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आंखन-देखी : जब बाबासाहब बोल रहे थे

“जब बाबासाहब संसद में बोल रहे थे तो पूरा हॉल उनके भाषण को गंभीरता से सुन रहा था। उनका भाषण लंबा था और जब उन्होंने भाषण खत्म किया तो सभी लोगों ने खड़े होकर और मेजें थपथपाकर बहुत देर तक तालियां बजाई। जवाहरलाल नेहरू ने उनसे हाथ मिलाया और ऐसे ही अन्य सदस्य उनके पास आकर उन्हे बधाई देने लगे और गले मिले।” पढ़ें, शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के पंजाब प्रांत के महासचिव रहे करतार चंद सुलेख से विद्याभूषण रावत की आत्मीय बातचीत

यदि आप आंबेडकरवादी हैं और इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं तो यह कल्पना करें कि क्या हो यदि आप एक ऐसे व्यक्ति से मिलें, जिन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर को न केवल सुना, बल्कि उनके साथ काम करने का अवसर भी उन्हें मिला हो? पिछले तीस वर्षों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला, जिन्होंने अपनी आंखों से डॉ. आंबेडकर को देखा और उनके साथ काम किया, और मैं हर बार गौरवान्वित महसूस करता हूं। ऐसे लोगों को सुनना अपने आप मे एक बेहद खूबसूरत अनुभव है और जब भी ऐसे अवसर मिलते हैं तो मैं कोशिश करता हूं कि उनके कहे को सहेजा जाय। 

बीते 7 दिसंबर, 2022 को करतार चंद्र सुलेख से मिलने चंडीगढ़ उनके निवास स्थान गया। वे एक समय में डॉ. आंबेडकर द्वारा गठित शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की पंजाब प्रांत के महासचिव रहे थे और डॉ. आंबेडकर के साथ कई अवसरों पर मिल चुके थे। यहां तक कि वे 25 नवंबर, 1949 को पंजाब के शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के अध्यक्ष सेठ किशन दास के साथ संसद की दीर्घा मे बैठकर संविधान सभा में बाबासाहब का ऐतिहासिक भाषण सुन रहे थे। उन लमहों को याद करते हुए वे कहते हैं कि “जब बाबासाहब संसद में बोल रहे थे तो पूरा हॉल उनके भाषण को गंभीरता से सुन रहा था। उनका भाषण लंबा था और जब उन्होंने भाषण खत्म किया तो सभी लोगों ने खड़े होकर और मेजें थपथपाकर बहुत देर तक तालियां बजाई। जवाहरलाल नेहरू ने उनसे हाथ मिलाया और ऐसे ही अन्य सदस्य उनके पास आकर उन्हे बधाई देने लगे और गले मिले।” 

करतार चंद्र सुलेख का जन्म 20 जुलाई, 1927 को पंजाब के जिला नवा शहर के बंगा नामक स्थान पर बीरू राम और दानी के घर में हुआ था। करीब 65 वर्ष की उम्र में इनके पिता का देहांत हो गया। तब करतार नौवीं कक्षा के छात्र थे। उनके पिता पारंपरिक वैद्य थे। सांप के काटने, कीड़े-मकोड़ों के काटने पर लोगों इलाज करते थे और साथ ही पारंपरिक गायन भी करते थे। 

आप बाबासाहब से पहली बार कब मिले? मेरे इस सवाल के जवाब में सुलेख साहब ने बताया कि गांधी जी की हत्या से 3-4 दिन पहले की बात है, जब वह सेठ किशन दास के साथ बाबासाहब से मिलने दिल्ली गए थे। मिलने का मकसद था– पंजाब में दलितों के हितों को सुरक्षित करने हेतु उर्दू मे ‘उजाला’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू करना। 

करतार चंद सुलेख

सर्वविदित है कि गांधी जी की हत्या 30 जनवरी, 1948 को हिंदू महासभा के सदस्य नाथूराम गोडसे ने कर दी थी। बाबासाहब ने इस पत्रिका के शुरू किए जाने के अवसर पर एक संदेश भेजा था, जो कि सुलेख साहब ने आज भी संभाल कर रखा है। यह 12 अप्रेल, 1948 को डॉ. आंबेडकर द्वारा “1, हार्डिंग एवेन्यू, नई दिल्ली” से भेजा गया पत्र है। इसका हिंदी अनुवाद निम्नवत है– 

[“प्रिय श्री सुलेख,

मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आप पंजाब के अनुसूचित जातियों के हितों के लिए एक समाचार पत्र उजाला निकाल रहे हैं। मैं भारत में किसी ऐसे हिस्से को नहीं जानता, जहां जातिवादी हिंदू दलितों और अन्य दबे-कुचले लोगों पर अत्याचार नहीं कर रहे हों और जहां सरकार ने इसे दबाने के लिए कुछ इच्छाशक्ति दिखाई हो। हमारे अपने विधायक इस मामले में पूरी तरह से असफल रहे हैं। 

यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि पूर्वी पंजाब में कोई ऐसा अखबार नहीं है, जो हमारी परेशानियों और समस्याओं को बता सके और हमारे लोगों को सही जानकारी दे सके। आपका यह अखबार बहुत आवश्यक है। मैं आपको इस कार्य के लिए शुभकामनाएं देता हूं और मुझे आशा है कि हमारे लोग आपको इस कार्य मे पूरा सहयोग करेंगे।”] 

दरअसल, इससे पहले ही सुलेख साहब ने बाबासाहब की प्रसिद्ध पुस्तक ‘गांधी और अछूतों की आजादी’ का उर्दू में अनुवाद किया था। यह एक प्रकार से डॉ. आंबेडकर की पुस्तकों का उनकी मूल भाषा से सर्वप्रथम अनुवाद रहा होगा। 

ऐसा नहीं है कि डॉ. आंबेडकर से मिलने का अवसर सुलेख साहब को यूं ही मिल गया। दरअसल, पंजाब मे शेड्यूल कास्ट फ़ेडरेशन के अध्यक्ष सेठ किशन दास 1937 में पंजाब विधान सभा में चुने गए और वह 1946 तक विधायक रहे। वह बताते हैं कि 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड मे पहले पंजाब को कोई सीट नहीं दी गई थी, लेकिन पूना पैक्ट के बाद पंजाब को 8 सीटें मिलीं। उन्मे से एक जालंधर के पास बूटा मंडी है, जहां से सेठ किशन दास यूनियनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। 1942 में वह डॉ. आंबेडकर से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के सम्मेलन में नागपुर में मिले और इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पंजाब में भी इसकी शाखा खोल दी। 

उन दिनों सुलेख साहब जालंधर के दोआबा कालेज में पढ़ने के लिए आए थे और डॉ. आंबेडकर से प्रभावित होने के कारण शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की गतिविधियों में सहयोग करने लगे। धीरे-धीरे सेठ किशन दास ने उन्हें फेडरेशन का महासचिव बना दिया ताकि वे उनकी मदद कर सकें। फिर तो उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सेठ किशन दास के नेतृत्व में वह उनके साथ पूरे पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में कार्यक्रमों मे भाग लेने लगे। 

फिर उन्हें संसद के ऐतिहासिक अधिवेशन में सुनने का अवसर मिला जब 25 नवंबर, 1949 को हुई संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई, जिसमें डॉ. आंबेडकर ने अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। 

उर्दू समाचार पत्र ‘उजाला’ का प्रकाशन प्रारंभ होने के अवसर पर करतार चंद सुलेख को डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखा गया पत्र

इसके बाद भी सुलेख साहब को डॉ. आंबेडकर को कई बार सुनने, नजदीक से देखने और जानने का भी अवसर मिला। संविधान के बाद, डॉ. आंबेडकर हिंदू कोड बिल के निर्माण में लग गए। इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें विशेष रूप से अनुरोध किया था। डॉ. आंबेडकर को यह लगा कि हिंदू कोड बिल भारत के इतिहास में सामाजिक बदलाव का एक बहुत बड़ा हथियार साबित होगा। संविधान तो बन गया था लेकिन सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए यह हिंदू कोड बिल बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज होगा। हालांकि वह जान रहे थे कि कांग्रेस के डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल सहित अनेक बड़े नेता इस बिल का विरोध कर रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यकीन था कि इस बिल को प्रधानमंत्री नेहरू संसद मे पारित करा देंगे। लेकिन इस बिल को पारित न कर देने और इसके टुकड़े-टुकड़े कर देने से डॉ. आंबेडकर बुरी तरह से आहत थे। 

सुलेख साहब कहते हैं कि वाकई में बाबासाहब बहुत गुस्से में थे। उन्होंने इस बिल को इतनी मेहनत से बनाया था। इस बिल के विरोध में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, के. एम. मुंशी, अनंत स्वामी अयंगर आदि सभी हो गए थे और इसीलिए नेहरू को बिल को संसद में स्थगित करना पड़ा। 

अप्रैल 1951 में इस बिल और अन्य मसलों पर तत्कालीन सरकार से मतभेदों के चलते डॉ. आंबेडकर ने केंद्रीय विधि मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। वह संसद को इन परिस्थितियों के बारे में बताना चाहते थे, जिनके चलते उन्हें त्यागपत्र देने को मजबूर होना पडा। लेकिन उन्हें संसद मे वक्तव्य देने से रोका गया। अंत में 10, अक्टूबर, 1951 को डॉ. आंबेडकर ने संसद में अपना बयान दिया। उस समय भी सुलेख साहब और सेठ किशन दास दर्शक दीर्घा में बैठे थे। जैसे ही डॉ. आंबेडकर ने संसद में अपने त्यागपत्र के कारणों की घोषणा की, पंजाब में उन्हें लाने के लिए आंबेडकरवादियों ने प्रयास शुरू कर दिए, क्योंकि 1951-52 के संसदीय चुनावों की घोषणा हो चुकी थी और शेड्यूल कास्ट फेडरेशन चाहती थी कि बाबासाहब पंजाब आएं। उनके समर्थकों और चाहने वालों की संख्या पंजाब में बहुत ज्यादा थी। 

सुलेख साहब बताते हैं कि डॉ. आंबेडकर 27 अक्टूबर, 1951 को हवाई जहाज से अमृतसर पहुंचे और फिर वहां से सड़क मार्ग से जालंधर आए। इस क्रम में कई जगहों पर लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। जालंधर में उनकी दो सभाएं थीं, जिसमें एक आबादी में, जहां अब आंबेडकर भवन है और दूसरी डीएवी कालेज में। सुलेख साहब तब नौजवान थे और पढ़ाई के साथ अपना काम लगातार कर रहे थे। ‘उजाला’ की जिम्मेदारी उनके पास थी और इसके लिए डॉ. आंबेडकर के कई लेखों का उर्दू मे अनुवाद भी कर चुके थे। इसलिए भी जालंधर की ऐतिहासिक रैली के संचालन की जिम्मेवारी उन्हें दी गई थी। 

वह बताते हैं कि पंजाब में डॉ. आंबेडकर का भव्य स्वागत हुआ और शाम चार बजे उन्होंने भाषण दिया, जो आम जनता की समझ आने वाली भाषा मे था। बाबासाहब जब लोगों से बात करते थे तो उनकी कोशिश होती थी कि उनके साथ बहुत सरल भाषा में बात की जाय। वे ऐसी भाषा बोलते थे, जैसी परिवार के बड़े-बुजुर्ग वाली होती है, जिसका उद्देश्य बच्चों को समझाना होता है। डॉ. आंबेडकर के साथ उनकी पत्नी सविता आंबेडकर, सेठ किशन दास, फेडरेशन के सेक्रेटरी आर. सी. पाल आदि लोग थे। डॉ. आंबेडकर की लोकप्रियता इतनी थी कि लोग उन्हें छूने मात्र को लेकर आतुर थे। जालंधर की इस सभा में वे करीब डेढ़ घंटे तक बोलते रहे। उपस्थित जनसमूह उन्हें तल्लीनता से सुनता रहा। केवल बाबासाहब के शब्द गूंज रहे थे। 

इस सभा में डॉ. आंबेडकर ने पाकिस्तान में दलितों पर हो रहे अत्याचारों के विषय पर बात रखी और तत्कालीन सरकार द्वारा किये गए प्रयासों के प्रति नाराजगी जताई, क्योंकि उनका यह सोचना था कि सरकार इस मामले में उतनी तत्परता से काम नहीं कर रही है, जितना उसे करना चाहिए था। विभाजन का सबसे अधिक दंश दलितों को झेलना पडा था। पाकिस्तान में माहौल बहुत खराब था और लगातार खबरें आ रही थीं कि जो लोग वहां छोड़कर भारत आना चाहते थे, उन्हें भारत नहीं आने दिया जा रहा था, क्योंकि पाकिस्तानी नेता यह शिकायत कर रहे थे कि यदि दलितों को भारत भेज दिया गया तो वहां साफ-सफाई का काम कौन लोग करेंगे? 

सुलेख बताते हैं कि विभाजन के बाद बंगाल और पंजाब, दोनों प्रांतों में दलितों के लिए हालात बहुत खराब थे, उनका जबरन धर्मांतरण करवाया जा रहा था और उनके घरों को लूटा जा रहा था। इसलिए डॉ. आंबेडकर ने प्रधानमंत्री नेहरू से तुरंत दखल देने की बात कही। उनके जोर देने पर ही महार रेजिमेंट के जवानों को सीमांत इलाकों मे मदद करने के लिए भेजा गया और उन्होंने पूरे साल भर तक बेहद मेहनत और निष्ठा से अपना काम कर दलितों को, विशेषकर मजहबी लोगों, को भारत लाने मे मदद की। असल में महार रेजीमेंट को 1946 में ही भंग कर दिया गया था, लेकिन उसकी तीन बटालियन पंजाब सीमा बल के नाम से काम कर रही थीं। 

सुलेख कहते हैं कि बाबासाहब जानते थे कि हिंदू और मुसलमान दोनों के कुलीनों के लिए दलित मात्र सेवक थे। पाकिस्तान बनने के बाद वहां के हुक्मरान भी उन्हें बराबरी का हक देने को तैयार नहीं थे। 

वह कहते हैं कि राजनीति और सत्ता की इस भयानक जुगलबंदी ने बहुत लोगों को तोड़ा। पंजाब शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के महासचिव मोटा सिंह लायलपुरी अकाली दल मे शामिल हो गए और फिर उनके स्थान पर सुलेख बने। 1952 के आम चुनावों के लिए शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के टिकट पर आरक्षित 8 सीटों में से एक में उन्हे भी चुनाव लड़ने को कहा गया। सुलेख साहब बताते हैं कि उनकी उम्र कम थी, लेकिन उन्हे कुछ मित्रों ने सलाह दी कि वह अपनी उम्र सर्टिफिकेट मे बढ़वा लें और चुनाव लड़ लें। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। आम चुनाव में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की बुरी तरह पराजय से लोगों के हौसलों पर बहुत्त असर पडा। सुलेख साहब इसकी वजह संयुक्त चुनाव प्रणाली बताते हैं। 

खैर, उसके बाद, घर की परिस्थितियों के चलते और क्योंकि उनका विवाह हो चुका था और एक बच्चा भी हो चुका था, सुलेख साहब नौकरी की तलाश में थे। लेकिन उन्होंने कभी डॉ. आंबेडकर से इस संदर्भ में बात नहीं की। उन्हें लगा कि इसके दूसरे अर्थ निकल सकते हैं और कही बाबासाहब यह न सोचें कि वह नौकरी के कारण से ही शेड्यूल कास्ट फेडरेशन में आया। बहरहाल, उन्हें पहले दिल्ली में नौकरी मिली और फिर पंजाब में। 14 अक्टूबर 1952 को उन्हें पंजाब में आबकारी विभाग मे नौकरी मिल गई और यहां उन्होंने 31 जुलाई, 1985 तक काम किया।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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