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पांच किलो राशन की भीख नहीं, ज़मीन चाहिए : श्रवण कुमार निराला

जनता के जागरुक होने से सरकार डरती हैं। वो जानते हैं कि जनता जागेगी तो उनका वोट बैंक खिसकेगा। हम जनता को जागरुक कर रहे हैं। जनता को बता रहे हैं कि हम भिखारी नहीं है। हमें 5 किलो राशन नहीं, ज़मीन में हिस्सा चाहिए। पढ़ें, आंबेडकर जन मोर्चा के संस्थापक सह संयोजक श्रवण कुमार निराला से यह खास बातचीत

देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। आज़ाद भारत में मतदान के मामले में सभी को समानता मिल गई, लेकिन ज़मीन के मामले में असमानता आज भी क़ायम है। इसकी प्रमुख वजह है कि ज़मीन के सवाल को सुचारू रूप से हल नहीं किया गया। भूमिहीनों में अधिकांश दलित-बहुजन और पसमांदा मुस्लिम समाज के लोग हैं। भूमिहीन दलित-ओबीसी समाज के हर भूमिहीन परिवार को एक एकड़ ज़मीन की मांग लेकर गोरखपुर में आंबेडकर जन मोर्चा के नेतृत्व में 17 मार्च, 2023 को गोरखपुर कमिश्नर कार्यालय पर एकदिवसीय धरना प्रदर्शन हुआ। इससे पहले 17 दिसंबर 2022 को भी आंदोलन हुआ था, जिसमें बड़ी तादात में जनभागीदारी हुई थी। जनमोर्चा 10 अक्टूबर 2023 से अनिश्चितकालीन आंदोलन करने जा रहा है। पढ़ें, ज़मीन का हक़ आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर आंबेडकर जन मोर्चा के संयोजक श्रवण कुमार निराला से सुशील मानव की खास बातचीत। 

श्रवण जी, कृपया पहले अपनी पारिवारिक समाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

मेरा जन्म शहीदों की भूमि चौरी-चौरा, गोरखपुर के पास केवला चक गांव में 20 जुलाई 1980 को एक सामान्य परिवार में हुआ। मेरा परिवार की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि रही। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई। फिर एक सामान्य विद्यार्थी की तरह गांव से निकलकर उच्च शिक्षा के लिए 1996-97 में गोरखपुर विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया। वहां अपनी समस्या और दलित-बहुजन छात्रों की समस्याओं से जूझते हुए विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की राजनीति में सक्रिय हुआ। 9-10 साल छात्रसंघ की राजनीति में दलित, पिछड़े छात्रों को संगठित करना, छात्रवृत्ति जैसे अनेक समस्याओं का समाधान करवाने की कोशिशें की। गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में दो बार अध्यक्ष पद के लिये चुनाव लड़ा, सफलता के क़रीब पहुंच कर चुनाव हारा। मैं जनसंचार विषय में परास्नातक किया है। लॉ की पढ़ाई में दिलचस्पी थी, लेकिन उसे बीच में ही छोड़ना पड़ा। 

आप किस छात्रसंघ से जुड़े हुए थे?

मैंने वहां खुद अपने छात्र संगठन ‘आंबेडकरवादी युवा छात्र परिषद’ की स्थापना की। तमाम विश्वविद्यालयों में उसकी इकाई गठित करने के लिए मुहिम चलाया। इस दौरान पूरे राज्य के विश्वविद्यालयों में छात्रों को संगठित करने की कोशिश में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस यूनिवर्सिटी, लखनऊ यूनिवर्सिटी जैसे जगहों पर सक्रिय रहा। छात्रसंघ के समय मैंने राज्य स्तर के कई संघर्ष और लड़ाईयां लड़ी। छात्रवृत्ति के मुद्दे पर, विश्वविद्यालय कैम्पस में, पीएचडी रजिस्ट्रेशन में आरक्षण की मांग करना, मानदेय पर शिक्षक नियुक्ति में आरक्षण की मांग को लेकर हमलोगों ने आंदोलन चलाया। गोरखपुर विश्वविद्यालय में तो लागू करवाया। फिर दलित चेतना को लेकर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित कराया। विश्वविद्यालय में कई साहित्य सम्मेलन करवाये, जिनमें प्रोफ़ेसर तुलसीराम, श्योराज सिंह बेचैन, एच.एल. दुसाध, चंद्रभान प्रसाद, विवेक कुमार आदि दलित-बहुजन बुद्धिजीवी शामिल हुए। 

आपका जुड़ाव तो बहुजन समाज पार्टी से भी रहा?

हां, आंबेडकरवादी चेतना के चलते बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रति एक आकर्षण था। दस वर्ष की छात्रसंघ राजनीति के बाद जब बसपा से जुड़ा तो एक साल तो सामान्य कार्यकर्ता के रूप में छोटी-मोटी जिम्मेदारियां निभाता रहा। साल 2009 के बाद बसपा के संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलने लगी। सबसे पहले बस्ती मंडल में सिद्धार्थनगर जिले का प्रभारी बना। फिर पूरे बस्ती मंडल (जिसमें तीन जिले होते हैं) का प्रभारी बना और लगभग दो साल तक समन्वयक रहा। उसके बाद डेढ़ दशक तक पार्टी के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में मंडल प्रभारी, जोनल को-आर्डिनेटर जैसे जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। इस दौरान कई मुख्य मंडल यथा– गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद, देवीपाटन, बस्ती, आजमगढ़, बनारस में संगठन की मजबूती के लिए काम किया। 

फिर बसपा से आपका मोहभंग क्यों हुआ?

मैं 2017 विधानसभा चुनाव में गोरखपुर का प्रभारी बना। प्रत्याशी हार गया तो बहन जी (मायावती जी) ने बुलाकर साल 2022 विधानसभा चुनाव के लिए बांसगांव विधानसभा से मुझे प्रत्याशी घोषित कर दिया। फिर इसके बाद उन्होंने एक पूर्व विधायक को यह टिकट दे दिया, जो 2019 लोकसभा चुनाव में बांसगांव संसदीय सीट से प्रत्याशी रहा था। उसने दो तीन महीना काम किया, पैसा खर्च किया, इसके बावजूद उसका टिकट भी काटकर बहन जी ने एक पूर्व मंत्री को टिकट दे दिया। यहां से मेरा मतभेद बहन जी के साथ हुआ। मेरा विरोध यह था कि जब आपको किसी का टिकट दो महीने में काटना ही था तो आपने उसको टिकट क्यों दिया था। उसने उस क्षेत्र में लोगों के बीच अपना पैसा और समय खर्च़ किया। बहन जी ने कहा कि हमारी शर्तें हैं, जो पूरा करेगा, उसको टिकट देंगे। मैंने कहा कि आप शर्तों पर राजनीति करेंगी या मुद्दों पर। काफी विचार-विमर्श के बाद और 15 साल बसपा को देने के बाद मुझे इस निर्णय पर आना पड़ा कि जहां पैसा ही सबसे महत्वपूर्ण है कार्यकर्ता का समर्पण नहीं, वहां नहीं रहना। 

श्रवण कुमार निराला, संस्थापक सह संयोजक, आंबेडकर जन मोर्चा

आंबेडकर जन मोर्चा के गठन का उद्देश्य क्या है?

साल 2019 लोक सभा के चुनाव में एक घटनाक्रम के बाद यह स्पष्ट हो गया कि दलित समाज के नाम पर स्थापित पार्टी द्वारा दलितों के वोट थोक भाव से बड़ी कीमत लेकर बेचा जा रहा है, दलितों, पिछड़ों की मूल समस्या पर कोई जन आंदोलन नहीं रह गया, सिर्फ वोट की राजनीति चल रही है। ऐसी स्थिति में पूर्वी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और सामाजिक, राजनैतिक, युवा कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श किया। तब सबका यह कहना था कि हमको पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक सामाजिक/राजनीतिक संगठन खड़ा करना चाहिए और समाज हित के जो मुद्दे आज नहीं उठ रहे हैं, या संघर्ष बंद हो गया है, हमें ये ज़रूरी मुद्दे उठाने हैं और जन आंदोलन खड़ा करना है। 

इसलिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के आंदोलन को आगे बढ़ाने व जनहित की लड़ाई लड़ने के उद्देश्य से पूर्वी उत्तर प्रदेश में दलितों, पिछड़ों, गरीबों के हक़-अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए एक नया संगठन स्वतंत्र रूप से खड़ा करने का फैसला किया। इस तरह 8 अगस्त, 2019 को आंबेडकर जन मोर्चा का गठन गोरखपुर में किया गया। 

क्या सिर्फ़ ज़मीन के मुद्दे पर ही आंदोलन किया है आपके संगठन ने? 

आंबेडकर जन मोर्चा के गठन के बाद पहला आंदोलन ‘दलित, पिछड़ा शिक्षा, छात्रवृत्ति बचाओ रैली’ 12 जनवरी, 2020 को गोरखपुर में हुई। इस रैली में पचास हजार से अधिक छात्र, नौजवान, नागरिक शामिल हुए। रैली से उत्तर प्रदेश सरकार बैकफुट पर आई और उसने राज्य के लाखों छात्रों की छात्रवृत्ति एवं फीस प्रति पूर्ति जारी की। इसके बाद मोर्चा ने सड़क पर कई आंदोलन चलाये। इस कड़ी में 28 नवंबर, 2021 को कौड़ीराम, गोरखपुर मे ‘संविधान सम्मान अधिकार यात्रा’ भी शामिल है, जिसे व्यापक समर्थन मिला। 

ज़मीन के मुद्दे पर आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?

ज़मीन के मसले पर बाबा साहब ने भी विभिन्न अवसरों पर विचार किया है। इसे बेहतर समझाने के लिए आगे चलकर मान्यवर कांशीराम जी ने नारा दिया कि “जो ज़मीन सरकारी है, वह ज़मीन हमारी है”। ज़मीन के मसले पर दलित महापुरुषों ने समझाया और काम करने की भी कोशिश की। लेकिन उनके पास काम बहुत ज़्यादा था और समय बहुत कम। तो हम लोगों को लगा कि इस मुद्दे पर लडेंगे। ज़मीन के मामले में हमारे यहां बहुत असमानता है। इस असमानता के ख़िलाफ़ हमने दलित-पिछड़ा, भूमिहीन गरीबों को प्रति परिवार एक-एक एकड़ जमीन दिलाने के लिए संघर्ष शुरु किया। इस मुहिम के तहत दिनांक 17 दिसंबर, 2022 को गोरखपुर में ‘दलित अधिकार रैली’ का आयोजन किया गया। इस रैली में बड़ी संख्या में लोगों ने शामिल होकर ज़मीन के अधिकार की लड़ाई को नई दिशा दी। फिर सरकार को चेताने के लिए 17 मार्च, 2023 को गोरखपुर कमिश्नर परिसर में एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया। और इस मुद्दे पर अब आर-पार की लड़ाई लड़ने की तारीख हमने घोषित कर दी है। आगामी 10 अक्टूबर, 2023 को हम गोरखपुर कमिश्नर कार्यालय पर “डेरा डालो, घेरा डालो” आंदोलन की शुरुआत करेंगे। जा रहे हैं। उस आंदोलन में लाखों लोग भाग लेंगे और तब तक नहीं जाएंगे जब तक सरकार उस पर अपना कोई निर्णय सुना नहीं देती है।

आप मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सांस्कृतिक गढ़ गोरखपुर में काम कर रहे हैं। कोई मुश्किलात पेश आई क्या? 

ज़मीन के मुद्दे पर हुई दलित अधिकार रैली में जुटी भारी भीड़ ने उत्तर प्रदेश सरकार को हिला दिया। जिला प्रशासन ने घबराहट में मेरे घर भारी पुलिस बल भेज कर सील करा दिया। उन्होंने कहा कि रैली में भारी भीड़ आपने कैसे जुटाई और इस रैली में आपने पैसा कहां से ख़र्च किया। इस घटनाक्रम के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष जब मैंने अपील किया तब दस दिन के बाद मेरा घर जिला प्रशासन को मजबूर होकर खोलना पड़ा।  

क्या आपका संगठन अभी सिर्फ़ गोरखपुर तक सीमित है?

यूपी का पूर्वी क्षेत्र (पूर्वांचल) गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, फैजाबाद, देवीपाटन, बनारस, इलाहाबाद मंडलों में मोर्चा का मुख्य आधार है, जिसमें मुख्य जनपद गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, गोण्डा, फैजाबाद, बाराबंकी, सुल्तानपुर, अमेठी, अम्बेडकर नगर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी और फतेहपुर है, जिसमें आंबेडकर जन मोर्चा का संगठन विधान सभा, ब्लाक, गांव स्तर तक। स्थापित हो चुका है। इसके अलावाअन्य राज्यों बिहार, छत्तीसगंढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, जम्मू कश्मीर में भी हमारा संगठन सक्रिय हो चुका है।

क्या आपकी योजना आंबेडकर जन मोर्चा को राजनीतिक दल के रूप में भी स्थापित करने की है? 

अभी तक इसका कोई इस तरह से रजिस्ट्रेशन तो नहीं है। पर समाज हित जन आंदोलन के साथ हमारा राजनैतिक लक्ष्य भी है। दलित-पिछड़ों की रहनुमाई करने वाली तमाम पार्टियां आजकल पार्टी एजेंडे पर बात करते हैं, जनता के मुद्दे पर नहीं। उन लोगों ने अवैध तारीके से इतनी प्रॉपर्टी बना ली है कि वे अब सीबीआई और ईडी से डरते हैं और जनता के मुद्दों की नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षी की लड़ाई लड़ रहे हैं। तो इन हालातों में हमें लगता है कि अब जनता की लड़ाई हमें सड़क पर भी लड़ना है और सदन में भी लड़ना है। और यह हमारी मज़बूरी भी बन गई है कि जनता की आवाज़ सदन में भी उठे। इसके लिए हमें अपना प्लेटफॉर्म बनाना होगा।

आपको बता दूं कि 2022 में आंबेडकर जन मोर्चा ने चार विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी उतारे। जनता ने साथ दिया और हमारा उत्साह बढ़ाया, लेकिन हमारे प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाए। हम चुनाव हारे, लेकिन हौसला नहीं। हम आगे चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। अगले साल लोक सभा का चुनाव भी मोर्चा लड़ेगा। 

क्या आपको लगता है कि ज़मीन के मुद्दे से सांप्रदायिक गोलबंदी टूटेगी? 

जनता के जागरुक होने से सरकार डरती हैं। वो जानते हैं कि जनता जागेगी तो उनका वोट बैंक खिसकेगा। हम जनता को जागरुक कर रहे हैं। जनता को बता रहे हैं कि हम भिखारी नहीं है। हमें 5 किलो राशन नहीं, ज़मीन में हिस्सा चाहिए। हम लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं और आशान्वित हैं। 

 (संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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