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अमेरिका में आंबेडकरवादियों की जीत व जातिवादियों की हार

ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में जिस तरह से स्थानीय निकाय अब जातिभेद के प्रश्न को देख रहे हैं तो यह स्वाभाविक है कि अपनी संस्कृति की महानता पर गर्व करने वाले हमेशा जाति और छुआछूत के सवालों और सच्चाई से असहज रहेंगे। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

विश्व के स्तर पर जाति और वर्ण को भारत के विशेषकर हिंदुओं का अंदरूनी मामला समझा जाता रहा है। हालांकि किसी भी व्यक्ति का शोषण या उससे गुलामी करवाना किसी भी देश, समाज, धर्म या जाति का अंदरूनी मामला नहीं कहा जा सकता। जब भी विदेश, विशेषकर यूरोप व अमेरिका में भारतीय जातिप्रथा, पर बहस हुई है तो अक्सर उसे उस नजरिए से नहीं देखा जाता जैसे नस्लभेद के मामले में या यहूदियों के प्रश्नों पर उनकी सरकारों के सख्त रवैये से दिखता है। 

दुनिया के अधिकांश देशों में रंग और नस्ल के सवाल पर बहुत संजीदगी के साथ कानून बने हैं, लेकिन जाति का मसला भारत की एक धर्म और जाति विशेष को छोड़कर और कहीं न होने के फलस्वरूप उस पर चर्चा भी नहीं होती। 

पहले तो यह बात ही झूठी है कि छुआछूत का सवाल केवल धर्म और देश केंद्रित है। यह बात अब छुपी हुई नहीं है कि भारत मे अधिकांश धर्मावलंबियों में चाहे वे हिंदू हों, मुसलमान हों या फिर ईसाई, जाति सभी में विद्यमान है। जाति दक्षिण एशिया में एक प्रमुख प्रश्न है और भारत के अलावा इस पर और देशों मे कोई चर्चा भी नहीं करना चाहता। हालांकि नेपाल ने इस संदर्भ में अब बहुत ही सकारात्मक कदम उठाए हैं और वहां पर राष्ट्रीय दलित आयोग भी बना है तथा छुआछूत के विरुद्ध कानून भी बने हैं। पाकिस्तान में रहने वाले सभी ईसाई दरअसल ‘चूड़ा’ समुदाय से आते हैं और भयंकर छुआछूत व जातिभेद के शिकार हैं। लेकिन वहां की सरकार और मीडिया दलित सवालों को केवल भारत और हिंदुओं का बताकर उसे केवल भारत विरोधी प्रोपेगेंडा के रूप में इस्तेमाल करता है। बांग्लादेश में अमूमन वैसे ही हालात हैं और वहां दलितों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है तथ इस कारण लोग लगातार धार्मिक समूहों द्वारा प्रायोजित हिंसा का शिकार होते रहते हैं। 

डॉ. आंबेडकर हमेशा कहते थे कि भारत के लोग जहां भी जाएंगे जाति अपने साथ लेकर जाएंगे। जैसे-जैसे भारतीय और दक्षिण एशिया के लोगों का फैलाव यूरोप, अमेरिका और ब्रिटेने में बढ़ रहा है, जातिभेद के सवाल भी बढ़ते जा रहे हैं। ब्रिटेन में 2013 मे जातिभेद विरोधी एक कानून संसद मे पारित हो गया था, लेकिन भारत में सरकार बदलने के बाद हिंदुत्व लॉबी इतनी सशक्त हो गई कि उन्होंने इस कानून को लागू होने से रुकवा दिया और कंजर्वेटिव सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि वह भारत सरकार को नाराज नहीं करना चाहती थी। 

जातिभेद के विषय में ब्रिटेन में आंबेडकरवादी समूहों का योगदान जगजाहिर है। उनके प्रयासों से वहां डॉ. आंबेडकर स्मारक बना है। 

जातिभेद निरोध कानून बनाने वाली सिएटल सिटी काउंसिल के सदस्य :  (दायें से बाएं) सैली बागशॉ, एम. लोरेना गोंजालेज, अबेल पचेको, क्षमा सावंत, ब्रुस हॅरल, डेबरा जुआरेज, माइक ओ’ब्रायन, टेरेसा मॉसकेडा और लीजा हर्बोल्ड

ब्रिटेन के अलावा जिन देशों में आंबेडकरवादी सक्रिय हैं, उनमें कनाडा और अमेरिका प्रमुख हैं। इन दोनों देशों मे बड़ी संख्या में एशियाई और भारतीय मूल के लोग हैं, जो अभी भी अपनी परंपराओं और अपने-अपने सामुदायिक संगठनों से गहरे से जुड़े हुए हैं। सिखों के गुरुद्वारे अलग जातियों के खांचों में बने हुए हैं। ऐसे ही गुजरातियों में स्वामी नारायण संप्रदाय बेहद लोकप्रिय है। इस्कॉन भी बहुत बड़ी संख्या में सवर्ण भारतीयों को आकर्षित कर रहा है। 

पिछले एक दशक से यही ‘देशभक्त’ भारतीय सोशल मीडिया पर हिंदुत्व की बड़ी ट्रोल आर्मी को खाद पानी दे रहे हैं, जो भारत को हिंदू राष्ट्र और दुनिया की सबसे बड़ी ‘ताकत’ के रूप मे ‘देखने’ के लिए ‘लालायित’ हैं। लेकिन वे डॉलर, यूरो और पौंड का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। 

उदारवादी लोकतंत्रों में ये लोग अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के अधिकारों की वकालत करते हैं, लेकिन भारत में किसी भी अल्पसंख्यक या सीमांत समुदाय के व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं देना चाहते। इनकी शादी-विवाहों के तौर-तरीके अभी भी पुराने जातिवादी सांचों में ढले हुए हैं। अपनी जातियों से बाहर शादियां अभी भी देखने को नहीं मिलती हैं और अधिकांश मामलों में उनका हिंसक विरोध भी होता है। 

इन सबके बावजूद धर्म निरपेक्ष, प्रगतिशील और आंबेडकरवादी संगठनों की संख्या लगातार बढ़ी है और वे जातिभेद के मसले पर बेहद मुखर हो रहे हैं। 

जातिभेद का प्रश्न अब मजबूती से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामने आ चुका है। हिंदुत्ववादी संगठन इसे भारत विरोधी बता रहे हैं, लेकिन विश्व भर में लोग यह समझ चुके हैं कि जातिभेद के विरुद्ध मजबूत आवाज उठायी जानी चाहिए और यही कारण है कि डॉ. आंबेडकर का साहित्य और लेखन अब दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहा है। 

इसी संदर्भ में अमेरिका से एक बड़ी खबर आई है कि वहां सिएटल नामक शहर ने अपने यहा जातिभेद को आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित कर दिया है। वहां इसे भी रंगभेद, नस्लभेद, लिंगभेद की तरह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। गत 21 फरवरी, 2023 को सिएटल की सिटी काउंसिल ने इस संदर्भ में एक अधिसूचना जारी की, जिसके अनुसार, रोजगार, व्यापार, घर लेने या किराये पर घर देने में या अन्य सार्वजनिक स्थलों या कार्यक्रमों में किसी भी प्रकार का जातिभेद अब अपराध की श्रेणी में होगा, जिसके खिलाफ यथोचित स्थानों पर शिकायते दर्ज कारवाई जा सकेगी। 

यह एक महत्वपूर्ण परिघटना है, जिसके दूरगामी नतीजे होने वाले हैं, क्योंकि अमेरिका एक बहुत बड़ा देश है, जहां सभी राज्यों के अंदर भी शहरों के अपने कानून हैं। इसलिए सिएटल सिटी काउंसिल के इस फैसले के बाद जातिभेद का सवाल अन्य शहरों और राज्यों में भी जाएगा, जहां बड़ी संख्या में भारतीय और एशियाई मूल के लोग रहते हैं। 

सिएटल शहर में इस संदर्भ में लॉबिंग करने वाली कॉर्पोरेटर भारतीय मूल की क्षमा सावंत कहती हैं कि वह पूरे अमेरिका में इस संदर्भ में कानूनों को बदलने के लिए लड़ाई लड़ेंगीं। 

बताते चलें कि सिएटल शहर को आईटी संबंधी संस्थनों के लिए जाना जाता है। यहां दक्षिण एशिया और भारत से आए अप्रवासियों की बड़ी संख्या है। जाहिर है कि जातिगत भेदभाव के प्रश्न दबे रह जाते हैं और इसलिए ये प्रश्न अब महत्वपूर्ण बन गए कि जातिभेद और छुआछूत का प्रश्न हर सरकार और निजी कंपनियों के अजेंडे में हो।  

हम सभी जानते हैं कि अमेरिका में अभी भी रंगभेद और नस्लभेद की समस्या जटिल है और पूरी दुनिया के मीडिया का ध्यान भी इससे जुड़े प्रश्नों पर ही जाता है और इस कारण जातिभेद की समस्या बहुत बार नजरअंदाज कर दी जाती है, क्योंकि इस विषय में समझ का अभाव रहता है। इसके अलावा यह भारत के ‘उदार’ दिखने वाले सवर्ण बुद्धिजीवियों की भी समस्या है, जो भारतीय संस्कृति की उदारता के झंडे गाड़ते रहते हैं और केवल आरएसएस या संघ परिवार अथवा हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से ही भारत या फिर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का आकलन करते हैं। जबकि पूरे दक्षिण एशिया की मुख्य समस्या जाति है और जातिवाद हिंदू समाज में सबसे अधिक विद्यमान है। इसलिए यह कहना कि अब यह शहरों से खत्म हो गया, एकदम बेमानी है। 

दिल्ली में तो अभी ही में ‘संभ्रांत’ समझी जानी वाली एक हाउसिंग सोसाइटी के बाहर जूते बनाने वाले या पॉलिश करनेवाले राम अवतार वर्मा को इसलिए धमकाया गया, क्योंकि उनका सरनेम वर्मा था। किसी साहब को यह मंजूर नहीं था कि वर्मा जाति का व्यक्ति चमड़े, जूते पोलिश करने का काम भी कर सकता है। भारतीय लोग विदेश जाकर भी सरनेम या गांव या पिता दादा आदि की जांच पड़ताल करते हैं ताकि आपकी जाति का पता लगाया जा सके। 

सनद रहे कि 2016-17 में अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में वहां के शिक्षा विभाग ने मध्य विद्यालयों में दक्षिण एशिया की संस्कृति और इतिहास के प्रश्नों को पाठ्यक्रम में शामिल करने के संदर्भ में एक चर्चा शुरू की थी ताकि इस संदर्भ में उनका नजरिया भी जाना जा सके। तब अलग-अलग समुदायों और संगठनों ने हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों, रविदासियों, दलितों, दक्षिण एशिया, भारत, महिलाओं के प्रश्न, सिंधु घाटी की सभ्यता आदि प्रश्नों पर अपने ज्ञापन दिये। अंत मे जातिभेद और जाति व्यवस्था के सवालों को भी पाठ्यपुस्तकों मे शामिल किए जाने पर सहमति हो गई। वहां छठी और सातवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए बनाए जा रहे इन पाठ्यक्रमों को लेकर हिंदुत्व के बहुत से संगटन आक्रामक हो गए और जाति व्यवस्था और जातिभेद के सवाल को झूठ और हिंदू विरोधी बताते हुए बात करने लगे। बहुत सारे लोग भारत को अलग से रखना चाहते थे और किसी भी प्रकार से दक्षिण एशिया के अन्य देशों के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहते थे। अंतत: जाति-व्यवस्था और जातिभेद के सवाल तो शामिल कर लिए गए और भारत को अलग से भी देखने पर सहमति हो गई। 

चूंकि जाति-व्यवस्था के प्रश्न जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आने लगे हैं तो हिंदुत्व लॉबी भी सतर्क हो गई है। पहले वे कहते थे कि वर्ण-व्यवस्था ‘कर्म’ पर आधारित है और जन्म आधारित नहीं है, लेकिन क्योंकि कर्म के इस खेल में भगवद्गीता का भी विश्लेषण होने लग गया तो अब एक नई थ्योरी लाई जा रही है कि जाति -व्यवस्था अंग्रेजों की देन है। मजेदार बात यह कि इंग्लैंड और अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों को भारत के बड़े उद्योगपतियों की फंडिंग भी हो रही है और एनआरआई भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं। इन्हीं विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ अब यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत मे जातिव्यवस्था ब्रिटिश शासन की देन है। वैसे तो नॅरटिव बनाने मे ब्राह्मणवादी शक्तियों से बड़ा कोई नहीं है। संविधान सभा में बहुत से सदस्यों ने डॉ. आंबेडकर को उनके महती कार्य के लिए बधाई देते हुए उन्हें आधुनिक मनु तक कह दिया गया। आश्चर्य की बात यह कि उन्हें शायद यह नहीं पता था कि बाबा साहब ने मनुस्मृति को अन्याय का दस्तावेज कहा था और 25 दिसंबर, 1927 को महाड़ में अपने समर्थकों के साथ मनुस्मृति का दहन किया था। 

ब्राह्मणवादियों में तथ्यों को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की भयानक प्रवृत्ति देखी जाती है और इसलिए उसे बार-बार पकड़ा जाना चाहिए। मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू करने के वी.पी. सिंह सरकार के फैसले के बाद इन्हीं उदार और कठोर लोगों ने वी.पी. सिंह को जातिवाद का जनक तक कह डाला था। जिस किसी ने आरक्षण के समर्थन में बात कही, उसे भारत के ‘ब्राह्मणवादी’ विशेषज्ञों ने जातिवादी बना दिया। 

बहरहाल, ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में जिस तरह से स्थानीय निकाय अब जातिभेद के प्रश्न को देख रहे हैं तो यह स्वाभाविक है कि अपनी संस्कृति की महानता पर गर्व करने वाले हमेशा जाति और छुआछूत के सवालों और सच्चाई से असहज रहेंगे। लेकिन अब उनके ऐसा करने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जिस जागरूक समाज कि कल्पना डॉ. आंबेडकर कर रहे थे, उसका बड़ा हिस्सा अवश्य जागरूक हुआ है और अन्याय का जमकर विरोध कर रहा है। भारत के सत्ताधारी या तथाकथित उदार चाहे इसे कितना भी छुपा लें, जातिवाद की क्रूर सच्चाईयों से दुनिया वाकिफ हो चुकी है और इसके विरुद्ध संघर्ष में डॉ. आंबेडकर के मिशन के लोगों के साथ हाथ मिलाने को तैयार है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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