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बहस-तलब : राष्ट्रपति के अनकहे का निहितार्थ

छोटे-मोटे अपराधों के आरोपियों की जिंदगी बिना मुकदमा की सुनवाई के जेलों में खत्म हो जाती है और किसी को उनकी सुध भी नहीं होती। राष्ट्रपति मुर्मू ने वह सच सत्ता के लोगों के सामने कहा, जिसके लिए न्यायपालिका और सरकार दोनों समान रूप से जिम्मेवार हैं। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

सामान्यतः भारत के राष्ट्रपति केंद्र सरकार की नीतियों के अनुसार ही अपना वक्तव्य देते हैं, लेकिन गत 26 नवंबर, 2022 को संविधान दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के भाषण ने न्यायपालिका और सरकार दोनों को थोड़ा असहज कर दिया। अपने लिखित भाषण से हटकर जब उन्होंने विचाराधीन कैदियों के सवालों पर बात रखी, तो देश भर के दलित-बहुजन समाज के लोगों को लगा मानो वह उनके दिल की बात कह रही हों। 

संविधान दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ सहित देश भर के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की उपस्थिति में राष्ट्रपति ने कहा कि जब वह ओडिशा राज्य मे गृह विभाग की स्थाई समिति की अध्यक्ष थीं, तो उन्हें राज्य भर की जेलों मे जाने का मौका मिला। उन्होंने तमाम जेलों में बैठकें की और उनके सुधार के संबंध में अपनी राय भी दी, जिनसे कुछ चीजें बदलीं भी। लेकिन वे बदलाव न हाे सके, जिनकी अपेक्षा उन्हें थी। राष्ट्रपति ने ने कहा कि “उन लोगों के बारे मे सोचिए, जो जेलों में वर्षों से बंद हैं। उन्हे संविधान की प्रस्तावना के विषय में भी कुछ पता नहीं है, न ही उन्हें अपने मूल अधिकारों और कर्तव्यों के विषय में पता है। कोई उनके विषय मे नहीं सोच रहा है। उनके परिजनों के पास उन्हें जेल से निकालने का सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि केस लड़ते-लड़ते उनके घर के बर्तन तक भी बिक चुके होते हैं।” 

राष्ट्रपति यहीं नहीं रूकीं और अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर उन्होंने वह कह दिया जो वर्तमान न्याय व्यवस्था पर बहुत बड़ा आरोप है। उन्होंने कहा कि “जो लोग दूसरों की जान लेते हैं, वे बाहर आराम से घूमते हैं। लेकिन वे लोग जेलों में हैं, जिन्होंने कोई छोटा-मोटा अपराध किया होता है। वे दरअसल समाज से भी भयभीत होते हैं क्योंकि लोग उन्हे बहुत ही हिकारत की नजर से देखते हैं।” 

लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण बात राष्ट्रपति महोदया ने कही, वह यह थी कि क्या जेलों की संख्या बढ़ने से सुधार हो जाएगा। उन्होंने कहा कि “जो एक बात मैं लगातार सुन रही हूं कि हमे नई जेलें बनानी चाहिए, क्योंकि वहां कैदियों की संख्या बहुत बढ़ रही है। यदि एक समाज के रूप में हम प्रगति कर रहे हैं तो हमें सोचना पड़ेगा कि हमें नई जेलें क्यों चाहिए। हमे तो जो हैं उन्हे भी बंद कर देनी चाहिए।”

द्रौपदी मुर्मू, राष्ट्रपति, भारत

अपनी बात को बेहद गंभीरतापूर्वक रखते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि “मैं इस प्रश्न को न्यायधीशों और केन्द्रीय कानून मंत्री के ऊपर छोड़ती हूं। मै और कुछ नहीं कहना चाहती। मैं अपनी बात अधूरी रखती हूं। मुझे उम्मीद है कि आप वो बात भी समझ गए होंगे जो मैं यहां कहने से रुक गई।” 

राष्ट्रपति मुर्मू के वक्तव्य से दो बातें साफ तौर पर झलक रही थीं। वह वर्तमान न्याय व्यवस्था की सीमाओं को बता रही थीं और विशेषकर इस बात पर खासा जोर दे रही थीं (उनकी अनकही बात) कि हमारी न्याय प्रणाली कहीं न कहीं दलित-बहुजनों के साथ न्याय नहीं कर पायी है। अगर भारत की जेलों के सर्वे करवा लिए जाएं तो पता चल जाएगा कि कितने कैदी विचाराधीन हैं और वे किस-किस समुदायों से आते हैं। 

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में देश भर की जेलों मे 76.1 प्रतिशत लोग विचाराधीन कैदी थे। इसका मतलब है कि ये वे लोग हैं, जिन्हे गिरफ्तार तो कर लिया गया है, लेकिन न कोई चार्जशीट है और न कोई मुकदमा। केवल 23 प्रतिशत ही ऐसे कैदी थे, जो न्यायालयों द्वारा सजायाफ्ता थे। 

विभिन्न मीडिया संस्थानों में प्रकाशित रपटें बताती हैं कि विचाराधीन कैदियों मे 19 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं और सजायाफ्ता कैदियों में भी मुस्लिमों की हिस्सेदारी 17.4 प्रतिशत है। करीब 19 प्रतिशत विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदी दलित हैं। जबकि आदिवासियों की संख्या 14 प्रतिशत के लगभग है। अगर आबादी का प्रतिशत देखें तो दलितों की आबादी देश की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत ओर आदिवासियों की आबादी साढ़े सात प्रतिशत के लगभग है। वहीं विचाराधीन व सजायाफ्ताओं में ओबीसी की हिस्सेदारी 38 फीसदी है। इन आंकड़ों से यह आसानी से समझा जा सकता है कि जेलों में किन जातियों और समुदायों के लोग अधिक हैं। 

अब यह सवाल उठता है कि क्या यह एक बेहद अन्यायी व्यवस्था नहीं है? जाहिर तौर पर इससे पता चलता है कि न्याय व्यवस्था भयंकर जातिवाद का शिकार है, क्योंकि छोटे-मोटे अपराधों के आरोपियों की जिंदगी बिना मुकदमा की सुनवाई के जेलों में खत्म हो जाती है और किसी को उनकी सुध भी नहीं होती। राष्ट्रपति मुर्मू ने वह सच सत्ता के लोगों के सामने कहा, जिसके लिए न्यायपालिका और सरकार दोनों समान रूप से जिम्मेवार हैं। 

हालांकि इस समय न्यायिक और सत्ता के गलियारे में जो बहस चल रही है, वह कॉलेजियम सिस्टम को लेकर है, जिसने कुल मिलाकर यह साबित कर दिया है कि उच्च स्तर पर न्यायपालिका मे परिवारवाद है। शुरू से ही अधिकांश जज एक पारिवारिक ‘परंपरा’ के तहत आ रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार 1950 से 1989 तक सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त जजों का 40 प्रतिशत ब्राह्मण थे और 50 प्रतिशत अन्य सवर्ण जातियों के। इन गैर-ब्राह्मण सवर्ण जातियों में कायस्थ, रेड्डी और बनिया प्रमुख हैं। यह तथ्य हमेशा सत्य रहा है कि किसी भी समय सुप्रीम कोर्ट में दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियों से आनेवाले जजों का प्रतिशत दहाई नहीं रहा। लेकिन 1989 के बाद से स्थिति और बिगड़ती चली गई है और जजों की नियुक्तियों मे तीन बड़ी जातियों का दबदबा दिखाई देता है। अभी तक सुप्रीम कोर्ट मे नियुक्त कुल 256 न्यायाधीशों में से अनुसूचित जातियों से मात्र 5, आदिवासियों से 1 और महिलाओं की संख्या 11 है। वर्ष 1989 तक कुल 4 जज ओबीसी समुदाय से थे और वर्तमान में केवल एक इस वर्ग से हैं। 

यह बात सत्य है कि निचली अदालतों में हालत और भी खराब है और वंचित वर्गों से वकील भी नहीं मिलते। इस प्रकार जाति और प्रशासन का एक दृश्य और अदृश्य दोनों तरह का गठबंधन पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक में दिखाई देता है, जिसे तोड़े जाने की आवश्यकता है। 

लेकिन इस पूरी स्थिति के लिए केवल न्यायपालिका को दोष देने का मतलब है कि कार्यपालिका को दोष्मुक्त कर देना। जबकि मौजूदा कार्यपालिका हिंदुत्व के एजेंडे के तहत काम कर पूरी न्याय प्रणाली को आरएसएस के रंग में रंग देना चाहती है। यह सोचना भी जरूरी है कि केंद्र सरकार ने अचानक से न्यायपालिका पर हमला क्यों कर रही है। क्या इसका कारण भीमा-कोरेगांव के आरोपियों को जमानत देने से तो नहीं है? वरवरा राव, सुधा भारद्वाज को जमानत देने के बाद सरकार के वकीलों ने जिस प्रकार गौतम नवलखा और फिर आनंद तेलतुंबड़े को जमानत देने का विरोध किया, वह सवाल खड़े करता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी. एन. साईबाबा के मामले में केंद्रीय एजेंसियों ने ऐसा व्यवहार किया मानो वे देश के सबसे बड़े आतंकवादी हों। जबकि वह शारीरिक तौर पर 90 प्रतिशत असमर्थ हैं और उन्हें हर समय एक सहायक की जरूरत होती है। वे विभिन्न रोगों से ग्रस्त हैं और कायदे से उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें जमानत दी जानी चाहिए। अभी सुप्रीम कोर्ट ने नए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार को कटघरे मे खड़ा किया। 

सवाल और भी हैं। मसलन, क्या सरकार जस्टिस चंद्रचूड़ से कुछ परेशान दिखाई दे रही है क्योंकि वह पूरे दो साल तक मुख्य न्यायाधीश रहेंगे और 2024 के चुनावों से पहले उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इस दरमियान यदि न्यायपालिका ने कुछ कठोर फैसले लिए तो नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं। संभ्वत: इसीलिए सरकार का न्यायपालिका पर हमला उस रणनीति का हिस्सा है, जो न्यायपालिका तो दवाब में लाकर उसे एक ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ में बदल दे ताकि वह सरकार के किसी भी फैसले को कोई चुनौती देने की स्थिति में ही न रहे। 

अब यदि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बात को देखें तो बढ़ते हुए लंबित मामलों के लिए न्यायपालिका से अधिक सरकारें दोषी हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश नहीं हैं। लिहाजा लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। दूसरी अेर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने विभिन्न उच्च न्यायालयों के लिए उच्चतम न्यायालय के लिए जो अनुशंसाएं की हैं, केंद्र सरकार ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने हाल ही में 10 जजों की नियुक्ति के लिए सरकार को नाम भेजे थे, लेकिन सरकार ने वे नाम वापस भेज दिए हैं। इनमें एक नाम दिल्ली के नामी वकील सौरभ कृपाल भी हैं, जो पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.एन. कृपाल के बेटे हैं, लेकिन उनके नाम पर रोड़ा इस बात से है कि वह घोषित तौर पर समलैंगिक हैं। 

इस बात से कोई आंख कैसे चुरा सकता है कि 2014 के बाद से ही सरकार और सरकारी पार्टी के पदाधिकारियों ने जेल को भारत मे व्यवस्था परिवर्तन का हथियार बना दिया और धरना, प्रदर्शन करनेवााले लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह देश की पहली सरकार है, जिसने देश की प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को खत्म करने की ठानी और अपनी मांग कर रहे युवाओं को जेल भेजा और देशद्रोह तक के मुकदमों में उन्हें फंसा दिया। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरुद्ध आंदोलन करने पर हजारों लोगों को जेल भेज दिया गया और संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया। हालांकि अनेक लोग छोड़ भी दिए गए, लेकिन अभी भी अनेक लोग जेल में हैं। 

बहरहाल, गत 29 नवंबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संजय किशन कौल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बात पर संज्ञान लिया है। उन्होंने भारत सरकार के सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता को यह आदेश दिया कि वे देश के सभी जेलों से उन कैदियों की सूची मंगवाएं, जो मामूली अपराधों में वर्षों से जेल में बंद हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि सूची में कैदी का नाम, अपराध का संक्षिप्त विवरण, जमानत संबंधी आदेश, रिहाई संबंधी संभावनाएं आदि का स्पष्ट उल्लेख हो। लेकिन इसके बावजूद न्यायालयों मे सभी समुदायों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का सवाल शेष है और यह भी आवश्यक है कि न्याय प्रक्रिया मे राजनैतिक हस्तक्षेप किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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