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आंबेडकरवादी प्रशिक्षण शिविर के दौरान राजद नेताओं ने विचारा आंबेडकरवाद

डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि यदि बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर एवं अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा के विचारों को गौर से देखा जाए तो पता चलेगा कि उनके विचारों में भी आंबेडकरवाद और समाजवाद दोनों पूरी तरह शामिल हैं। पढ़ें, अरुण आनंद की खबर

गत 17-19 अप्रैल, 2023 को बिहार की राजधानी पटना में राज्य की सत्ता में साझेदार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया। यह बेहद खास मौके और बेहद खास थीम पर किया गया आयोजन था। बिहार सहित देश के किसी भी राज्य में यह पहला मौका था जब किसी राजनीतिक दल द्वारा डॉ. आंबेडकर की जयंती के अवसर पर आंबेडकरवादी विचारों को आत्मसात करने हेतु प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। राजद के मंत्रियों, विधायकों व कार्यकर्ताओं को आंबेडकरवादी विचारों के बारे में बताने की जिम्मेदारी वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त और बहुजन विचारक व दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने निभायी।

तेजस्वी ने समझाया आंबेडकरवादी विचारों का महत्व

इस मौके पर राजद के नेता व प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपने संबोधन में इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि “राजनीतिक दलों द्वारा प्रशिक्षण शिविर के कार्यक्रम पहले भी होते रहे हैं। लेकिन इसबार यह इस मायने में खास है कि यहां पार्टी के चुने हुए खास लोगों का आंबेडकरवादी विचारों के परिप्रेक्ष्य में प्रशिक्षण हो रहा है। यही लोग बिहार के सभी प्रखंड मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों में जाकर राजद कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि “समाजवादी राजनीति में इस तरह के प्रशिक्षण की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। हालांकि कुछ कारणों से बीच में गतिरोध आ गया था। अब फिर से राजद ने इस परंपरा से खुद को जोड़ा है।” 

तेजस्वी यादव ने आगे कहा कि देश में जो माहौल बनाया जा रहा है वह चिंताजनक है। आंबेडकवादियों और समाजवादियों पर लगातार प्रहार हो रहा है और क्षेत्रीय दलों को समाप्त करने का कुचक्र रचा जा रहा है। देश की साझी संस्कृति को नष्ट करने का कोई भी मौका भाजपा नहीं छोड़ रही है। वहीं राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा कि आज विघटनकारी शक्तियां देश को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने पर तुली हुई हैं। इससे हम तभी पार पाएंगे जब गांव-गांव में लोगों को जागरूक किया जाए। उन्होंने कहा कि गोडसे, सावरकर को आदर्श मानने वाले लोग कभी भी इस देश का भला नहीं कर सकते। इस देश का कल्याण होगा डॉ. आंबेडकर, डॉ. राममनोहर लोहिया, जेपी, कर्पूरी ठाकुर के पदचिह्नों पर चलकर। यह तभी संभव होगा जब हम उपर से नीचे तक लोगों को वैचारिक तौर पर प्रशिक्षित करें।

त्रिवेणी संघ से लेकर मौजूदा दौर तका हवाला दिया प्रो. लक्ष्मण यादव ने

दिल्ली से आये बहुजन विमर्शकार डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि “आज 2023 में जब मैं बिहार में मनुस्मृति बनाम संविधान के विषय में सोचता हूं तो मन में एक ही बात आती है कि समाजवादी और आंबेडकरवादी– दोनों धाराएं एक साथ मिलकर आगे बढ़ती हैं तो मनुस्मृति का हारना और भारत के संविधान का जीतना बिल्कुल तय है। ऐसे देखा जाए तो आंबेडकरवाद और समाजवाद में कोई खास अंतर नहीं है, क्योंकि आंबेडकरवाद की तरह समाजवाद के मूल में भी समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व है। दोनों विचारधाराएं हाशिए के समाज को लेकर चिंतित हैं।” 

डॉ. यादव ने डॉ. आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया के बीच हुए पत्राचार के संदर्भ का हवाला दिया और बतलाया कि अपने आखिरी समय में डॉ. लोहिया और डॉ. आंबेडकर साथ मिलकर कुछ बड़ा काम करना चाहते थे। लेकिन अफसोस की बात है कि दोनों की भेंट साकार न हो सकी। डॉ. आंबेडकर का परिनिर्वाण 6 दिसंबर, 1956 को हो गया। इस कारण बेशक दोनों नहीं मिल पाये, लेकिन आंबेडकरवादी और समाजवादी विचारधाराएं मजबूती से एक साथ आगे बढ़ीं। इस क्रम में मान्यवर कांशीराम का योगदान अहम है, जिन्होंने सामाजिक न्याय के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन किया।

डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि यदि बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद, जननायक कर्पूरी ठाकुर एवं अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा के विचारों को गौर से देखा जाए तो पता चलेगा कि उनके विचारों में भी आंबेडकरवाद और समाजवाद दोनों पूरी तरह शामिल हैं। इस एकजुटता में बिहार की भूमि पर इतिहास में एक और पहल हुई, जिसका नाम है– त्रिवेणी संघ। त्रिवेणी संघ में सिर्फ दलित या आदिवासी या अन्य पिछड़े समाज की बात नहीं, बल्कि पूरे नब्बे प्रतिशत समाज की बात थी। प्रो. लक्ष्मण यादव ने कहा कि ये नब्बे प्रतिशत लोग वही शोषित, वंचित एवं पिछड़े लोग हैं, जो हाशिए पर रखे गए हैं और पलटू राम उन्हें कमेरा जाति की संज्ञा देते थे। जबकि दस प्रतिशत आबादी वाले उन्हें लुटेरा जाति कहते हैं। उन्होंने कहा कि बंबई में मिल मजदूर एसोसिएशन के धरने में बाबासाहेब शामिल हुए और वहां वामपंथियों से वैचारिक मतभेद होने के बाद उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत में सिर्फ श्रम का ही विभाजन नहीं होता, बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन होता है। पूरा मेहनतकश आवाम शोषित-वंचित तबका है, जो कुल आबादी का नब्बे प्रतिशत है। देश के सभी संसाधनों और राजपाट में सबकी हिस्सेदारी है, इसलिए सभी की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।

डॉ. लक्ष्मण यादव ने आगे कहा कि 1946 से 1952 के बीच लखनऊ में पिछड़े समाज का सम्मेलन होता है, जिसमें शिवदयाल चौरसिया, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु एवं पेरियार ललई सिंह यादव आदि शामिल होते हैं। इसमें एक की अध्यक्षता डॉ. आंबेडकर करते हैं तो दूसरे की अध्यक्षता पेरियार रामासामी। बाबासाहेब ने 1927 में जब प्रतीकात्मक रूप से मनुस्मृति का दहन किया तब पेरियार ने मजबूती के साथ उनके निर्णय का साथ दिया। 

प्रशिक्षण शिविर के दौरान बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, डॉ. लक्ष्मण यादव, राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह, बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल व श्याम रजक

भारत की वर्तमान परिस्थितियों की चर्चा करते हुए डॉ. यादव ने कहा कि देश में संविधान के लिए सबसे ज्यादा खतरा मनुस्मृति और उसे मानने वालों से है। मनुस्मृति में महिलाओं और शूद्रों का अपमान किया गया है और एक जाति विशेष का महिमामंडन। जबकि संविधान सबको समान मानता है। आज जब हम कहते हैं कि संविधान खतरे में है और आरक्षण खतरे में है तो देश की बड़ी आबादी नहीं समझ पाती है कि संविधान और आरक्षण क्या है? 

विचारधारा के आधार पर ही जीती जा सकती है लड़ाई

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने दक्षिणपंथी ताकतों के उभार के कारणों पर रोशनी डाली तथा आंबेडकरवाद और लोहियावादी विचार को गांव-गांव तक प्रसारित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने माना कि विचारधारा के आधार पर ही कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की ताकतें आज बिखरी पड़ी हैं, उन्हें मजबूत करके ही देश को बचाया जा सकता है।

इस मौके पर बिहार के शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर, बिहार विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, पूर्व शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल, पूर्व मंत्री श्याम रजक, विधान पार्षद रामचंद्र पूर्वे, शिवानंद तिवारी सहित राजद के अनेक नेताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। 

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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