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आंखन-देखी : कटाई-मंड़ाई रोक दलित-बहुजनों ने मनाई डॉ. आंबेडकर की जयंती

दलित-बहुजन स्त्रियों और पुरुषों ने, जहां कहीं भी वे काम कर रहे थे, पहले ही ताकीद कर दिया था कि वे बाबा साहेब का जन्मदिन मनाएंगे, इसलिए काम पर नहीं आएंगे। यानि खेत-खलिहान में कटाई व मंड़ाई का काम बंद रहेगा। पढ़ें, सुशील मानव की रपट

गत 14 अप्रैल, 2023 को डॉ. आंबेडकर की 132वीं जयंती पूरे देश में मनाई गई। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल प्रयागराज के फूलपुर तहसील के कई गांवों यथा पाली, चकमाली, बिगहिया आदि में भी इस मौके पर दलित-बहुजनों में उत्साह देखा गया। लोगों ने  इस अवसर पर डीजे के साथ झांकी निकाली। वे इस दिन की तैयारी पहले से कर रहे थे। चूंकि अभी खेतों में फसल की कटाई व मंड़ाई का दौर चल रहा है, इसके बावजूद लोगों ने डॉ. आंबेडकर की जयंती मनाने के लिए एक दिन पहले ही अपना हंसिया-दरांती सब रख दिया गया था। दलित-बहुजन स्त्रियों और पुरुषों ने, जहां कहीं भी वे काम कर रहे थे, पहले ही ताकीद कर दिया था कि वे बाबा साहेब का जन्मदिन मनाएंगे, इसलिए काम पर नहीं आएंगे। यानि खेत-खलिहान में कटाई व मंड़ाई का काम बंद रहेगा। चूंकि अधिकांश दलित-बहुजन बस्तियों तक चौड़ी सड़क नहीं है, इसलिए बस्ती से लगे खेत-खलिहानों से डीजे लेकर निकले। ये सभी निकले तो अलग-अलग गांवों से, लेकिन बाबूगंज बाजार में आकर एक बड़े जुलूस का हिस्सा बन गए। 

पुरुषों के माथे पर नीला टीका और स्त्रियों के दोनों गालों पर नीला गुलाल आंबेडकरवाद के प्रति उनके विश्वास को प्रदर्शित कर रहा था। घोड़े पर बैठे किशोर लड़कों ने हाथों में नीला झंडा ले रखा था, जिसमें धम्म चक्र बना हुआ था और नीचे लिखा था– ‘जय भीम’। इस दृश्य का एक प्रतीकात्मक मायने यह था कि दलित-बहुजन अब ब्राह्मणवाद  और सामंतवाद की जकड़बंदियों से आज़ाद हो रहे हैं। 

हालांकि खेत-खलिहान में काम करने वाली स्वावलंबी दलित-बहुजन स्त्रियों को घूंघट में शोभायात्रा में शामिल होते देखना अखर गया। लगा जैसे वे अभी भी पितृसत्ता के जकड़बंदियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही हैं। बावजूद इसके बच्चों को टेट (कमर) और कंधों पर बिठाये शोभायात्रा में उनका शामिल होना सुकूनदायक रहा। छोटे-छोटे बच्चे डॉ. आंबेडकर का चित्र मुद्रित टी-शर्ट पहन हाथों में नीला झंडा थामे डीजे के पीछे-पीछे सड़क पर मार्च कर रहे थे। पुरुषों, स्त्रियों, नौजवानों से अलग उनकी अपनी टोली थी। उनका अपना रंग व अपना भावबोध दिखा। कुछ नौजवान लड़के डीजे के ऊपर चढ़कर तो कुछ कारों के ऊपर बैठकर नाच रहे थे। बुजुर्ग लोग लाठी टेकते कान दबाये जुलूस में सबसे पीछे चल रहे थे। वे कहते नजर आए कि डीजे कान फाड़े देत बा। 

एक बात और जो उल्लेखनीय रही, वह यह कि तमाम बैनरों पर दलितबहुजन नायकों की तस्वीर के बजाय भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीरें छाई रहीं। बसपा अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की तस्वीर एक भी बैनर में नज़र नहीं आई। 

प्रयागराज जिले के फूलपुर प्रखंड के बाबूगंज में बिल्कुल अलग ही नज़ारा देखने को मिला। करीब 40 डिग्री तापमान में और एकदम सीधी खड़ी दोपहरिया में यहां आसपास के गांवों से डीजे के साथ शोभायात्रा निकाला गया। ग्रामसभा पाली, दतईपूरा, फजिलापुर, चकमाली, बिगहिया, फतेहगंज, तारडीह, टटिहरा, आटा, नरई, पूरे भुलई, बीरकाजी, चिरौरा, कनौजा, मंशी खुर्द आदि गांवों से चौतरफा डीजे और झांकी लेकर गांववासी नाचते-गाते शोभायात्रा लेकर निकले और एक साथ 31 डीजे बाबूगंज (इलाहबाद से जौनपुर नेशनल हाईवे स्थित) पर इकट्ठा हुए। यहां पर सभी डीजे के बीच प्रतिस्पर्द्धा हुई, जिसमें जीतने वाले को 24 हजार रुपए का इनाम दिया गया। इसके बाद एक जनसभा आयोजित की गई, जिसे तमाम स्थानीय दलित-बहुजन नेताओं, छात्रसभा के नेताओं और समाजिक राजनीतिक लोगों ने संबोधित किया। कार्यक्रम में लोकगायक भी बुलाये गये थे। लेकिन सारा आकर्षण डीजे और जुलूस को लेकर दिखा। लोग-बाग डीजे के पीछे नाचते-नाचते इस कदर थककर चूर हो गये कि जनसभा और गायन कार्यक्रम का होना न होना सब एक बराबर हो गया। 

प्रयागराज के फूलपुर तहसील के बाबूबाजार इलाके में शोभयात्रा का दृश्य

डीजे पर ठीक ‘जय श्री राम’ की तर्ज पर ‘जय भीम’ जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा के नारे ऊंचे वॉल्यूम में गूंजते रहे। बीच-बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज़ में आंबेडकर दिवस का बधाई संदेश भी बजता रहा। फूलपुर तहसील में वकील राम कृपाल यादव आपत्ति दर्ज़ करते हुए कहते हैं कि ये नारे ग़लत हैं। इनसे समाज का सौहार्द्र और भाईचारे की भावना को नुकसान होगा। हालांकि शोर और हिंसा के अंतर्संबंध को उजागर करते हुए वे आगे कहते हैं कि यही डीजे वाले रामनवमी, दुर्गा विसर्जन, गणेश विसर्जन, कांवड़ यात्रा आदि में निकलने वाले जुलूस में भी शामिल होते हैं। ये लोग शादी-विवाह और अन्य कार्यक्रमों में भी अश्लील भोजपुरी गाने के साथ शामिल होते हैं तो इनका हिंसा, अश्लीलता और शोर का एक पैटर्न निर्धारित है। इन्हें लगता है कि ये उत्सव, मोहत्सव और आनंद के पर्याय हैं। 

राम कृपाल जी आगे कहते हैं कि फिर भी जिन्होंने पैसे देकर डीजे बुलाया है, उन्हें और जुलूस में शामिल बुजुर्ग लोगों को समझाना चाहिए कि ऐसी चीजें न बजाओ, जिससे समाज में शांति और भाईचारे का माहौल खराब हो। 

वहीं राजेंद्र कुमार पटेल आंबेडकर जन्मोत्सव मनाने के तरीके पर आपत्ति दर्ज़ करते हैं। वे कहते हैं कि “दशहरा के जुलूस और भीम जन्मोत्सव के जुलूस में क्या फर्क है रह गया है। केवल नारों का ही ना?” राजेंद्र आगे कहते हैं कि “इतना पैसा डीजे में फूंकने और दारू पीकर नाचने से क्या होगा? सब सिर्फ़ बाजार का खपत ही बढ़ाएंगे। अच्छा होता कि गांव स्तर पर कार्यक्रम किया जाता। बाबा साहेब पर केंद्रित गीत गाने वाले, बिरहा गाने वाले, नाटक-नौटंकी करने वाले गायकों कलाकारों को बुलाया जाता। बाबा साहेब पर कार्यक्रम होता तो सारे लोग गीत, बिरहा और नौटंकी के मार्फत बाबा साहेब के बारे में मन लगाकर सुनते। इसका उनके जीवन में असर भी होता। कम-से-कम छोटे बच्चे सुनते तो बाबा साहेब से प्रभावित होते। उनके मन में भी कुछ बनने कुछ करने का भाव पैदा होता। डीजे बजाकर नाचने से कौन-सा भाव पैदा होगा?” 

शोभायात्रा में घोड़े पर सवार एक किशोर

तमाम गांवों से नीला जनसैलाब देख एकबारगी लगता है कि आंबेडकरवादी चेतना का विस्फोट हो गया है। पर थोड़ा नज़दीक जाकर जातियों की शिनाख्त करने पर यह भ्रम बहुत जल्द ही टूट भी जाता है। बाबा साहेब के जन्म महोत्सव पर गैरजाटव दलितों ने भागीदारी नहीं की। जबकि दोस्ती-यारी में गैर दलित यानि सवर्ण और ओबीसी वर्ग जाति के लोगों ने भी छिटपुट ही सही, डॉ. आंबेडकर के जन्मोत्सव में भागीदारी निभाई।

अच्छी बात यह रही है कि तमाम गांवों के कार्यक्रमों को गैर-दलित ग्राम प्रधानों का साथ और आर्थिक सहयोग भी मिला। जहां नगर निकाय चुनाव होने हैं, वहां क़स्बों और शहरों में बाबा साहेब का जन्मोत्सव गैर-दलित उम्मीदवारों द्वारा भी मनाया गया। हालांकि उनके द्वारा बाबा साहेब के जन्मदिन मनाने के पीछे उनकी वोटबैंक की राजनीति भी निहित है। विशेषकर जाटव जाति के वोट उनके निशाने पर हैं। 

एक आयोजक जो कि शारदीय नवरात्र पर दुर्गा देवी की प्रतिमा बैठाते हैं और उसमें लगभग सभी जातियों के लोग चढ़ावा चढ़ाने आते हैं, उनसे हमने कहा कि जब आप देवी की मूर्ति स्थापित करते हैं तो सबको बुलाते हैं, फिर विसर्जन के समय सबके दरवाजे पर मूर्ति घुमाकर सबसे चंदा लेते हैं, तो बाबा साहेब के जन्मोत्सव पर सभी जातियों के लोगों को क्यों नहीं बुलाया। तो उन्होंने जवाब में दो टूक कहा कि “हमने किसी को आने से रोका तो नहीं है। बाबा साहेब सबके हैं सब आयें हम किसी को बुलाने क्यों जाएं।”  

वहीं मछलीशहर, जौनपुर, गोरखपुर शहर, गोरखपुर के देवीपुर, कटसिकारा, और गोरखपुर शहर में भी आंबेडकर जयंती मनायी गयी। इसके अलावा प्रयागराज के सहसों ब्लॉक के रामनगर और मेडुआ में, बहरिया ब्लॉक, सोरांव ब्लॉक, कोरांव ब्लॉक, बारा ब्लॉक, मऊआइमा, बहरिया, बहादुरपुर, प्रतापपुर, धनुपुर, जसरा, शंकरगढ़, करछना, कौंधियारा, उरुवा, भगवतपुर आदि के तमाम गांवों में भी इस मौके पर आयोजन किये गये।

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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