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राजनीतिक रस्साकशी में पिछड़े वर्ग का राजनीतिक आरक्षण

जब केंद्र और राज्य सरकारों को पता है कि न्यायपालिका पिछड़े वर्ग के मामले पर तथ्य मांग रहा है तो केंद्र सरकार जातिगत जनगणना की बात क्यों नहीं स्वीकार करती? यह कब तक चलेगा कि जब चुनाव करवाने का समय हो, तभी इस प्रकार की बातें की जाती हैं? बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनावों से संबंधित इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ पीठ के फैसले के बाद बहुत से लोगों ने चिंता व्यक्त की थी कि प्रदेश सरकार पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के प्रति वफादार नहीं है। लेकिन हंगामे के बाद सरकार ने तुरंत ही एक आयोग बनाने की घोषणा कर दी और उसे छह महीने का कार्यकाल देकर यह बताया कि प्रदेश मे स्थानीय निकायों के चुनाव पिछड़े वर्ग के आरक्षण के बिना नहीं कराए जाएंगे। सूबाई सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दिया है। 

हकीकत है कि उत्तर प्रदेश मे भाजपा किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं करेगी जिससे यह संदेश जाए कि वह पिछड़ा वर्ग विरोधी है। दरअसल उत्तर भारत मे पिछड़ा वर्ग आंदोलन केवल नेताओ की महत्वाकांक्षाओं के चलते जातीय अस्मितावादी आंदोलन मे बदल चुका है, जिसका उद्देश्य फुलेवादी या पेरियारवादी परंपराओं का आत्मसम्मान कहीं से भी नहीं है। राजनेताओ और उनके भक्तों की भाषा में ओबीसी सशक्तिकरण नेताओं के प्रतिनिधित्व तक ही सीमित रह गया है। इसके नतीजा यह होता है कि इस बहुसंख्यक समाज के हितों के प्रश्न अक्सर गायब हो जाते हैं। इस संदर्भ को भाजपा ने अच्छे से पहचाना है। उसने ओबीसी को अपने खेमे में शामिल करने के हर संभव प्रयास किये हैं। इस क्रम में भाजपा ने सांस्कृतिक व धार्मिक रणनीतियां बनायीं। कुछ जातियों के नेताओं को टिकट दिया। इससे ओबीसी की गैर-उच्च जातियों के नेताओं का प्रतिनिधित्व कुछ हद तक बढ़ा। दूसरी ओर सरकारी नौकरियों से लेकर, मीडिया और न्यायपालिका में ओबीसी हाशिए पर रखे गए। 

ओबीसी के मामले में एक बड़ा सवाल यह कि हर प्रदेश में इसकी सूची को इतना बढ़ाया जा रहा है कि उसमें समृद्ध व ताकतवर जातियां भी शामिल कर ली गई हैं। 

बताते चलें कि मंडल आयोग के सदस्य एल. आर. नायक ने ओबीसी को दो हिस्सों मे बांटने की बात कही थी। एक कृषक जातियां और दूसरी वो जातियां, जो श्रमिक जातिया हैं और पूरी तरह से भूमिहीन हैं। इन्हे नायक ने अति वंचित और पिछड़ी जातियों का वंचित वर्ग कहा। नायक अनुसूचित वर्ग से थे और मुमकिन है कि इसी कारण उन्होंने पिछड़ा वर्ग के ‘उपवर्गीकरण’ की आवश्यकता को समझ लिया था, क्योंकि वह जिस ‘अति पिछड़ा वर्ग’ की बात कर रहे थे, उसका वर्ग चरित्र अनुसूचित जातियों या कहिए कि दलित जातियों की तरह ही है। वहीं जो कृषक जातियां हैं, उनका अधिकांश वर्ग चरित्र सामंती जातियों के अनुरूप है, जो गांवों मे दलितों व अति पिछड़ी जातियों के खिलाफ हिंसक व भेदभाव का आचरण करता है।

ओबीसी आरक्षण पर ही सवाल क्यों?

तमिलनाडु में इस संदर्भ में समानुपातिक आधार पर विभिन्न जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है और इसलिए वहां पर पिछड़े वर्ग में शामिल जातियों मे उतनी तनातनी नहीं है, जितना कि उत्तर भारत मे है। यह तनातनी दरअसल कृषक जातियों मे बड़ी समझी जाने वाली जातियों में है, जो राजनीतिक तौर पर कभी साथ नहीं आ पातीं, क्योंकि सभी को आशंका है दूसरी जातियां उनके प्रतिनिधित्व को खा रही हैं। 

उत्तर प्रदेश में सरकार ने 17 नगर निगमों के मेयर, 200 नगर पालिकाओ के अध्यक्षों और 545 नगर पंचायतों के अध्यक्षों के चुनावों के लिए अधिसूचना जारी किया था, जिसमें ओबीसी के लिए आरक्षण शामिल था। अधिसूचना के अनुसार अलीगढ़, मथुरा, वृंदावन, मेरठ और प्रयागराज में मेयर पद पिछड़े वर्ग के सदस्यों के लिए आरक्षित था। इसमें अलीगढ़, मथुरा और वृंदावन की सीटों पर ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा ओबीसी लिए निर्धारित 200 नगर पालिकाओं में से 54 पद पिछड़े वर्ग की महिलाओ के लिए आरक्षित था। 545 नगर पंचायतों मे से 147 पंचायतों में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण था, जिसमें 49 महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। 

इस अधिसूचना के प्रारूप के संबंध में सरकार ने लोगों की राय मांगी थी, लेकिन लोग उच्च न्यायालय चले गए और उसने सरकार के अधिसूचना को ही रद्द कर दिया और 31 जनवरी, 2023 तक बिना ओबीसी आरक्षण के ही चुनाव करवाने के आदेश दे दिया। हाई कोर्ट ने सरकार से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ट्रिपल टेस्ट करवाने की बात कही है। 

विदित है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, ट्रिपल टेस्ट का मतलब यह कि सरकार एक आयोग का गठन करे,जो गहन तथ्यों की जांच के आधार पर यह निर्धारित करे कि पिछड़े वर्ग की राजनीतिक भागीदारी कितनी है। दूसरा यह कि इस आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर वह निर्धारित करे कि पिछड़े वर्ग को कितना आरक्षण मिलना चाहिए और तीसरा यह कि पूरा आरक्षण ( एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण) 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक न हो। 

चूंकि राज्य सरकार ने न आयोग का गठन किया और ना ही उसके पास कोई आंकड़ा है, इसलिए कोर्ट ने कह दिया कि बिना आरक्षण के ही चुनाव करवाए जाएं। 

दुखद यह है कि पिछड़े वर्ग के आरक्षण के सवाल पर हर राज्य में सरकारें खेल खेल रही हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि राजनीतिक दल इस सवाल पर केवल राजनीति के अलावा कुछ नहीं कर रहीं। मतलब यह कि मंडल अयोग की रिपोर्ट में सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के अलावा राजनीतिक व भूमि संबंधी अधिकार संबंधी अनुशंसाएं शामिल हैं, लेकिन इस दिशा में कुछ भी नहीं किया गया है। यहां तक कि जिन राज्यों में पिछड़े वर्गा की सरकारें लंबे समय से हैं, वहां भी हालात जस के तस हैं। जबकि ये सरकारें चाहें तो अपने यहां सामाजिक- आर्थिक सर्वे करवा सकती हैं, लेकिन तमिलनाडु, कर्नाटक आदि राज्यों को छोड़ दें, तो कहीं भी सरकारों के पास ओबीसी को लेकर कोई डाटा नहीं है। न्यायालयों की आड़ में छिप कर चुप रह जाना ही राजनीतिक दलों की रणनीति रही है ताकि उनसे कोई सवाल न पूछे। अब जाकर योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक आयोग का गठन किया है। अब यह आयोग किस तरह की रिपोर्ट देगी और क्या वह सरकार को मंजूर होगी, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। 

कहना अतिरेक नहीं कि इस देश में जो कानूनी दांव-पेंच हैं, वे खतरनाक हैं। यहां कोई भी निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि ‘बेंच’ किसकी है। आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करवाने के लिए इन्हीं न्यायमूर्तियों ने कह दिया था कि पचास प्रतिशत की सीमा कोई अंतिम नहीं है और 10 प्रतिशत आरक्षण आर्थिक आधार पर दे दिया गया, जो कि संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने तब कोई तथ्य नहीं मांगे कि आर्थिक आधार पर ‘वंचित’ समुदाय कौन-कौन से हैं? असल में सवाल तो यह होना चाहिए था कि धन-संपत्ति किनके पास ज्यादा है और कैसे आया? लेकिन बिना किसी आयोग के एक और आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई और उसके लिए अपनी सुविधा के हिसाब से 50 प्रतिशत की सीमा भी लांघ दी गई। 

सवाल यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस संदर्भ में किन कारणों से आयोग का गठन नहीं करना चाहती है ताकि समस्या का समाधान हो? जब सरकारों को पता है कि न्यायपालिका पिछड़े वर्ग के मामले पर तथ्य मांग रहा है तो सरकार जातिगत जनगणना की बात क्यों नहीं स्वीकार करती? यह कब तक चलेगा कि जब चुनाव करवाने का समय हो, तभी इस प्रकार की बातें की जाती हैं? हालांकि इस वजह से न्यायपालिका को भी अपना एजेंडा चलाने में मदद मिलती है। वैसे तो हाई कोर्ट सरकार से आरक्षण पर सवाल कर सकता था, लेकिन मंडल आयोग की अनुशंसाओं को आंशिक तौर पर स्वीकार करने के तीस वर्षों के बाद भी सवर्ण लोगों के पेट का दर्द नहीं मिटा है। इसलिए आवश्यकता है कि केंद्र सरकार भी इस संबंध में एक आयोग का गठन करे। हालांकि अक्टूबर, 2017 में दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रहीं जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता मे पिछड़े वर्गों में उपवर्गीकरण के लिए एक आयोग का गठन किया गया। लेकिन अभी तक रिपोर्ट नहीं मिल पाई है और इसके लिए उसका कार्यकाल लगातार बढ़ाया जा रहा है। अब इसका कार्यकाल बढ़ाकर 31 जनवरी, 2023 कर दिया गया है। मतलब यह कि हर चीज ‘अनुकूल समय’ के अनुसार होगी और वह समय होगा आम चुनाव का, ताकि सरकार यह बताया सके कि वह पिछड़े वर्ग के प्रति कितनी ईमानदार है। 

हकीकत यह है कि 27 प्रतिशत आरक्षण को बांटा जाएगा ताकि कुछ जातियों का एकाधिकार न हो। लेकिन इसका उद्देश्य तो चुनावों मे एक जाति को दूसरे से लड़ाकर सत्ता हथियानी है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि आरक्षण का सवाल आज सामाजिक प्रतिनिधित्व का नहीं, अपितु अति महत्वाकांक्षी नेताओ के प्रतिनिधित्व तक सीमित रह गया है। नौकरियों में आरक्षण का सवाल निजीकरण और सरकारी क्षेत्र के खात्मे को रोके जाने के बगैर उत्तरित नहीं होगा।लेकिन दुखद यह कि सिवाय डीएमके के नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के किसी और ने इन प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया है। 

जब उत्तर प्रदेश में निकाय चुनावों को पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के बिना चुनाव करवाने का हाई कोर्ट का आदेश आया तो बहुत से अति उत्साही लोगों ने ट्वीट करना शुरू किया कि दलितों को इस बात पर ओबीसी के साथ आना चाहिए, क्योंकि आज उनका आरक्षण खत्म हुआ है तो कल दलितों का भी नंबर आएगा। मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को न तो इतिहास की जानकारी है और ना ही आंदोलनों की। दलितों पर हमले लगातार हुए हैं और उन पर हमला करते समय पिछड़ा वर्ग भी सवर्ण बन जाता है और कई बार सवर्णों से भी अधिक क्रूर। जिस समय मंडल रिपोर्ट आई थी, उस समय सबसे अधिक आंदोलन दलितों ने किया था। जिनके लिए आरक्षण हुआ, उन्हें पता भी नहीं चला था। 

बहरहाल, भाजपा ने तो कह दिया कि बिना पिछड़े वर्ग को आरक्षण के वह निकाय चुनाव नहीं करवाएगी। अब इस पूरे घटनाक्रम से किसे लाभ मिलने वाला है? दो बातें हो गईं। एक तो सरकार को चुनाव टालने का बहाना मिल गया और दूसरा यह कि कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद यह कहने का बहाना मिल जाएगा कि ओबीसी के सच्चे पैरोकार वही हैं। सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले क्या प्रदेश में पिछड़ो के आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर कभी सड़कों पर आकर आंदोलन करेंगे? प्रदेश सरकार तो सुप्रीम कोर्ट मे चली गई है और उसके निर्णय के बाद ही तय होगा कि चुनाव कब होंगे लेकिन चुनाव तो अब देर से ही होंगे और तब तक मैनेज करने के लिए बड़े-बड़े वकील तो हैं ही। विपक्ष के पास क्या है? एक जवाब है कि विपक्ष जनता के बीच जा सकता है। यह तो स्पष्ट है कि राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन यदि विपक्षी नहीं करेंगे तब उनके लिए अवसर व बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग के अधिकार गायब होते रहेंगे। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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