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‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ एंड ‘ऑथर्स नोट्स’ : एक दलित स्त्री का बेजोड़ लेखन व आत्मावलोकन

शिवकामी अपने उपन्यास ‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ में दलित आंदोलन की सीमाओं को रेखांकित हैं और नारीवादी दृष्टिकोण से दलित पितृसत्ता को भी उजागर करती हैं। फिर भी वह कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि वह अपने जाति समुदाय से ‘दगा’ कर रही हैं, क्योंकि वह समस्या के समाधान की तलाश में पूरी रचना करती नज़र आती हैं। अमिता शीरीं कर रही हैं पुनर्पाठ

हम बचपन से सुनते आए हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेकिन क्या यह दर्पण समूचे भारतीय समाज को दर्शाता है? ज़ाहिर तौर पर दर्पण है तो जिसके हाथ में होगा, वही उसमें दिखेगा। दलितों के पास साहित्य रूपी दर्पण सदियों तक रहा ही नहीं। आज जब साहित्य में दलितों का प्रतिबिंबन बढ़ रहा है तो सभी हैरत में हैं।

महिला दलित कथाओं को समझने के क्रम में मैंने विख्यात तमिल लेखिका पी. शिवकामी की प्रसिद्ध किताब ‘ग्रिप ऑफ़ चेंज एंड ऑथर्स नोट्स’ पढ़ी। फिर से एक बार आश्चर्य से भर गई कि हिंदी साहित्य अन्य भारतीय भाषाओं की दुनिया से कितना अछूता रह जाता है।

पलानीमुथु शिवकामी एक चर्चित तमिल दलित नारीवादी लेखिका हैं। करीब 29 साल तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत रहने के बाद 2008 में उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। फरवरी 2016 में अंग्रेजी दैनिक ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा– “नौकरशाही ने मेरे साथ एक अछूत की तरह व्यवहार किया।” वर्ष 1995 से वह एक तमिल साहित्यिक पत्रिका ‘पुथिया कोदांगी’ से जुडी रहीं। उन्होंने दलित और अन्य पिछड़ी जाति के मुद्दों पर लगातार कॉलम लिखा। उन्होंने भूमि अधिकार और दलित महिला सशक्तिकरण के मुद्दों पर भी व्यापक तौर पर लिखा। वर्ष 2004 में उन्होंने दलित भूमि अधिकार आंदोलन शुरू किया। नौकरी से इस्तीफे के बाद उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के टिकट से कन्याकुमारी से लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गईं। वर्ष 2009 में उन्होंने अपनी पार्टी ‘समुगा समथुआ पदाई’ का गठन किया।

वह तमिल में लिखने वाली पहली दलित महिला उपन्यासकार हैं। वह मुख्यतः तमिल में ही लिखती हैं। उनका पहला उपन्यास ‘पझियाना कझिदलम’ 1989 में आया। इसके प्रकाशन के आठ साल बाद उन्होंने अपने ही इस उपन्यास पर एक आलोचनात्मक नोट्स लिखा – ‘असरियार कुरिप्पू’ (ऑथर्स नोट्स)। वर्ष 2006 में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द ग्रिप ऑफ चेंज एंड ऑथर्स नोटस’[1] प्रकाशित हुआ। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद शिवकामी ने स्वयं किया है। इनका दूसरा उपन्यास ‘अनान्धई’ के नाम से आया। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद 2011 में ‘दी टेमिंग ऑफ वूमेन’ प्रकाशित हुआ, जिके अनुवादक प्रीतम के. चक्रवर्ती हैं। इसके अलावा शिवकामी ने अनेक कविताएं और कहानियां भी लिखी हैं।

वर्ष 1995 में उन्होंने एक लघु फिल्म ‘ऊदाह’ (थ्रू) बनाई, जिसे राष्ट्रपति अवार्ड भी मिला।

पी. शिवकामी के पहले उपन्यास ‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ ने दलित साहित्य की दुनिया को नया विमर्श दिया, क्योंकि इसमें लेखिका स्वयं दलित जीवन में मौजूद पितृसत्ता को प्रमुखता से चिन्हित करती है। हालांकि कहा तो यह जाना चाहिए कि तो नफ़रत के साथ चिन्हित करती हैं। बाद में कुछ आलोचकों ने उन्हें इसे सुधारने की सलाह भी दी। इसके बारे में अपने इसी उपन्यास के आत्मकथ्य में वह आलोचनात्मक पुनर्पाठ भी करती हैं।

‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ उपन्यास की शुरुआत होती है थंगम नामक एक चरित्र के दुःख से, जो वर्गीय उत्पीड़न, जातीय उत्पीड़न और पितृसत्तात्मक उत्पीड़न के त्रिस्तरीय अत्याचार का बराबरी से शिकार है। ये तीनो उत्पीड़न इस तरह एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं कि यह तय करना मुश्किल होता है कि कौन-सा उत्पीड़न अधिक उत्पीड़क है।

पहले ही दृश्य में थंगम एक दलित नेता कथामुथु, जो पूर्व पंचायत सदस्य है, से मदद मांगने आती है। भूमिहीन थंगम एक नि:संतान विधवा है। उसे उसके देवरों ने घर से बाहर निकाल दिया है। मजबूरी में वह सवर्ण ज़मींदारों के खेत में मजदूरी करती है। सदियों की दोहराई जाने वाली कहानी एक बार फिर दोहराई जाती है। सवर्ण ज़मींदार पहले उसका बलात्कार करता है और फिर नियमित तौर पर उसका शारीरिक शोषण करने लगता है। गांव में अपने ही समाज में वह दुत्कारी जाने लगती है। उसके ऊपर ‘बदचलन’ का कलंक चस्पा कर दिया जाता है। एक रोज़ जमींदार की पत्नी और अन्य लोग मिल कर उसे पीट-पीट कर अधमरा कर देते हैं। अपने गांव के दलित नेता के घर वह ‘न्याय’ की गुहार लेकर पहुंच जाती है।

कथामुथु की दो पत्नियां पहले से ही हैं। मदद की एवज में वह उसे भी ‘रख’ लेता है। घर में बड़ी पत्नी की एक बेटी गौरी और बेटा हैं। किशोरी बेटी गौरी जातिगत अपमान और अपने पिता के पितृसत्तात्मक रवैये से नफ़रत करती है। पढ़-लिख कर वह कॉलेज जाती है और घर से ‘मुक्ति’ पाती है। बाद में कथामुथु का बड़ा भाई कलामुथु विदेश से वापस आता है। कथामुथु का उससे झगड़ा हो जाता है। वह अपने भाई को घर में उसका हिस्सा देने से इंकार कर देता है। अंततः पंचायत में हुए फैसले के बाद गांव में कथामुथु की संपत्ति में कलामुथु को हिस्सा मिलता है। भाई का युवा पुत्र चंद्रन राइस मिल में मजदूरी करने लगता है। बाद में वह दलितों और पिछड़ों का भी नेता बन जाता है। राजनीति की कमान उसके हाथ में आ जाती है। कथामुथु स्थानीय राजनीति में अपदस्थ हो जाता है।

इस मुख्य कहानी के अलावा उपन्यास में कई उपकथाएं समानांतर चलती हैं। मसलन, सवर्णों द्वारा दलितों का उत्पीड़न, दलितों की खेत मजदूरी बढ़ाने की लड़ाई, बदले में सवर्णों द्वारा दलितों की झोपड़ियां जलाना, पुलिस व प्रशासन का सवर्णों के प्रति झुकाव और दलित नेता का समझौतापरस्त अवसरवादी चरित्र, सब जानी-पहचानी कहानी लगती है। अंत में वर्ग और जाति का एक होना, एक संदेश देता है।

लेखिका पी. शिवकामी व ‘द ग्रिप ऑफ चेंज’ एंड ‘ऑथर्स नोट्स’ का आवरण पृष्ठ

इधर गौरी पढ़ लिख कर अक्लमंद बन जाती है। वह रिसर्च करती है और डाक्टरेट करके शिक्षिका बन जाती है। वह शादी करने से इंकार कर देती है। उसे अपनी मां की तरह का जीवन नहीं जीना। उसका यह अस्वीकार उसके पिता की लिए एक बड़ा धक्का था। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर अब वह सिर उठा कर जीने लगती है। अब वह पिता के सामने सज-संवर सकती थी। बाल में फूल लगा सकती थी। जवाब दे सकती थी। तर्क कर सकती थी। अब उसका पिता उसे पीट नहीं सकता था। इस तरह से वह पितृसत्ता से संघर्ष करती है और अपने स्तर पर जीत भी जाती है।

दलितों की दशा-दिशा बदल रही थी। गांव, क़स्बे में दलितों के जीवन में परिवर्तन आ रहा है। उपन्यास यहीं पर समाप्त हो जाता है।

इस तरह इस उपन्यास में दलित जीवन ख़ास तौर पर दलित औरतों के जीवन का क़रीब से ब्यौरा मिलता है। कथामुथु के रूप में अवसरवादी दलित आंदोलन की कमियां नज़र आती हैं तो वहीं पिता के रूप में वह दलित नेता पितृसत्ता का घृणित वाहक भी है। गौरी दलित आंदोलन की सचेत प्रतीक है। एक तरफ़ वह दलितों के प्रति हो रहे अन्यायों के ख़िलाफ़ दलित बगावत की चेतना का प्रतीक है तो दूसरी तरफ वह घिनौने पितृसत्ता के रूप में अपने पिता के कार्यों से भी नफ़रत करती है। वह शिक्षा को अपनी मुक्ति का एकमात्र रास्ता मानती है। पढ़-लिख कर, नौकरी करके वह अपनी मां के जैसी औरतों की अपमानयुक्त जिंदगी जीने से इंकार कर देती है। वह अपनी मां और दूसरी मां दोनों को नारी मुक्ति का पाठ पढ़ाती है।

लेकिन इस उपन्यास के ख़त्म होने के बाद आश्चर्यजनक रूप से लेखक के नोट्स के रूप में एक दूसरी किताब शुरू हो जाती है। लेखिका इसमें उपन्यास का पुनरीक्षण करती हैं। इस उपन्यास के प्रकाशित होने के आठ साल बाद लेखिका ऐसा साहसिक काम करती हैं। वह अपने ही उपन्यास को तार-तार करते हुए आलोचना करती हैं। संभवतः साहित्य लेखन में यह अपनी तरह का अनूठा और साहसिक प्रयोग है। अपनी ही रचना का पुनर्पाठ करना और वह भी आलोचनात्मक रूप में। ऐसा हिंदी साहित्य में देखने को नहीं मिलता।

गौरी (जो संभवतः लेखिका शिवकामी का अपना रूप ही है) उपन्यास के पात्रों को पुनः तलाशने वापस अपने क़स्बे में लौटती है। क़स्बा काफ़ी बदल गया है। पुरानी चुप्पी का स्थान गाड़ियों की तरह तरह की आवाज़ों ने ले लिया है।

गौरी का घर भी वही नहीं रहा। गौरी के पुराने घर में फूलने वाले चमेली और कन्कम्बरम के फूल नादारद हैं। घर में अनेक बच्चे हैं। सबसे छोटे वाले नंग-धडंग। उनसे बड़े चीथड़ों में लिपटे हुए। जिस साल उसने यह उपन्यास लिखा, उसके 12 भाई-बहन थे। बदले में उनके लगभग दो दर्ज़न बच्चे वहां मौजूद थे। लेखिका सवाल करती हैं कि उपन्यास में केवल दो ही क्यों दिखाए गए? लेखिका स्वयं से ही सवाल करती हैं कि यथार्थ से लेखक को कितना बचना चाहिए था। लेकिन संभवतः लेखिका को यह आज़ादी तो होना ही चाहिए कि वह अपनी किताब को किस तरह लिखना चाहती है। अगर वह पुनः ईमानदारी से सच्चाई नहीं बयान करती तो पाठकों को कैसे पता चलता।

घर से निकल कर गौरी ने पाया कि क़स्बे की सड़कों पर बहुत कुछ बदल गया था। उसे बहुत कुछ याद आता है। उसके लोगों की मुश्किलें, परेशानियां हर ओर बिखरी हुई थीं। लेखिका फिर सवाल करती है कि उसने केवल अपने चुने हुए दुःख ही क्यों दिखाए? क्या लेखक का केवल चुने हुए यथार्थ को दिखाना सही है? वह सवाल करती है।

उपन्यास में गौरी दलित व स्त्री चेतना का प्रतीक है। वह दलितों के साथ होने वाले जातिगत अपमान से दुखी होती है। साथ ही वह अपने पिता के अपमानजनक व्यवहार से भी क्षुब्ध है। पिता द्वारा थंगम से किया हुआ व्यवहार उसे नागवार गुज़रता है। वहीं पिता द्वारा किया गया बहुविवाह भी उसे अपमानजनक लगता है। उपन्यास में लेखिका अपने पिता का नकारात्मक चरित्र गढ़ कर एक तरह से बदला लेती है। अंत में वह दिखाती हैं कि न केवल दलितों के नेता के रूप में वह अप्रासंगिक हो गए हैं, बल्कि उसकी माएं भी उससे ‘डरना’ बंद कर देती हैं। यहां तक कि थंगम भी अंत में उसका उपहास उड़ाती है। स्वयं गौरी भी एक पिता के रूप में उसकी सत्ता को चुनौती देती है। अपने पिता को थंगम का पैसा हड़पने वाला भ्रष्टाचारी के रूप में भी दिखाती है। इस तरह लेखिका अपनी तरह से पितृसत्ता और सामंती व्यवस्था से बदला लेती है।

लेखिका के नोट्स वाले हिस्से में लेखिका कई घटनाएं लिखती हैं, जो उनकी जिंदगी में घटी थीं और एक-एक करके सवाल पूछती हैं। क्या बहुविवाह करने वाला एक व्यक्ति सेक्स एडिक्ट होता है? उसके उपन्यास के ज़्यादातर पुरुष पात्र अपनी महिला पात्रों से धोखा क्यों करते हैं? वह सवाल करती हैं, और खुद ही उत्तर देती हैं कि बचपन से ऐसे यातनादायी माहौल में जीवन बसर करने के कारण ऐसे पात्रों का सृजन होता है शायद।

आगे वह सवाल करती हैं कि क्या एक लेखक को आत्मगत निष्कर्षों से बचना चाहिए? वह आत्मालोचना करती हैं कि गौरी का पात्र इतना अच्छा है कि वह सच नहीं हो सकता। उसे बहुत गहराई से नहीं सृजित किया गया है। वह बार-बार आत्मावलोकन करती हैं।

लेखिका की यह बेबाकी आश्चर्यचकित करती है। वह खुद सवाल करती हैं– ‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ उपन्यास के रूप में क्या यह कहना चाहता है कि एक निम्न जाति का नेता अपने खुद के लोगों का शोषण करता है और सवर्णों की तरह ही वह एक गरीब विधवा थंगम की वंचना का फ़ायदा उठता है? उनके अनुसार यह उपन्यास यह बताता है कि अमीर, गरीब, सवर्ण, दलित हरेक स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है।

उपन्यास में कुछ भी झूठ नहीं है लेकिन लेखिका को यह अहसास होता है कि उपन्यास एक झूठ था। उनके अनुसार पात्रों को घटनाओं के साथ गूंथ दिया गया है। उन्हें यह भी महसूस होता है कि ‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ उपन्यास दलित नेता को उस वक्त निम्न दिखाता है जब दलित आंदोलन खड़ा हो रहा था। उन्हें लगता है जब महान कवि सुब्रमण्यम भारती ने अपने समुदाय से विश्वासघात नहीं किया तो उन्हें क्या हक़ है ऐसा करने का।

तुमने दलित नेतृत्व का मजाक क्यों बनाया? वह सीधे पूछती हैं और जवाब भी देती हैं– शायद बचपन की स्मृतियों ने उनसे ऐसा कराया। चिंतन के सतहीपन ने ऐसा कराया। एक कठोर आत्मालोचना करते हुए वह कहती हैं कि ऐसा सवर्ण प्रशंसा के प्रभाव में उन्होंने किया। आगे वह कहती हैं कि उपन्यास की मूल भावना यह नहीं है। जाति अभी भी एक ताकतवर ताकत है, यह सच है। लेकिन दलितों का वर्तमान नेतृत्व अपर्याप्त है और उसमें ओज की कमी है। आगे वह कहती हैं कि जाति पर विशेष फोकस करते हुए भी समस्त शोषित जातियों की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना ज़रूरी है।

आगे वह उन भौतिक परिस्थितियों का वर्णन करती हैं, जिनमें इस उपन्यास का सृजन हुआ। कुछ के यथार्थ को वह स्वीकार करती हैं और कुछ को नकारती हैं। पहले जब वह उपन्यास का अंत इस रूप में किया था कि कथामुथु ने थंगम को अपनी तीसरी पत्नी के रूप में हासिल कर लेता है। अपनी इस निर्मिती से संतुष्ट होकर वह उपन्यास की पांडुलिपि किसी साहित्यिक मित्र को देती हैं। वह सुझाव देती हैं कि एक दलित नेता को जो अपने समुदाय की पहचान के प्रति सचेत है, उसे नकरात्मक रूप से नहीं उजागर करना चाहिए। इसके बाद वह समुदाय के भीतर से ही एक ऐसे नेता को गढ़ती हैं जो एक क्रांतिकारी है। चंद्रन का नेता के रूप में उदय होता है।

लेखिका को लगता है कि सामाजिक समस्याओं का हल उसे पेश ही करना चाहिए … ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ की मार्क्सवादी समझ उपन्यास के अंत में सारे वंचितों की एकता करवा देती हैं। जाति ही वर्ग है, की समझ उनसे ऐसा करवाती है। लेखिका को लगता है कि उनके उपन्यास में जाति समस्या अपने अनेक आयामों के साथ उपस्थित है। औरतों का शोषण उसके साथ गुंथा हुआ है।

किताब के एकदम अंत में दो परिशिष्ट हैं। एक मीना कंडास्वामी का और दूसरा सी.एस. लक्ष्मी का। मीना कंडास्वामी शिवकामी के लेखन की तारीफ़ करते हुए लिखती हैं कि कितने लेखकों में यह साहस होगा कि वह अपने पहले ही उपन्यास की इस तरह से आत्मलोचनात्मक पुनर्व्याख्या करे? वहीं लक्ष्मी कहती हैं कि अपने ही रचना की विखंडन करना एक पीड़ादायी काम होता है और शिवकामी ने यह मुश्किल काम किया।

इस तरह शिवकामी अपने उपन्यास ‘द ग्रिप ऑफ़ चेंज’ में दलित आंदोलन की सीमाओं को रेखांकित हैं और नारीवादी दृष्टिकोण से दलित पितृसत्ता को भी उजागर करती हैं। फिर भी वह कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि वह अपने जाति समुदाय से ‘दगा’ कर रही हैं, क्योंकि वह समस्या के समाधान की तलाश में पूरी रचना करती नज़र आती हैं।

उपन्यास की भाषा प्रवाहपूर्ण और सरल है। ऐसा लगता है मूल उपन्यास और भी सरस होगा। अंग्रेज़ी अनुवाद स्वयं लेखिका ने किया है जो बहुत ही ग्राह्य और साहित्यिक है। बिलकुल शुरुआती पंक्तियों में भाषा का एक रूप देखिए– “उसकी दूसरी पत्नी नागमणि, जिसे उसने घर में स्थापित किया था, सोते हुए कराह रही थी। मानो उसे कोई पीड़ा हो रही हो।”[2] और उपन्यास की अंतिम पंक्ति देखिए– “चमेली के फूलों को बहुत दिनों से तोड़ा नहीं गया था। ज़मीन पर फूल झरे हुए थे। खिले हुए फूलों की खुशबू उस दिन चारों ओर बिखरी हुई थी। हरेक शाख पर नई कलियां लहरा रही थीं। गौरी के माध्यम से प्रकृति में जीवन शक्ति चिन्हित हो रही थी। वह वहां जागरूकता के रोमांच में समाहित खड़ी हुई थी।”[3] यहीं किताब का अंत हो जाता है।

यह उपन्यास दलित साहित्य ही नहीं, समूचे भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

[1] प्रकाशक ओरिएंट लॉंगमॅन, 2006

[2] अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद – अमिता शीरीं

[3] वही

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अमिता शीरीं

लेखिका विगत बीस वर्षों से सक्रिय सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उनकी अनेक कहानियां व कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

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