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दिल्ली : स्कूली शिक्षा से बेदख़ल किये जा रहे दलित-बहुजन छात्र

सवाल उठता है कि क्या जो बच्चे कक्षा 9वीं और कक्षा 11वीं फेल हो गये हैं, नई शिक्षा नीति उन्हें ‘स्कूल छोड़ा हुआ’ मानती है और ओपेन स्कूलिंग सिस्टम में जाने के लिए स्कूल प्रशासन इन बच्चों को बाध्य कर रहे हैं? बता रहे हैं सुशील मानव

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक-सत्र 2022-23 में कक्षा 9वीं और कक्षा 11वीं में कुल 4 लाख बच्चों ने नामांकन करवाया था। उनमें से डेढ़ लाख बच्चे अनुत्तीर्ण हो गये हैं। अब तमाम स्कूलों के प्रशासन और प्रबंधन द्वारा अनुत्तीर्ण बच्चों से कहा जा रहा है कि उन्हें अब वहां दोबारा दाखिला नहीं मिलेगा। इसलिए वो अपनी ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) लेकर ओपेन स्कूलों में जाएं।

 

वहीं भारत सरकार की नई शिक्षा नीति-2020 कहती है कि सतत् विकास लक्ष्य के तहत शिक्षा में सभी तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए स्कूल छोड़ चुके बच्चों को ओपेन स्कूलिंग सिस्टम के माध्यम से मुख्यधारा में वापस लाएंगे। सवाल उठता है कि क्या जो बच्चे कक्षा 9वीं और कक्षा 11वीं फेल हो गये हैं, नई शिक्षा नीति उन्हें ‘स्कूल छोड़ा हुआ’ मानती है, और ओपेन स्कूलिंग सिस्टम में जाने के लिए स्कूल प्रशासन इन बच्चों को बाध्य कर रहे हैं?

लंबे समय से दिल्ली के सरकारी स्कूलों से जुड़े मामलों पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि सरकारी स्कूल बच्चों को दुबारा दाखिले के लिए मना नहीं कर सकते। हर एक बच्चा जो कक्षा 9वीं या 11वीं में फेल हुआ है, उसका क़ानूनी अधिकार है कि वह उसी स्कूल में फिर से दाख़िला ले। वे आगे कहते हैं कि अगर इन बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर ओपेन स्कूल में डाल दिया जाएगा तो इनकी ज़िन्दग़ी खराब हो जाएगी। 

यहां दो सवाल महत्वपूर्ण हैं। सरकारी स्कूलों में किस जाति वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं? अधिकांश फेल होने वाले बच्चे किस जाति वर्ग और पृष्ठभूमि के होते हैं? इन सवालों पर विचार करने से पहले कुछ और तथ्यों पर नज़र डाल लेते हैं। 

किन्हें धकेला जा रहा ओपेन स्कूलिंग सिस्टम में?

इसी तरह नई शिक्षा नीति और नेशनल करीकुलम फ्रेमवर्क के तहत राजधानी दिल्ली में छठवी, सातवीं, आठवीं कक्षा में जिन बच्चों को वो कमज़ोर मानते हैं, उनका सिलेबस अलग है। उनका इम्तेहान अलग लेते हैं और उन्हें ओपेन स्कूल में डाल देते हैं। यह सीधे-सीधे शिक्षा के अधिकार क़ानून का उल्लंघन है और दिल्ली हाईकोर्ट में इसके ख़िलाफ़ केस चल रहा है। 

दिल्ली में 9वीं और 11वीं के डेढ़ लाख बच्चे अनुत्तीर्ण

दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षा विभाग में प्रोफ़ेसर और शिक्षाविद् अनीता रामपाल इसके लिए नई शिक्षा नीति और नेशनल करीकुलम फ्रेमवर्क पर सवाल खड़े करती हैं। उनके मुताबिक, जैसा कि नई शिक्षा नीति कहती है कि बच्चों के लिए बहु-विकल्प होंगे। तो यह शिक्षा के अधिकार कानून के खिलाफ़ है, क्योंकि वह ओपेन स्कूल की बात कर रहे हैं और चला भी रहे हैं। अब कक्षा 3, कक्षा 5, कक्षा 8 की परीक्षा लेकर सबको धकेला जा रहा है ओपेन स्कूल में जाने के लिए। इसके लिए पाठ्यक्रम तैयार किये गए हैं। 

फेल होने पर स्कूल ही छोड़ देते हैं

‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009’ जब पारित हुआ तो शिक्षा मंत्रालय ने एक सरकारी नोट में बच्चों को फेल न करने के सेक्शन 16 के पक्ष में यह तर्क दिया– “परीक्षाओं का इस्तेमाल अक्सर उन बच्चों को फेल करके स्कूल से हटाने के लिए किया जाता है, जिनके नंबर कम आते हैं। फेल करके बच्चों को क्लास में रोकने से वो हताश और निरुत्साहित हो जाते हैं। दोबारा उसी कक्षा में रोकने से बच्चे को किसी भी तरह की ऊर्जा या नये संसाधन नहीं मिलते हैं, जिससे वह उसी पाठ्यक्रम को फिर एक साल के लिए दोबारा कर पायें। फेल होना बच्चे की कमी नहीं, ज्यादातर सीखने के माहौल की दुर्दशा दर्शाता है। यह तंत्र का फेल होना है। ज़रूरत है कि तंत्र ही हालत सुधारी जाए, न कि बच्चों को दंड देकर रोक लिया जाये। कोई भी शोध यह नहीं दिखाता कि फेल करने से बच्चे की सीखने की क्षमता बेहतर होती है। बल्कि वे स्कूल ही छोड़ देते हैं।”  

वहीं साल 2019 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार क़ानून 2009 के अनुच्छेद-16 (नो-डिटेंशन पॉलिसी) को खत्म कर दिया। इसके तहत नियम था कि कक्षा 8 तक के छात्रों को फेल नहीं किया जा सकता है। जबकि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र (एनसीईआरटी) ने केंद्र सरकार की संसदीय समिति को साल 2016 में सलाह दिया था कि बच्चों को फेल न करने की नीति को खत्म न किया जाये।   

शिक्षाविद् अनीता रामपाल इस मसले पर कहती हैं कि जिस तरह दिल्ली में कक्षा आठवीं तक के छात्र/छात्राओं का ‘लेवल टू’ के नाम पर अलग से परीक्षा लिया जा रहा है, वह एक तरह से उनकी छंटनी करने-जैसा ही है। यह उन्हें स्कूल से निकालने की नीति है। 

स्कूलों को किया जा रहा खत्म

‘नई शिक्षा नीति’ के तहत सबको सतत् विकास लक्ष्य कह कर सरकार ने सबको एक साथ मिला दिया है। चाहे वे अनुसूचित जाति के बच्चे हों, अनुसूचित जनजाति के बच्चे हों, या फिर धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चे हों, सभी के लिए पहले अलग-अलग व्यवस्था थी। लेकिन सरकार ने सबको मिला दिया है। इतना ही नहीं, स्कूल क्लस्टर्स के नाम पर विलय कर हजारों स्कूल खत्म कर दिये गये। 

निजी शिक्षा व्यवस्था वाली मौजूदा बाज़ारवादी व्यवस्था में प्राइवेट स्कूलों का मकड़जाल-सा बिछा हुआ है। लेकिन ये प्राइवेट स्कूल शिक्षा को बहुत ऊंचे दाम में बेचते हैं, जिसे ख़रीदने की औकात ग़रीब-गुरबे समाज के पास नहीं है।  ऐसे में ग़रीब दिहाड़ी मज़दूर, बेरोज़गार दलित-बहुजन समाज के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही एक मात्र शिक्षा हासिल करने का विकल्प है। अमूमन देश के तमाम राज्यों के सरकारी स्कूलों में इन्हीं जाति वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन अब वहां से भी इन्हें बेदख़ल करने की योजना पर काम चालू है। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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