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यात्रा संस्मरण : कबीरा तेरे मगहर में अब भी भांति-भांति के लोग

इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज मगहर में आधुनिकता का प्रवेश जरूर हो रहा है, लेकिन अभी भी इसकी मूल संस्कृति बची हुई है। एक बड़ी रोचक बात इस मेले के साथ जुड़ी है कबीर के मकबरे और समाधि पर खिचड़ी चढ़ाने की प्रथा। इसमें दूर-दूर से न केवल कबीरपंथी, बल्कि हिंदू-मुस्लिम के बीच का फर्क भी मिट जाता है। बता रहे हैं स्वदेश सिन्हा

बुद्ध, कबीर और गोरखनाथ हमेशा से मेरे लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इसकी वजह भी है। मेरे शहर गोरखपुर के निकट ही कबीर और बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली है। साथ ही इसी शहर में ही गोरखनाथपीठ भी है, जिसके बारे में यह‌ कहा जाता है कि गोरखनाथ ने यहां लंबे समय तक तपस्या की थी। इसके अतिरिक्त गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी, जो नेपाल में है तथा उनकी क्रीड़ा स्थली इसी गोरखपुर के निकट सिद्धार्थनगर जिले में है। 

युवा होने पर मैं लगातार इन स्थलों का भ्रमण करता रहा। यहां तक कि नब्बे के दशक में कपिलवस्तु के ध्वस्त स्तूप के निकट मैंने श्रीलंका के एक बौद्ध भिक्षु से बौद्ध धम्म की दीक्षा भी ग्रहण कर ली थी तथा बाकायदा एक बौद्ध भिक्षु बनकर श्रीलंका जाने की तैयारी करने लगा। लेकिन जल्दी ही यह समझ में आ गया कि बौद्ध धर्म सहित सभी धर्मों की ऐतिहासिक प्रगतिशील भूमिका समाप्त हो गई है। अब केवल कर्मकांड बचे हैं तथा धर्म आज की प्रतिक्रियावादी राजनीति के हाथ के खिलौने बन गए हैं। वे अपने राजनीतिक हितों के लिए इनका उपयोग करते रहते हैं। बाद के दौर में वामपंथी राजनीति में सक्रिय होने तथा पूरी तरह से नास्तिक हो जाने के बावजूद मेरा आकर्षण बुद्ध, कबीर और गोरखनाथ से घटा नहीं, बल्कि बढ़ा ही। 

इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इन तीनों ने अपने-अपने समय में बाह्मणवाद को जबरदस्त चुनौती दी थी और इनके अधिकतर अनुयायी दलित, पिछड़े और जनजाति समाज के ही थे। कबीर के तो अधिकांश अनुयायी पसमांदा मुसलमान थे। गोरखपुर के बिलकुल निकट कबीर की निर्वाण स्थली मगहर है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि कबीर जीवन भर काशी में रहे, लेकिन अपनी मृत्यु के समय मगहर आ गए। 

उस समय ऐसी मान्यता थी कि काशी में अपना देह त्यागने वाला स्वर्ग जाता है और मगहर में नर्क। ऐसा कहा जाता है कि इसी धारणा को तोड़ने के लिए कबीर मगहर आ गए। इस संबंध में उनका एक प्रचलित दोहा भी है–

क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा।

जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा॥

उनका यह विद्रोही स्वर जो रूढ़ियों और कुरीतियों के ख़िलाफ़ एक शंखनाद जैसा था, मुझे आज भी आकर्षित करता है। कबीर के बारे में एक और किंवदंती है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्य, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों थे, उनका अंतिम संस्कार अपने-अपने धर्म के हिसाब से करने के लिए आपस में लड़ने लगे। इसमें बहुत समय व्यतीत हो गया। बाद में चादर हटाने पर उनके शव की जगह कुछ फूल मिले, जिसे दोनों समूहों ने आपस में बांटकर अपने-अपने धर्म के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया। 

मगहर में कबीर की समाधि और मकबरा

आज भी मगहर में कबीर का मकबरा और उनका समाधि स्थल एकदम अगल-बगल है। महापुरुषों के बारे में आमतौर से हमारे लोकजीवन में इस तरह की किस्से-कहानियां प्रचलित हैं। हालांकि आमतौर से सच्चाई कुछ और ही होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर की एक जबरदस्त मूर्तिभंजक छवि थी। यहां तक कि आधुनिक असहिष्णु समाज में संभव है कि अगर कबीर होते तो उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगा दिया जाता और उन्हें जेल में डाल दिया जाता। 

पिछले दिनों गोरखपुर यात्रा के दौरान जब मैं मगहर गया, तो मुझे कबीर को एक और नई दृष्टि से देखने और समझने का अवसर मिला। पहले मगहर में आमी नदी के निकट कबीर की निर्वाण स्थली पर बहुत पुराना उनका मकबरा और समाधि थी। नदी के किनारे खेतों के बीच बने ये स्थल प्राकृतिक, आकर्षक एवं सुकून प्रदान करने वाले थे, लेकिन अब संपूर्ण परिदृश्य बदल गया है। केंद्र और राज्य सरकार इसे एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है। करीब-करीब 80-90 करोड़ की परियोजनाएं यहां विकसित की गई हैं। इसके तहत उनका समाधि स्थल और मकबरा बहुत ही भव्य बनाया गया है। एक बहुत विशाल सभागार, पुस्तकालय, कबीर शोध संस्थान और संग्रहालय का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त शोधार्थियों के पठन-पाठन एवं आवास के लिए एक हाॅस्टल और गेस्ट हाउस भी बनाया गया है। 

यहां पर कबीर के जीवन और रचनाओं से संबंधित दृश्य व श्रवणीय कार्यक्रम (लाइट एंड साउंड शो) की भी शुरुआत होने वाली है। चारों ओर भव्यता ज़रूर बिखरी है, लेकिन लगता है कि जैसे कबीर की वह विद्रोही छवि भ्व्यता में कहीं गुम हो गई है, जिसमें वे कहते हैं–

कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।

जो घर फूँके आपनौ, चले हमारे साथ।

इसी छवि के आकर्षण में मैं युवावस्था में अकसर मगहर जाता था और आमी नदी के तट पर उसका अहसास भी करता था। भले ही मगहर में सब कुछ बदल गया है, लेकिन कुछ चीजें अभी अपने मूल रूप में हैं, जैसे मकर संक्रान्ति के अवसर पर सदियों से लगने वाला कबीर मेला, जो एक माह तक चलता है। इसके बारे में मैंने एक वृद्ध व्यक्ति से पूछा कि, “यह मेला कबसे लग रहा है?” उन्होंने बताया कि, “जब से मैंने होश संभाला, तब से हर साल इसे देख रहा हूं।” हालांकि इसी मेले में मगहर महोत्सव के नाम से एक सरकारी आयोजन भी होता है, जो स्थानीय सांसद, स्थानीय विधायक तथा सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति के बावजूद जनजीवन से कभी नहीं जुड़ पाया। 

कबीर मेला वास्तव में एक ग्रामीण मेला है, जिसमें ग्रामीण संस्कृति है। गांव के बाज़ार की झलक है। इसमें लोकसंगीत, नृत्य, गायन और बाज़ीगरी आदि शामिल हैं। देश भर से आए कबीरपंथी गायकों द्वारा गाए कबीर के भजन और सबद मेले में गूंजते रहते हैं। रात में तो यह दृश्य और अधिक मनमोहक दिखता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज इसमें आधुनिकता का प्रवेश जरूर हो रहा है, लेकिन अभी भी इसकी मूल संस्कृति बची हुई है। एक बड़ी रोचक बात इस मेले के साथ जुड़ी है कबीर के मकबरे और समाधि पर खिचड़ी चढ़ाने की प्रथा। इसमें दूर-दूर से न केवल कबीरपंथी, बल्कि हिंदू-मुस्लिम के बीच का फर्क भी मिट जाता है। 

मकर संक्रांति से लेकर एक माह तक यहां पर लोग खिचड़ी चढ़ाने आते हैं, लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में भी एक माह का मेला लगता है तथा वहां भी खिचड़ी चढ़ाई जाती है। 

मैंने मगहर में यह जानने की कोशिश की कि क्या गोरखपंथ और कबीरपंथ में आपस में कोई गहरा संबंध है? इस विषय पर लोगों की अलग-अलग राय है। कुछ लोगों का यह मानना है कि संभव है कि बहुत से लोग जो गोरखनाथ में खिचड़ी नहीं चढ़ा पाते थे, वे यहां पर खिचड़ी चढ़ा देते हों। बाद में यह एक प्रथा के रूप में प्रचलित हो गई। लेकिन यहीं के वरिष्ठ कबीरपंथी परिचयदास कहते हैं कि कबीरपंथ में लोगों को भोजन कराने या लंगर की प्रथा बहुत पुरानी है। लोगों को भोजन कराना बहुत बड़ा पुण्य माना जाता रहा है। कबीर मेले में प्रतिदिन हज़ारों लोगों को भोजन कराया जाता है। यही कारण है कि यहां पर खिचड़ी का दान किया जाता है। सिक्ख धर्म पर कबीरपंथ का काफी प्रभाव है। गुरुग्रंथ साहिब में भी ढेरों कबीर के पद संकलित हैं। गोरखपंथ और कबीरपंथ दोनों ही जातिवादी वर्णव्यवस्था के विद्रोही थे। दोनों में ही बड़े पैमाने पर दलित, पिछड़े तथा जनजाति समाज के लोग, जिसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों थे, जुड़े थे। मुझे याद आता है कि बचपन में गोरखनाथ में मकर संक्रांति के मेले में ढेरों गोरखपंथी फ़कीर दिखते थे, जिसमें अधिकांश मुस्लिम होते थे। वे सारंगी (वायलिन सरीखा एक वाद्य यंत्र) बजाते हुए गोरखवाणी के साथ-साथ कबीर के सबद भी गाते थे। जबसे गोरखपुर में गोरखनाथ पीठ हिंदू धर्म के सांप्रदायिक तत्वों के हाथ में चला गया है, तबसे ये फ़कीर अब नहीं दिखते हैं।

कबीरपंथ का प्रभाव आज भी राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में हैं। ज्यादातर घुमंतू जनजातियां कबीरपंथी हैं। मगहर में कबीर मेले में ऐसे ढेरों कबीरपंथी मिले, जो देश के सुदूर इलाकों से यहां पर आए थे। विशेष रूप से गुजरात के कच्छ इलाके से। ऐसा भी माना जाता है कि केंद्र की मोदी सरकार ने गुजरात के कबीरपंथियों से चुनाव में लाभ लेने के लिए मगहर का विकास किया। 

खैर इस कबीर मेले की मुझे सबसे बड़ी बात यह लगती है कि इसमें धार्मिकता का पुट बहुत ही कम है। कोई भी विद्रोही कवि या लेखक किसी तरह आम जनजीवन या लोकजीवन में रच-बस जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुझे यह मेला लगता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के अत्यंत पिछड़े ग्रामीण इलाकों में भी गरीब अनपढ़ किसान कबीरदास के एक दो पद या चौपाई ज़रूर गाता है। यह बात मुझे इन इलाकों घूमते हुए निरंतर महसूस होती है। यही कारण है कि कबीर मेला मुझे बहुत अनोखा लगता है और शायद भारत में इस तरह का अकेला।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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