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राजेश कुमार का नाटक : कह रैदास खलास चमारा (अंतिम भाग)

नाटककार ने यज्ञोपवीत में विश्वास दिखाकर रैदास का विश्वास भी जनेऊ में दिखा दिया है। इस प्रकार निर्गुण रैदास यहां ब्राह्मणवादी बना दिए गए हैं। नाटककार को जनेऊ वाली कहानी को या तो दिखाना ही नहीं चाहिए था, और अगर दिखाना ही था, तो उसका रैदास के द्वारा खंडन कराना चाहिए था। पढ़ें राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक का कंवल भारती द्वारा पुनर्पाठ का दूसरा और अंतिम भाग

पहली कड़ी के आगे

नाटक में अगला दृश्य चमत्कार का है, जो रैदास साहेब को वैष्णव बनाने के उद्देश्य से ब्राह्मणों द्वारा उनकी ठाकुर-भक्ति दिखाने के लिए गढ़े गए हैं। पर नाटककार ने बड़ी कुशलता से इस चमत्कार को वैज्ञानिक मोड़ दे दिया है। पहले इस प्रसंग को देख लेते हैं। नाटक के अनुसार काशी के ब्राह्मण पंडे महंत अघोरनाथ के नेतृत्व में काशी नरेश के दरबार में रैदास के विरुद्ध शिकायत लेकर जाते हैं, और कहते हैं, महाराज हमारे धर्म को बचाइए। महंत महाराज को बताता है, “अब मंदिरों में कीर्तनों के समानांतर नुक्कड़-चौराहों पर सबद गाए जा रहे हैं। धर्मानुसार पूजा-पाठ का जो कार्य ब्राह्मणों के लिए निर्धारित है, वह एक शूद्र कर रहा है। रैदास ने ब्राह्मणों के सुरक्षित क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश करने का जो अपराध किया है, वेदों को मिथ्या कहा है, कर्मकांड को पाखंड बताया है, उसके लिए ऐसे कठोर दंड-विधान की रचना करें ताकि फिर कोई शूद्र ब्राह्मण के सम्मुख सिर उठाकर चलने का दुस्साहस न कर सके।”[1]

महाराज के आदेश पर रैदास को दरबार में बुलाया जाता है। रैदास प्रवेश करते हैं। महाराज रैदास से उनका नाम और ठांव पूछते हैं। रैदास अपना नाम बताते हैं और ठांव के उत्तर में यह पद गाते हैं—

अब हम खूब वतन घर पाया।
ऊंचा खेर सदा मन भाया।
बेगमपूर सहर का नांव।
दुःख अंदोह नहीं तेहि ठांव।

…….

कह रैदास खलास चमारा।
जो हम सहरी सो मीत हमारा।

आगे काशी नरेश और रैदास के बीच दिलचस्प संवाद चलता है। काशी नरेश पूछते हैं, “सार्वजनिक रूप से जाति का नाम लेने से ग्लानि नहीं होती?” रैदास इसके उत्तर में कहते हैं, “ग्लानि उसे होगी, जिसने ये बनाई है।”[2]

इस वार्तालाप में एक बार पुन: नाटककार ने रैदास का पूर्वजन्म में विश्वास दिखाया है। यह वार्तालाप इस प्रकार है–

काशी नरेश : आखिर तुम जातिभेद क्यों नहीं मानते?

रैदास : जब सृष्टि के अन्य प्राणियों में जातिभेद नहीं है, तो फिर मानव प्राणियों में कहां से आ जाता है? … ये जातियां प्रभु ने नहीं बनाई हैं। इसे बनाने वाले हम मानव ही हैं। जिसने वेद पढ़ा, वह ब्राह्मण हो गया और जिसने जूते गांठने का काम किया, वह चमार। सब मनुष्य बराबर हैं। केवल व्यवसाय भेद के कारण अलग-अलग बांट दिए गए हैं।

महंत : ईश्वर ने स्वयं कहा है, चारों वर्ण मेरी ही सृष्टि हैं। चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुण कार्य विभागश: ।

रैदास : ईश्वर ने सृष्टि की है गुण कर्म के अनुसार।

महंत : आखिर माना न कि यह ईश्वरीय सृष्टि है।

रैदास : फिर जन्म लेते ही किसी को शूद्र क्यों बना दिया गया? बनाना था तो सबको ब्राह्मण बनाया होता।

महंत : ब्राह्मण कोई हलुवा नहीं है, जो ऐरो-गैरों को बांट दिया जाए।

रैदास : भगवान के लिए तो सब बराबर हैं।

महंत : सब ऊंगलियां एक समान नहीं हुआ करतीं। जिसने पिछले जन्म में कुकर्म किए, इस जन्म में शूद्र हुआ।

रैदास : पिछले जन्म में बुरे कर्मों के कारण शूद्र बना, लेकिन ब्राह्मण बनने के लिए ऐसी कोई संभावना भी तो नहीं छोड़ी।[3]

ऊपर के संवाद में न केवल रैदास को पूर्वजन्म का पक्षधर बना दिया गया है, बल्कि उनके मुख से जातिव्यवस्था को भी ईश्वरीय रचना कहलवा दिया गया है। रैदास तो वर्णव्यवस्था का ही खंडन कर रहे थे, फिर वह ब्राह्मण बनने की किसी संभावना का प्रश्न कैसे उठा सकते थे? अगर निर्गुणवादी दर्शन की समझ के साथ यह संवाद चलता, तो तर्क ज्यादा धारदार और मारक हो सकते थे।

एक और संवाद देखिए, जिसमें रैदास को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा गया है। रैदास कहते हैं, “जब सारा शास्त्र ही हमारे विरुद्ध लिखा गया हो, तो शास्त्रार्थ किस आधार पर होगा?” काशी नरेश उत्तर देते हैं, “आधार होंगे ईश्वर। ईश्वर ही इस धर्म-बहस के निर्णायक होंगे।” तुरंत एक सिंहासन मंगाया जाता है, जिस पर भगवान कृष्ण की मूर्ति स्थापित है। काशी नरेश शर्त रखते हैं, जो इस मूर्ति को अपनी शक्ति से अपनी गोद में बिठाकर दिखायेगा, वही विजयी घोषित किया जाएगा। महंत एक और शर्त जोड़ देते हैं कि जो विजयी होगा, उसे पालकी में बिठाकर पूरी काशी नगरी में घुमाएगा। रैदास को शर्त स्वीकार करने को कहा जाता है, पर रैदास कहते हैं, “महाराज, मुझे चमत्कार दिखाना पसंद नहीं है।” लेकिन महंत रैदास को कहते हैं कि “तुम तो चमत्कार के सहारे ही चर्चा में रहते हो। काशी में हल्ला है कि भगवान रोज पांच मुहरें तुम्हारी पूजा की पिटारी में छोड़ देते हैं, जिससे तुम मंदिर और धर्मशाला बनवा रहे हो।” रैदास इसका खंडन करते हुए कहते हैं कि हम तो निर्गुण हैं, भला हमें मंदिर और पूजा से क्या मतलब? तभी रसानंद कहता है कि अगर ऐसा है, तो गंगा मइया ने हाथ निकालकर कंगन कैसे दिया था? काशी नरेश भी पूछते हैं, “तो तुम्हारे बारे में लोग जो किस्से-कहानियां सुनाते हैं, वह क्या है?’ रैदास इसका बहुत सही उत्तर देते हैं, “चमत्कार और जनश्रुति में अंतर होता है। जिन्हें आप पढ़ने-लिखने नहीं देते, वे जनश्रुतियों के आधार पर ही समझा सकते हैं। जैसा बामन लोग किस्सा-कहानी गढ़ते हैं, वैसा हमारे लोग भी अपने हिसाब से बनाते रहते हैं।”[4]

पर इस बहस का कोई परिणाम नहीं निकला, और रैदास साहेब महाराज की शर्त स्वीकार कर लेते हैं। तुरंत ब्राह्मण मंत्रोच्चार शुरू करते हैं। महंत भी मंत्रपढ़ते हैं। लेकिन सिंहासन पर विराजमान मूर्ति में कोई हलचल नहीं होती है। इसके बाद रैदास भजन गाते हैं। तभी बाहर तेज आंधी-हवा चलने लगती है। तेज हवा से मूर्ति सरकती हुई रैदास की गोद में आ जाती है। काशी नरेश खुशी से बोलते हैं, “यह तो चमत्कार हो गया।” हालांकि, नाटककार ने रैदास के मुख से कहलवाया है, “यह चमत्कार नहीं है। मूर्ति हवा के वेग से मेरे पास आई है।” लेकिन काशी नरेश इसे चमत्कार ही मानते हैं, और रैदास को विजयी घोषित कर देते हैं। शर्त के मुताबिक रैदास को पालकी में बिठाया जाता है और महंत व उसके ब्राह्मण भक्त पालकी उठाकर नगर में भ्रमण करते हैं। महंत कहता है, “शूद्रों ने दिखा दिया, पालकी उठवाकर सारी दुनिया को दिखा दिया कि काशी में अब ब्राह्मणों की क्या औकात रह गई है।” फिर उसके मुख से नाटककार ने ओशो के विचार प्रकट कराए हैं, “बुद्ध की जड़ें काट डालीं, महावीर के विचर उखाड़ फेंके। लेकिन रैदास में आखिर क्या है, जो उखाड़ नहीं पा रहे हैं।”

इसके बाद नाटककार बताता है कि महंत आत्म-ग्लानि से गंगा में जलसमाधि लेने का प्रयास करता है। वह धीरे-धीरे गंगा में उतरता है और पूर्णरूपेण पानी में समा जाता है कि अचानक चार-पांच ब्राह्मण गंगा में कूदकर उसे बचा लेते हैं। फिर एक और स्वामी आते हैं, जो महंत के पीछे खड़े होकर कहते हैं, “अनीश्वरता और समता के सिद्धांत पर जब बौद्धों ने जन्माश्रित वर्णभेद के विरुद्ध विद्रोह किया, तो बृहद्रथ की हत्या कर दी गई … और बौद्ध विहार, मठ, संघाराम, और पुस्तकालय ध्वस्त कर दिए गए … ध्वस्त स्मारकों के स्थान पर विशाल हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ।”

यह सुनकर महंत में दैवीय शक्ति का संचार होता है, और वह खुशी से नाचने लगता है। उसे रैदास की हत्या करने की बुद्धि मिल जाती है। यहां नाटक का पूर्वार्द्ध समाप्त होता है।

राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक ‘कह रैदास खलास चमारा’ (पुस्तकाकार रूप में) का आवरण पृष्ठ

नाटक के उत्तरार्द्ध का आरंभ भी हसौड़ा लाल और मटकाराम के प्रहसन से होता है। यह प्रहसन थोड़ा उलझा हुआ लगता है। पूर्वार्द्ध में हसौड़ा लाल को जाति से बढ़ई बताया गया है, पर यहां अब वह चमार हो जाता है। पूर्वार्द्ध में हसौड़ा लाल का लगन पंडित मटकाराम की लड़की से दिखाया गया है, जबकि यहां मटकाराम सूत्रधार को बताता है, “बात यह है कि इसने राम टाइटल लगाकर किसी सुआराम की लड़की के साथ लगन पक्की कर ली। कोई पंडित नहीं मिल रहा था तो भागा-भागा मेरे पास आया। बेचारे पर दया आ गई। सोचा, चलो इस पतित का आज उद्धार कर ही दें।‘[5]

लेकिन जब हसौड़ालाल की बारात निकली, तो ठाकुर ने अपने दरवाजे से बारात निकालने से मना कर दिया। कहा, “मेरे दरवाजे के सामने से चमार जाति का दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर नहीं जा सकता।” पर दूल्हे ने घोड़ी पर से उतरने से मना कर दिया। कहा, “जब दरवज्जे के सामने से खजैला कुत्ता जा सकता है … तो क्या हम उससे भी गए गुजरे हैं? कौन से शास्त्र में लिखा है, दिखाओ?” इस पर ठाकुर के आदमियों ने रूई की तरह सबको धुन दिया। गेंहू के साथ घुन की तरह पंडित मटकाराम भी धुने गए।[6]

इसके बाद नाटककार ने किंवदंतियों का सहारा लिया है। एक तरफ से स्वामी रामानंद अपने शिष्यों के साथ आते हैं, और दूसरी तरफ से रैदास और उनके साथी आते हैं। सामने पड़ने पर दोनों के बीच वार्तालाप होता है, जो इतिहास-सम्मत तो नहीं है, पर कहानियों पर आधारित है। रामानंद से भेंट की कथा भक्तमाल में कबीर के साथ आई है। वह वार्तालाप उनके बीच में पर्दा डालकर होता है। नाटककार ने यहां भी रैदास और रामानंद के बीच केसरिया पर्दा डलवा दिया है। रामानंद कहते हैं, “ब्राह्मण की निंदा करोगे, तो जमलोक में भी जगह नहीं मिलेगी।” इस पर रैदास यह पद सुनाते हैं– “रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जउ होवे गुणहीन/ पूजिहि चरण चंडाल के, जउ हो गुण परवीन।” तब रामानंद कहते हैं, “चिल्लाते रहो, गला फाड़कर गाते रहो, कुछ नहीं होगा। दो कौड़ी का जुलाहा कबिरा मुझे रोज चेताते रहता है, अधकचरे ज्ञान का ढिंढोरा पीटते हुए चुनौती देते रहता है कि काशी में प्रगट हो गए हैं। अरे, प्रगट हो गए हैं, तो क्या हम अप्रगट हो गए हैं? भूल गया, काशी में उसे कोई चेला बनाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था, तो मेरे पास हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने आया था। मना कर दिया तो दूसरे दिन पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लाकर लेट गया था। जब मेरा पैर उसके शरीर पर पड़ा, तो कसकर पकड़ लिया। कहने लगा, ‘मैं धन्य हो गया, मुझे गुरुमंत्र मिल गया। आज उस गुरुमंत्र का कबिरा यह दक्षिणा दे रहा है कि काशी में घूम-घूमकर मुझे गरिया रहा है।” इस पर रैदास बोलते हैं, “आप भी बात का बतंगड़ बनाना खूब जानते हैं। कबिरा तो किसी तरह आपको अपने शरीर से छुआना चाहता था। जब आपका पैर उसकी छाती पर पड़ा, तो कैसे चींटियां रेंग गईं थीं। राम-राम कहकर पीछे हट गए थे। तब कबिरा ने क्या कहा था, याद है? उसने कहा था, क्या रक्खा है इस छूत विचार में। एक बूंद एक मल मूतर, एक चाम एक गूदा/ एक जाति से सब उत्पन्ना, को बामन को सूदा।”[7]

एक और कहानी पर आधारित संवाद रैदास के पूर्वजन्म से संबंधित है। रामानंद रैदास के साथियों से कहते हैं, “जिस कबीर और रैदास के बल पर तुम लोग फुदक रहे हो, पता है वे किस जाति के हैं? कबीर ब्राह्मणी पुत्र है और रैदास कोई चमार नहीं है। चमार के चोले में घुसा हुआ एक ब्राह्मण है, जो यह सब काम कर रहा है। पिछले जन्म में रैदास ब्राह्मण था और मेरा शिष्य था। एक दिन की बात है, यह भिक्षा मांगकर लाया। मैंने पूजा की थाली सजाई, और अपने ठाकुरजी को प्रसाद चढ़ाया। लेकिन पहली बार मेरे जीवन में ठाकुरजी ने प्रसाद लेने से इंकार कर दिया। मैंने ठाकुरजी से पूछा, क्यों अस्वीकार कर रहे हो? तो उन्होंने बताया कि यह प्रसाद एक ऐसे बनिए के घर से लाया गया है, जिसका सीधा कारोबार एक चमार से है। मैं इतना नाराज हुआ कि फौरन शाप दे डाला कि जा, मर जा इसी क्षण। और एक शूद्र के घर में, एक चमार के घर में तेरा जन्म हो। उसने उसी क्षण मरकर चमाइन के गर्भ से पैदा हुआ, तो उसने दूध पीने से इंकार कर दिया। चमाइन भागकर मेरे चरणों में पहुंची। मुझे भी दया आ गई। फिर कान फूंका, राम नाम दिया। तब जाकर उसने दूध पिया।”[8]

नाटककार ने इस कहानी का रैदास के मुंह से ही खंडन कराया है, यह अच्छी बात है। पर आगे रैदास स्वयं अपने जन्म को नीच बताकर प्रभु का गुण गा रहे हैं : “भगवन, तुमने ठीक ही किया जो नीच के घर जन्म दिया, क्योंकि तुम्हें प्रमाणित करना था कि जो विधान अब तक बनाए गए हैं, उनकी अब आवश्यकता नहीं रही।”[9] अब आवश्यकता नहीं है, का क्या मतलब है? क्या यह कहलवाकर नाटककार यह कहना चाहता है कि किसी समय इन विधानों की आवश्यकता थी?

अगला दृश्य चित्तौड़ का है, जहां मीराबाई के आमंत्रण पर रैदास गए हुए हैं। वहां काशी के महंत अघोरनाथ और अन्य ब्राह्मण भी आमंत्रित हैं। यह दृश्य भी कहानी पर आधारित है। मीराबाई ने रैदास को अपना गुरू बनाया था, और मीराबाई के बारे में यह कहा जाता है कि वह कृष्ण की उपासक थीं और उनकी मूर्ति अपने पास रखती थीं। रैदास निर्गुणवादी थे और मूर्ति-पूजा के विरोधी थे। अब दो बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। या तो यह बात गलत है कि मीरा के गुरू रैदास थे, या मीराबाई कृष्णभक्त थीं, यह बात गलत है। अगर मीरा कृष्ण की उपासक थीं, तो वह निर्गुणवादी रैदास की शिष्या नहीं हो सकतीं। अगर मीरा रैदास की शिष्या थीं, तो वह सगुणोपासक कृष्णभक्त नहीं हो सकतीं। यह साहित्य से ज्यादा दर्शन का विषय है। ऐतिहासिक रूप से इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मीरा ने पूरी तरह से ब्राह्मणी व्यवस्था से विद्रोह करते हुए एक निम्न जाति के संत को अपना गुरू बनाकर समकालीन सामंतों तथा ब्राह्मणों को यह संदेश दिया हो कि वह उनकी व्यवस्था में एक पराधीन स्त्री बनकर नहीं रह सकती। उस घोर स्त्री-विरोधी तन्त्र में एक स्त्री का राजमहल की चाहरदीवारी से बाहर निकलना और एक दलित जाति के संत को अपना गुरू बनाना निश्चित रूप से एक बड़ा विद्रोह था। और उससे भी बड़ा विद्रोह मीरा द्वारा रैदास के स्वागत में दिया गया सहभोज था।

नाटक में महंत कहता है : “हमें अगर तनिक भी भनक लग जाती कि मीराबाई ने रैदास को गुरू ग्रहण करने के उपलक्ष्य में इस सहभोज का आयोजन किया है, तो यहां अपमानित होने कदापि नहीं आता। … यह भोज ब्राह्मणों के गर्व से उठे सिर को मर्दन करने के लिए सुनिश्चित योजना है।… ब्राह्मणों के रहते एक चमड़ा उतारने वाले, जूता सीने वाले को गुरू बनाकर पूरी ब्राह्मण जाति के मुंह पर तमाचा मारा है।”[10]

ब्राह्मण सहभोज ग्रहण करने से इंकार कर देते हैं। इस संबंध में मीराबाई और महंत के बीच जो वार्तालाप होता है, वह इस प्रकार है–

मीराबाई : चलिए महाराज, गुरुवर रैदास आ गए हैं। मुख्य कक्ष में चित्तौड़ के सभी सम्मानित मेहमानों के साथ सहभोज के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

महंत : मुख्य अतिथि आ ही गए हैं, तो हमारी क्या आवश्यकता?

मीराबाई : ऐसा न कहिए, आप हमारे सम्मानित मेहमान हैं।

महंत : आप लोग भोजन करिए, हम नहीं करेंगे।

मीराबाई : क्या है विवशता?

महंत : हम रैदास के साथ भोज नहीं कर सकते।

मीराबाई : क्यों?

महंत : एक नीच के साथ हम भोज नहीं कर सकते।

मीराबाई : मेरे गुरूजी नीच नहीं है।

महंत : आपके गुरूजी चाहे जितने बड़े संत हो गए हों, हैं तो चर्मकार ही।

मीराबाई : आप उनका अपमान कर रहे हैं।

महंत : और आप हम सबका अपमान कर रही हैं। … अगर भोज की पंक्ति से रैदास उठ जाएं, तो हम चलने के लिए तैयार हैं।

मीराबाई : गुरूजी बैठे हुए हैं। उन्हें कैसे उठा दूं?

महंत : उन्हें उठा नहीं सकतीं, तो हम उठे जा रहे हैं।

मीराबाई : मैं आप लोगों के लिए कोई व्यवस्था करती हूं। आप थोड़ी देर विश्राम करें, मैं गुरूजी को भोजन कराके आती हूं।

महंत : हम उनकी जूठन खाएंगे?

मीराबाई : आप लोगों को अलग पंक्ति में बिठाकर खिलाएंगे।

महंत : ब्राह्मण के पहले रैदास भोजन कर लेगा, तो वह भोज्य हमारे लिए जूठन हो जायेगा। इसलिए जब तक हम ग्रहण नहीं कर लेते, दूसरा कोई भोजन को मुंह नहीं लगायेगा। यह विधान है।

मीराबाई : ठीक है, आप लोगों के लिए अलग रसोई की व्यवस्था करती हूं। कुछ ब्राह्मणों को मेरे साथ भेज दीजिए। अलग से सौदा दिलाती हूं। आप लोग अपना भोजन स्वयं बनवा लीजिए।[11]

ब्राह्मणों की बनाई हुई लीक और व्यवस्था को तोड़ने वाली मीराबाई को नाटककार ने ब्राह्मणों के आगे क्यों झुका दिया? शायद नाटककार के जहन में यह ख्याल रहा हो कि मीराबाई ने स्वयं महंत और ब्राह्मणों को भोज के लिए आमंत्रित किया है, इसलिए उनका बिना भोजन किए जाना सदाचार के विपरीत हो। पर यह दिखाना ज्यादा उचित होता कि मीराबाई ने सहभोज के लिए बुलाया था, उनकी अलग रसोई के लिए नहीं। मीराबाई द्वारा ब्राह्मणों की अलग रसोई स्वीकार कराके न केवल सहभोज का निरादर किया गया, बल्कि जिस मानवीय एकता और समानता के लिए रैदास लड़ रहे थे, उसके खिलाफ भी ब्राह्मणों की ही जीत दिखाई गई।

क्या नाटककार की यह विवशता इस कारण से थी कि उसे आगे एक चमत्कार के रूप में ब्राह्मणों को पराजित दिखाना था? हालांकि, यह चमत्कार एक किंवदंती है, जिसे आधार बनाकर नाटककार ने ब्राह्मणों की अलग रसोई का प्रसंग डाला है, पर यही भोज रैदास की हत्या का कारण बन जाता है। इस अलग भोज में जब ब्राह्मण भोजन के लिए पंक्ति में बैठते हैं, तो हरेक ब्राह्मण को अपनी बगल में रैदास बैठा हुआ दिखाई देने लगता है। नाटककार ने लिखा है, “ब्राह्मण जन अभी कुछ ही कौर मुंह में डाले होंगे कि पंक्ति छोड़कर खड़े हो जाते हैं। सब जोर-जोर से बोलने लगते हैं : मेरी बगल में रैदास बैठा है, मेरे दायें तरफ रैदास बैठा है, मेरे बाएं तरफ रैदास बैठा है। यहां बैठा है, वहां बैठा है, इधर है, उधर है।”

इसी समय मीराबाई का प्रवेश होता है। वह परोसे गए भोजन को देखकर कहती है, “आप लोगों ने तो भोजन को हाथ भी नहीं लगाया।” महंत उत्तर देते हैं, “हम काशी लौट रहे हैं। रानी जी, आपने हम लोगों के साथ अच्छा नहीं किया। हमने पहले ही कह दिया था कि हम नीच के साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते। फिर पंगत में रैदास को लाकर क्यों बिठा दिया?” मीराबाई बताती हैं कि “गुरुवर तो महल में हैं ही नहीं। वह तो श्रीकुम्भ श्याम मंदिर के प्रांगण में सत्संग कर रहे हैं।”[12]

महंत और अन्य ब्राह्मण कुपित होकर मंदिर पहुंच जाते हैं। यहां भी नाटककार ने ब्राह्मण लेखकों द्वारा गढ़ी गई एक कहानी को आधार बनाया है। वह कहानी यह है कि ब्राह्मण मंदिर जाकर रैदास से पूछते हैं कि तुम्हारा जनेऊ कहां है? तब रैदास रांपी से अपना पेट चीरकर दिखाते हैं, तो ब्राह्मणों को अंदर जनेऊ दिखाई दे जाता है। लेकिन इस तरह पेट चीरने से रैदास की मृत्यु हो जाती है। नाटककार ने इस कहानी में कुछ परिवर्तन किया है। ब्राह्मण श्रीकुंभ श्याम मंदिर पहुंचकर रैदास को बोलते हैं कि इस मंदिर में यज्ञोपवीत रहित व्यक्ति के लिए पूजा निषिद्ध है। रैदास कहते हैं, “मैं भी जनेऊ धारण करता हूं।… पर वह धागे का नहीं है।” महंत पूछता है, “तुम्हारा कौन सा जनेऊ है?” रैदास उत्तर देते हैं, “वह गले में नहीं, ह्रदय में है। उसे देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए, जो तुम्हारे पास नहीं है।”

सभी ब्राह्मण जोर देते हैं कि इसका सीना चीरकर देखा जाए कि किसे यह दिव्य जनेऊ बता रहा है। वे इतने हिंसक हो उठते हैं कि भीड़ में से कोई डंडे से रैदास पर प्रहार कर देता है। रैदास लड़खड़ाते हुए गिर जाते हैं। ब्राह्मण अपने-अपने भगवा चादर को उनके शरीर पर मंत्रोच्चारण करते हुए फेंकने लगते हैं। रैदास का शरीर चादरों से ढक जाता है। महंत पार्श्व से एक जलती हुई मशाल लेकर आता है और एक नजर रैदास के शरीर पर डालते हुए उस पर मशाल फेंक देता है। लपटें ऊपर तक उठने लगती हैं। रैदास जलकर मर जाते हैं। दूसरे शब्दों में रैदास को जलाकर मार दिया जाता है। उसके बाद रैदास के साथी रैदास के सबद गाने लगते हैं।

यहां नाटककार के साथ कई बिंदुओं पर आपत्तियां हैं। पहली आपत्ति यह कि नाटककार ने निर्गुण रैदास से श्रीकुम्भ श्याम मंदिर में सत्संग तो करवा दिया, लेकिन ब्राह्मणों द्वारा गढ़ी गई कहानी के आधार पर ही चित्रण करके रैदास की विचारधारा की ही हत्या कर दी है।

दूसरी आपत्ति यह है कि नाटककार ने यज्ञोपवीत में विश्वास दिखाकर रैदास का विश्वास भी जनेऊ में दिखा दिया है। इस प्रकार निर्गुण रैदास यहां ब्राह्मणवादी बना दिए गए हैं। नाटककार को जनेऊ वाली कहानी को या तो दिखाना ही नहीं चाहिए था, और अगर दिखाना ही था, तो उसका रैदास के द्वारा खंडन कराना चाहिए था। दिव्य जनेऊ का मतलब उसी अलौकिकवाद में विश्वास करना है, जिसका आजीवन रैदास ने खंडन किया।

तीसरी आपत्ति यह है कि रैदास की दुखद हत्या पर रैदास के साथियों द्वारा कोई रोष प्रकट न कराकर और रैदास के सबदों का गायन कराकर नाटककार ने मृत्यु को भी एक उत्सव में बदल दिया है, जो बहुत अधिक अखरता है।

चौथी आपत्ति यह है कि रैदास की हत्या जिस जघन्य तरीके से की गई, उस पर मीराबाई और शूद्र समाज की कोई प्रतिक्रिया न हुई हो, यह असंभव प्रतीत होता है। उसे नाटककार ने क्यों उपेक्षित किया?

कुल मिलाकर रैदास के जीवन पर राजेश कुमार का यह नाटक एक क्रांतिकारी रचना नहीं है। हालांकि उन्होंने कुछ अच्छे प्रयास अवश्य किये हैं, लेकिन इतिहास और सही तथ्यों की जानकारी के अभाव में वह रैदास के साथ कदाचित न्याय नहीं कर पाए हैं। वे और बेहतर सकते थे।

समाप्त

[1] राजेश कुमार, उपरोक्त, पृष्ठ 34-35
[2] वही, पृष्ठ 36
[3] वही, पृष्ठ 37-38
[4] वही, पृष्ठ 39-40
[5] वही, पृ. 45-47
[6] वही, पृ. 47
[7] वही, पृ. 49-50
[8] वही, पृ. 49-52
[9] वही, पृ. 53
[10] वही, पृ. 54-55
[11] वही, पृ. 56-57
[12] वही, पृ. 60-61

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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