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दर्शन सोलंकी आत्महत्या : जाति ही समस्या, पहले स्वीकारें तभी निदान संभव

शिक्षा व्यवस्था मे मौजूद जातिवाद के खात्मे के लिए हर एक विद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान मे वंचित वर्ग के छात्रों की समस्या के समाधान के लिए ऐसी व्यवस्था हो जो उनकी बातों को संवेदनशीलता और गंभीरता से सुने तथा प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करे। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

बहस-तलब

गत दिनों खबर आई कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई में बीटेक (प्रथम वर्ष) के छात्र दर्शन सोलंकी ने हॉस्टल की आठवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। वह अहमदाबाद से थे और अभी तीन महीने पूर्व ही उनका चयन आईआईटी में हुआ था। दर्शन की मौत की खबर से बहुजन छात्रों में आक्रोश है। सवाल है कि दलित-बहुजनों के साथ इस प्रकार की घटनाएं बार-बार क्यों घटित हो रही हैं? 

आंबेडकर-पेरियार-फुले स्टडी सर्कल ने आरोप लगाया है कि दर्शन की मौत का मामला आत्महत्या नहीं, अपितु संस्थानिक हत्या है, क्योंकि दलित-बहुजन छात्रों की परेशानियों के समाधान के लिए इन उच्च शिक्षण संस्थानों में कोई ‘आत्मरक्षा’ का तरीका नहीं है। दरअसल भारत के इन उच्च शैक्षणिक संस्थानों मे जातिभेद अन्य संस्थानों से अधिक है। फिर चाहे वह मेडिकल और प्रबंधन संस्थान ही क्यों न हों, ये सभी मेरिट के नाम पर जातिवादी शक्तियों के गढ़ बन चुके हैं, जहां दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्र असहज और अवांछित महसूस करते हैं। 

विदित है कि 17 जनवरी, 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय में 26 वर्षीय रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर छाया था, लेकिन उसके बाद जिस प्रकार से इस प्रश्न को दबंगई के जरिए चुप करवा देने की कोशिश की गई थी, उससे साफ जाहिर है कि कैसे विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के अंदर ‘अनुशासन’ के नाम पर छात्रों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। यहां तक कि आज उन्हें सेमिनार और लेक्चर भी आयोजित करने के लिए अनेक प्रकार की बाधाओ से गुजरना पड़ रहा है, जिसके कारण संस्थान के बाहर के विशेषज्ञों, लेखकों और कार्यकर्ताओ को अब इन स्थानों पर तभी अनुमति मिल पा रही है यदि वे संस्थानों के प्रबंधनकर्ताओं के अनुरूप होते हैं। 

इस घटना पर जातिभेद के आरोप लगने के बाद से अनेक लोगों ने कहा कि आईआईटी जैसे संस्थानों मे ऐसा नहीं होता, क्योंकि वहां मेरिट ही सर्वोच्च है और बच्चों में जो तनाव होता है, वह उनके पारिवारिक कारणों या कोर्स को ठीक से नहीं समझ पाने की वजह से हो रहा है। जबकि मेरिट ब्राह्मणवाद का सबसे खतरनाक हथियार है, जिसके जरिए उन्होंने समय-समय पर वंचित वर्ग के छात्रों के हिस्से की हकमारी की है। 

दर्शन सोलंकी की स्मृति में आईआईटी, मुंबई में दलित छात्रों द्वारा आयोजित सभा के दौरान उसकी तस्वीर

संसद में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत एक रपट के अनुसार 2014-2021 तक भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में 122 छात्रों ने खुदकुशी की। इनमें 24 छात्र अनुसूचित जाति, 41 पिछड़े वर्गों से, 3 अनुसूचित जनजाति और 3 अल्पसंख्यक समुदायों के थे। रपट बताती है कि सबसे अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालयों के 37 छात्रों अपने ही हाथों अपनी इहलीला समाप्त की। इनमें 14 ओबीसी, 9 अनुसूचित जाति और एक अनुसूचित जनजाति का छात्र था। 

छात्रों द्वारा खुदकुशी के मामले में दूसरे नंबर पर आईआईटी है, जहां 2014-21 के दौरान कुल 34 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इनमें 13 ओबीसी और अनुसूचित जाति के 5 छात्र शामिल थे। 

बहरसूरत, सरकारी रपटों में उल्लिखित आंकड़ों पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि सरकारें जातिगत भेदभाव को दिखावे के लिहाज से खरिज करती रही है। हकीकत है कि आईआईटी और मेडिकल संस्थानों में वंचित वर्गों के छात्रों को जातिगत भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इसकी पुष्टि तो 2007 में अभ्यर्पित थोराट समिति की रपट कर देती है, जिसने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली में जाति आधारित भेदभाव की पड़ताल की थी। मई 2006 मे तत्कालीन मानव संशधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की। इसके विरुद्ध एम्स के सवर्ण छात्रों ने विरोध किया था। थोराट समिति ने अपनी रपट में बताया कि एम्स में दलित छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव होता है। हॉस्टल मे दलित छात्रों को बंद कर दिया जाता था ताकि वे अपनी पढ़ाई नियमित तौर पर न कर सकें। दीवारों पर जातिसूचक गालियां लिखी होती थीं। समिति ने पाया कि रेजिडेंट डाक्टर एसोसिएशन नामक संगठन जाति के आधार पर विभक्त था और आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाने वालों में प्रमुख संगठन था। समिति ने पाया कि वंचित वर्ग के छात्रों के साथ कोई सामाजिक संवाद नहीं होता था, क्योंकि सवर्ण छात्र दलित छात्रों के साथ उठना-बैठना और बातचीत करना पसंद नहीं करते थे। अध्यापन से लेकर प्रैक्टिकल तक में दलित छात्रों को जातिवादी डाक्टरों से दुर्व्यवहार का खतरा बना रहता था। रपट में बताया गया कि 72 प्रतिशत दलित छात्रों का कहना था कि पठन-पाठन के दौरान उनके साथ भेदभाव होता है। जबकि 76 प्रतिशत दलित छात्रों ने आरोप लगाया कि परीक्षाओं में उनके साथ न्याय नहीं हुआ। वहीं 88 प्रतिशत छात्रों का मानना था कि उनके साथ प्रैक्टिकल परीक्षाओ में भेदभाव हुआ। इसी तरह 85 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि उनके पर्यवेक्षक उन्हें समय ही नहीं देते। 

खैर, रपट के इन आंकड़ों को देखकर भी एम्स प्रबंधन खामोश बना रहा और मार्च 2010 में एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के छात्र बालमुकुंद भारती ने प्रताड़ना से तंग आकर खुदकुशी कर ली। हालांकि एम्स प्रशासन और उसके चहेते छात्रों ने यही कहा कि बालमुकुंद कैंपस के वातावरण के साथ तालमेल नहीं कर पाया और डिप्रेशन का शिकार हो गया। 

दर्शन के परिजनों का कहना है कि वह तब से बहुत निराश दिखने लगा था जब उसके ‘दोस्तों’ ने उससे बात करना बंद कर दिया था। ये उसके वो ‘दोस्त’ थे, जिन्हे पहले यह पता नहीं था कि वह अनुसूचित जाति का है। छात्र आपस मे अक्सर ताने कसते हैं कि ‘आरक्षण’ का मतलब बिना योग्यता के, मुफ़्त की पढ़ाई करने वाला होता है, जो ‘योग्य’ छात्रों का हिस्सा मारकर इन संस्थानों मे आ रहे है। 

आज भी जब दर्शन सोलंकी की मौत के बाद बहुत से लोग यही आरोप लगाते हैं कि आरक्षण से आए छात्र अक्सर इन ‘कठिन’ विषयों के लिए तैयार नहीं रहते हैं और फिर डिप्रेशन मे चले जाते हैं।लेकिन यह बेहद ही अपमानजनक बात है, क्योंकि आज के दौर में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्र मेरिट लिस्ट में भी शीर्ष स्थान पा रहे हैं। निस्संदेह यह चालाकी और धूर्तता से नॅरटिव बदलने की कोशिश है कि छात्र कठिन पाठ्यक्रम को झेल नहीं पा रहे हैं। आखिर पायल तड़वी जैसे होनहार छात्राएं आत्महत्या के लिए क्यों मजबूर होते हैं? इसका कारण है संस्थानों मे व्याप्त जातिवादी सोच और पाखंड, जहां दलित छात्रों से बात करने या उनके साथ मेस मे खाना शेयर करने में भी सवर्णों को परेशानी होती है। 

वैसे भी संस्थानों में नए छात्र के लिए स्वीकार्यता का सवाल बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वे कड़ी मिहनत के बाद पहुंचते हैं। फिर यह पता चल जाने पर कि कोई आरक्षण के जरिए आया है तो उस पर ताने और फब्तियां बेहद आम बात बन जाती है। वंचित वर्गों के छात्रों को मुश्किल यह होती है कि अपनी बात कहने के लिए ऐसे संस्थानों में कोई फोरम नहीं होता है और उन्हें खुद जद्दोजहद करना पड़ता है। 

बहुत बार वंचित समुदायों के ये छात्र अपनी तकलीफ और उपेक्षाओं को स्वीकार कर लेते हैं और किसी भी प्रकार के विवाद से बचे रहना चाहते हैं। वे जानते है कि यहां तक आकर अब उस स्थान पर अपनी जगह को कायम रखने की लड़ाई भी बहुत बड़ी है। सच यही है कि दलित-बहुजन छात्र वाकई में इन मनुवादी संस्थानों में अल्पसंख्यक होते हैं, क्योंकि अभी भी उनकी संख्या इन संस्थानों में बहुत कम है। दूसरी ओर अन्य विश्वविद्यालयों में पिछड़े वर्गों, दलितों और आदिवासी छत्रों की संख्या बढ़ रही है और वे अपना समूह भी बना लेते हैं, लेकिन उच्च तकनीकी संस्थानों में अभी भी जातिवादी मानसिकता के अधिकारियों और छात्रों का अड्डा बना हुआ है। 

बहरहाल, शिक्षा व्यवस्था मे मौजूद जातिवाद के खात्मे के लिए हर एक विद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान मे वंचित वर्ग के छात्रों की समस्या के समाधान के लिए ऐसी व्यवस्था हो जो उनकी बातों को संवेदनशीलता और गंभीरता से सुने तथा प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करे। साथ ही इन संस्थानों मे जातिभेद को खत्म करने और खुलापन लाने के लिए समय-समय पर जाति और छुआछूत के सवालों पर सेमिनार, परिचर्चा, लेक्चर आदि आयोजित किये जाएं ताकि सभी छात्र इन सवालों के प्रति संवेदनशील बनें और खुदकुशी की घटनाएं घटित न हों। लेकिन सवाल यही है कि क्या हमारे उच्च शिक्षण संस्थान जातिभेद को खत्म करने के लिए कोई पहल करने को तैयार हैं? इसके पहले उन्हें यह स्वीकारना होगा कि उनके संस्थानों में जाति विद्यमान है। याद रखें कि किसी भी समस्या का समाधान तभी संभव है जब उसके होने की स्वीकार्यता हो। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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