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एक था अतीक अहमद

यूपी पुलिस और मीडिया की मौजूदगी में जिस तरह से अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ को मारा गया, उसे देश-दुनिया ने अपनी आंखों से देखा। पसमांदा समाज में जन्मे अतीक अहमद की कहानी बता रहे हैं सुशील मानव

गत 14 अप्रैल, 2023 को देर रात अतीक-अशरफ हत्याकांड के बाद सिर्फ़ प्रयागराज जिले में ही नहीं, जिले के बाहर भी लोगों में भय का माहौल है। तीन दिनों के बाद 18 अप्रैल की सुबह से इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गयी है। हालात फिलहाल सामान्य हैं। फिलहाल कोई भी खुलकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है। दबी ज़ुबान लोग कह रहे हैं कि अतीक को इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसकी ज़रूरत खत्म हो गई थी। 

शिक्षक के पेशे से रिटायर एक बुजुर्ग कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में नगर निगम का चुनाव सिर पर है। देश का सबसे बड़ा सूबा होने के नाते यहां के नगर निगम चुनावों के नतीजों को मीडिया द्वारा 2024 लोकसभा की एक्जिट पोल की तरह पेश किया जाएगा। और एक साल पहले की घटना का सांप्रदायिक प्रभाव दो साल तक बरकरार रहता ही है। 2013 में हुए मुज़फ्फ़रनगर सांप्रदायिक दंगे का साफ असर 2014 लोकसभा और 2016 विधानसभा चुनाव में दिखा था। अतः अतीक-अशरफ हत्याकांड का असर 2024 लोकसभा में भी दिखेगा।

एक प्रबुद्धजन अतीक-अशरफ हत्याकांड को भाजपा में अगले नेतृत्व के लिए अंदरखाने की राजनीतिक संघर्ष से जोड़कर देखते हैं। वे कहते हैं कि “नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपनी दावेदारी से पहले एक मॉडल पेश किया था– गुजरात मॉडल। ठीक उसी समय शिवराज सिंह चौहान ने भी मध्य प्रदेश मॉडल पेश किया था, लेकिन वह ब्राडिंग और विज्ञापन में मोदी से पिछड़ गये थे। आगामी साल 2024 के लोकसभा के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी उत्तर प्रदेश का अपना मॉडल जनता के सामने पेश कर रहे हैं।” 

वे आगे कहते हैं कि “योगी ने जहां एक ओर भाजपा और केंद्र सरकार दोनों को जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के पुलवामा कांड पर बयान के प्रभाव से बचा लिया, वहीं दूसरी ओर वे भाजपा के नये खेवनहार बनते दिख रहे हैं।” उनके मुताबिक, “खुद नरेंद्र मोदी का भाजपा को दिया मंत्र है कि 75 साल की उम्र के नेताओं को सक्रिय राजनीति से निकालकर मार्गदर्शक मंडल में डाल देना चाहिए और खुद नरेंद्र मोदी अगले साल चुनाव के समय 74 साल के हो जाएंगे। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व के लिए मुख्य मुकाबला अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच होगा।” 

दूसरी ओर भाजपा समर्थक न सिर्फ़ दोनों की हत्या को सही बता रहे हैं, बल्कि ज़श्न भी मना रहे हैं। लोगों का कहना है कि अतीक अहमद माफिया था। उसने सैंकड़ों घरों को उजाड़ा, हजारों लोगों की ज़मीन-जायदाद छीन ली। जो वह दूसरों के साथ करता आया था, खुद उसी का शिकार हो गया।

क्या है पूरा घटनाक्रम

बीते 15 अप्रैल की रात 10:37 बजे पर पुलिस कस्टडी में प्रयागराज के कॉल्विन अस्पताल के गेट पर मीडियाकर्मियों और 21 पुलिसकर्मियों के सामने पूर्व सासंद-विधायक अतीक अहमद और पूर्व विधायक अशरफ़ को गोली मारकर हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अतीक को आठ और अशरफ की शरीर में छह गोली मारे जाने की पुष्टि हुई। पुलिस के मुताबिक, 20-25 वर्ष की आयुवर्ग के तीनों हत्यारों ने 18 राउंड गोली मारने के बाद ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते हुए मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को सरेंडर कर दिया। 

अतीक अहमद की तस्वीर

गौरतलब है कि अतीक-अशरफ की हत्या के समय एक इंस्पेक्टर, 7 दरोगा और 13 सिपाही और दीवान उनके साथ थे। अतीक और अशरफ को धूमनगंज थाने से लेकर पुलिस टीम रात 10 बजकर 19 मिनट पर निकली और क़रीब पंद्रह मिनट बाद टीम कॉल्विन अस्पताल के बाहर पहुंची। टीम का नेतृत्व धूमनगंज थाने के इंस्पेक्टर कर रहे थे जो उमेशपाल हत्याकंड के विवेचक हैं। 

अतीक अहमद की सामाजिक पृष्ठभूमि

पसमांदा समाज से आनेवाले अतीक अहमद के पिता का नाम फिरोज़ अहमद था। वह प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में तांगा चलाकर परिवार का गुज़र बसर किया करते थे। 10 अगस्त, 1962 को इलाहाबाद के चकिया में अतीक का जन्म हुआ था। उसके छोटे भाई अशरफ अहमद उर्फ खालिद अजीम और दो बहनें आयशा नूरी व एक अन्य हैं। अतीक अहमद दसवीं फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़कर जुर्म की दुनिया में चला गया। कुल मिलाकर वो सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक रूप से बेहद पिछड़े समाज से ताल्लुक रखता था। 

जुर्म की दुनिया में जाने वाले अधिकांश लोगों की समाजिक-आर्थिक बैकग्राउंड को देखें तो अधिकांश अपराधियों का बचपन बेहद ग़रीबी में बीता होता है। चूंकि उच्च शिक्षा जैसी चीजें जो अच्छी नौकरी दिलाकर आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकती हैं, वह भी उनसे कोसों दूर होती हैं। इसलिए वो तमाम बुनियादी ज़रूरत की चीजों को हासिल करने और जल्द अमीर बनने के लिए अपराध की दुनिया में चल देते हैं। 

अतीक अहमद ने 1996 में शाइस्ता परवीन से शादी की थी। दोनों के पांच बेटे हैं– मोहम्मद उमर, अली अहमद, असद, अहजाम और आबान। अतीक का सबसे बड़ा बेटा मोहम्मद उमर है। उमर इस वक्त लखनऊ जेल में बंद है। जब देवरिया जेल में अतीक बंद था तो एक कारोबारी को पीटा गया था। इस देवरिया कांड में मोहम्मद उमर का नाम आया था। पिछले साल अगस्त में उसने सीबीआई के सामने सरेंडर कर दिया था। इसके बाद से वह जेल में है।

उमर से छोटा यानी अतीक का दूसरे नंबर का बेटा अली अहमद है। अली इस वक्त प्रयागराज के नैनी सेंट्रल जेल में बंद है। अली पर एक बिल्डर से पांच करोड़ रुपए की रंगदारी मांगने का आरोप है। उस पर कातिलाना हमले का मामला भी चल रहा है। वहीं उसके तीसरे बेटे असद अहमद व उसके साथी गुलाम को यूपी पुलिस ने गत 13 अप्रैल, 2023 को एनकाउंटर में मार दिया। उमेश पाल हत्याकांड में वह भी मुख्य आरोपी था। उमेश पाल हत्याकांड के बाद अतीक के दो छोटे बेटे आबान और अहजाम बाल सुधारगृह में हैं। आबान और अहजाम सेंट जोसेफ कालेज में कक्षा नौवीं और बारहवीं में पढ़ते हैं।

बहरहाल, सिर्फ़ खौफ़ के बल पर कोई पांच बार विधायक और एक बार सांसद नहीं बन सकता। अतीक अहमद तीन बार तो निर्दलीय विधायक चुना गया। पसमांदा समाज के बीच वो किसी सुधारक से कम नहीं था। वह गरीब लोगों की मदद भी करता था। यही वजह रही कि अतीक-अशरऱफ के शव को कसारी-मसारी क्रब्रिस्तान में दफ़नाने के लिए ले जाते जाते समय हजारों की संख्या में लोग बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती के बावजूद शामिल होने पहुंचे। पहचान की समस्या न हो इसलिए बिना किसी के कहे लोग-बाग अपना-अपना आधारकार्ड लेकर पहुंचे थे। लेकिन जब आधारकार्ड दिखाने के बाद भी पुलिस ने उन्हें वहां नहीं जाने दिया तो गुस्साये लोगों ने जमकर नारेबाजी की और पुलिस पर अतीक-अशरफ की हत्या करवाने का आरोप लगाया। इसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग कर लोगों को वहां से भगाया। 

आपराधिक पृष्ठभूमि

अतीक के खौफ़ की बात करें तो साल 2012 में जब वह जेल में बंद था तब चुनाव लड़ने के लिए उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका डाली। उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई करने से एक के बाद एक कुल 10 जजों ने खुद को अलग कर लिया। वहीं ग्यारहवें जज ने फैसला उसके पक्ष में दिया और उसे जमानत दे दी। 

लोगों का मानना है कि अतीक  इतना बड़ा माफिया खुद नहीं बना, बल्कि उसे बनाया गया। जैसा कि हर बड़े अपराधी माफिया के केस में होता है। उस समय इलाहाबाद के पुराने शहर में चांद बाबा का खौफ हुआ करता था। चांद बाबा इलाहाबाद का बड़ा गुंडा माना जाता था। आम जनता, पुलिस और राजनेता हर कोई चांद बाबा से परेशान थे। अतीक अहमद ने इसका फायदा उठाया। पुलिस और नेताओं से सांठगांठ हो गई और कुछ ही सालों में वह चांद बाबा से भी बड़ा बदमाश बन गया। लोगों का कहना है कि पुलिस ने अतीक को शह दे रखा था।

साल 1989 में राजनीति में अतीक ने कदम रखा। इलाहाबाद शहर पश्चिमी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। यहां उसका सीधा मुकाबला चांद बाबा से था। चांद बाबा को हराकर अतीक चुनाव जीत गया। दोनों के बीच गैंगवार शुरू हो गया। इसके कुछ महीनों बाद ही बीच चौराहे पर दिनदहाड़े चांद बाबा की हत्या हो गई। उसके बाद चांद बाबा गैंग के कुछ गुर्गों को पुलिस ने और कुछ को अतीक ने इलाहाबाद से मुंबई तक खोज-खोजकर खत्म कर दिया। चांद बाबा मारा गया तो इलाहाबाद ही नहीं, पूरे पूर्वांचल में अपराध की दुनिया में अतीक अहमद का सिक्का चलने लगा। वह ज़मीन का कारोबार करता था। प्रयागराज से लेकर पूर्वांचल के प्रतापगढ़, जौनपुर, आजमगढ़, गोरखपुर और देवरिया तक उसका ज़मीन का कारोबार फैला था। 

अतीक अहमद के ख़िलाफ़ अलग-अलग कुल 101 संगीन मामले दर्ज़ थे, जिनमें हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण, रंगदारी जैसे केस हैं। उसके ऊपर 1989 में चांद बाबा की हत्या, 2002 में नस्सन की हत्या, 2004 में मुरली मनोहर जोशी के करीबी भाजपा नेता अशरफ की हत्या, 2005 में बसपा के विधायक रहे राजू पाल की हत्या का आरोप थे। जबकि उसके छोटे भाई अशरफ के खिलाफ 52 मामले दर्ज़ थे। 

राजनीतिक पृष्ठभूमि

इलाहाबाद पश्चिम सीट से वह 5 बार विधायक निर्वाचित हुआ। 1989 के बाद साल 1991 और 1993 में भी अतीक निर्दलीय चुनाव जीता। साल 1996 में सपा के टिकट पर विधायक बना। साल 1999 में अपना दल के टिकट पर प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा और हार गया। फिर 2002 में अपनी पुरानी इलाहाबाद पश्चिमी सीट से पांचवीं बार विधायक बना। साल 2004-2009 में वह फूलपुर संसदीय सीट से सपा सांसद था। 1999-2003 तक सोने लाल पटेल की पार्टी अपना दल का अध्यक्ष रहा।

साल 2012 का विधानसभा चुनाव भी अतीक ने लड़ा, लेकिन उसे राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने हरा दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उसने समाजवादी पार्टी के टिकट पर श्रावस्ती सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के दद्दन मिश्र से हार गया। दिसंबर 2016 में मुलायम सिंह ने 2017 विधानसभा चुनाव के लिए अतीक को कानपुर कैंट से टिकट दिया। 14 दिसंबर, 2016 को अतीक अपने समर्थकों के साथ इलाहाबाद के शियाट्स कॉलेज में एक निलंबित छात्र की पैरवी करने पहुंचा, जहां उसने कॉलेज के अधिकारियों को भी धमकाया। वीडियो वायरल हो गया। इसी बीच 22 दिसंबर को अतीक 500 गाड़ियों के काफिले के साथ कानपुर पहुंचा। उस वक्त अतीक का यह काफिला सुर्खियां बना था। इसी बीच समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष अखिलेश यादव बने और अतीक को पार्टी से बाहर निकाल दिया। शियाट्स कॉलेज मामले में हाईकोर्ट ने अतीक को गिरफ्तार करने के आदेश दे दिये और फरवरी 2017 में अतीक को गिरफ्तार कर लिया गया। हाईकोर्ट ने सारे मामलों में उसकी जमानत रद्द कर दी। इसके बाद से अतीक जेल में ही था।

साल 2017 में यूपी के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बने। फूलपुर सीट से सांसद रहे केशव प्रसाद मौर्य डिप्टी सीएम बनें। उन्हें फूलपुर की सीट छोड़नी पड़ी। सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई। जेल में बैठे अतीक अहमद ने निर्दलीय चुनाव का फॉर्म भर दिया। हालांकि फिर से उसे हार मिली। इसके बाद 2019 के आम चुनाव में जेल से ही वाराणसी सीट पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ा और उसकी जमानत ज़ब्त हो गई। इस तरह दिन-ब-दिन उसकी राजनीतिक साख गिरने के साथ ही अतीक का माफिया रूप हावी हो गया।

पूरे मामले को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश

भाजपा नेता, अधिवक्ता और राजू पाल मर्डर केस का गवाह उमेश पाल की 24 फरवरी, 2023 को हुई दिनदहाड़े हत्या के बाद सरकार इस मामले को सांप्रदायिक बनाने में लग गयी थी। योगी सरकार के तमाम मंत्री और भाजपा के विधायकों-सांसदों की ओर से इस मामले में लगातार सांप्रदायिक बयान और गाड़ी पलटने जैसे बयान दिए जा रहे थे। इस मामले में यूपी पुलिस ने विजय चौधरी को उसके घर से उठाकर एनकाउंटर कर दिया, इस मामले में धर्मांतरण का एंगल जोड़ दिया। पुलिस ने बताया कि विजय चौधरी अतीक का शूटर था और अतीक ने उसका धर्मांतरण करके नाम उस्मान रख दिया था। फिर जिस तरह से अतीक-अशरफ की हत्या के बाद हत्यारों द्वारा ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया गया, वह सांप्रदायिक राजनीति का क्लाइमेक्स था।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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