h n

के. बालगोपाल के जाति-विरोधी साहित्य का अवलोकन

इस नागरिक अधिकार कार्यकर्ता व वकील की मान्यता थी कि जाति-आधारित समाज की आंबेडकर द्वारा की गई समालोचना ‘एक लोकतांत्रिक व्यक्ति द्वारा एक गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था की समालोचना’ भी है। पहले के अवसान के साथ ही दूसरे का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और दोनों का चोली-दामन का साथ है। बता रही हैं अनामिका दास

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और वकील के. बालगोपाल, जिनकी कर्मभूमि मुख्यतः संयुक्त आंध्रप्रदेश (जो अब आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में विभाजित है) थी, के जाति-विरोधी साहित्य की समीक्षा करना एक चुनौती है। ऐसा इसलिए क्योंकि जाति’ उनके लेखन कर्म की एक महत्वपूर्ण धुरी तो थी, परंतु वे कई विषयों पर एक साथ काम कर रहे थे। उनका फोकस अधिक व्यापक क्षेत्र पर था, जो उनके अनुसार, अधिकारों का आंदोलन’ था। उनकी प्रत्येक कृति – चाहे वह भूमि से जुड़े मुद्दों पर हो या किसी न्यायालीय कार्यवाही पर या कानून, नागरिकों के अधिकार या घरेलू हिंसा पर केंद्रित हो – उन सभी में या तो कार्यात्मक अथवा सैद्धांतिक अथवा दोनों स्वरूपों में जाति उपस्थित है। इसलिए उनके जाति-विरोधी साहित्य की समीक्षा के लिए हमें उनके संपूर्ण लेखन की समीक्षा करनी होगी। लेकिन इस लेख में हम केवल उनकी चुनिंदा कृतियों (व व्याख्यानों) की समीक्षा करेंगे, जिसमें उन्होंने जाति’ को नागरिक अधिकार आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उनका लेखन मुख्यतः आरक्षण व जाति-आधारित अत्याचारों एवं लोकतंत्र से इनकी संगतता पर केंद्रित है।

उन्होंने मई, 1996 में बंगलौर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपने व्याख्यान और अपनी कुछ कृतियों में भारत में नागरिक अधिकार संगठनों की प्रकृति के इतिहास पर प्रकाश डाला है। इनमें से कुछ संगठनों, जैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल), का गठन 1976 में आपातकाल की प्रतिक्रिया में किया गया था। उस दौर में मौलिक अधिकार खतरे में थे। इसके अतिरिक्त, कुछ नागरिक अधिकार संगठन फर्जी मुठभेड़ों और राज्य द्वारा इसी तरह की न्यायेतर ज्यादतियों की प्रतिक्रिया में अस्तित्व में आए। इनमें से अधिकांश ज्यादतियां उनलोगों के खिलाफ की गईं, जिनके ऊपर माओवादी होने का संदेह था। पश्चिम बंगाल में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राईटस (एपीडीआर) एवं आंध्रप्रदेश सिविल लिबर्टिज कमेटी (एपीसीएलसी) का क्रमशः 1972 और 1974 में गठन, इसके दो उदाहरण हैं। इस प्रतिरोध के अन्य उदाहरण भी हैं, जिनमें व्यक्तिगत रूप से प्रतिरोध करने वाले शामिल हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने आपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिक्ख नवयुवकों को अगवा कर उनकी हत्या किए जाने की घटनाओं के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी। खालड़ा को 1995 में अत्यंत क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। नागरिक अधिकार संगठनों का गठन भले ही अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ हो, लेकिन उन सभी ने राज्य की तानाशाहीपूर्ण और निष्ठुर कार्यवाहियों का विरोध किया। सन् 1982 से लेकर 1998 तक एपीसीएलसी के सदस्य के रूप में बालगोपाल ने इन्हीं सिद्धांतों को अपनाया और उनके अनुरूप काम किये। परंतु सन् 1996 के अपने व्याख्यान में उन्होंने स्मरण किया कि अनेक आंबेडकरवादियों, जाति विरोधी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने उनके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया कि जाति’ का ‘नागरिक अधिकारों’ से क्या कोई संबंध नहीं है?

एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार से आनेवाले बालगोपाल ने यह स्वीकार किया कि एपीसीएलसी से उनके जुड़ाव के शुरूआती वर्षों में उनकी भी यही मान्यता थी कि जाति का नागरिक अधिकार के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन जल्द ही उन्हें यह अहसास हुआ कि जाति और नागरिक अधिकार न केवल आपस में जुड़े हुए हैं, बल्कि उन्हें लगा कि जाति का प्रश्न किसी भी नागरिक अधिकार आंदोलन का शुरूआती बिंदु होना चाहिए। उन्होंने 1996 में जब अपना व्याख्यान दिया था तब एपीसीएलसी से उनका जुड़ाव अंतिम चरण में था। उन्होंने कहा कि, “अक्सर आंबेडकर के विचारों को जाति के विरूद्ध संघर्षरत दलित बुद्धिजीवियों की सोच के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन हमें इससे भी आगे बढ़कर आंबेडकर को भारत में लोकतंत्र के सबसे महान पैरोकारों में से एक के रूप में देखना चाहिए। आंबेडकर को यह पूरा विश्वास था कि भारत में उन लोकतांत्रिक सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए, जो यूरोप के ज्ञानोदय आंदोलन व वहां की लोकतांत्रिक क्रांति से उपजे हैं। यह बात आंबेडकर ने कई बार कही और उनके लेखन में ये दोनों मसले मिश्रित स्वरुप में हैं। यह आंबेडकर के लेखन से उपजा एक अत्यंत शक्तिशाली विचार है और इस विचार को नागरिक अधिकार आंदोलन का हिस्सा बनना ही चाहिए…”

उनकी मान्यता थी कि जाति आधारित समाज की आंबेडकर द्वारा की गई समालोचना एक लोकतांत्रिक व्यक्ति द्वारा एक गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था की समालोचना” भी है। एक के अवसान के साथ ही दूसरे का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और दोनों का चोली-दामन का साथ है। यह एहसास उन्हें इस व्याख्यान के काफी पहले हो गया था और उन्होंने इस मुद्दे पर अंग्रेजी में व्यापक लेखन किया। 

सन् 1980 में मंडल आयोग ने आरक्षण की व्यवस्था में अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) को शामिल करने की सिफारिश की। ओबीसी पूरे देश की ऐसी जातियों का समूह था, जिन्हें सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला था। इन जातियों की पहचान की जा सकती थी और आबादी में उनके हिस्से का निर्धारण भी संभव था। 

इसके लगभग एक दशक बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने इस सिफारिश को लागू करने का निर्णय लिया। इसके नतीजे में जो घिनौनी हिंसा हुई, उसे हम आज भी नहीं भुला सकते। बालगोपाल ने मंडल-विरोधी आंदोलनों के बारे में लिखा। परंतु उसके पहले, 1986 में उन्होंने आंध्रप्रदेश की एन. टी. रामाराव सरकार द्वारा गठित मुरलीधर राव आयोग के बारे में भी लिखा था। इस आयोग की रपट मंडल आयोग की रपट से प्रभावित थी और इसमें यह सिफारिश की गई थी कि राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण में वृद्धि की जानी चाहिए। इन दोनों विषयों पर उनके लेखन में कई बातें समान थीं और उनमें कई ऐसे विचार व्यक्त किए गए थे, जो आज भी अनूठे लगते हैं।

करीमनगर (पूर्व में आंध्रप्रदेश और अब तेलंगाना) में आंबेडकर की मूर्ति के बगल में (बाएँ) के. बालगोपाल (1952-2009) (फोटो साभार: बालगोपाल.ओआरजी)

सबसे पहले उनके लेखन से यह पता चलता है कि हिंसा’ (इस मामले में जिसकी प्रकृति जातिगत थी) एक सतत प्रक्रिया है और जिसमें मीडिया, राज्य और समाज तीनों की भूमिका है। दोनों मुद्दों पर लेखन में वे कहते हैं कि मीडिया और पुलिस सामान्यतः किसी भी आंदोलन, विरोध प्रदर्शन या प्रतिरोध के विरूद्ध होते हैं। परंतु ओबीसी आरक्षण के विरूद्ध प्रदर्शनों को मीडिया प्रोत्साहित करती दिखी और ऐसा लगा कि प्रदर्शनकारियों से उसकी सहानुभूति है। पुलिस ने यह सुनिश्चित किया कि एक भी प्रदर्शनकारी घायल न हो। राजनैतिक पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इन विरोध प्रदर्शनों का समर्थन नहीं किया, परंतु यह सुनिश्चित किया कि उनकी युवा शाखाओं के सदस्य जोर-शोर से इसमें भागीदारी करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों संदर्भों में उन वर्गों का पाखंड स्पष्ट देखा जा सकता है, जिनका यह दावा रहता है कि वे आमजनों की तुलना में अधिक जागरूक हैं और किसी भी मुद्दे का समालोचनात्मक और तार्किक विश्लेषण करते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रगतिशील समूह, जो बुद्धिजीवी वर्ग कहलाते हैं, और जिनमें कुछ शिक्षाविद्, वामपंथी राजनैतिक दल और उदारवादी मीडिया से जुड़े लोग शामिल हैं, ने आरक्षण-विरोधी आंदोलन के दौरान अपना असली रंग दिखा दिया। प्रगतिशील हलकों में जाति पर विमर्श पूर्णतः अदृश्य था और उसे अतीत का मुद्दा माना जाता रहा। प्रगतिशील तबके से कई ऐसे आख्यान निकले जो विरोध प्रदर्शनों को औचित्यपूर्ण ठहराने पर केंद्रित थे। कुछ ने योग्यता’ पर समुचित ध्यान न दिए जाने की बात कही तो कुछ ने कहा कि यह आंदोलन रोजगार के अवसर खोने की चिंता और आशंका का नतीजा है। अन्यों ने पिछड़े वर्ग में शामिल जातियों की परेशानियों और दुःखों की तुलना ऊंची जातियों के निम्न वर्गों से की। बालगोपाल ने न केवल जाति-आधारित समाज के निर्माण की प्रक्रिया का गहराई से विश्लेषण किया वरन् उन्होंने यह भी बताया कि पिछड़े वर्गों को संगठित और गोलबंद करना अनुसूचित जातियों को संगठित और गोलबंद करने से कठिन क्यों है।

अनुसूचित जातियों के विरूद्ध अत्याचार लंबे समय से होते आए हैं। आंध्रप्रदेश में सन् 1985 का कारम्चेडू नरसंहार इस श्रेणी की सबसे भयावह घटनाओं में से एक था। इस घटना में हमलावर – कृषकों की एक वर्चस्वशाली जाति कम्मा – से थे। यह विडंबना ही है कि कम्माओं ने आंध्रप्रदेश में जाति-विरोधी आंदोलन, जो कि विशिष्टतः ब्राम्हणों के विरूद्ध था, का आगाज किया था। लेकिन मंडल-विरोधी आंदोलन, पिछड़ी जातियों के अधिकारों को पहली चुनौती था और यह ज़रूरी था कि देश भर में बिखरी ऐसी जातियों का एक नेटवर्क बनाया जाए। 

वामपंथियों की इस चिंता कि आरक्षण से नौकरी के अवसर कम होंगे, का समाधान करते हुए हुए बालगोपाल ने लिखा कि यह आशंका निराधार एवं संदिग्ध है। वैसे भी, सन 1990 के दशक की शुरुआत में जब यह आंदोलन चल रहे थे, उस समय आरक्षण को शैक्षणिक संस्थाओं में लागू नहीं किया गया था और राज्य सरकारों को इस आरक्षण को लागू करने या न लागू करने का विकल्प उपलब्ध था। ऊंची जातियां बड़ी संख्या में उपलब्ध कम वेतन वाले निम्न स्तर के पदों के बारे में चिंतित नहीं थी, क्योंकि ये पद ‘योग्यता’ पर उनके एकाधिकार के दावों को प्रभावित नहीं करते थे। लेकिन ऊंची जातियां यह पचा नहीं पा रहीं थीं कि निम्न जातियां उनकी जातिगत पहचान के आधार पर गोलबंद हो रहीं थीं और उनमें यह हिम्मत आ गई थी कि वे राज्य से अपनी मांगें पूरी करने की अपेक्षा करें। इससे ही यह पता चलता है कि ‘योग्यता’ की बात कितनी खोखली थी और जातिगत अभिमान से जनित थी। 

उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि ‘योग्यता’ का मुद्दा उठाकर ब्राह्मणवादी एक तरह से यह कह रहे हैं कि ज्ञान के मामले में वे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि अगर शैक्षणिक अहर्ता और रोज़गार हासिल करने के लिए योग्यता ज़रूरी है तो यह तर्क उच्च जातियों के कब्ज़े में जो संपत्ति है, उस पर क्यों लागू नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में अगर ‘योग्यता’ ही समाज के संचालन का आदर्श है तो ऊंची जातियों की संपत्ति ‘योग्य’ लोगों को उत्तराधिकार में मिलनी चाहिए ना कि संबंधित व्यक्तियों के बेटों, पोतों और परपोतों को। लेकिन संपत्ति के मामले में, अधिकार का निर्धारण जन्म से होता है न कि ‘योग्यता’ से। इसलिए, उन्होंने कहा कि ये सारे आख्यान केवल उस उच्च जातियों के उस कोप को ढंकने के प्रयास हैं, जो इस तथ्य से उपजा है कि निम्न कही जानेवाली जातियां उन अधिकारों की मांग कर रहीं हैं, जो उनकी दृष्टि में उच्च जातियों के लिए आरक्षित हैं। 

जहां तक ऊंची जातियों के निम्न वर्गों की पिछड़े वर्गों से समतुल्यता का प्रश्न है, उनका कहना था कि जाति के उद्भव से ही यह स्पष्ट है कि इस तरह की तुलना संभव नहीं है। ऊंची जातियों का निम्न वर्ग भी उनकी जाति को सुलभ संसाधनों का उपयोग कर अपनी स्थिति बेहतर कर सकता है और नौकरियां पा सकता है। सामाजिक संबंध-संपर्क के ज़रिये उच्च जातियों के लोग विशेषाधिकारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन यह सुविधा निम्न जातियों को उपलब्ध नहीं है। 

दूसरे शब्दों में, ऊंची जातियों के निम्न वर्गों को भी जो सामाजिक पूंजी सहज सुलभ है, वह निम्न जातियों को अप्राप्य है। इस सिलसिले में, 1986 और 1990 के आंदोलनों का मखौल उड़ाते हुए, बालगोपाल ने कहा कि वे शास्त्रों और पूंजी पर आधारित थे और व्यर्थ की नौटंकी के अलावा कुछ नहीं थे। इस संदर्भ में प्रगतिशील तबकों, विशेषकर वामपंथियों, को वर्गीय पहचान को मुद्दा बनाने की बजाय, उच्च जातियों के निम्न वर्गों को यह समझाना था कि आरक्षण से उनमें बेरोज़गारी बढ़ने की उनकी आशंका निराधार है। 

बालगोपाल ने आंध्रप्रदेश के दो सबसे भयावह जातिगत नरसंहारों के बारे में काफी कुछ लिखा है। ये थे 1985 का कारम्चेडू नरसंहार और 1991 का चुंडूरु नरसंहार। उन्होंने इन दोनों नरसंहारों की पृष्ठभूमि की विवेचना करते हुए लिखा कि इनके पीछे जातिगत और लैंगिक, दोनों मुद्दे थे। सन 1991 के नरसंहार की शुरुआत इस अफ़वाह से हुई थी कि एक ब्राह्मण महिला के साथ एक दलित ने बलात्कार किया है। उन्होंने मनुस्मृति का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि किसी निम्न जाति की महिला द्वारा उच्च जाति की महिला को स्पर्श करना और विशेषरूप से किसी निम्न जाति के पुरुष का उच्च जाति की महिला के साथ संभोग ऐसे अपराध हैं, जिनकी अत्यंत कड़ी सजा दी जानी चाहिए, क्योंकि महिला का शरीर उसके समुदाय या जाति के सम्मान से जुड़ा होता है। इस तरह की सोच के चलते उच्च जातियों की महिलाओं का दमन निश्चित रूप से बढ़ता है, लेकिन वे भी अपनी जाति के नेटवर्क से जुडीं होतीं हैं और इस कारण संसाधनों तक उनकी पहुंच होती है, जिसके चलते वे निम्न जाति की महिलाओं के दमन में बराबर की सहभागी बन जातीं हैं। 

इसी तरह मनुस्मृति इस बात की भी इज़ाज़त देती हैं कि अगर निम्न जातियां उस तरह से व्यवहार नहीं कर रहीं हैं, जैसा कि उनसे अपेक्षित हैं तब ऐसी जातियों की महिलाओं के साथ उनसे उच्चतर जातियों के पुरुष बलात्कार कर सकते हैं। बालगोपाल की दृष्टि में, जातिगत और लैंगिक मुद्दे आपस में इस कदर उलझे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग करने देखना संभव ही नहीं है। 

चुंडूरु नरसंहार के मामले में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उपयोग किया किया और जिस गांव में यह नरसंहार हुआ था, वहीं एक विशेष अदालत ने पूरे मामले की सुनवाई की। यह घटना के पीड़ितों के आंदोलन का नतीजा था। इसके बहुत सालों बाद, सन 2006 में, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में व्याख्यान देते हुए, बालगोपाल ने इस मज़बूत कानून, जो एससी व एसटी के आंदोलनों और मांगों का सीधा नतीजा था, की सराहना की। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस अधिनियम को पुलिस और न्यायपालिका में उच्च जातियों के वर्चस्व और राज्य और समाज के इन घटकों की ब्राह्मणवादी मानसिकता के चलते, पूर्णतः लागू नहीं किया जा सका है। उन्होंने कहा कि कारम्चेडू और चुंडूरु जैसे नरसंहार होते रहते हैं और ये आकस्मिक नहीं होते वरन् रोज़-ब-रोज़ होने वाली हिंसा से उपजते हैं। 

बालगोपाल ने दोनो नरसंहारों की तुलना करने हुए अत्यंत भेदक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि 1991 के चुंडूरु नरसंहार के मामले में उच्च जातियों ने 1985 के नरसंहार की तुलना में अपना कहीं ज़ोरदार बचाव किया। यह शायद 1990 के मंडल-विरोधी आंदोलन के दौरान उनमें पनपी घिनौनी एकता का नतीजा था। इस आंदोलन ने उन्हें जातिगत पदक्रम में उनकी स्थिति का ‘उपयोग’ करना और भयावह दमन को औचित्यपूर्ण ठहराने का आधार प्रदान किया। सार्वजनिक नियोजन में आरक्षण और ‘योग्यता’ के मुद्दों को लेकर जो जातिगत गोलबंदी हुई थी, के अलावा जातिगत अत्याचार आदि को एक ही सिरे में देखा जाना चाहिए। 

इस दौर में जब आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को आरक्षण देने के लिए किये गए संवैधानिक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने वैध करार दे दिया है और इस मसले पर उदारवादी, प्रगतिशील और वामपंथी तबकों ने चुप्पी साध रखी है; जब जातिगत अत्याचारों की कई घटनाएं सामने आ रहीं हैं और उनसे कहीं अधिक सामने नहीं आ रहीं हैं, तब बालगोपाल का जाति-विरोधी लेखन अत्यंत सामयिक और प्रासंगिक नज़र आता है। बालगोपाल की अधिकारों के लिए आंदोलन की व्यापक परियोजना की सीख यही है कि जब तक जाति का विनाश नहीं होता, तब तक एक असली लोकतांत्रिक समाज के निर्माण का स्वप्न अधूरा ही रहेगा। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अनामिका दास

लेखिका हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद में समाज शास्त्र की पीएचडी शोधार्थी हैं

संबंधित आलेख

Why more and more Dalitbahujan are embracing Buddhism
Over the past few years, the Dalitbahujan are increasingly converting to Buddhism. Does this have anything to do with a State that has allowed...
Christmas is a protest against all forms of oppression
'O Holy Night', it turns out, was a song of political resistance and protest. Imagine white Americans singing the lyrics in the years leading...
A review of K. Balagopal’s anti-caste literature
The civil rights activist and lawyer believed that Ambedkar’s critique of a caste society is also a “democrat’s critique of an undemocratic system”. One...
‘Chhello Show’: What EWS would look like on-screen
‘Poor Brahmin’ is the constant refrain in this film chosen as India’s official entry for the Best International Feature category at the 95th Oscars,...
How can late K. Balagopal’s learnings on the ground benefit academia today
In his writings, Balagopal has revisited the concept of ‘universal’ in a way which I believe, can be visited by us, students and academics,...