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ईडब्ल्यूएस आरक्षण लोकतांत्रिक संविधान में जातिगत भेदभाव का आगाज़ : प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल (अंतिम भाग)

हाशियाकृत और प्रतिनिधित्व से वंचित सामाजिक समूहों की गोलबंद होने और सत्ता में अपना जायज़ हिस्सा मांगने की ताकत और क्षमता को समाप्त करना ही ईडब्ल्यूएस आरक्षण का असली उद्देश्य है। पढ़ें, प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल से विस्तृत साक्षात्कार का दूसरा और अंतिम भाग

गत 7 नवंबर, 2022 को उच्चतम न्यायालय की पांच जजों की एक संविधान पीठ ने बहुमत से दिए गए अपने फैसले में 103वें संविधान संशोधन अधिनियम को वैध घोषित कर दिया। इस संशोधन के ज़रिये आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को आरक्षण प्रदान किया गया था। पीठ ने यह फैसला इस संशोधन को चुनौती देने वाली अनेक याचिकाओं का निपटारा करते हुए दिया। भारत के शीर्ष विधिवेत्ताओं में से एक, प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल, जो नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी (बेंगलुरु) के कुलपति रहे हैं, ने भी पीठ के समक्ष इस संशोधन को रद्द करने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए थे। बीते 26 नवंबर, 2022 को 73वें संविधान दिवस के अवसर पर फारवर्ड प्रेस के साथ साक्षात्कार में प्रोफेसर गोपाल ने बताया कि इस संशोधन से क्यों और कैसे संविधान को गंभीर क्षति पहुंची है। पढ़ें, इस विस्तृत साक्षात्कार की दूसरा व अंतिम भाग

पहले भाग के आगे

तो अगर संविधान में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की जगह ‘अन्य पिछड़ी जातियां’ शब्दावली का प्रयोग किया गया होता तो क्या उससे जो आज हो रहा है, उसे रोका जा सकता था?

नहीं। ऐसा नहीं है। और इसके दो कारण हैं। केवल सवर्णों में जातियां होती हैं या हम यूं कहें कि जातियां, केवल सवर्ण होती हैं। जाति से आशय है एक ऐसा ‘पवित्र’ समूह, जिससे ‘अपवित्र’ लोग बाहर कर दिए गए हों। जाति, दरअसल, लोगों को एक-दूसरे से काटती है। जाति शुद्ध और पवित्र लोगों को एक साथ लाने वाला और अपवित्र लोगों को अलग करने वाला समूह है। इसलिए चातुर्यवर्ण व्यवस्था के संदर्भ में जाति शब्द का साशय इस्तेमाल किया जाता है। चातुर्यवर्ण भी पवित्र लोगों को अपवित्र लोगों से अलग करने की व्यवस्था है। वर्ण और जाति ये दोनों शब्द पवित्र’ लोगों के संदर्भ में इस्तेमाल किए जाते हैं। समाजशास्त्री जी. एस. घुरिए ने अपनी पुस्तक कास्ट एंड रेस इन इंडिया’ में लिखा है कि जाति मूलतः वर्ण का उपवर्गीकरण है। शेष लोगों को सदियों से जातिच्युत कहा जाता रहा है। जातिच्युत से आशय है जाति से वंचित या बिना जाति का। तो इस प्रकार सवर्णों के अलावा किसी की कोई जाति ही नहीं है। हम केवल समुदाय हैं, सामाजिक समूह हैं। वर्ण और जातियां केवल सवर्णों की होती हैं और इसलिए ‘पिछड़ी जाति’ जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती। चूंकि जातियां केवल सवर्णों की होती हैं, इसलिए किसी को भी पिछड़ी जाति का नहीं कहा जा सकता। तो इसलिए हम सब पिछड़े लोगों का समूह हैं। पिछड़े से मतलब है प्रतिनिधित्व से वंचित। पिछड़ा शब्द का संविधान में सबसे पहले प्रयोग अनुच्छेद 16(4) में किया गया था, अनुच्छेद 15(4) में नहीं। और यह शब्द त्रावणकोर, मद्रास प्रांत, मैसूर और महाराष्ट्र के गैर-ब्राह्मण या ब्राह्मण-विरोधी आंदोलनों से आया था। 

ये आंदोलन इस मांग को लेकर चलाए गए थे कि गैर-ब्राह्मणों को सरकार और सार्वजनिक नियोजन में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इन आंदोलनों में प्रतिनिधित्व से वंचित लोगों को ‘पिछड़े’ कहा जाता था। इसी अर्थ में पिछड़े वर्ग शब्द को अनुच्छेद 16(4) में शामिल किया गया – अर्थात ऐसे वर्ग – जिन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है या पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। पिछड़े वर्गों से आशय सांस्कृतिक, बौद्धिक या अनुवांशिक दृष्टि से पिछड़ा नहीं है। जातिगत दुराग्रहों के कारण पिछड़ों को इन अर्थों में पिछड़ा बताया जा रहा है।

दूसरी बात यह है कि जातियां केवल हिंदुओं में होती हैं। हमारे देश में अनेक ऐसे गैर-हिंदू समुदाय हैं, जिन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। जैसे केरल के लातिनी ईसाई और पूरे देश के मुसलमान। विभाजन के बाद से देश के सभी मुसलमान समुचित प्रतिनिधित्व से वंचित हैं और हाशिए पर हैं क्योंकि मुसलमानों के कुलीन, उच्च वर्गों ने तो अपना अलग देश बना लिया और उसमें रहने लगे, और जैसा कि मौलाना आजाद ने कहा था, उन्होंने अधिकांश मुसलमानों को भारत में छोड़ दिया और वह भी उन्हें पहले से भी छोटा अल्पसंख्यक वर्ग बनाकर। तो इस प्रकार जब हम पिछड़े वर्गों की बात करते हैं तो हमारा आशय उन सभी समूहों से होता है, जो जातियां नहीं हैं और जो अन्य धर्मों के मानने वालों के भी हो सकते हैं। याद कीजिए कि सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि सभी ट्रांसजैंडर पिछड़े वर्गों का हिस्सा हैं। अब ट्रांसजेंडरों की क्या कोई विशिष्ट जाति या धर्म होता है? परंतु उन्हें कलंकित किया जाता है, नीची नजरों से देखा जाता है, उनके साथ भेदभाव होता है, वे समाज के हाशिए पर हैं और उन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। तो ऐसे में क्या उन्हें पिछड़ा वर्ग के रूप में चिन्हित किए जाने और आरक्षण का लाभ मिलने का अधिकार नहीं है? बिल्कुल है। मुझे बताया गया है कि कुछ साल पहले राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने कहा कि ‘अनाथ’ एक पिछड़ा वर्ग होना चाहिए। अब एक समूह के रूप में, क्रीमी लेयर वालों को छोड़कर, क्या अनाथ प्रतिनिधित्व से वंचित, असहाय, हाशियाकृत, बेजुबान और निर्धन हैं? हां, वे यह सब हैं। निर्धनता कई अन्य कारकों से उपजती है। जैसे राजनीति में आवाज न सुना जाना, प्रतिनिधित्व न मिलना आदि। 

तो इस प्रकार पिछड़ा वर्ग लोगों की एक श्रेणी है, जो किसी भी जाति या धर्म के हो सकते हैं और जो किसी भी प्रकृति के सामाजिक समूह का हिस्सा हो सकते हैं, परंतु जिनकी आवाज नहीं सुनी जा रही हो और जो राजनैतिक सत्ता से वंचित हों। यह एक अत्यंत शक्तिशाली वर्ग है, जिसने पूरे देश के ऐसे लोगों को एक कर दिया है, जिनकी आवाज नहीं सुनी जा रही थी। आज अगर आप केरल के किसी पिछड़े वर्ग से हैं और कश्मीर जाकर आप अपना परिचय इस रूप में देते हैं तो आप वहां के हाशियाकृत वर्गों से स्वत: जुड़ जाते हैं। चाहे आप कहीं भी जाएं, कश्मीर, असम या गुजरात, सब जगह ऐसा ही होता है। तो पिछड़े वर्ग की अवधारणा ने एक ऐसा मजबूत ढ़ांचा खड़ा कर दिया है, जो पूरे देश के, सभी क्षेत्रों के, सभी धर्मों के, सभी जातियों के, सभी भाषाएं बोलने वाले ऐसे लोगों को एक करता है, जो सत्ता से वंचित हैं, प्रतिनिधित्व से वंचित हैं और जिनकी आवाज सुनी नहीं जाती। आज यह जो बैकवर्ड क्लासिस हैं, दरअसल वे ही भारत की बैकबोन (रीढ़ की हड्डी) क्लासिस हैं। 

वर्ग की यह परिभाषा मार्क्सवाद में वर्ग की अवधारणा से कहीं विस्तृत है। क्या भारत के वामपंथी भी आज जो स्थिति है उसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? उनके द्वारा 1993 में क्रीमी लेयर का विरोध नहीं करने से लेकर ईडब्ल्यूएस आरक्षण तक।

इस संबंध में सभी वामपंथियों की सोच एक नहीं हैं। केरल के कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े सम्मानित नेता थे– एन. ई. बलराम। वे एक अत्यंत विशेषाधिकार प्राप्त सामाजिक समूह, एक तथाकथित उच्च जाति, से थे। वे अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी और बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता थे। वे ई.एम.एस. नंबूदरीपाद की इस धारणा के कटु विरोधी और आलोचक थे कि आरक्षण का आधार सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक होना चाहिए। वे मंडल आयोग की सिफारिशों के जबरदस्त समर्थक थे। उन्हें यह एहसास था, समझ थी कि पिछड़ा वर्ग एक आर्थिक वर्ग तो है, परंतु वह आय और संपत्ति के अर्थों में आर्थिक वर्ग नहीं है। उसके निर्धारण में सामाजिक पूंजी और अन्य कई प्रकार की संपत्तियों की भूमिका है। दरअसल आर्थिक और वित्तीय दोनों अलग-अलग चीजें हैं। आर्थिक कमजोरी बहुआयामी है। आर्थिक’ शब्द की कई परिभाषाएं हैं, परंतु इस शब्द को समझने के मुख्यतः चार दृष्टिकोण या तरीके हैं।

एक दृष्टिकोण वह है जो कल्याण, जिसे हम वेल्फेयर कहते हैं, उस पर आधारित है। इस दृष्टिकोण में आर्थिक शब्द का संबंध सुख से रहने, आराम से जीने के लिए जरूरी साधनों तक पहुंच से जोड़ा जाता है। ये साधन कुछ भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने पिछड़ा वर्ग के निर्धारण के लिए 15-20 मानदंड चुने हैं, जो चार श्रेणियों में विभाजित हैं– सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व शैक्षणिक। राजनीतिक से आशय है पंचायतों, विधानमंडलों आदि में प्रतिनिधित्व। तो इन बहुआयामी मानदंडों, जो चार क्षेत्रों से संबंधित हैं, उनके आधार पर आप यह तय करते हैं कि कोई समूह आर्थिक दृष्टि से कमजोर है या नहीं। अगर आप व्यक्तियों या परिवारों की निर्धनता की बात करते हैं, गरीबी की बात करते हैं, तो वह भी बहुआयामी अवधारणा है। ऑक्सफ़ोर्ड पावर्टी इंस्टीट्यूट ने यूएनडीपी ने मिलकर एक मल्टी-डाईमेंशनल पावर्टी इंडेक्स (बहुआयामी निर्धनता सूचकांक) विकसित किया है, जिसे कुछ परिवर्तनों के साथ नीति आयोग ने भी स्वीकार किया है। यह सूचकांक भी निर्धनता के विविध आयामों को, जिनमें सामाजिक पहलू भी शामिल हैं, संज्ञान में लेता है। अंतर यह है कि पिछड़ा वर्ग’ समूहों की आर्थिक निर्धनता / कमजोरी को देखता है और आक्सफोर्ड का इंडेक्स व्यक्तियों और परिवारों की निर्धनता पर केंद्रित है। लेकिन ये दोनों बहुआयामी हैं। कुल मिलाकर मुद्दा यह है कि हम गरीबी को, निर्धनता को, केवल कुछ सीमित वित्तीय मानदंडों के आधार पर परिभाषित नहीं कर सकते। 

प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल

तो मुझे नहीं लगता कि मार्क्सवादी दृष्टिकोण और पिछड़ेपन को देखने के इस दृष्टिकोण में कोई असंगति या भिन्नता है। पिछड़ापन, आर्थिक निर्धनता या बहुआयामी वंचना के लिए ही दूसरा शब्द है। पिछड़ापन भी बहुआयामी है जो सुख से जीने के लिए आवश्यक साधनों की बात करता है। परंतु मार्क्सवाद और पिछड़े वर्ग की संकल्पना में टकराव या विरोध कहां है? पिछड़े वर्ग का दृष्टिकोण एक अधिक व्यापक दृष्टिकोण है। आप श्रमजीवी वर्ग के हो सकते हैं और साथ ही पिछड़े वर्ग के भी। सैद्धांतिक तौर पर संपूर्ण श्रमजीवी वर्ग एक पिछड़ा वर्ग है, यद्यपि इस मुद्दे के व्यावहारिक पक्षों पर मैंने विचार नहीं किया है। सरकार यह कह सकती है कि वे श्रमजीवी वर्ग, जो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व शैक्षणिक वंचना के इन-इन मानदंडों को पूरा करते हैं और जिन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है, वे पिछड़े वर्ग हैं। वे किसी जाति के सदस्य हैं या नहीं, इससे उनकी पात्रता तय नहीं होगी। जैसे कोई ब्राह्मण जो अंतिम संस्कार संपन्न करवाता है, वह पिछड़े वर्ग का सदस्य होने का अपात्र नहीं हो जाता। उसी तरह कोई ट्रांसजेंडर पिछड़े वर्गों का सदस्य होने का अपात्र नहीं है। ये लोग अपात्र नहीं हैं, इसलिए कोई कारण नहीं कि संपूर्ण श्रमजीवी वर्ग एक पिछड़ा वर्ग क्यों नहीं हो सकता। समस्या यह है कि पिछड़ा वर्ग की अवधारणा इस बात की अनुमति देती है, और मार्क्सवादी विश्लेषण की भी इस तरह से व्याख्या की जा सकती है कि वह यह अनुमति दे कि किसी सामाजिक समूह को एक वर्ग के रूप में मान्यता दी जा सकती है, परंतु हमारी कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेता, दिवंगत एन. ई. बलराम जैसे लोगों को छोड़कर, यह नहीं मानते कि कोई सामाजिक समूह, एक वर्ग हो सकता है। यही कारण है कि ई. एम. एस. नबूंदरीपाद ने अपनी प्रशासनिक सुधार समिति की रपट में कहा था कि उत्पादन संबंधों को बदलने और गरीबी को समाप्त कर देने से सामाजिक भेदभाव अपने-आप समाप्त हो जाएगा। परंतु यह बहस का विषय है। 

हम कतई इस पक्ष में नहीं हैं कि सामाजिक समूहों को केवल सामाजिक समूह होने के कारण अलग-अलग खांचों में बांटा जाय और ना ही हम समाज को विभाजित करना चाहते हैं। मुझे नहीं लगता कि मार्क्सवादी विचारधारा को चातुर्यवर्ण व्यवस्था पर हमलावर होने में कोई परेशानी होनी चाहिए। इसी तरह, मुझे नहीं लगता कि पवित्रता और प्रदूषण, पिछले जन्मों के पुण्यों और पापों का प्रभाव आपके इस जीवन पर पड़ने व आपके गरीब होने के लिए आपके पिछले जन्म के कर्मों के उत्तरदायी होने जैसी धारणाओं की खिलाफत करने में मार्क्सवादियों को कोई संकोच होना चाहिए। इसी प्रकार के अंधविश्वासों का मुकाबला तो हम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि व्यक्तिगत तौर पर कुछ वामपंथी नेता भी जातिवादी हैं। हम जानते हैं कि एस. एस. डांगे जातिवादी थे और अंततः उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। ई. एम. एस. नंबूदरीपाद निश्चित ही जातिवादी थे और एन. ई. बलराम निश्चित तौर पर ही जातिवादी नहीं थे। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि ए. के. गोपालन जातिवादी थे। तो इस तरह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता जातिवादी थे। जातिवादी नेता हर जगह हैं। कांग्रेस जातिवादी नेताओं से भरी हुई है। परंतु इस तथ्य का, हमें जिस सावधानी और बारीकी से पिछड़े वर्गों की अवधारणा का विश्लेषण करना है, उससे कोई संबंध नहीं है। हमें पिछड़े वर्ग को ऐसे लोगों की श्रेणी के रूप में प्रस्तुत करना है जो किसी भी तरह के हाशियाकरण, प्रतिनिधित्व के अभाव और उनकी आवाज को महत्व न दिए जाने जैसी समस्याओं से पीड़ित हैं। फिर चाहे उस श्रेणी की प्रकृति और उसके साथ हो रहे भेदभाव की प्रकृति कुछ भी हो। इस अर्थ में पिछड़ा वर्ग एक शक्तिशाली और प्रगतिशील श्रेणी है। 

अनुच्छेद 16(4) में जिस पिछड़े वर्ग की बात कही गई है, उसमें अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां शामिल हैं। मैं पिछड़े वर्ग शब्द का प्रयोग उसी अर्थ में कर रहा हूं। अनुच्छेद 15(4) आते-आते पिछड़े वर्गों को एससी, एसटी व सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में बांट दिया गया। कुलीन जातियां, चाहे वे किसी भी राजनैतिक दल के साथ जुड़ी हों या किसी भी विचारधारा को मानने की बात करती हों, वे सभी अनुच्छेद 16(4) में पिछड़े वर्ग की जो अवधारणा है, उस पर हमलावर हैं।

अब सभी को ऐसा लग रहा है कि आरक्षण पर जो 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा लगाई गई थी, उसे उठा लिया गया है और राज्य सरकारें आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा रही हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह हो चुका है और शायद बिहार में अगले साल तक हो जाएगा। आपको क्या लगता है, क्या ऐसा है और इसका क्या प्रभाव होगा?

देखिए, हमें यह बात स्पष्ट समझनी होगी कि इस संविधान पीठ के समक्ष जो मुद्दा था, वह केवल यह था कि संविधान में जो संशोधन किया गया है वह वैध है या नहीं। जैसा कि आप जानते हैं, किसी भी संविधान संशोधन को केवल एक आधार पर अवैध घोषित किया जा सकता है – और वह यह है कि संबंधित संशोधन संविधान के मूल ढ़ांचे का उल्लंघन करता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हम किसी कानून की संवैधानिक वैधता का परीक्षण नही कर रहे होते हैं। हम संविधान के एक भाग की वैधता का परीक्षण करते हैं। मेरा तर्क यह है – और यह मैं पहले भी कह चुका हूं – कि यह संशोधन प्रतिनिधिक राज्य, संविधान के मूल ढ़ांचे और समानता की अवधारणाओं को नष्ट करने वाला है, क्योंकि यह केवल जाति पर आधारित भेदभाव और चातुर्यवर्ण की अवधारणा को संविधान का अंग बनाता है। 

जहां तक मुझे याद है कि केवल कट्टर आरक्षण विरोधी संगठन यूथ फॉर इक्वालिटी के वकील ने पीठ के समक्ष यह तर्क दिया था कि 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा को संविधान के मूल ढ़ांचे का भाग माना जाना चाहिए। यह तर्क किसी और ने नहीं दिया या कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं और यह तो निश्चित है कि इस तर्क पर किसी ने भी विशेष जोर नहीं दिया। यह साफ है कि इस तर्क को पांचों जजों ने खारिज कर दिया। पचास प्रतिशत की सीमा संविधान के मूल ढ़ांचे का भाग नहीं है, तो फिर इस सीमा का उल्लंघन हो सकता है या नहीं, यह पीठ के विचारार्थ मुद्दों में शामिल कैसे हो सकता था? मुद्दा केवल यह था कि संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के अंतर्गत वर्तमान में दिए जा रहे आरक्षण के अतिरिक्त ईडब्लूएस को आरक्षण देना संविधान के मूल ढ़ांचे का उल्लंघन है या नहीं – सभी तर्क इसी मुद्दे को लेकर दिए गए। चूंकि 50 प्रतिशत की सीमा संविधान के मूल ढ़ांचे का भाग नहीं है, इसलिए इस सीमा को पार किया जा सकता है या नहीं, इस पर संविधान पीठ को विचार करने की जरूरत नहीं थी और उसने इस पर विचार किया भी नहीं। 

अब हम कहां खड़े हैं? जैसा कि हम सब जानते हैं इंद्रा साहनी मामले में 50 प्रतिशत की एकदम कठोर सीमा का निर्धारण नहीं किया गया था। इस मामले में पीठ ने आंबेडकर को उद्धृत करते हुए यह कड़ी चेतावनी भर दी थी कि 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन अनुच्छेद 16(1) में दिए गए समानता के अधिकार के लिए क्षतिकारक होगा। इंद्रा साहनी मामले में नौ जजों की पीठ ने कहा था कि अपवादात्मक परिस्थितियों में, जैसे किसी दूरस्थ क्षेत्र में रहने वाले अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोगों की खातिर, इस सीमा को पार किया जा सकता है। यही कारण है कि कई राज्यों में इस सीमा को पार किया गया है और आगे भी किया जाता रहेगा। इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। 

अब एक प्रश्न जिस पर विचार होना चाहिए, वह यह है कि ईडब्ल्यूएस को आरक्षण अनुच्छेद 15(6) के अंतर्गत 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा के भीतर दिया जाना चाहिए या नहीं। मैं इस मुद्दे पर अदालत जाऊंगा। निश्चित रूप से मैं यह नहीं चाहता कि जातिगत भेदभाव पर आधारित और केवल सवर्णों के लिए यह कोटा, उसी 50 प्रतिशत कोटे में से आए जो एससी, एसटी और ओबीसी के लिए निर्धारित है और ना ही मैं यह चाहूंगा कि यह कोटा शेष 50 प्रतिशत में से आए क्योंकि पिछड़े वर्गों के संघर्ष के कारण ही समानता का अधिकार, और विशेषकर शिक्षा व सार्वजनिक नियोजन में समानता का अधिकार, संविधान का हिस्सा बन सका है। हमारे लिए यह अधिकार बहुत मूल्यवान है और हम इसे संरक्षित रखना चाहेंगे। तो आदर्श स्थिति तो यह होगी कि ना तो अन्यों के लिए निर्धारित 50 प्रतिशत कोटा और ना ही कुलीन तंत्र को स्थापित होने से रोकने और सभी को प्रतिनिधित्व देने के लिए जो 50 प्रतिशत कोटा निर्धारित किया गया है, ये दोनों ही ईडब्ल्यूएस आरक्षण के कारण कम नहीं होने चाहिए। ईडब्लूएस आरक्षण समानता की अवधारणा के खिलाफ है। दुखद यह कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को वैध ठहरा दिया है तो इसलिए अब यह या तो पहले 50 प्रतिशत में से आएगा या दूसरे 50 प्रतिशत में से। जैसा कि मैंने पहले भी कहा आदर्श स्थिति तो यह होती कि यह आरक्षण दिया ही नहीं जाता और मैं यह आशा करता हूं कि कभी न कभी संसद संविधान से इस कैंसर को, इस अलोकतांत्रिक संशोधन, को निकल फेंकेगी। परंतु जब तक ईडब्ल्यूएस कोटा है, वह सभी के लिए खुले हिस्से में से दिया जाना चाहिए ना कि उस हिस्से से जिसका उद्देश्य वंचित समूहों को प्रतिनिधित्व देना है। इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ी जानी होगी। 

तो इस तरह हमारे सामने मुद्दा यह नहीं है कि क्या 50 प्रतिशत की सीमा को कठोर बनाया जा सकता हैक्या यह कहा जा सकता है कि इस सीमा को किसी भी स्थिति में पार नहीं किया जा सकता? ऐसा करने के लिए, यह कहने के लिए कि यह सीमा गैर-उल्लंघनीय है, हमें 11 जजों की पीठ की जरूरत पड़ेगी। तो हम इस सीमा की समीक्षा करने की बात नहीं कर रहे हैं। हम तो चाहते हैं कि 50 प्रतिशत की सीमा लचीली बनी रहे। यहां मैं यह साफ कर दूं कि यह मेरा अपना विचार है। मैं चाहूंगा कि यह सीमा और उसकी प्रकृति जस-की-तस बनी रहे। जो एकमात्र प्रश्न है, वह यह है कि जो यह प्रतिनिधित्व-विरोधी 10 प्रतिशत आरक्षण है, वह कहां से आए – खुली श्रेणी से या वंचितों को प्रतिनिधित्व देने के लिए बनाई गई श्रेणी से? 

दो अंतिम प्रश्न हैं जिन्हें मैं एक साथ पूछना चाहूंगा। क्या यह विडंबना नहीं है कि कम से कम सतही तौर पर वर्तमान संसद के संविधान सभासे कहीं अधिक प्रतिनिधिक होने के बावजूद इस तरह का संशोधन हुआ? और दूसरा यह कि क्या पीठ के दो जजों, जिनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे, द्वारा अलग निर्णय दिए जाने से क्या यह आशा जागती है कि न्यायपालिका भविष्य में संविधान की रक्षा कर सकेगी?

मुझे लगता है कि हम वर्तमान संसद और संविधान सभा की प्रतिनिधिक होने या न होने के आधार पर तुलना नहीं कर सकते। मैंने कोई हिसाब-किताब तो नहीं किया है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि संविधान सभाकी तुलना में वर्तमान संसद में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। वर्तमान संसद पर चातुर्यवर्ण समर्थक शक्तियों का नियंत्रण है। संविधान सभा का नेतृत्व मुख्तलिफ़ वर्ग के लोगों के हाथों में था, जो बहुवादी भारत के पैरोकार थे। उस समय देश का विभाजन हुआ ही था और वे निश्चित तौर पर नहीं चाहते थे कि भारत हिंदू धार्मिक राज्य बने। तो इस प्रकार संविधान सभा अपनी पूरी ताकत से धार्मिक राज्य के खिलाफ खड़ी थी। आज हमारे देश में एक ऐसी केंद्रीय सरकार है, जो सावरकर और गोलवलकर के सपनों का हिंदू धार्मिक राज्य स्थापित करना चाहती है। वह एक ऐसा देश बनाना चाहती है, जिसका समाज चातुर्यवर्ण पर आधारित होगा और जिसमें सभी लोगों को चातुर्यवर्ण की अवधारणा और विचारधारा को राष्ट्रीय अवधारणा और विचारधारा के रूप में स्वीकार करना होगा। वे बहुवाद और विविधता को कायम रखने के लिए जो महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं, जैसे कि कार्यपालिका और न्यायपालिका में, उन समूहों को प्रतिनिधित्व देना जिन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है, वे ऐसे सभी उपायों और प्रावधानों पर हमलावर हैं, क्योंकि वे देश के विविधतापूर्ण और प्रतिनिधिक चरित्र को नष्ट कर एक एकसार चार वर्णों वाला समाज स्थापित करना चाहते हैं। मेरे विचार में हमारी जो वर्तमान संसद है वह पूर्व की तुलना में कहीं अधिक प्रतिगामी है। वह अंग्रेजी के खिलाफ है, वह अन्य देशों से हमारे संबंध खत्म करना चाहती है, वह धर्मों के बीच प्रतिस्पर्द्धा खत्म करना चाहती है, वह भारत को बर्मा की तरह एक निरंकुश राज्य में बदलना चाहती है, जो सारी दुनिया से कटा हो। वह वैदिक कर्मकांडों और आदर्शों पर आधारित वैदिक समाज स्थापित करना चाहती है, वह एक मनुवादी समाज बनाना चाहती है, जिसमें महिलाएं और नीची जातियां खुशी-खुशी उनके लिए निर्धारित काम करते रहें और कोई प्रश्न न पूछें। वह लोकतंत्र की पुनर्व्याख्या कर उसे वैदिक प्रजातंत्र में बदलना चाहती हैं। मुझे बताया गया है कि गत 26 नवंबर को भारत सरकार ने एक नई थीम प्रस्तुत की है और वह यह है कि भारत लोकतंत्र की जननी है। एक विश्वविद्यालय से किसी ने मुझे फोन कर यह बताया था और वे चाहते थे कि मैं इस विषय पर बोलूं। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह है कि लोकतंत्र से उनका आशय मनुतंत्र से, चातुर्यवर्ण से है। तो आज जो हमारी संसद है, वह प्रतिनिधिक नहीं है। वह सामाजिक दृष्टि से प्रतिगामी है, जो भारत को अंधकारमय अतीत में धकेल देना चाहती है। आज संसद में चंद प्रभु जातियों को जबरदस्त प्रतिनिधित्व प्राप्त है। पिछड़े वर्गों, एससी, एसटी व अल्पसंख्यक वर्गों के लोग महत्वपूर्ण पदों पर नहीं हैं। सारा नियंत्रण एक छोटे से वर्ग के हाथों में है और इसलिए वे किसी अन्य वर्ग को प्रतिनिधित्व देना ही नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि केवल उनके वर्ग का बोलबाला बना रहे।

जहां तक दो जजों के बेंच के बहुमत के निर्णय से असहमत होने का प्रश्न है, मुझे लगता है यह बौद्धिक और पेशेवर निष्ठा और ईमानदारी का द्योतक है, यह उच्च दर्जे के विवेक और तर्क-वितर्क का सूचक है, क्योंकि मैंने देखा था कि ये दोनों जज खुलकर बात कर रहे थे, तर्कों को सुन रहे थे, समझ रहे थे, प्रश्न कर रहे थे और अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने सभी तर्कों को ध्यान में रखा और उन पर गहन विचार किया और अपनी स्वतंत्र राय बनाई। जो बाकी तीन जज थे, उनमें से दो जज, जितना मैंने देखा और जितना मैं जानता हूं, कुछ भी नहीं कह रहे थे और जो तीसरे जज थे, वे बहुत कम बोल रहे थे। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि अदालत में बोलना जजों के लिए आवश्यक है और मुझे विश्वास है कि वे भी अपने तरीके से निष्कर्षों पर पहुंचे होंगे। परंतु ये जो दोनों असहमत जज थे, वे इस बारे में बहुत पारदर्शी थे कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। उन्होंने क्या समझा, किस बात से वे सहमत हैं, किस बात से वे असहमत हैं, इस मामले में वे पूरी तरह पारदर्शी थे। मुझे लगता है कि इस तरह के पारदर्शी, पेशेवर और उच्च शिक्षित जज और ऐसे जज जो संवैधानिक विधि, विशेषकर प्रतिनिधित्व, लोकतंत्र, मूल ढ़ांचा, समानता आदि जैसे विषयों की बारीकियों को समझते हैं और जो पूरी ईमानदारी और स्वतंत्रता से निर्णय सुनाते हैं, ऐसे जज और निर्णय लेने की ऐसी प्रक्रिया तेजी से विलुप्त हो रही है। तो मैं सोचता हूं कि हमें निर्णय लेने के इस तरीके को बचाए रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। जब तक इस तरह के निर्णय लिए जाते रहेंगे, चाहे हम उनसे सहमत हों या असहमत, ऐसे निर्णय लेने वाले जज हमारे लिए सम्मान के पात्र बने रहेंगे। आखिर हम और आप भी तो इसी तरह की प्रक्रिया से गुजरकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। हम एक-दूसरे से असहमत हो सकते हैं परंतु हम उस खुलेपन और उस निष्पक्षता का हमेशा सम्मान करते हैं, जिससे हम अपने-अपने निष्कर्षों पर पहुंचते हैं। इस तरह के जज होना हमारी खुशकिस्मती है। निर्णय लेने की इस तरह की गुणवत्तापूर्ण प्रक्रिया एकदम समाप्त हो गई है या हो जाएगी, ऐसा कहना ठीक नहीं है। लेकिन इसके साथ ही यह सोचना कि आशा की कोई किरण है, जरूरत से ज्यादा आशावादी होना होगा। 

(समाप्त)

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

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आदिवासी समाज को रहस्यात्मक अनुष्ठानों तक सीमित करके समझना या उनका अति महिमामंडन करना कोई नई बात नहीं है। उनके असली मुद्दों पर बहुत...