h n

रोहित वेमूला, तुम्हारे जाने के बाद कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे मसले पर संसद में भी बहस हुई। लेकिन तुम तो जानते ही हो, जो संसद से लेकर तमाम संस्थानों में बैठे हैं, उनकी विचारधारा क्या है। क्या वे देश और यहां के लोगों से प्रेम करते हैं? नहीं, वे सिर्फ सत्ता से प्रेम करते हैं। वे सदियों से सामाजिक सत्ता पर काबिज हैं। रोहित वेमूला का स्मरण कर रहे हैं प्रो. रविकांत

रोहित वेमूला (30 जनवरी, 1989 – 17 जनवरी 2016)

[उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न के शिकार रोहित वेमूला की आत्महत्या को दलित-बहुजनों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर याद किया जाने लगा है। साथ ही, वे देश भर में दलित-बहुजन युवाओं के आंदोलनों के लिए उत्प्रेरक हैं, लेकिन अभी भी उच्च शिक्षण संस्थानों व समाज में जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न थमा नहीं है। रोहित का स्मरण कर उनके बाद के हालातों के बारे में बता रहे हैं प्रो. रविकांत]

प्रिय रोहित,

जिस सड़ांध को छोड़कर तुम सितारों की सैर पर गए वह सड़ांध अब और ज्यादा बदबूदार हो गई है। शैक्षणिक संस्थानों के बड़े-बड़े दरवाजे अब दलित, आदिवासी, पिछड़े-वंचितों के लिए अधिक संकीर्ण हो चले हैं। इन स्थानों पर संवाद के लिए जगह दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही है। हां, सदियों तक कमजोरों और सामाजिक रुप से वंचितों को जिस अफीम के नशे में सुलाया जाता रहा, वह जरूर बढ़ता जा रहा है। अपने हक-हुकूक के लिए तनी मुट्ठियां और बुलंद आवाजों को दबाने के लिए तमाम संस्थान वही कर रहे हैं, जो तुम्हारे साथ सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैदराबाद ने किया था।

प्रिय रोहित, तुम कार्ल सागान की तरह विज्ञान लेखक बनना चाहते थे। कितना अच्छा होता यदि तुम जीवित रहते और सितारों की सैर करते, उनका सच कहते। इस देश में पाखंडियों ने सितारों को भी धंधे का एक साधन बना लिया है। सितारों के नाम पर डराकर लोगों को भाग्यवादी बनाया जा रहा है। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए तमाम पाखंडी धर्म के नाम पर हिंसा के लिए उकसाकर, लोगों को हत्यारा बनाने के लिए उतावले हैं। इन्हें भी उसी सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, जिसके दबाव में तुम्हें और तुम्हारे साथियों को निलंबित करके छात्रावास से बेदखल किया गया था।

हम जानते हैं कि तुम्हारे ऊपर सिर्फ तात्कालिक दबाव नहीं था। सिर्फ वही होता तो तुम शायद उसका मुकाबला करते। लेकिन तुम्हारी दृष्टि निजी नहीं थी। विश्वविद्यालय में पढ़ने का मतलब ही होता है, निजी दृष्टि को सामाजिक दृष्टि में तब्दील करना। लेकिन तुमने शायद विश्वविद्यालय को सिकुड़ते पाया। तुमने देखा कि शिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक सोच और मनुष्यता के विचार को बढ़ावा देने के बजाय जातीय दंभ, धार्मिक अंधता, ढकोसला और मूर्खता का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। जातीय श्रेष्ठता के दंभ में छिपे भेड़ियों को दलित, आदिवासी वंचित समाज से आने वाले कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों की प्रतिभाओं को बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है। ऐसी प्रतिभाओं का मनोबल तोड़ने के लिए उनका उत्पीड़न किया जाता है।

सदियों तक शूद्रों, दलितों और स्त्रियों को पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं मिला। मिथकों में तप करने वाले का सिर उतार दिया गया। विद्या अभ्यास करने वाले का अंगूठा काट लिया गया। फिर स्मृतियों में विधान कर दिया गया कि जो वेद सुनने की कोशिश करे तो उसके कान में पिघला सीसा डाल दिया जाए। सदियों तक दलित स्त्रियों को खुले स्तन रहने के लिए मजबूर किया गया। कहीं दलितों के गले में मटकी और कमर में झाड़ू बांध दी गई। चढ़ती सुबह और उतरती शाम उनका निकलना प्रतिबंधित कर दिया गया, ताकि उनकी लंबी परछाई से स्वघोषित श्रेष्ठ जातिधारी शोषक अपवित्र ना हो जाएं! 

आजादी के आंदोलन में यह समाज दोहरी लड़ाई लड़ रहा था। विदेशी साम्राज्यवाद और देशी सामंतवाद की दोहरी गुलामी में जातिगत शोषण का तंत्र ज्यादा खतरनाक था। ब्राह्मणवादी जातितंत्र ने शोषितों को अपाहिज बना दिया था। इसीलिए बाबासाहेब अंबेडकर ने 15 अप्रैल, 1920 को नासिक में कहा था, “जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है।” सवाल यह है कि आजादी के 75 साल बाद यह बाधा समाप्त हुई क्या?

छात्रावास खाली करने के बाद जाते रोहित वेमूला की तस्वीर, जो उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का प्रतिबिंब बन गई

रोहित, तुमने अपने पहले और दुर्योग से अंतिम खत में लिखा, “मेरा जन्म एक भयानक हादसा था!” यह कथन जाति व्यवस्था का नंगा सच बयान करता है। करोड़ों लोगों का जीवन एक हादसा ही है। इस देश में जन्मते ही जाति और लिंग के आधार पर लोगों की नियति तय हो जाती है।

इस भयानक हादसे के शिकार तुम्हारे बाद भी हुए हैं। 2018 में केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित छात्र अखिल ताणत ने प्रशासन की प्रताड़ना से आजिज आकर अपनी कलाई काट ली। उसकी जेब में खून से सना खत मिला, जिसमें लिखा था, “मैं उस दर्द, क्रूरता और उपेक्षा को व्यक्त नहीं कर सकता, जिसका मुझे सामना करना पड़ा है।” 2019 में मुंबई में डाक्टरी की पढ़ाई कर रही पायल तड़वी ने जाति शोषकों की प्रताड़ना की शिकार होकर आत्महत्या कर ली। 

रोहित, तुम्हारी तरह ही उसने भी अपने माता-पिता को लिखा था, “मैं जानती हूं कि मैं आपके लिए कितनी खास हूं और आप लोग ही मेरी दुनिया हो लेकिन अब हालात ऐसे असहनीय हो गए हैं कि मैं उनके साथ एक मिनट भी नहीं रह सकती।” इसी तरह मद्रास आईआईटी में टॉप करने वाली छात्रा फातिमा लतीफ ने धार्मिक फब्तियों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। यह सूची बहुत लंबी है, रोहित! जिन्हें जमीन का सितारा होना था, वे अब तुम्हारी तरह आसमां के सितारों के बीच कहीं होंगे; जहां जाति और धर्म का दमघौंटू परिवेश नहीं होगा।

तुम्हारे जाने के बाद पूरे देश में छात्र आंदोलन खड़ा हो गया था। जेएनयू, डीयू से लेकर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों के छात्र संगठन और तमाम सामाजिक संगठन सड़क पर आ गए थे। तुम्हारे पत्र को पढ़कर लाखों लोगों की आंखें नम हुई थीं। वे चाहते थे कि फिर कोई रोहित उनको अलविदा ना कहे। इसलिए भी वे सड़क पर निकले और कैंपसों में एकजुट हुए। कैंडिल मार्च निकाला गया। रोहित एक्ट बनाने की मांग की गई ताकि फिर कोई नौजवान जातीय उत्पीड़न का शिकार ना हो। लेकिन उसके बाद क्या हुआ, जानना चाहते हो? जेएनयू के छात्रों, जिन्होंने तुम्हारी शहादत पर आक्रोश व्यक्त किया था, उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा गया। मीडिया और सत्ता के षड्यंत्र से जेएनयू को बदनाम किया गया। वहां के छात्रों को देशद्रोही तक करार दिया गया। इसके बाद देशभर के तमाम बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों ने खड़े होकर इसका प्रतिवाद किया। सत्ता को अकादमिक चुनौती दी। राष्ट्रवाद पर संवाद हुआ। तुम्हारे मसले पर संसद में भी बहस हुई। लेकिन तुम तो जानते ही हो, जो संसद से लेकर तमाम संस्थानों में बैठे हैं, उनकी विचारधारा क्या है। क्या वे देश और यहां के लोगों से प्रेम करते हैं? नहीं, वे सिर्फ सत्ता से प्रेम करते हैं। वे सदियों से सामाजिक सत्ता पर काबिज हैं। लेकिन संविधान ने सब नागरिकों को सामान बनाया। अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए वे अब संविधान का पाठ उलट देना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने पहले तुम्हें बदनाम करने की कोशिश की और फिर जो लोग तुम्हारे विचारों और सपनों के साथ खड़े हुए, उनको भी बदनाम किया। ऐसे जन बुद्धिजीवी जो इस देश में संविधान और लोकतंत्र के हिमायती हैं, जो दलितों-वंचितों के उत्थान और उनके अधिकारों के समर्थक हैं, उन्हें भी बदनाम किया गया। उनको अर्बन नक्सल कहा गया। इतना ही नहीं भीमा कोरेगांव मामले में आनंद तेलतुंबड़े, सुधा भारद्वाज, फादर स्टेन स्वामी जैसे तमाम बुद्धिजीवियों को जेल में डाल दिया गया। सत्ताधारी और उनके समर्थक अहंकार में चूर हैं। किसानों का दमन जारी है। शिक्षा महंगी होती जा रही है। दवाइयों के दाम पांच गुने हो गए हैं। एक तरफ गरीबों और भिखारियों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी तरफ धन्नासेठ मालामाल होते जा रहे हैं। नौजवानों के पास नौकरी नहीं है। ऐसे में तुम्हारे सपनों का क्या होगा? उन सपनों को जिलाए रखने वालों का क्या होगा?

प्रिय रोहित, जीते जी तुम्हारी प्रतिभा से रश्क करने वाले आज भी तुम्हारे स्वतंत्र विचारों और लोकतांत्रिक सोच से घबराते हैं। सत्ता के नशे में चूर तुम्हें प्यार करने वालों को गालियां बकते हैं। तुम्हारी यादों और विचारों को साझा करने के लिए होने वाले आयोजनों पर पहरेदारी करते हैं। वे जानते हैं कि तुम्हारे नाम का मतलब क्या है! इसका मतलब है : स्वतंत्र विचारों का होना, संवाद का होना, समता और न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के भाव का होना। दरअसल, ये जाति शोषक वंचित तबकों से आने वाले नौजवानों के मौलिक विचारों, स्वतंत्र चेतना और परिवर्तन की कामना को भी मार डालना चाहते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकशित पुस्तकों में "समाज और आलोचना","आजादी और राष्ट्रवाद" ,"आज के आईने में राष्ट्रवाद" और "आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता" शामिल हैं। साथ ही ये "अदहन" पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

संबंधित आलेख

क्यों बख्शें तुलसी को?
अगर मंडल कमीशन और सिमोन द बुआ का स्त्री-विमर्श आ भी गया होता, तब भी तुलसी स्त्री-शूद्र के समर्थक नहीं होते, क्योंकि जब मंडल...
बुद्धि और विवेक पर मीडिया का पुरोहितवादी हमला
एंकर ने मुझसे जानना चाहा कि क्या सनातन धर्म में चमत्कार होते हैं? मेरा जवाब था– मैं तो नहीं जानता। माइंड रीडिंग करने वाले...
उत्तर भारत में ओबीसी ने रामचरितमानस के खिलाफ बजाया विद्रोह का डंका
यह कदाचित पहली बार है कि उत्तर भारत के शूद्र और दलित राजनेता, प्राचीन और मध्यकाल में ब्राह्मणों के जातिवादी (कथित हिंदू) लेखन के...
आजमगढ़ का खिरिया बाग आंदोलन : ग्रामीण महिलाएं संभाल रहीं मोर्चा
धरने पर बैठीं जमुआ गांव की केवलपत्ती देवी से एक पत्रकार जब पूछती हैं कि कब तक आप सब ये आंदोलन चलाएंगीं तो वे...
दलित-बहुजनों को अपमानित करनेवाली किताबों को जलाने या न जलाने का प्रश्न
सवाल उठता है कि यदि ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ नहीं जलाई जानी चाहिए, तो रावण का पुतला जलाना भी बंद होना चाहिए, होलिका दहन भी...