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बहस-तलब : कौन है श्वेता-श्रद्धा का गुनहगार?

डॉ. आंबेडकर ने यह बात कई बार कही कि जाति हमारी वैयक्तिकता का सम्मान नहीं करती और जिस समाज में वैयक्तिकता नहीं है, वह समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता। पढ़ें, विद्या भूषण रावत का नजरिया

स्वतंत्र पत्रकार श्वेता यादव की ‘आत्महत्या’ (या ‘हत्या’) के बाद से सोशल मीडिया पर अनेकानेक लोगों ने टिप्पणियां की। श्वेता को मैंने तब जाना था जब वह पत्रकार बनने के लिए संघर्ष कर रही थी। जंतर-मंतर का वह दौर याद है जब वह वंचित समुदायों के द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होती थी। शुरुआत में वह भाषण के समय बहुत उत्तेजित हो जाती थी। एक कार्यक्रम में हम साथ थे और उसकी विचारोत्तेजक टिप्पणी के बाद मैंने बेहद शांत होकर अपनी बात रखी तो कार्यक्रम के अंत में चाय पीते हुए उसने मुझसे कहा कि आप कैसे इतनी शांति से अपनी बात कह देते हैं। 

मैंने उसे समझाया कि सिंदूर और चूड़ियों तक ही स्त्री-विमर्श को सीमित न रखो, क्योंकि यह बहुत बड़ा है और इसमें दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति की महिलाओं की भागीदारी के सवाल भी आने चाहिए और वे निस्संदेह सवर्ण जातियों की महिलाओं के सवालों से अलग है। सभी समुदायों की महिलाओं के प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में कहें तो राजनीति में इस समय ऊंची जातियों की महिलाओं का वर्चस्व है और वे ही नॅरेटिव तय कर रही हैं। 

मुझे यह महसूस हुआ कि श्वेता को फुले, आंबेडकर के आंदोलनों की बहुत समझ नहीं है और वह वर्तमान स्त्री विरोधी मूल्यों की आलोचना कर रही है। बाद में मैंने जंतर-मंतर के बहुत से क्रांतिकारियों से दूरी बना ली, क्योंकि कभी-कभार ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होना इस तरह के बेजा अहंकार से भर देता है मानों आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं तथा आप ही दुनिया हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का मतलब आप ‘राष्ट्रीय’ ऐक्टिविस्ट हो गए हैं। इसलिए देश भर के अनेकानेक कार्यकर्ता इस सपने के साथ भी आते हैं कि वहां बोल देने का मतलब है कि आप राष्ट्रीय प्रवक्ता बन गए हैं। 

खैर, मेरा संपर्क श्वेता से एक-दो और कार्यक्रमों के बाद नहीं रहा। फिर उसके विवाह की तस्वीरे देखी तो मुझे बेहद आश्चर्य और निराशा हुई कि एक इतना बोलने वाली लड़की कैसे इस प्रकार से परंपराओं के नाम पर आत्मसमर्पण कर देगी। विश्वास नहीं हुआ। फिर भी मुझे पता था कि हमारे समाज में तो ऐसे ही होता है कि सार्वजनिक जीवन में हम क्रांतिकारी होते हैं और व्यक्तिगत जीवन में अपनी सुविधाओ के हिसाब से ही निर्णय लेते हैं। 

खैर, उसके बाद यूट्यूब पर श्वेता के के वीडियो देखा, लेकिन कभी बहुत प्रभावित नहीं रहा। अब अचानक से उसकी मौत की खबर सोशल मीडिया पर देखा तो अफसोस हुआ कि एक बहादुर महिला इतनी असहाय क्यों हो गई। 

अनेक लोगों ने उसके प्रेम विवाह या अंतर्जातीय विवाह को इसका दोषी माना और कहा कि ऐसे तो होना ही था। सवाल यह है कि हम इतनी जल्दी निर्णय पर क्यों पहुंच जाते हैं कि उसका निर्णय गलत था। यह निर्णय तो उसने स्वयं लिया तो क्यों लिया, इसका उत्तर तो हम नहीं दे सकते। लेकिन अक्सर लोग शादी-विवाह के प्रश्न पर वैचारिक होने से अधिक व्यवहारिक होना ज्यादा पसंद करते हैं और सोचते हैं कि अपने को बदलकर शायद दूसरे को भी बदल देंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। 

श्वेता यादव व श्रद्धा

शायद श्वेता ने भी ऐसे हो सोचा हो कि अपने प्यार को पाने के लिए यदि थोड़ा बहुत समझौता करना पड़े, तो क्या दिक्कत है। लेकिन अंततः जब ऐसे समझौते करते-करते भी व्यक्ति दूसरे को नहीं बदल सकता तो उसकी निराशा बढ़ती जाती है। हमारे भारतीय समाज में सबसे बड़ी परेशानी इस बात की है कि हम एक असहज रिश्ते से लोकतांत्रिक तरीके से बाहर नहीं आ सकते और उसी में फंसकर रह जाते हैं। 

मसलन, बहुत से लोगों ने कहा कि वैचारिकी के तौर पर श्वेता और उसके पति में जबरदस्त अंतर था। 

 खैर, मूल बात यह है कि हमारे समाज में जड़ता यथावत है, जिसका शिकार युवा होते हैं। अनेक लोग तो यही कह रहे हैं कि यदि श्वेता मां-बाप की मदद से किसी स्वजातीय लड़के के साथ विवाह करती तो आज ऐसा नहीं होता। हकीकत यह  है कि देश भर में दहेज के कारण जो प्रताड़नाएं और हत्याएं होती हैं, वे अधिकांश स्वजातीय और कुंडलियों के मिलान के बाद ही होती हैं। 

अभी कुछ दिनों पहले ही आजमगढ़ से प्रिंस यादव नामक एक लड़के द्वारा बेरहमी से अपनी दोस्त आराधना प्रजापति की हत्या की खबर आई, जिसमें उसने लड़की के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। बताया जा रहा है कि लड़के के मां-बाप ने ही उसे रास्ते से हटाने की बात कही। लेकिन खबर यह बनाई गई कि लड़की विवाह नहीं कर रही थी। लेकिन हकीकत यह है कि यह मामला जातीय अस्मिता से ज्यादा जुड़ा हुआ है। आखिर मां-बाप क्यों अपने बच्चे को लड़की की हत्या के लिए उकसा रहे थे? यही ना कि उसका विवाह स्वजातीय लड़की से करा सकें?  

इसी महीने एक और घटना घटित हुई, जिसमें आयुषी नामक लड़की की हत्या उसके पिता ने गोली मारकर कर दी। आयुषी की मां और भाई ने उसके शव को सूट्कैस में छिपाकर यमुना एक्स्प्रेस हाइवे पर मथुरा के पास फेंक दिया। इस मामले में भी यही बात सामने आई कि वह छत्रपाल नामक लड़के से प्यार करती थी और शायद सहजीवन में रह रही थी, जिसके कारण उसके घर में तनाव रहता था। तनाव की वजह यह भी कि लड़का दूसरी जाति का था। इसलिए उसके परिवार को वह अस्वीकार था तथा  कहा-सुनी में पिता ने अपनी ही बेटी को गोली मार दी। इस मामले मे छत्रपाल भी बहुजन समाज से आने वाली कृषक जाति, गुज्जर जाति से आता है और आयुषी यादव समुदाय से थी। 

अक्सर जब कोई लड़की दूसरी जाति के लड़के साथ रिश्ता बनाती है तो उसके परिवार वाले अपने आपको लुटा हुआ मानते हैं। गोया लड़की यदि गैर बिरादरी में चली गई तो पूरी नाक कट जाएगी। इस प्रकार प्रेम करना हमारे समाज में सबसे बड़ा अपराध बन जाता है, क्योंकि तब कोई भी आपके साथ खड़ा नहीं होता। 

ऐसा नहीं है कि भारत के किसी एक प्रांत में ही इस तरह की घटनाएं हुई हैं। दरअसल यह केवल जाति की श्रेष्ठता को बनाए रखने की ही बात भर नहीं है, अपितु जाति को पवित्र समझकर उसे बचाए रखना भी है। सवाल इस बात का भी नहीं है कि इसमें लड़के या लड़की की जाति क्या है, क्योंकि अगर कोई अपनी ही बिरादरी में भी अपनी चाहत से विवाह करे तो अक्सर उनके माता-पिता और समाज को स्वीकार नहीं होता। 

फिर दुखद यह कि ये सभी मामले हमारे नजर में केवल हत्या की घटनाओं के उदाहरण तक ही सीमित रह जाते हैं और जल्दी ही गायब हो जाते है, क्योंकि बृहत्तर हिंदुत्व नॅरेटिव में इसे फिट करने के लिए यह जरूरी है कि इन घटनाओं में कोई मुस्लिम हो तो वह ‘देश’ और हिंदुओं के लिए  खतरा बन जाती हैं। लेकिन बाकी घटनाओं को कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता। इसलिए दिल्ली के चैनल इस समय केवल एक ही सवाल से ‘जूझ’ रहे हैं कि श्रद्धा वाकर नामक लड़की, जो आफताब पूनावाला के साथ सहजीवन जी रही थी, उसकी हत्या कैसे हुई और क्या यह ‘लव जेहाद’ का मामला नहीं था? इसमें कोई शक नहीं है कि श्रद्धा की जघन्य हत्या की गई, लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अब हमारे देश और समाज में किसी भी घटना को जघन्य कहना एक पाखंड सा लग रहा है, क्योंकि यहां तो जघन्यता की सीमाएं पहले ही लांघी जा चुकी हैं। तंदूर मे अपनी पत्नी को जलाने वाला सुशील शर्मा अब ‘अच्छे’ चरित्र का प्रमाणपत्र पाकर छूट चुका है। गुजरात मे बिलकिस बानो का बलात्कार करनेवाले, उसकी बेेटी और उसके परिजनों की हत्या करनेवालों को रिहा कर दिया गया। 

राजस्थान के राजसमंद में शंभु लाल रैगर का मामला हो या उदयपुर में ईशनिंदा के नाम पर एक टेलर मास्टर की हत्या, उत्तर प्रदेश में उन्नाव की घटनाएं हो या हाथरस की, दिल्ली में निर्भया का मामला हो या उत्तराखंड की अंकिता या फिर जगदीश हत्याकांड, जिसे राजपूत लड़की के साथ विवाह करने पर सजा-ए-मौत दे दी गई। दक्षिण से लेकर उत्तर तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक जातिभेद से उपजी घृणा और उसके फलस्वरूप महिलाओं की चाहतों पर नियंत्रण की एक जैसी ही कहानी है।  

हम सभी अपनी-अपनी जातियों की आजादी या सर्वोच्चता चाहते हैं, लेकिन उसमें अपने बच्चों या अपने घर की महिलाओं की आजादी नहीं चाहते हैं। नतीजा यह होता है कि हमे अपनी झूठी शान या इज्जत के लिए अपने बच्चों की हत्या तक करने में कोई परहेज नहीं होता। 

अब आज के दौर में सरकार के इशारे पर नाचनेवाली मीडिया को कोई मुस्लिम खलनायक चाहिए ताकि वह उस घटना पर ज्यादा फोकस करे और सांप्रदायिकता को घृणा में बदल दिया जाए। और जब मुस्लिम एंगल नहीं मिलता है तो इसी प्रकार के अन्य जघन्य हत्याकांडों को जगह भी नहीं मिलती। बाजदफा जगह मिलती भी है तो केवल सामान्य अपराध की श्रेणी में रख दिया जाता है।  

दरअसल, सभी महिलाओं पर पुरुषों के अधिपत्य और हमारे सामाजिक जीवन के खोंखलेपन को भी दर्शाता है, जहां महिलाओं के पास अलग होने के निर्णय लेने की क्षमता होने के बावजूद समाज के जाहिलपन से लेकर कानूनी अड़चनों तक के अनगिनत सवाल होते हैं, इसलिए वह समझौते करती रहती है ताकि एक दिन तो उसके बदलने से चीजें बदल जाएंगीं। 

डॉ. आंबेडकर ने हमारे समाज के संबंध में 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने वक्तव्य में कहा था–

“26 जनवरी, 1950 से हम अंतर्विरोधों के एक नये युग में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हम सभी बराबरी पर होंगे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में गैर-बराबरी बनी रहेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत पर चलेंगे, लेकिन हमारी सामाजिक और आर्थिक जिंदगी ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के सिद्धांत पर अपने ढांचों के कारण से नहीं चलेगी। आखिर कब तक हम इस तरह अंतर्विरोध मे जीते रहेंगे? अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन मे हम कब तक ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के सिद्धांत के खिलाफ चलेंगे। यदि हम लंबे समय तक लोगों को सामाजिक आर्थिक जीवन में बराबरी नहीं दे पाए तो हमारा राजनैतिक लोकतंत्र एक दिन खतरे मे पड़ जाएगा। हमें अतिशीघ्र इस अंतर्विरोध को समाप्त करना चाहिए, नहीं तो जो लोग इस व्यवस्था के शिकार हैं, वे इस राजनैतिक लोकतंत्र को, जिसे हमने इतनी मेहनत से बनाया है, उसे खत्म करने में कोई समय नहीं लगाएंगे।” 

इसी भाषण में वे कहते हैं कि जिस देश में इतनी जातियां होंगीं, वह देश एक कैसे होगा। जाति देश विरोधी है, क्योंकि यह समाज में पृथकता पैदा करती है। यह देश विरोधी इसलिए है, क्योंकि यह आपस में ईर्ष्या और नफरत पैदा करती है।

डॉ. आंबेडकर ने यह बात कई बार कही कि जाति हमारी वैयक्तिकता का सम्मान नहीं करती और जिस समाज में वैयक्तिता नहीं है, वह समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता। 

आज हमारे सामाजिक जीवन में घनघोर हिंसा और घृणा है। इसका अहम कारण यह कि जाति आधारित अस्मिताएं, जिनके कारण जाति पर गर्व करने के लिए सब एकजुट हैं लेकिन जब बात किसी की चाहत की होती है तो उसकी जान लेने में एक मिनट की देर भी नहीं लगाते। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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