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सावित्रीनामा : एक क्रांतिकारी महिला की विरासत

इस पुस्तक के दूसरे भाग में सावित्रीबाई फुले द्वारा जोतीराव को भेजे गए पत्र हैं। इन पत्रों में जहां एक ओर दोनों का आपसी प्रेम झलकता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों और स्त्री के शोषण के खिलाफ संघर्ष करने की उनकी चाहत जबरदस्त रूप से सामने आती है। बता रहे हैं स्वदेश कुमार सिन्हा

आधुनिक भारत की शिक्षा का इतिहास जोतीराव फुले-सावित्रीबाई फुले दंपत्ति के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने महिलाओं के लिए भारत में पहला स्कूल खोला। दुखद यह कि आज़ादी के बाद फुले दंपत्ति के इस असाधारण योगदान को विस्मृत कर दिया गया। भारत के सामाजिक और शैक्षणिक इतिहास में जोतीराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले एक असाधारण दंपत्ति के रूप में सामने आते हैं। वे पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए आंदोलन खड़ा करने के लिए अपनी पूरी ताकत से जुटे रहे। सावित्रीबाई फुले को प्रथम भारतीय शिक्षिका भी माना जाता है।

इसके अतिरिक्त फुले दंपत्ति ने विपुल साहित्य रचा। अंग्रेजी और मराठी में इनका लेखन तो उपलब्ध है, लेकिन हिंदी में उनका साहित्य कम उपलब्ध है। विशेष रूप से सावित्रीबाई फुले द्वारा रचा गया साहित्य। हाल ही में फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’ इस कमी को दूर करने का एक ठोस प्रयास है। इसे सीधे मराठी से हिंदी में अनूदित किया गया है।

अनुवादक उज्ज्वला म्हात्रे ने इस जिम्मेदारी का निर्वहन अत्यंत ही निष्ठा के साथ किया है। वह स्वयं लंबे समय से वामपंथी नारीवादी आंदोलनों से जुड़ी रही हैं और सक्रिय लेखिका हैं।

इस पुस्तक में संगृहीत सावित्रीबाई फुले की कविताएं, उनके भाषण हमें इसलिए भी चकित करते हैं, क्योंकि बहुत ही कम उम्र में जब उनका विवाह हुआ तब वह निरक्षर थीं। जोतीराव फुले ने उन्हें बड़े लगन से पढ़ाया। वे सरकारी और मिशनरी स्कूलों में पढ़कर एक योग्य शिक्षिका बनीं। उस समय एक महिला के लिए शिक्षा प्राप्त करना, विशेष रूप से अगर वह दलित-बहुजन समाज से आती है, तो बहुत ही बड़ी बात मानी जाती थी। यह वह समय था जब उच्च जाति की महिलाओं को भी शिक्षित होने का अधिकार प्राप्त नहीं था। फुले दंपत्ति को यह अहसास था कि ज्ञान ही शक्ति है और इसके बिना महिलाओं और दलित-बहुजनों की प्रगति संभव नहीं है। इस पुस्तक में यह तथ्य बार-बार सामने आता है।‌

यह पुस्तक करीब छह खंडों में विभक्त है। प्रारंभ में प्रो. हरी नरके द्वारा लिखित व पूर्व में प्रकशित एक लेख भूमिका के रूप में संगृहीत है। इसके अलावा इसमें ‘काव्यफुले’, ‘सावित्रीबाई द्वारा जोतीराव को भेजे गए पत्र’, ‘सावित्रीबाई फुले के भाषण’, ‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’, ‘सावित्रीबाई फुले द्वारा संपादित जोतीराव के भाषण’ और ‘सावित्रीबाई फुले का जीवन कालक्रम’ शामिल हैं।

समीक्षित पुस्तक ‘सावित्रीनामा’ का मुख पृष्ठ

प्रो. हरी नरके अपने आलेख ज्ञान ज्योति सावित्रीबाई फुले में तत्कालीन प्राख्यात सामाजिक कार्यकर्ता नारायण महादेव उर्फ़ मामा परमानंद की टिप्पणी उद्धृत करते हैं–

“जोतीराव से भी अधिक प्रशंसा की पात्र उनकी पत्नी हैं। उनकी जितनी तारीफ़ की जाय, कम ही होगी। उनकी महानता के वर्णन के लिए हम कौन से शब्द चुनें। उन्होंने अपने पति को उनके हर काम में हर संभव सहयोग किया और दोनों ने मिलकर उन सभी मुसीबतों का सामना किया, जो उनकी राहों में आईं। उच्च जातियों की सुशिक्षित महिलाओं में भी इतनी त्यागी महिला का मिलना मुश्किल है। फुले दंपत्ति ने आजीवन आम लोगों की सेवा की।”[1]

इस उद्धरण में सावित्रीबाई फुले का समग्र व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है, जिसमें वे एक क्रांतिकारी और प्रगतिशील महिला के रूप में स्थापित होती हैं। प्रो. हरी नरके यह भी लिखते हैं कि फुले दंपत्ति ने न केवल महिलाओं के लिए देश में स्कूल और पुस्तकालय खोले, बल्कि उन्होंने शोषित गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं को सुरक्षा प्रदान करने और उनके बच्चों की देखभाल के लिए वर्ष 1863 में अपने घर में ‘शिशु हत्या निवारण गृह’ की स्थापना की। सत्यशोधक समाज का गठनकर उन्होंने ‘सत्यशोधक विवाह’ की परंपरा की शुरूआत की। इस विवाह में दहेज के लिए कोई स्थान न था और इसमें न्यूनतम व्यय होता था। अपने घर के कुएं को अछूतों के लिए खोलकर उन्होंने जातिप्रथा के विरोध में आंदोलन का आगाज किया। इस तरह जोतीराव और सावित्रीबाई ने बाल विवाह की ख़िलाफत तो की ही, उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह भी करवाया। फुले दंपत्ति स्वयं संतानहीन थे, लेकिन उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के लड़के को गोद लिया। उसे चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा दिलवाई और उसका अंतर्जातीय विवाह किया।

इसी भूमिका में वे लिखते हैं– “एक क्रांतिकारी परिवार को जिस तरह मुसीबतों का सामना करना पड़ा और एक बेसहारा का जीवन बिताना पड़ा, यह हृदयविदारक था। जोतीराव और सावित्रीबाई; जिन्होंने सैंकड़ों विधवाओं के जीवन में ख़ुशी का प्रकाश फैलाया था, की बहू को एक मंदिर की सीढ़ियों पर गुमनाम मौत नसीब हुई। अगर जोतीराव और सावित्रीबाई ने कठिन परिश्रम से अर्जित अपनी आय को समाज की सेवा में व्यय करने की बजाय, उसका निवेश किया होता तो उनकी बहू और नातिन को वंचना और वेदना का सामना नहीं करना पड़ता। जोतीराव की दुखद मृत्यु भी इसीलिए हुई, क्योंकि उनके पास अपना इलाज करवाने के लिए धन नहीं था। उन्होंने अपनी दौलत समाज पर लुटा दी थी। सावित्रीबाई और डाॅ. यशवंत प्लेग की महामारी के दौरान रोगियों की सेवा करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए। जोतीराव की बहू ने अतिशय निर्धनता में फुटपाथ पर अंतिम सांस ली और उनकी नातिन को ग़रीबी के कारण एक विधुर से विवाह करना पड़ा। इस त्रासदी के बारे में क्या कहा जा सकता है? इस त्याग का हम किन शब्दों में वर्णन करें?”[2]

इस पुस्तक का पहला भाग ‘काव्यफुले’ है, जो सावित्रीबाई की कविताओं का प्रथम संग्रह था। इसमें कुल 41 कविताएं हैं, जो प्रकृति, सामाजिक मुद्दों और इतिहास पर केंद्रित हैं। इसमें शिक्षाप्रद रचनाएं भी संगृहीत हैं। उनकी कविताओं को पढ़ने से लगता है कि वे प्रारंभ में हिंदू धर्म के विचारों से प्रभावित रहीं। यही कारण रहा कि उन्होंने शिव स्त्रोत और शिव प्रार्थना जैसी कविताओं को रचा। लेकिन बाद में उनकी सोच में परिवर्तन हुआ और धार्मिक पाखंड और शोषण के खिलाफ कविताएं लिखीं। इस क्रम में वह शिवाजी और उनकी मां जीजाबाई के बारे में भी कविता रचती हैं। इस लिहाज से देखें तो काव्यफुले को पढ़ते हुए हम सावित्रीबाई फुले के व्यक्तित्व के निर्माण से परिचित होते हैं।

इस पुस्तक के दूसरे भाग में सावित्रीबाई फुले द्वारा जोतीराव को भेजे गए पत्र हैं। इन पत्रों में जहां एक ओर दोनों का आपसी प्रेम झलकता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों और स्त्री के शोषण के खिलाफ संघर्ष करने की उनकी चाहत जबरदस्त रूप से सामने आती है। इनमें कई पत्र मर्मस्पर्शी हैं। एक पत्र में वह लिखती हैं कि किस तरह गांव में पञ्चांग देखने वाले एक ब्राह्मण युवक से एक महार युवती प्रेम कर बैठती है और उस दौरान गांववालों से उत्पीड़ित उन दोनों को सावित्रीबाई फुले ने अंग्रेजी सरकार का भय दिखाकर जोतीराव के पास भेज दिया। इस तरह के अनेक महत्वपूर्ण पत्रों का संग्रह इस भाग में है, जिनसे उनके महत्वपूर्ण सामाजिक सरोकारों के बारे में हमें पता लगता है।

इसके अगले भाग में सावित्रीबाई फुले के भाषणों का संकलन है। ये भाषण छोटे-छोटे होने के बावजूद सहज रूप से अत्यंत प्रभावशाली हैं। इसमें संकलित पहले ही भाषण ‘उद्योग’ में वे बताती हैं– “ये उद्योग असाधारण बुद्धि के कारण संभव हो पाए और इनके कारण मानवता का विकास हुआ। अज्ञान की परंपरागत ढंग से चली आ रही बेड़ियों से जकड़े हुए शूद्रातिशूद्रों को उद्यमी और परिश्रमी बनाने के लिए ये उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।”[3]

सावित्रीबाई फुले के भाषणों के इस खंड में ‘उद्योग’ के अलावा ‘विद्यादान’, ‘सदाचार’, ‘व्यसन’ और ‘कर्ज़’ आदि के विषय में उनके विचार संगृहीत हैं।

इस पुस्तक के अगले भाग में ‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’ संगृहीत हैं। इनमें सावित्रीबाई फुले की कुल बावन कविताएं हैं। ये कविताएं 1891 में जोतीराव फुले की मृत्यु (28 नवंबर, 1890) के बाद लिखी गई थीं और 1892 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई थीं। इन कविताओं में जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले के सामाजिक सरोकारों का विशद वर्णन हुआ है। इस पुस्तक के अंतिम अध्याय के रूप में सावित्रीबाई फुले द्वारा संपादित जोतीराव फुले के भाषण हैं। इन भाषणों को पढ़ने से यह पता लगता है कि जोतीराव का वैचारिक फलक अत्यंत ही विस्तृत था। इसमें ‘मानव की उत्पत्ति’, ‘इतिहास’ और ‘गुलामगिरी’ जैसे उनके महत्वपूर्ण भाषणों का संकलन है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन भाषणों में मानव की उत्पत्ति, इतिहास तथा पुराणों को आधुनिक दृष्टि से देखने की कोशिश की गई है। अपने भाषण ‘इतिहास’ में वे इतिहास और पौराणिक ग्रंथों में वर्णित मिथकों के अंतर को स्पष्ट करते हैं। चार्ल्स जोशी द्वारा लिप्यांतरित व 25 दिसंबर, 1856 को प्रकाशित जोतीराव फुले के ये भाषण आज भी पूर्णरूपेण प्रासंगिक हैं।

बहरहाल, सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म मराठी से हिंदी में अनुवाद होना एक क्रांतिकारी कदम है। सामाजिक सरोकार रखनेवाले सभी लोगों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

पुस्तक – सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म
रचयिता – सावित्रीबाई फुले
अनुवादक – उज्ज्वला म्हात्रे
प्रकाशक – फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
मूल्य – 220 रुपए

[1] (सावित्रीबाई फुले, सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, 2023, पृष्ठ xi)
[2] (वही, पृष्ठ xxix)
[3] वही, पृष्ठ 94

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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