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बीसवीं सदी के अंतिम दशक की दलित कविता (दूसरा भाग)

उत्तर भारत में दलित कविता के क्षेत्र में शून्यता की स्थिति तब भी नहीं थी, जब डॉ. आंबेडकर का आंदोलन चल रहा था। उस दौर में और आजादी के बाद अनेक दलित कवि हुए, जिन्होंने कविताएं लिखीं। पढ़ें, कंवल भारती की आलेख श्रृंखला ‘हिंदी दलित कविता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य’ की छठी कड़ी का दूसरा भाग

दलित कविता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (छठा कड़ीदूसरा भाग)

पिछली कड़ी के आगे

कुसुम वियोगी और एन. आर. सागर

वर्ष 1995 में ही दो कविता-संग्रह और प्रकाशित हुए। पहला डॉ. कुसुम वियोगी का ‘व्यवस्था के विषधर’ और दूसरा एन.आर. सागर का ‘आजाद हैं हम’। कुसुम वियोगी की दलित कविता का संघर्ष सामंतवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के साथ-साथ लोकतंत्र विरोधी धार्मिक उन्माद के विरुद्ध भी दिखायी देता है। ‘प्रतिशोध’ शीर्षक कविता उस हिंदू कोड के विरुद्ध दलित आक्रोश को व्यक्त करती है, जो दलित को बारात में ‘घुड़चढ़ी’ करने पर प्रतिबंधित करता है। कवि सवाल करता है–

दलित दूल्हा
जब घोड़ी पर चढ़कर निकलता है
न जाने क्यों
उनके कलेजे का पानी हिलता है?[1]

और तुरंत बाद कवि का आक्रोश इन शब्दों में फूटता है–

हम ही फटेंगे बनके बारूद
जब तुम्हारे घर-बस्तियों व आंगन में
लेने को प्रतिशोध सोचो, तब तुम्हें कैसा लगेगा?[2]

पिछड़ी जातियों के हित में 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के खिलाफ सवर्ण जातियों ने पूरे देश में आंदोलन चलाया, सरकारी इमारतों और संपत्ति को आग लगायी, सवर्ण छात्रों से आत्मदाह कराये और हिन्दुत्व का उन्माद उभारा, उसका प्रतिरोध इस काल के सभी दलित कवियों ने किया। कुसुम वियोगी ने भी ‘राष्ट्रीयता के नाम पर’ शीर्षक कविता में इस उन्माद का तीखा विरोध किया। वियोगी ने इसे ब्राह्मण संस्कृति को बचाने का उन्माद कहा। यथा–

मंडल आयोग की सिफारिशें
क्या लागू हुईं
समस्त वायु मंडल ही हिल गया

आग लगवा दी पूरे देश में
और उतर आये सड़कों पर
कराने को आत्मदाह
बचाने को ब्राह्मणी संस्कृति।[3]

यह संयोग नहीं था कि जब मंडल की सिफारिशें लागू हुईं, उसी समय भाजपा ने राम-मंदिर का मुद्दा उठाया और उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी राम-रथ लेकर पूरे देश में घूमे। इस घटना का चित्रण कवि ने अपनी कविता में इस प्रकार किया–

खूब छला जन गण को
राम के नाम पर
मंदिर-निर्माण को चल पड़ा
हाथ में कमंडल लिये एक अदद आदमी
होकर सवार राम रथ पर
बन बैठा, भारतीय संस्कृति का पोषक,
राष्ट्रीयता के नाम पर।[4]

ऐसे ही उथल-पुथल के दौर में दलित कवि एन.आर. सागर का कविता-संग्रह ‘आजाद हैं हम’ (1995) प्रकाशित हुआ। उन्होंने इस संग्रह का समर्पण “उस दलित खून को किया, जो अपनी स्वतंत्रता की अभिप्राप्ति हेतु सदियों से अनवरत बहता चला आ रहा है।” जाहिर है कि इस दौर में सागर की कविता दलित मुक्ति के संघर्ष के लिये समर्पित थी। वे दलितों को आजाद तो मानते थे, पर गुलाम की तरह। वे पहली ही कविता ‘आजाद हैं हम’ में कहते हैं–

आजाद हैं हम आज पर गुलाम की तरह।
आबाद बन जांबाज, पर गुलाम की तरह।।
जंजीरों-लाठियों औ’ बंदूकों के साये में।
गुजारते हम जिंदगी, गुमनाम की तरह।।
गिनती में हम नहीं, हैं तो वोट की खातिर।
वरना तो जी रहे हैं, उपनाम की तरह।।[5]

आजादी के बाद भी भारत के गांवों में दलित जातियों की यही सामाजिक स्थिति थी, जिसका मार्मिक वर्णन कवि ने उपर्युक्त पंक्तियों में किया है। कवि अपने समय में इस गुलामी को स्पष्ट देख रहा था। भारत में जन्म लेकर भी उसे उसकी गंध अपनी नहीं लगती थी। इसलिए, ‘माटी की गंध’ कविता में उसने कहा–

मेरा जन्म हुआ भारत की पावन धरती पर,
लेकिन माटी की गंध मुझे अनजानी लगती है।[6]

उनकी दृष्टि में, दलित जातियों पर जुल्म केवल अपराध का साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह जाति के आधार पर किया जाने वाला वह अत्याचार था, जिसे हिंदू समाज व्यवस्था स्वीकृति देती है। कवि ने इसका प्रतिरोध अपनी एक बेहद विचारोत्तेजक कविता ‘तब तुम्हें कैसा लगेगा’ में किया है। वह हिंदू व्यवस्था के समर्थकों को संबोधित करते हुए कहता है–

यदि तुम पर लाद दिया जाये
कर्त्तव्यों का भार
निषेधों-प्रतिबंधों का अंबार
अवश हो जिनसे
करनी पड़े दासता-बेगार
दिन-रात की हाड़-तोड़ मेहनत
और तब बदले में
खाने को दी जाए बासी जूठन
या दो मुट्ठी सड़ा-गला अनाज
तन ढंकने को पुराने वसन-उतरन
ऊपर से डांट-फटकार,
भद्दी अश्लील गालियों की बौछार
लात-घूंसों-डंडों की मार
तब तुम्हें कैसा लगेगा?[7]

मोहनदास नैमिशराय व श्योराज सिंह ‘बेचैन’ की कविता संग्रह का आवरण पृष्ठ

दलित कवि सागर दलितों की ही नहीं, देश की गुलामी का दोषी भी ब्राह्मण को मानते हैं। वे ब्राह्मण को विद्वान और शीलवान के अर्थ में नहीं लेते, वरन् वह उसके लिये ‘बेईमान’, ‘शीलहीन’, ‘लंपट’, ‘पाखंडी’, ‘कुजात’ और ‘समाज को विषाक्त बनाने वाला’ शब्दों का प्रयोग करते हैं। देखिए, उनकी ‘ब्राह्मण’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां–

तेरी ओछी जात कुजात कमीने ब्राह्मण बेईमान।
तू ढोंगी, कपटी, पाखंडी,
क्रूर, कुकर्मी कुटिल शिखंडी,
शील हीन, बदचलन बने तू फिर भी श्रेष्ठ महान।।
जाति-पांति का जाल बिछाया,
भेदभाव का चक्र चलाया,
ऊंच-नीच का जहर घोलकर देश किया वीरान।।[8]

ब्राह्मण के प्रति कवि का यह आक्रोश अकारण नहीं है। इसकी पुष्टि हर वह दलित करेगा, जिसने गांव में ब्राह्मण के आतंक को देखा और भोगा है। स्वर्ग-नर्क का जाल, पाप-पुण्य के आधार पर पुनर्जन्म और पूर्वजन्म का स्वांग, सामाजिक भेदभाव, व्यभिचार, ढोंग, कपट, पाखंड, कुकर्म और उच्चता का दंभ – यह सब ब्राह्मण का वह धार्मिक आतंक है, जिसकी मार सबसे ज्यादा दलितों पर ही पड़ती है। यह अनुभव सिर्फ दलित को अपना लगेगा, गैर दलित को नहीं। इसलिये दलित कविता में अलग किस्म के रस हैं। यहां आक्रोश, अस्वीकार और विद्रोह अथवा क्रांति सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण रस हैं। सागर की उपर्युक्त कविता में आक्रोश के साथ-साथ प्रतिशोध का रस भी देखने को मिलता है। ‘हमारा संघर्ष’ कविता में उन्होंने अपने प्रतिशोध को इस प्रकार व्यक्त किया है–

हमारा संघर्ष है
अधिकार पाने के लिये
शासन पर कब्जा जमाकर
सत्ता हथियाने के लिये
और शक्ति के बल पर
धन, धरती छीनकर
शोषकों को गुलाम बनाने के लिये
ताकि वे
निर्धन-मजबूर बंधुआ मजदूर
बनकर काम करें
मारे खेतों-खलिहानों में
जुते रहें रात-दिन बैलों की तरह
और उनकी स्त्रियां?
वे हमारे घरों में बेगार करें
बर्तन मांजें, कपड़े धोएं, पानी भरें
झाड़ू-पौंछा लगायें, गोबर थापें,
हमारी गृहणियों के पैर चांपें।
और इतना कुछ करने पर
बदले में पायें
सड़ा-गला डेढ़-दो किलो अनाज,
जूठन, फटे-पुराने वस्त्र, उतरन।[9]

इस कविता में व्यक्त विचार को कोई भी गैर दलित समीक्षक बड़ी आसानी से एक भावुक दलित का पागलपन कह सकता है। लेकिन, यही ‘पागलपन’ सवर्णों की शोषक श्रेणी को आईना भी दिखाता है। शोषक वर्ग ने सत्ता के बल पर, जो व्यवहार दलितों के साथ किया, वही ‘व्यवहार’ दलित सवर्णों के साथ अपनी सत्ता में करना चाहता है। इस कविता को पढ़कर शायद ही किसी सवर्ण का खून न खौले, पर, यही दलित कविता की सफलता है। दलित कवि की तो यह सिर्फ कल्पना है, लेकिन सवर्णों की शोषक श्रेणी ने तो इसे बाकायदा अमल में उतारा है।

लक्ष्मीनारायण सुधाकर की कविताएं

वर्ष 1996 में लक्ष्मी नारायण सुधाकर का कविता-संग्रह ‘उत्पीड़न की यात्रा’ आया। यद्यपि वे बुद्ध की शीतल छाया में शांति और सद्भाव के कवि माने जाते हैं, पर उत्पीड़न की व्यथा भी उनकी कविताओं में साफ झलकती है। वे अपनी ‘स्वराज’ कविता में कहते हैं–

माता-बहिनों के लाल छीन, कूंओं में फेंके जाते हैं।
ललनाओं को नंगा करके, गलियों में दुष्ट घुमाते हैं।।
बामणशाही के ये गुलाम, जी भर कर हमें सताते हैं।
मौका पाकर पापी हमको, जिंद ही बांध जलाते हैं।।[10]

कवि की दृष्टि में, 1947 में जो आजादी देश को मिली, यह वह आजादी नहीं थी, जिसकी दलित वर्गों ने कल्पना की थी। कवि इस आजादी को शोषकों की आजादी के रूप में देख रहा था। शोषण, अन्याय और असमानता मिटी नहीं थी। दलित उसी तरह मारे जा रहे हैं, जैसे पहले मारे जा रहे थे। बेलछी, पिपरा और साढ़ूपुर जैसे नरसंहार इसी आजाद भारत में हुए। इसलिये कवि ने ‘आजादी’ शीर्षक कविता में लिखा–

झोपड़ियों तक आने वाली आजादी की यही कहानी।
निकल फिरंगी के चंगुल से, बनी महल वालों की रानी।।

पिपरा और बेलछी वाली घटनाओं पर मुसकाती है।
साढ़ूपुर देहुली काण्ड की सुनकर हंसी उसे आती है।।
जिंदों को भले जला डालो तुमको पूरी आजादी है।
बेकसूर मरवा डालो आजादी ही आजादी है।।[11]

यहां प्रसंगवश पंजाबी भाषा के दलित कवि गुरुदास राम ‘आलम’ की कविता का जिक्र करना जरूरी है, जिनकी ‘आज़ादी’ कविता सुधाकर की कविता से मेल खाती है। आलम की ‘आजादी’ कविता को डॉ. आंबेडकर ने बहुत पसंद किया था। उस कविता की चर्चित पंक्तियां ये हैं–

क्यों भई निहाल्या आजादी नहीं देखी।
न भई भरावा न खाई न देखी।
मैं जग्गू ते सुनिया से अम्बाले आई खड़ी सी।
बड़ी भीड़ ओस ते खाली आई खड़ी सी।
जनता ते मुंह बल पछाड़ी सी ओस दी।
ते बिरला ते मुंह बल अगाड़ी सी ओस दी।।[12]

गुरुदास राम ‘आलम’ बता रहे थे कि यह आजादी जनता को नहीं, बिरला जैसे पूंजीपतियों को मिली है। लेकिन, लक्ष्मी नारायण सुधाकर को इस आजादी के प्रति शोषित वर्गों का विद्रोह भी साफ नजर आ रहा है। वे इसी कविता में, अंत में कहते हैं–

भूखों की दुनिया में न कहीं, आ जाय लहर उन्मादी की।
मूकों की दुनिया से न कहीं, आवाज उठे आजादी की।।
फिर महलों की आजादी का अंजाम न जाने क्या होगा?
भूखे-नंगों के आलम का पैगाम न जाने क्या होगा?
दौलत वालों है खेद नहीं, उनको अपनी बरबादी का।
चिंता केवल अपहरण कहीं हो जाय न फिर आजादी का।।[13]

सुधाकर के कहने का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणों और सामंतों के जुल्मों से मुक्ति के लिये भारत की दलित जातियों ने अंग्रेजों का स्वागत किया था, उसी तरह कहीं ऐसा न हो जाये कि वर्तमान शासक वर्गों के अत्याचार भारत को फिर से गुलाम बना दें। ऐसी चेतावनी आजादी के बाद डॉ. आंबेडकर ने भी दी थी। उन्होंने 9 जनवरी 1950 को बंबई में शेडयूल्ड कास्ट फेडरेशन की सभा में कहा था– “भारत को मुसलमानों और अंग्रेजों ने गुलाम बनाया था। किंतु आज हम स्वतंत्र हैं और अब हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि इतिहास अपने आप को दोहराये नहीं।”[14]

दलित कवि का संघर्ष ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के खिलाफ है। इसलिये वह उनका ध्वंस और नयी समाजवादी व्यवस्था के लिये दलित वर्गों में जोश भरता है। ‘क्रां की पूजा’ और ‘मशाल’ सुधाकर की ऐसी ही कविताएं हैं। ‘क्रांति की पूजा’ में वे कहते हैं–

निर्भय होकर आग लगा दो दुनिया के वैभव को।
जहां नहीं रोटी मिल पाती मेहनतकश मानव को।।
भस्मसात हो जाय पुरातन, नूतन जग हो सारा।
धन और धरती का दुनिया में हो फिर से बंटवारा।।
दुनिया के भूखे-नंगों, मजदूरों और किसान।
युग की सुनो पुकार विश्व करता तेरा आह्वान।।
जाति-धर्म की तोड़-श्रृंखला, खुली हवा में आओ।
दुनिया के शोषित मिलकर अब एक सभी हो जाओ।।
पूंजीवाद मिटा दो समता तभी विश्व में होगी।
मनुवाद मिटा दो दुनिया से तो मानवता पनपेगी।।[15]

इन पंक्तियों में कवि समाजवादी चेतना से समाज का निर्माण करना चाहता है। इसलिए वह दुनिया के शोषितों को एक होने को कहता है। दलित कविता शुरू से ही वर्ग-संघर्ष और वर्ण-संघर्ष, दोनों की पक्षधर रही है। इसीलिये ‘मनुवाद मिटा दो दुनिया से तो मानवता पनपेगी’ दलित कवि ही कह सकता है। काश भारत के मार्क्सवादियों ने भी इसे अपना नारा बनाया होता। ‘मशाल’ कविता में कवि की दलित चेतना में शोषित, मजदूर, किसान और आदिवासी सब आ जाते हैं। कवि उन्हें मशाल लेकर आजादी खोजने निकल चलने को कहता है। यथा–

चलो खोजने आजादी को
लेकर वीर मशाल चलो।
अधिकार युद्ध का बिगुल बजा
शोषित मजदूर किसान चलो
बनजारे बनवासी जागो
कोल-भील-संथाल चलो
झोंपड़ी जलाने वालों के
महलों को आगे दिखाने को
तानाशाह निरंकुश पर
अब अंकुश चलो लगाने को।[16]

सी. बी. भारती का आक्रोश

वर्ष 1996 में ही दलित कवि सी.बी. भारती का कविता-संग्रह ‘आक्रोश’ आया। उन्होंने सबसे पहले उस प्रथा और व्यवस्था पर थूकना लाजमी समझा, जो मनुष्य-विरोधी है और मनुष्य-मनुष्य के बीच अलगाव करती है। ‘गति’ शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा–

यह लाजमी है कि थूकें
उस प्रथा पर
करती हो जो, मनुष्य का विरोध
जो तोड़ती हो
मनुष्यता के रिश्ते को।[17]

शोषण के खिलाफ उनका संघर्ष हिंसात्मक नहीं है, वरन् कलम के द्वारा वैचारिक क्रांति करने का है। ‘कलम के जरिये’ कविता में वह कहते हैं–

तुम फैलाते रहे गंदगी
और मैं करता रहा सफाई
चलाता रहा अपनी झाडू।
रहा फिर भी ओछा मैं
और ऊंचे तुम
मैंने अब उठा ली है कलम
झाड़ू के बदले
करेंगे साफ तुम्हारी सारी गंदगी
बचायेंगे हम
देश की टूटती एकता को।[18]

कवि ने ईश्वर को भी अपनी कलम से साफ कर दिया है, जो उसकी दृष्टि में शोषकों के स्वार्थ की उपज है। वह ‘ईश्वर नहीं है’ कविता में कहता है–

देखता हूं जब भी
किसी गरीब की पीठ पर
शोषण के बेरहम निशान
उठते हैं मेरे मस्तिष्क में प्रश्न
ईश्वर हो ही नहीं सकता
मुझे लगता है
ईश्वर कुछ लोगों के स्वार्थ की उपज है।[19]

कवि ने शोषक श्रेणी को ‘जोंक’ की संज्ञा दी है। इसी नाम की कविता में वह कहता है कि जोंक खून चूसना और अपने शिकार को दर्द देना जानती है, पर यह नहीं जानती कि–

दर्द जब सहा न जायेगा
और खून घटता जायेगा, तब
जरूर वह गुस्सायेगा
और मसल दी जायेगी जोंक तब
जोंक नहीं जानती।[20]

क्रमश: जारी

संदर्भ :
[1] व्यवस्था के विषधर (कविता संग्रह)- डॉ. कुसुम वियोग, अपना प्रकाशन, 1/4334-ए, रामनगर विस्तार, शाहदरा, दिल्ली-32, प्रथम संस्करण- जुलाई, 1995, पृष्ठ 28
[2] वही
[3] वही, पृष्ठ 31
[4] वही
[5] आजाद हैं हम (कविता संग्रह)- एन.आर. सागर, संगीता प्रकाशन, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली-32, संस्करण- 1994, पृष्ठ 15
[6] वही, पृष्ठ 36-37
[7] वही, पृष्ठ 39
[8] वही, पृष्ठ 41-42
[9] वही
[10] उत्पीड़न की यात्रा (कविता संग्रह)- लक्ष्मी नारायण सुधाकर, कंचन प्रकाशन, 30/64, गली नं. 8, विश्वासनगर, शाहदरा, दिल्ली-32, संस्करण-1996, पृष्ठ 18
[11] वही, पृष्ठ 20-21
[12] दलित निर्वाचित कविताएं- सम्पादक : कँवल भारती, इतिहास बोध प्रकाशन, बी-239, चन्द्रशेखर नगर, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण- जनवरी 2006, देखिये, ‘भूमिका’, पृष्ठ 24, पूरी कविता का हिन्दी अनुवाद, पृष्ठ 288 पर मौजूद है।
[13] उत्पीड़न की यात्रा, उपयुर्क्त, पृष्ठ 21
[14] सोर्स मैटेरियल ऑन डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एंड दी मूवमेंट ऑफ अनटचेबुल्स, वॉल्यूम 1, एडुकेशन डिपार्टमेंट, महराष्ट्र गवर्नमेंट, बांबे, 1982, पृष्ठ 359
[15] उत्पीड़न की यात्रा, उपर्युक्त, पृष्ठ 62
[16] वही, पृष्ठ 63
[17] आक्रोश (कविता संग्रह)- डॉ. सी.बी. भारती, लोक सूचक प्रकाशन, नीम करोरी, जिला फर्रुखाबाद, उ.प्र., प्रथम संस्करण- 1996, पृष्ठ 2
[18] वही, पृष्ठ 12
[19] वही, पृष्ठ 49
[20] वही, पृष्ठ 25

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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