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सी.बी. भारती कविताएं : दलित चेतना का जनवादी विकास (अंतिम भाग)

यदि आज नब्बे प्रतिशत दलित साहित्य आत्म-कथात्मक है, तो इसका कारण यही है कि स्वानुभूति उसकी आधारभूमि है। दलित लेखक साहित्य में भी अपने अतीत को जीता है। उसे अपने अतीत से ऊर्जा मिलती है। वह उसका संचित कोष है, जहां तीखी से तीखी, घृणित से घृणित और असुंदर से असुंदर अनुभूतियां हैं। पढ़ें, कंवल भारती द्वारा डा. भारती की कविताओं के पुनर्पाठ का अंतिम भाग

पिछली कड़ी के आगे

जाति के प्रश्न पर साहित्य की भूमिका क्या होनी चाहिए? यही दलित साहित्य का प्रस्थान बिंदु है। यथा– “हम नहीं चाहते संकीर्ण आदमियों वाला/ जर्जर कोई समाज/ राष्ट्र और देश।”[1]

लेकिन, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह का समाज वास्तव में अस्तित्व में है, जो संकीर्ण भी है और जातियों में विभाजित भी। लोकतंत्र में इस समाज के अस्तित्व का क्या अर्थ है?  निश्चित रूप से लोकतंत्र या तो अपनी सही भूमिका में नहीं है या फिर वह बेमानी हो चुका है। इसका निर्णय कैसे हो?  सी. बी. भारती  की ‘घर’ कविता इस सवाल पर हमें कुछ रास्ता दिखा सकती है। पहले शुरू की ये पंक्तियां देखिए–

घर…………..
घर ही तो  नहीं है उन बेघरों के पास
बनाया जिन्होंने
अपना आशियाना फुटपाथों पर
रेलवे लाइन की पटरियों पर
बजबजाते गन्दे नालों के किनारे।[2]

हमारे लोकतंत्र में यह वह समाज है, जो बे-घर है। एक अन्य समाज, जिसके पास घर है, उसका चित्र यह है–

कुछ के पास घर हैं भी तो
उन मलिन बस्तियों में
झुग्गी, झोपड़ी के रूप में
जहां न प्रकाश
न ही जहां शिक्षा है।[3]

प्रकाश और शिक्षा किसी भी समाज के विकास के लिये अनिवार्य व्यवस्थाएं हैं। लेकिन, इस देश में करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें घर की ये सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं। आखिर, ऐसा क्यों है? यह  कैसा लोकतंत्र है, जहां लोग–

दे देते हैं अपना अमूल्य वोट
जिन्होंने किया है बेघर उन्हें
सजाये हैं जिन्होंने अपने महल
उन्हीं की ठिठरती हड्डियों से।[4]

निश्चित रूप से भारत में घर-विहीन गरीबों का अस्तित्व लोकतंत्र पर सामंतवाद और पूंजीवाद के शर्मनाक गंठजोड़  के कारण है। यदि लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति एक मूल्य’ है तो प्रकाश और शिक्षा से वंचित लोगो के वोट का मूल्य क्या उन्हें मिला?

डा. सी.बी. भारती व उनका काव्य संग्रह ‘आक्रोश’

सपाटबयानी दलित कविता का मुख्य प्रतिमान है। दलित कवि रहस्यों में अपनी बात नहीं कहता, बल्कि अपने अनुभवों को पूरी ईमानदारी के साथ व्यक्त करता है। यह ईमानदारी सी. बी. भारती के कविता-कर्म में स्पष्ट नजर आती है।  उनकी ‘नशा’ कविता की ये पंक्तियां देखें, जो बेहद विचारोत्तेजक हैं–

व्यथित होते हैं हम जब अशिक्षा से
सहा नहीं जाता अपमान
होती है यंत्रणाओं की थकान जब
तब पी लेते हैं कभी कच्ची दारू, कभी भांग
भुलाने के लिये अपना गम।
पर तुम तो पी-पीकर हमारा खून
—      —      —
पालकर ऊंचे होने का दंभ
—      —      —
हमेशा नशे में रहे
कभी नहीं उतरे नीचे उस जमीन पर
जो है जमीन मानवता की
जो है जमीन मैत्री की
करुणा और भाईचारे की
एकता की।[5]

इस कविता में दलित की शोषक द्विज से सीधी लड़ाई है। दलित पर जो यह आरोप लगाया जाता है कि वह दारू पीता है, उसकी सघन प्रतिक्रिया इस कविता में है। इसमें दलित द्विज की आंखों में अंगुली डालकर उसे बताता है कि असल में नशे में कौन है, दलित या वह द्विज, जो जातीय उच्चता के नशे में हमेशा दंभ में रहता है और इस नशे में वह दलित के साथ हमेशा अलगाव बनाकर रखता है?

इस निर्भीक साफगोई की एक अन्य कविता  ‘जोंक’  है, जिसकी संरचना   सी. बी. भारती ने बड़ी कुशलता से की है। शब्दों के लिहाज से बेहद सुगठित इस कविता की अर्थवत्ता शासक वर्ग के लिये विनाश की चेतावनी है। इस कविता का विन्यास तीन लघु खंडों में है। पहले खंड में जोंक का यह चरित्र है–

जोंक जानती है सिर्फ
औरों का खून चूसना
जोंक जानती है सिर्फ
औरों के खून से
अपने कद को बड़ा करना।[6]

दूसरे खंड में जोंक शोषक में बदल जाती है, जिसका मकसद होता है–

अपने शिकार को दर्द देना
दिन-ब-दिन
उसे कमजोर करते जाना।[7]

और अंतिम खंड में यह अर्थ खुलता है–

मगर जोंक नहीं जानती कि एक दिन
उसका शिकार जरूर बिलबिलायेगा
दर्द जब सहा न जायेगा
और खून घटता जायेगा, तब
जरूर वह गुस्सायेगा।
और, मसल दी जायेगी जोंक तब,
जोंक नहीं जानती।[8]

इस कविता को ‘दलित-सर्वहारा की सशस्त्र क्रांति’ का नाम भी दिया जा सकता है। इसमें दलित चिंतन का विकास हमें दिखायी देता है। इसमें चिंतन उस ठहराव से बाहर निकला है, जो हमें मिशनरी दलित कवियों के रचना-कर्म में मिलता है। बुद्ध की शरण में जाना, निश्चित रूप से हिंदुत्व से विद्रोह है। पर, खून चूस रही ‘जोंक’ से मुक्ति उसे मसल कर नष्ट करने से ही मिल सकती है। जोंक के प्रति अहिंसा और मैत्री का व्यवहार नहीं किया जा सकता। प्रार्थना और अपीलों से जोंक का हृदय-परिवर्तन होने वाला नहीं है। उसे तो कुचलना ही होगा।

सी. बी. भारती की इस कविता के प्रसंग में मुझे मराठी दलित कवि दया पवार की इस कविता का स्मरण हो रहा है, जो इसी भावबोध की अत्यंत सशक्त कविता है। इस कविता का विमल थोराट ने हिंदी में अनुवाद इस प्रकार किया है–

हे सिद्धार्थ
तुमने साक्षात मृत्यु के समान अंगुलिमाल को
अपने सामर्थ्य से
विवश किया था
तेरे हम अदने से अनुयायी
इस विकराल अंगुलिमाल का
हम कैसे मुकाबला करें?
हे सिद्धार्थ
अगर हमने घनघोर संघर्ष किया
तो हमे माफ कर देना।[9]

‘अंगुलिमाल’ और ‘जोंक’ दोनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए शब्द हैं। जिस तरह दया पवार बुद्ध की अहिंसा से अंगुलिमाल को रोकना अब संभव नहीं मानते हैं, उसी तरह सी. बी. भारती भी जोंक को कुचलने में ही विश्वास करते हैं। यह दलित वर्ग के लिये घनघोर संघर्ष करने का संदेश है। इसमें संदेह भी नहीं कि सिर्फ संघर्ष ही दलित-मुक्ति का रास्ता है। जब से दलित वर्ग संघर्ष के पथ पर बढ़ा है, तब से वह न उदास है और ना ही बे-जुबान। संघर्ष ने उसे इस कदर जागरूक बना दिया है कि वह षडयंत्रों को भी अच्छी तरह जानने लगा है। यह भाव-प्रवणता हमें सी. बी. भारती  की एक अन्य कविता,  ‘तितली’  में मिलती है। तितली बड़ा सुंदर प्रतीक दलित वर्ग के लिये है। स्वतंत्र, निर्भय, मुक्त निर्भांत, प्रकृति से पाने वाली भोजन, निरंतर श्रमरत, लालसाओं से विरत, न बाज और न दगाबाज। तितली के ये सारे गुण दलित वर्ग के ही तो हैं। लेकिन  “तो भी बच नहीं पायी वह/ शोषकों के खूनी डैनों से/ तार-तार कर दिये गये पंख उसके बार-बार।”[10]  दलित वर्ग भी इसी खूनी शोषण का शिकार हुआ है। इस शोषण को उसने भी अब पहचान लिया है। इसलिए–

अब तितली बेजुबान नहीं है
षडयंत्रों से अनजान भी नहीं है वह।
सीख लिया है उसने संघषों से
जीने के लिये मरना।
लड़कर छीन लेना फिर से स्वत्व।[11]

इस स्वत्व को हासिल करने में सबसे बड़ी बाधा ईश्वरवाद खड़ी करता है। यह इस धारणा को पैदा करता है कि सुख-दुख ईश्वर प्रदान करता है। ईश्वर जिसे चाहता है, सुख देता है और जिसे चाहता है दुख देता है। ईश्वर आदमी की परीक्षा लेता है। इसलिये दुख की अवस्था में भी आदमी विचलित न हो, धैर्य न खोये। यदि वह संघर्ष करेगा, तो यह ईश्वर की व्यवस्था में दखल देना होगा। दलित साहित्य इस ईश्वरवाद को नकारता है। दलित साहित्य की यह पहली शर्त है कि उसे भाग्यवाद, नियतिवाद और ईश्वरवाद की धारणाओं को अस्वीकार करना है। कहना न होगा कि उसका दर्शन ईश्वरवादी नहीं है। सी. बी. भारती का कवि-कर्म इस बिंदु पर जनवादी चेतना से भिन्न है। यद्यपि मार्क्सवाद धर्म को अफीम का नशा कहकर खारिज करता है, लेकिन लेनिन के इस मत ने कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है, धर्म की रूढ़ि के लिये रास्ता बना दिया है। इससे मार्क्सवादी धारा के बुद्धिजीवियों में कथनी और करनी का अंतर पैदा हो गया है। वे लेखन में धर्म की रूढि का खंडन करने के बावजूद अपने निजी जीवन में उस रूढि को बनाये रखते हैं। कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं,  पर सच्चाई यही है कि वर्ण व्यवस्था का खंडन अभी भी जनवादी लेखन का केंद्रीय विषय नहीं बन सका है।

दलित लेखन में कथनी और करनी का अंतर्विरोध नहीं है। उसकी विचारधारा में यह छूट नहीं है कि वह लेखन में क्रांति करता रहे और व्यक्तिगत जीवन में रूढ़िवादी बना रहे। दलित रचना-कर्म की यह मूल चेतना है कि वह ईश्वरवाद का समर्थक नहीं हो सकता। यह सिर्फ सिद्धांत की रूढ़ि की वजह से नहीं है, बल्कि सामाजिक यथार्थ के अनुभवों के आधार पर भी इस वैचारिकी का निर्माण हुआ है। सी. बी. भारती  की  ‘ईश्वर नहीं है’  कविता इसी अनुभव को अभिव्यक्ति देती है–

देखता हूं जब भी
किसी गरीब की पीठ पर
शोषण के बेरहम निशान
लगता है जैसे ईश्वर है ही नहीं।।[12]

(और)

ईश्वर कुछ लोगों के स्वार्थ की उपज है
जिससे कि वे सजाते रहें महल अपने
मिटाकर गरीबों की झोपड़ियों को।[13]

यहां ईश्वर शोषक श्रेणी के एक प्रपंच के रूप में आया है। इस प्रपंच को स्पष्ट करने के लिये कवि ने एक मार्मिक बिंब का विधान किया है। कलुआ, जो एक गरीब मजदूर है, दिन भर मशक्कत करने के बाद जब मालिक से मजूरी मांगता है, तो वह झिड़की देकर भगा देता है। वह अपनी झोंपड़ी में थका-मांदा लौट कर पसर जाता है खटिया पर। उसके सामने महाशून्य है–

यह कैसा ईश्वर है
कि जो पसीना बहाता है
मशक्कत करता है
मयस्सर होती है उसे झोपड़ी
मिलती है उसे मार और गालियां।[14]

उसके सामने यह महत्वपूर्ण सवाल है कि जो मेहनत नहीं करता क्यों– “मयस्सर होता है उसे महल/मिलती है उसे शीतल बयार।”[15]] कलुआ इस आधार पर, इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि– “इसलिये ईश्वर इस दुनिया में/शायद/कहीं है नहीं।”[16]

यह कविता दलित सर्वहारा की भाग्यवादी धारणाओं पर जोरदार ढ़ंग से प्रहार करती है और उसे जागरूक करती है। हम कह सकते हैं कि सामंतवादी समाज व्यवस्था को समझने की समझ इस कविता में विद्रोह को जन्म देती है। लेकिन यही विद्रोह  सी. बी. भारती की ‘धर्म’ कविता में नहीं है। जनवादी चेतना की दृष्टि से यह अंतर्विरोध माना जा सकता है, लेकिन दलित चेतना की दृष्टि से इस कविता में दलित कविता का दर्शन है, जिसके मूल में धर्म की स्वीकृति है। दलित लेखक जिस धर्म की बात करता है, उसके केंद्र में मनुष्य है, न कि ईश्वर, ब्रह्म और आत्मा। दलित चिन्तन धर्म के सवाल पर डॉ. आंबेडकर का अनुसरण करता है, जिनके अनुसार धर्म का अर्थ मनुष्य और ईश्वर के बीच संबंध स्थापित करना नहीं है, बल्कि मुनष्य और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित करना है। सी. बी. भारती की  ‘धर्म’  कविता के केंद्र में यही धर्म है–

धर्म जगाता है विवेक
उपजाता है करुणा
हिंसा से विरत करता है धर्म
लाता है समता
—    —     —
धर्म फैलाता है मैत्री
जातियां नहीं जन्माता
मनुष्यता के बीच
दीवारें नहीं खड़ा करता धर्म।[17]

लगभग इसी भाव-धारा को सी. बी. भारती ने  ‘मंदिर’  कविता में अभिव्यक्त किया है। इस कविता की ये पंक्तियां विचारणीय हैं–

गरीब की रोटियां छीनकर
भूख से उन्हें तड़फता छोड़कर
उनकी रोटियों को बदल दिया गया हो संगमरमर में।
और कर दिया गया हो खड़ा
विशालकाय मंदिर।[18]

यहां मंदिर भी शोषक श्रेणी के प्रपंच के रूप में है। यह मंदिर किसी भी धर्म का हो सकता है। जरूरी नहीं है यह हिंदू मंदिर है, जैनों और बौद्धों का मंदिर भी हो सकता है। मंदिर को लेकर कवि की दृष्टि धर्म-सापेक्ष नहीं है। दलित चिंतन में इस अवधारणा को समझने की जरूरत है। दरअसल, दलित चिंतन में धर्म की अवधारणा निर्गुणधर्म की अवधारणा है। मंदिर-मस्जिद सगुणधर्म की आवश्यकताएं हैं।  निर्गुण धर्म इन दोनों से मुक्त है, जैसा कि कबीर ने कहा है– “राम अलह का गम नहीं, तहं घर किया कबीर।”[19] यदि हम मंदिर-मस्जिद के वर्तमान झगड़े को देखें, तो वह सगुणवादी सांप्रदायिकता है, जिसने दोनों समुदायों को एक-दूसरे का शत्रु बना दिया है। अयोध्या का उदाहरण हमारे सामने है। इस विवाद में अभी न जाने देश-भर में कितने निर्दोष लोगों का खून और बहेगा। इसलिए कवि ने इसे ठीक ही खुनी मंदिर कहा है। यथा–

उनके खून से सना सफेद पत्थर
जिसके नीचे दबा दी गयी हों
उनकी चीत्कारें
मजहब के नाम पर
महज अपना उल्लू
सीधा करने के वास्ते।[20]

यही ‘मंदिर’ की मार्मिक परिणिति यही है।

दलित साहित्य में स्वानुभूति का प्रश्न उसकी आधार भूमि के रूप में माना जाता है। हालांकि नयी कविता के दौर में भी स्वानुभूति का प्रश्न चर्चा में था, पर उसकी अवधारणा स्पष्ट नहीं थी। स्वयं नामवर सिंह अपनी पुस्तक ‘कविता के नये प्रतिमान’ में स्वानुभूति के अर्थ को लेकर एक भ्रामक बौद्धिक बहस में उलझ गये हैं।[21] दलित चिन्तन ने इस भ्रम को तोड़ा है और तर्क-वितर्क में न उलझ कर सीधे-सीधे स्वानुभूति को ‘भोगे हुए यथार्थ’ का नाम दिया है। दलित लेखकों ने अपने जीवन के यथार्थ को जब शब्द-बद्ध किया तो नयी कविता के दौर से ज्यादा यह विवाद का विषय बन गया। इस लेखन ने साफ-साफ यह स्थापित किया कि कोई भी गैर-दलित, जिसने दलित-जीवन को नहीं जिया है, प्रामाणिक अनुभूति के साथ दलित साहित्य नहीं लिख सकता। इसलिये ‘स्वानुभूति’ और ‘प्रामाणिक अनुभूति’ ये दोनों ही शब्द आज सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।

इसलिये, यदि आज नब्बे प्रतिशत दलित साहित्य आत्म-कथात्मक है, तो इसका कारण यही है कि स्वानुभूति उसकी आधारभूमि है। दलित लेखक साहित्य में भी अपने अतीत को जीता है। उसे अपने अतीत से ऊर्जा मिलती है। वह उसका संचित कोष है, जहां तीखी से तीखी, घृणित से घृणित और असुंदर से असुंदर अनुभूतियां हैं, जो उसकी स्मृतियों में हमेशा रहती हैं। वह सी. बी. भारती के रचना कर्म में  ‘सिसकता आत्म-सम्मान’ है–

याद आती है पगडंडियों पर से भी
न गुजरने देने की रोक-टोक
शिक्षकों, सहपाठियों की कुटिल दृष्टि
उनके विहंसते खिझाते अट्टहास
और ठेस पहुंचाते
घृणित असमान व्यवहार।[22]

यह आत्मकथात्मक कविता सिर्फ सी. बी. भारती का ही भोगा हुआ यथार्थ नहीं है, बल्कि दलित लेखकों की पूरी श्रेणी इसी यथार्थ को भोग कर आयी है। यह उन सबकी साझा पीड़ा है–

कीडे़ मकोड़ों से बदतर जिन्दगी
तालीम के अवसरों का अभाव
छीजती इज्जत
बिखरते सम्मान
लुटती बहन-बेटियों की आबरू।[23]

‘आक्रोश’ की कविताएं निस्सन्देह सशक्त हैं, जिनमें दलित चेतना का जनवादी विकास है और जो डा. सी. बी. भारती को प्रतिनिधि दलित कवि बनाती है।

समाप्त

[1] डा. सी बी. भारती, आक्रोश, (कवित संग्रह), लोक सूचक प्रकाशन, फर्रुखाबाद, 1996, पृष्ठ 59
[2] वही, पृष्ठ 19
[3] वही, पृष्ठ 19
[4] वही, पृष्ठ 19
[5] वही, पृष्ठ 57
[6] वही, पृष्ठ 25
[7] वही
[8] वही
[9] दया पवार, कोंडवाडा, 1974, मागोवा प्रकाशन, पुणे, पृष्ठ 27 (साभार, विमल थोरात, मराठी दलित कविता और साठोत्तरी हिंदी कविता में सामाजिक और राजनीतिक चेतना, 1996, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, पृष्ठ 172)
[10] सी. बी. भारती, उपरोक्त, पृष्ठ 29
[11] वही
[12] वही, पृष्ठ 37
[13] वही
[14] वही, पृष्ठ 39
[15] वही
[16] वही
[17] वही, पृष्ठ 34
[18] वही, पृष्ठ 26
[19] कबीर समग्र, युगेश्वर, हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1995, पृष्ठ 411
[20] सी. बी. भारती, उपरोक्त, पृष्ठ 26
[21] देखिए, नामवर सिंह, कविता के प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1974 में, अध्याय : अनुभूति की जटिलता और तनाव, पृष्ठ 176-196
[22] सी. बी. भारती, उपरोक्त, पृष्ठ 62
[23]  वही, पृष्ठ 63

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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