलाफ सतत संघर्ष करते हुए ‘हंस’ में स्त्री और दलित लेखन को प्रकाशित और स्थापित ही नहीं किया, बल्कि इसके लिए एक आंदोलन जैसा चलाया। राजेंद्र यादव ने ऐसा करके साहित्य के दायरे का विस्तार ही नहीं किया अपितु उसके सरोकारों को पुनर्परिभषित भी किया। 

उन्होंने सबसे पहले संघ के फासीवाद का‌ अपने लेखन में जबरदस्त विरोध किया। हनुमान को प्रथम आतंकवादी कहने के कारण उनकी बहुत आलोचना भी हुई तथा देश में उन पर अनेक जगह मुकदमे भी दर्ज हुए। अपनी बातें दृढ़ता और निर्भीकता से कहने के कारण मैं उनकी तुलना हमेशा वाल्टेयर से करता हूं। वे‌ अजातशत्रु थे तथा किसी से स्थायी शत्रुता नहीं रख सकते थे। दुखद यह कि मैं करीब पांच वर्ष पहले दिल्ली में स्थायी रूप से जब बसा तब वे इस फानी दुनिया छोड़कर जा चुके थे। वे हिंदी प्रदेश के घोर पिछड़े और सामंती समाज में वे एक जलती मशाल की तरह थे। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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