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किसके वास्ते है आदित्यनाथ का ‘भुजदंड’?

आदित्यनाथ ने 1 मार्च, 2023 को विधान सभा में पूरे अभिमान के साथ कहा, ‘मैं क्या जानूं जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड।’ यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता की पंक्ति है। इसका अर्थ समझिए। भुजदंड का अर्थ यहां सत्ता है। बता रहे हैं कंवल भारती

जिस रामराज्य की वकालत गांधी करते थे, और जिसे तमाम ब्राह्मण संत और नेता भारत की धरती पर साकार करना चाहते थे, उसे उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तेजी से साकार करने में लगे हुए हैं। उनका रामराज्य क्या है, इसे लोगों को समझाने के लिए वह हमेशा अपनी ऑफिस-टेबिल पर मनुस्मृति की किताब रखते हैं, ताकि ऑफिस में उनसे मिलने आने वाले ब्राह्मण और द्विज प्रशासनिक अधिकारी उसे देखकर अच्छी तरह समझ जाएं कि उन्हें क्या करना है। असल में रामराज्य मनुस्मृति का ही राज्य था। शूद्रों को शिक्षा देने का कार्य कर रहे शंबूक का वध राजा राम ने मनुस्मृति के विधान के तहत ही किया था। मनुस्मृति का ही आदेश है कि शूद्रों को शिक्षा देने के कार्य से दूर रखना है। इसलिए पूरी शिद्दत से प्रोफेसरों के पदों पर ब्राह्मण-ठाकुरों को नियुक्त करके शूद्रों को वंचित करने का काम किया जा रहा है। इसके लिए बाक़ायदा ब्राह्मण कुलपतियों, निदेशकों तथा अध्यक्षों को काम पर लगा दिया गया है। और वे पूरी तरह बेख़ौफ़ होकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। अगर कोई प्रोफेसर, जिसका लोकतंत्र में विश्वास है, इन ब्राह्मण-ठाकुरों की संविधान-विरुद्ध नियुक्तियों का विरोध करता है, तो उसे बर्खास्त करने की जिम्मेदारी भी सत्ता द्वारा तैनात किए गए कुलपतियों, निदेशकों और अध्यक्षों को सौंप दी गई है। जीबी पंत समाज विज्ञान संस्थान, झूंसी, इलाहाबाद में वहां के ब्राह्मण निदेशक ने सभी पदों पर ब्राह्मणों की नियुक्तियां कीं, और शूद्र अभ्यर्थियों को ‘अयोग्य’ कहकर खारिज कर दिया। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रवक्ता के 78 पदों पर 45 ठाकुर और 17 ब्राह्मण नियुक्त किए गए और इन नियुक्तियों का विरोध करने वाले व्यक्ति को बर्खास्त कर दिया गया। इसी तरह लोकसेवा आयोग, उत्तर प्रदेश द्वारा इसी वर्ष जनवरी में राजकीय महाविद्यालयों में सहायक प्रोफेसरों के रिक्त 13 पदों में से 11 पदों पर ब्राह्मण-ठाकुरों को नियुक्त किया गया। आईआईटी, बीएचयू में पीजी एडमिशन में आठ सीटों में सात सीटों पर सवर्णों को प्रवेश दिया गया, और एक मात्र ओबीसी के अभ्यर्थी को निरस्त कर दिया गया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दलित-पिछड़ी जातियों के गरीब छात्रों को शिक्षा से वंचित करने के मकसद से वर्ष 2022-23 के लिए फीस को तीन गुना कर दिया गया। बीए के कोर्स की जो फीस पहले लगभग एक हजार रूपए थी, वह अब लगभग चार हजार रुपए कर दी गई है। उत्तर प्रदेश सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन के हवाले से साहित्यकार व इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा की इसी 11 जनवरी की एक पोस्ट के अनुसार, “उत्तर प्रदेश आयुष मंत्रालय ने 5 अगस्त 2022 को 611 आयुर्वेदिक डाक्टरों की रिक्तियां निकालीं, जिनमें 435 पद सामान्य के लिए, और 61 पद गरीबी के आधार पर, इस तरह कुल 496 पदों को सवर्णों, खासकर ब्राह्मण-ठाकुरों के लिए आरक्षित रखा गया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सरकार ने सामान्य और गरीबी कोटे की 50 प्रतिशत सीमा तय की थी, पर यहां गरीबी अर्थात सुदामा कोटा 10 प्रतिशत और सामान्य कोटा 71.2 प्रतिशत करके सीधे 81.2 प्रतिशत आरक्षण सवर्णों को दे दिया गया। इसके विपरीत अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित 18 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 4.74 प्रतिशत और ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 9.49 प्रतिशत कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बोलते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

सुभाष चंद्र कुशवाहा की ही 1 जनवरी, 2023 की पोस्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक कॉन्फिडेंशियल और विजिलेंस में 155 नियुक्तियां की गयीं, जिनमें 136 सवर्ण और 5 गरीब सवर्ण, इस तरह कुल 141 सवर्णों को नियुक्त किया गया।

चूंकि भाजपा सरकार के इस जातिवाद के खिलाफ कोई विपक्ष मुखर नहीं हो रहा है, इसलिए योगी आदित्यनाथ के हौसले बुलंद हैं। शायद इसीलिए उन्होंने 1 मार्च, 2023 को विधान सभा में पूरे अभिमान के साथ कहा, “मैं क्या जानूं जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड।” यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता की पंक्ति है। इसका अर्थ समझिए। भुजदंड का अर्थ यहां सत्ता है। अगर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री नहीं होते, तो क्या इतने अकड़ते? वह जाति नहीं जानते, पर अपने भुजदंड से दलित-ओबीसी को कुचलना अच्छी तरह जानते हैं। वह क्यों जाति को जानेंगे, जब उनकी जाति उनके लिए पीड़ादायक और अपमानजनक है ही नहीं? वह क्यों जाति को जानेंगे, जब मनुस्मृति उन्हें यह याद दिलाती रहती है कि यह देश द्विजों का है, यहां उन्हें प्रयत्नपूर्वक शासक बनकर रहना है? (मनु. 4/61)

फ़िलहाल तो योगी के भुजदंड बिना कानूनी खौफ के, बेरोकटोक हर निरंकुश कार्यवाही को अंजाम दे रहे हैं। इतिहास में जो न कभी हुआ और न अतीत में कभी सुना गया, योगी वह कारनामे कर रहे हैं। जो अपराधी है, उसे अदालत सजा देती है, पर योगी उनके घरों पर बुलडोजर चलवाकर उनके बीवी-बच्चों को बेघर करके सजा दे रहे हैं। यह जातीय भुजदंड का ही कमाल है, जिसे कानून का भी कोई डर नहीं है। अखबार में छपी खबर के मुताबिक राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल की हत्या के बाद माफिया की कमर तोड़ने की कार्रवाई में इसी 3 मार्च को इलाहाबाद और कौशाम्बी में अलग-अलग जगहों पर बुलडोजर चलवाकर दो भवनों को ध्वस्त करा दिया। इसमें एक असरौली के ग्राम प्रधान माशूकउद्दीन की शिक्षिका बहू का नवनिर्मित मकान तोड़ा गया, जबकि दूसरा मकान फरार चल रहे अब्दुल कवि का है। जातीय अहंकार में उन्मत्त भुजदंड वाले भगवा योगी से किसी की पूछने की हिम्मत है कि शिक्षिका बहू का क्या अपराध था, जो उसका नवनिर्मित मकान तोड़ दिया गया? अगर अब्दुल कवि फरार चल रहा था, तो उसके बीवी-बच्चों का क्या कुसूर था, जो उनको बेघर कर दिया गया? जब शिक्षिका बहू के पति ने रजिस्ट्री के कागज, पास किया हुआ नक्शा और जमा धन की रसीदें दिखाईं, तो मकान गिराने आए जातीय भुजदंड के अफसरों ने उन कागजों को देखने से ही इंकार कर दिया। रामराज्य की यही तो निरंकुश कार्रवाई है, जिसमें कानून नहीं, केवल राजा का हुक्म चलता है। ऐसी ही निरंकुश कार्रवाई जातीय भुजदंड ने मऊ में करवाई। वहां सुभासपा विधायक अब्बास अंसारी, जो जेल में है, का दो मंजिला मकान उसी 3 मार्च को पोकलेन मशीन और बुलडोजर से ढहा दिया। क्या उसका यही कसूर है कि वह मुख़्तार अंसारी का बेटा है? नहीं, असल में इन सबका कसूर यह है कि ये मुसलमान हैं, जो योगी जैसे भाजपा नेताओं की आंखों में खटकते हैं। योगी के जातीय भुजदंडों ने हाथरस कांड के अपराधी ठाकुरों के मकानों पर बुलडोजर क्यों नहीं चलवाया, जिन्होंने एक दलित लड़की के साथ दरिंदगी करके उसकी हत्या की थी? सहारनपुर में दलित बस्ती को जलाने वाले ठाकुरों की बस्तियों को बुलडोजर से क्यों नहीं गिरवाया? क्या वे अपराधी नहीं थे? उन्नाव के कुलदीप सेंगर पर 28 मुकदमे, वाराणसी के बृजेश सिंह पर 106 और चुलबुल सिंह पर 53 मुकदमे, जौनपुर के धनंजय सिंह पर 46 मुकदमे, प्रतापगढ़ के राजा भैया पर 31 मुकदमे, भदोही के उदयभान सिंह पर 83 मुकदमे, हमीरपुर के अशोक चंदेल पर 37 मुकदमे, चंदौसी के विनीत सिंह पर 34 मुकदमे, गोंडा के बृजभूषण सिंह पर 84 मुकदमे, सुलतानपुर के सोनू सिंह पर 57 और मोनू सिंह पर 48 मुकदमे, मिर्जापुर के अजय सिंह पर 81 मुकदमे, बस्ती के पिंटू सिंह पर 23 मुकदमे, देवरिया के रानी सिंह पर 48 मुकदमे, बिजनौर के संग्राम सिंह पर 58 मुकदमे, और मोहोबा के बादशाह सिंह पर 88 मुकदमे दर्ज हैं। इनके घर मिट्टी में क्यों नहीं मिलाए गए? क्या इसलिए कि ये ठाकुर हैं, और भाजपा के समर्थक हैं?

गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद के लिए संविधान की शपथ ली है, न कि मनुस्मृति की। शपथ समारोह में शपथ लेते हुए उन्होंने जनता को वचन दिया था कि वह कानून का राज स्थापित करेंगे। क्या यही कानून का राज्य है कि ब्राह्मणों और अन्य द्विजों का विकास किया जाए, और दलित-मुसलमानों को कुचला जाए? जिस कानून की उन्होंने शपथ ली है, क्या उस कानून में ऐसा प्राविधान है कि किसी अपराधी का घर ध्वस्त करके उसके परिवार को सजा दी जाएगी? और वह भी सिर्फ दलित या मुस्लिम अपराधी के परिवार को?

अभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जिंदा हैं, तब यह स्थिति है। लेकिन अगर पूरी तरह रामराज्य अर्थात हिंदू राष्ट्र स्थापित हो गया, और संविधान का राज्य खत्म हो गया, तब क्या होगा? ऐसे रामराज्य में भले ही जातीय भुजदंडों वाले योगी, संत, महात्मा, ब्राह्मण-ठाकुर अकड़े हुए रहेंगे, पर दलित-ओबीसी और मुसलमानों के लिए वह विनाश का राज्य ही होगा।

लोकतंत्र और रामराज्य में कितना अंतर है, इसे न्यूयार्क की एक खबर से समझा जा सकता है। गत दिनों न्यूयार्क में दक्षिण एशियाई मूल की भारतीय-अमेरिकी सोन्या क्रिश्चयन को कैलीफोर्निया कम्युनिटी कॉलेज सिस्टम का स्थायी चांसलर नियुक्त किया गया है। केरल विश्वविद्यालय की इस स्ननातक के बारे में कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूजोम ने कहा है कि “डॉ. क्रिश्चयन हमारे देश के सबसे गतिशील कॉलेज लीडरों में से एक हैं। वह छात्रों में वास्तविक सुधार करने के लिए उच्च शिक्षा में जरूरी आयामों को जानती हैं।” क्या डॉ. सोन्या क्रिश्चयन को योगी के भगवा रामराज्य में ऐसे किसी उच्च पद पर नियुक्त किए जाने की कल्पना की जा सकती है? कदापि नहीं। रामराज्य में सारी योग्यता का स्वामी सिर्फ ब्राह्मण या द्विज होता है, अन्य कोई वर्ण नहीं, शूद्र तो बिल्कुल भी नहीं। और मुस्लिम या क्रिश्चयन को तो रामराज्य म्लेच्छ ही मानता है। यह लोकतंत्र ही है, जो योग्यता को मनुष्यों के वर्ण या धर्म में नहीं, बल्कि उनके गुण में देखता है। अत: कहना न होगा कि रामराज्य एक राष्ट्रविरोधी और मनुष्य-विरोधी राज्य है, जो कभी लोकतंत्र का स्थान नहीं ले सकता।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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