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मीरा और रैदास का पुनर्पाठ : कौन थे गिरधर नागर?

मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि महलों को त्यागकर सड़कों पर आना लोकलाज त्यागना नहीं था। प्रत्युत, मीरा का विधवा होकर परपुरुष की ओर आकर्षित होना, उससे प्रेम करना और पुनर्विवाह की कामना करना लोकलाज का त्याग था। पढ़ें, कंवल भारती का यह विचारोत्तेजक आलेख

क्या रैदास साहेब मीरा के गुरु थे? यह वैसा ही प्रश्न है, जैसा यह कि क्या रामानंद कबीर और रैदास साहेब के गुरु थे। जिस निर्गुणवाद के आधार पर रामानंद को कबीर और रैदास साहेब का गुरु स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि रामानंद सगुणवादी थे, और वेद, परलोक तथा वर्णाश्रम में विश्वास करते थे, उसी आधार पर रैदास साहेब को भी मीराबाई का गुरु स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि मीराबाई को भी सगुणोपासक माना जाता है, और कृष्ण की मूर्ति के साथ चित्रित किया जाता है। लेकिन मीरा और रैदास के प्रश्न पर क्या सिर्फ इसी आधार पर विचार किया जा सकता है? मीरा के व्यक्तित्व और इतिहास की कुछ और परतें भी हैं, जिन्हें देखे जाने की जरूरत है। इस विषय पर ब्राह्मण आलोचकों ने जो खिचड़ी पकाई है, अभी तक मीरा और रैदास का अवलोकन उसी दृष्टि से किया जाता रहा है, जो एकपक्षीय है। दलित आलोचना में मीरा और रैदास के पुनर्पाठ का कार्य अभी नहीं हुआ है। इसलिए पुनर्पाठ की दिशा में मेरा यह विश्लेषण निश्चित ही पहला प्रयास है।

मैंने लोगों का मत जानने के लिए कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी थी– “अगर मीराबाई कृष्णभक्त थीं, तो रैदास साहेब उनके गुरु नहीं हो सकते। और अगर रैदास साहेब मीराबाई के गुरु थे, तो मीराबाई कृष्णभक्त नहीं हो सकतीं। दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकतीं।” इस पर गोपेश्वर सिंह ने लिखा, “रैदास और मीरा के समय में अंतर है। कालक्रमानुसार मीरा का रैदास की शिष्या होना संभव नहीं। मीरा किसी रैदासी परंपरा के संपर्क में आयी थीं। संभव है कि इसी कारण शिष्या वाली किंवदंती चल निकली हो। मीरा के अध्येताओं ने इस पर पर्याप्त रोशनी डाली है। वैसे मीरा पदावली में योगी को संबोधित पद भी मिलते हैं। इससे अनुमान लगाया गया कि शायद वे किसी योगी के संपर्क में भी आयी हों। वैसे वे रैदास की शिष्या नहीं थीं।” इसके बाद उन्होंने एक और टिप्पणी की– “रैदास और कबीर समकालीन हैं। यह इब्राहिम लोदी का समय है। मीरा अकबर की समकालीन मानी जाती हैं। राणाप्रताप की ताई थीं। मीरा का रैदास की शिष्या होना संभव नहीं। वे पंथनिरपेक्ष कृष्णभक्त कही जाती हैं।”

कुछ इतिहासकारों के अनुसार कबीर और रैदास इब्राहिम लोदी के समकालीन नहीं थे, बल्कि बहलूल खान लोदी के समकालीन थे, तो कुछ इतिहासकार उनका समय सिकंदर लोदी का मानते हैं। बहलूल लोदी का काल 1450 ई. से 1489 ई. तक है। इसके बाद सिकंदर लोदी सुल्तान हुआ, जिसने 1489 ई. से 1517 ई. तक राज किया। यही वह शासक है, जो कबीर (और रैदास) के संपर्क में आया था। इब्राहिम लोदी, इसी सिकंदर का पुत्र था, जिसका शासन-काल 1526 ई. तक रहा। दलित विद्वानों ने, (क्योंकि ब्राह्मण विद्वान अपने एजेंडे के साथ दलित नायकों का काल-निर्धारण करते हैं), रैदास साहेब का जन्म संवत 1455 (सन् 1398) और निधन संवत 1575 (सन् 1518) निश्चित किया है।[1] मीरा के आलोचकों ने, जिनमें अधिकांश ब्राह्मण हैं, मीरा की पैदाइश संवत 1555 (सन् 1498) और मृत्यु संवत 1603 (सन् 1546) स्वीकार की है।[2]

इस काल-गणना के अनुसार मीरा रैदास को अपना गुरु बना सकती थीं। फिर भी इस पर विचार करने से पूर्व यह जान लिया जाए कि मीरा के ब्राह्मण आलोचकों का क्या मत है? मीरा के अधिकांश आलोचक पंडित परशुराम चतुर्वेदी के इस मत से सहमत हैं–

“मीरा के गुरु कौन थे? इस प्रसंग में रैदास, तुलसीदास, विट्ठलनाथ और जीव गोस्वामी के नाम लिये जाते हैं। इनमें रैदास का नाम अधिकांश विद्वानों द्वारा समर्थित है। मीरा के अनेक पदों में रैदास का उल्लेख मिलता है। यथा, ‘गुरु मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।’ लेकिन यह रैदास संत कवि नहीं थे, वरन रैदास संप्रदाय के कोई अन्य व्यक्ति थे; क्योंकि स्थान और काल की दृष्टि से मीरा रैदास की शिष्या नहीं हो सकतीं। रैदास का समय संवत 1455 से 1575 के आसपास माना गया है। रैदास की मृत्यु के समय मीरा की अवस्था अधिक से अधिक 18 वर्ष की हो सकती है और उस समय तक कुंवर भोजराज भी जीवित थे। अत: संवत 1575 के पहले तक मीरा का काशी के चौक में संत रैदास को गुरु रूप में प्राप्त करना असंभव ही है।”[3]

पंडित परशुराम चतुर्वेदी का मत बचकाना और हास्यास्पद है। उन्होंने यह नहीं बताया कि रैदास संप्रदाय से उनका अभिप्राय क्या है? अगर कोई रैदास संप्रदाय रहा भी होगा, तो वह चमारों का ही रहा होगा। लेकिन इतिहास में ऐसे किसी संप्रदाय का पता नहीं चलता। अलबत्ता पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में रैदास को भी चमार-उपजाति के रूप में माना जाता है। अगर मीरा के गुरु रैदास संत नहीं थे, बल्कि रैदास संप्रदाय का ही कोई अन्य व्यक्ति था, तब अवश्य ही वह अन्य व्यक्ति भी संत रैदास की भांति ही विद्वान और लोकप्रिय रहा होगा। अन्यथा, किसी साधारण व्यक्ति को मीरा अपना गुरु कैसे बना सकती थीं? पंडित चतुर्वेदी को मीरा के गुरु के रूप में रैदास संप्रदाय का कोई भी साधारण व्यक्ति स्वीकार था, पर लोकप्रिय संत रैदास स्वीकार नहीं थे। यह अजीब रैदास-विरोधी ग्रंथी है।

चतुर्वेदी का दूसरा मत हिंदू इतिहास के ही विरुद्ध है। हिंदू समाज में, खास तौर से ब्राह्मणों और राजपूतों में कन्या की विवाह-योग्य आयु आठ वर्ष थी। ब्रिटिश भारत की संसद में जब इस आयु को बढ़ाकर 14 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया, तो देश भर के ब्राह्मणों ने उसकी निंदा की थी, जिसमें हिंदू-आदर्श माने जाने वाले राष्ट्रवादी नेता पंडित मदनमोहन मालवीय भी शामिल थे।[4] अत: जब 8 वर्ष की आयु लड़की की विवाह के लिए अपरिपक्व नहीं मानी जा सकती थी, तो गुरु बनाने में 18 वर्ष की आयु अपरिपक्व कैसे हो सकती थी? लेकिन चूंकि गुरु का मामला संत रैदास से जुड़ा है, जो चमार जाति से थे, इसलिए एक राजपूत स्त्री का चमार संत को गुरु स्वीकार करना ब्राह्मण आलोचकों के गले नहीं उतरता।

मीराबाई पर आधारित एक पेंटिंग

एक अन्य स्थान पर चतुर्वेदी जी मीरा की वैराग्य में निष्ठा की तुलना भी संत रैदास के साथ करना अनुचित बताते हैं, पर, वह साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि “रैदास जी की ‘परम वैराग्य’ वाली भावना से भी मीराबाई के ‘सहज वैराग्य’ की बहुत बड़ी समानता है।”[5]

लेकिन बात केवल संत रैदास के भावों से समानता की नहीं है, बल्कि यह है कि क्या रैदास मीराबाई के गुरु थे? इसका उत्तर हिंदी के लगभग सभी ब्राह्मण विद्वान काल-गणना करके ‘न’ में देते हैं। लेकिन उनकी काल-गणना गलत है। ऊपर में यह उद्धृत कर चुका हूं कि रैदास की मृत्य सन् 1518 में हुई थी, और उस समय मीरा की आयु बीस वर्ष की थी, क्योंकि मीरा की मृत्यु का सन् 1546 और जन्म का सन् 1498 परशुराम चतुर्वेदी ने स्वयं माना है। तब बीस वर्ष की अवस्था में मीरा का रैदास के संपर्क में आना और उनके साथ सत्संग करना कैसे असंभव हो सकता है?

परशुराम चतुर्वेदी ने मीरा के गुरु के रूप में तुलसीदास, विट्ठलनाथ और जीवगोस्वामी के नामों का भी उल्लेख किया है। लेकिन अधिकांश विद्वानों ने, और स्वयं परशुराम चतुर्वेदी ने भी काल-गणना और अन्य घटनाक्रम के आधार पर काफी हद तक इन तीनों नामों के साथ असहमति दिखाई है।[6] पर, कुछ ने जीवगोस्वामी के साथ मीरा की भेंट को सही भी माना है। क्या जीवगोस्वामी मीरा के गुरु हो सकते हैं? इसे हम ब्राह्मण-धर्म के निकष पर परखने का प्रयास करेंगे। यह उल्लेखनीय है कि तुलसीदास, विट्ठलनाथ और जीवगोस्वामी तीनों ब्राह्मण थे। यह भी उल्लेखनीय है कि सगुण संतों को छोड़कर, जिन निर्गुण संतों को ब्राह्मणों ने संत के रूप में न के बराबर सम्मान दिया, और यह न के बराबर सम्मान भी तब दिया, जब ब्राह्मणों ने उनका ब्राह्मणीकरण और वैष्णवीकरण कर दिया। अधिकांश ब्राह्मण-संत स्त्री-विरोधी थे। प्रश्न यह है कि जिन ब्राह्मणों को निर्गुण संत स्वीकार नहीं थे, क्या वे एक राजपूत स्त्री का निर्गुण होना स्वीकार कर सकते थे? इसे और अधिक स्पष्ट करने के लिए मीरा के इस पद को लेते हैं–

तेरो कोई नहिं रोकणहार मगन होइ मीरा चली।
लाज, सरम, कुल की मर्जादा सिर सै दूर करी।
मान अपमान दोऊ धर पटके निकसी हूँ ज्ञान गली।
सेज सुखमना मीरा सोहै, सुभ है आज घरी।
तुम जाओ राणा घर अपने, मेरी तेरी नाहिं सरी।[7]
लोक लाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।
अपणे घर का पर्दा करले, मैं अबला बौराणी।[8]

क्या तुलसीदास, विट्ठलनाथ और जीवगोस्वामी या कोई भी ब्राह्मण गुरु ब्राह्मणों द्वारा स्त्रियों के लिए निर्धारित मर्यादा और परंपराओं पर मीरा के इस प्रहार को सहन कर सकता था, जबकि ब्राह्मण धर्मगुरुओं के लिए स्त्रियों के साथ संपर्क ही घोर पाप था? जिन जीवगोस्वामी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उनसे मिलने के लिए वृंदावन गईं मीरा को यह कहलवा दिया था : “मैं स्त्रियों से नहीं मिला करता”[9], क्या वह स्त्री-विरोधी ब्राह्मण मीरा को शिष्या बनाता, और क्या मीरा भी उस स्त्री-विरोधी जीवगोस्वामी को अपना गुरु बनातीं? कहा तो यह जाता है कि मीरा ने जीवगोस्वामी को खरी-खरी सुनाई थी।[10]

अब इस प्रश्न को लेते हैं कि मीरा सगुणवादी थीं या निर्गुणवादी? यह प्रश्न रैदास के गुरु होने की गुत्थी को सुलझाने में सहायता करे या न करे, लेकिन इस बात में संदेह नहीं रहना चाहिए कि कोई भी ब्राह्मण-संत मीरा का गुरु नहीं हो सकता था, क्योंकि मीरा का लोक-लाज त्यागकर बेपर्दा सड़कों पर निकलना और सत्संग करना ब्राह्मण-धर्म के ही विपरीत था, और यह कहना कि “अपने घर का पर्दा कर लो, मैं अबला बौराणी”, शास्त्रों द्वारा अबला बनाई गई एक स्त्री की स्वयं को बंधन-मुक्त करने की ही घोषणा थी। यह निर्गुणवाद का बहुत बड़ा द्योतक था, क्योंकि निर्गुणवाद का अर्थ शास्त्रों के बंधनों से मुक्त होना है, और सगुणवाद का मतलब शास्त्रों के बंधनों में बंधकर रहना है। भले ही कृष्ण-भक्ति के रूप में मीरा का सगुण होना ब्राह्मण आलोचकों को आत्मसंतोष देता हो, पर उनकी कृष्ण-भक्ति किसी ब्राह्मण-संत से प्रभावित नहीं थी। जिन साधु-संतों के बारे में मीरा का कहना है कि वह उनके साथ बैठकर खुश रहती थीं, यथा– “साधा ढिंग बैठ-बैठ, लोक लाज खूयाँ”,[11] तो निश्चित रूप से वे ब्राह्मण सगुण (वैष्णव) संत नहीं हो सकते थे, क्योंकि वे सभी शास्त्रों के बंधनों में बंधे हुए स्त्री-विरोधी थे। हमें 1640 ई. में गोस्वामी गोकुलनाथ कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में दो वार्ताएं मीराबाई से संबंधित मिलती हैं, जिन्हें देखना जरूरी है। पहली वार्ता का शीर्षक है ‘अथ मीरांबाई के पुरोहित रामदास तिनकी वार्ता’। यह इस प्रकार है–

“सो एक दिन मीरांबाई के श्रीठाकुरजी के आगे रामदासजी कीर्तन करते हुते। सो रामदासजी श्रीआचार्यजी महाप्रभून के पद गावत हुते। तब मीरांबाई बोली जो दूसरो पद श्रीठाकुरजी को गावो। तब रामदासजी ने कह्यौ मीरांबाई सो जो अरे दारी (यानी कुलटा) रांड! यह कौनको पद है। तेरे खसम को मूंड है। जा आजते तेरा मुंहहौ कबहूँ न देखूंगौ। तब सब कुटुम्बको लेकें रामदासजी उठि चले। तब मीरांबाई ने बहुतेरो कह्यौ परि रामदासजी रहे नाहीं, पाछें फिरके वाको मुख न देख्यौ ऐसे अपने प्रभूनसों अनुरुक्त हुते सो वा दिनते मीरांबाई को मुख न देख्यौ। वाकी वृत्ति छोड़ दीनी। फेरि वाके गाँव के आगे होयकें निसके नाहीं। मीरांबाई ने बहुत बुलाए परि वे रामदासजी आए नाहीं।”[12]

जब मीरा के पुरोहित का यह हाल था, जो मीरा को ‘दारी रांड’ की गाली दे रहा था, तो बाकी ब्राह्मणों का क्या हाल होगा? क्या मीरा इस अपमान के बाद भी उसे वापस बुला सकती थी? कदाचित नहीं। जिस मीरा ने कुल, वर्ण और लोकलाज का त्याग कर दिया हो, क्या वह ऐसे ब्राह्मण को अपना पुरोहित बना सकती थी? इस वार्ता से पता चलता है कि मीरा ने रामदास पुरोहित से ठाकुरजी का पद गाने को कहा था, जिस पर वह क्रोधित होकर मीरा को गाली देने लगा था। इससे स्पष्ट होता है कि मीरा का अनुराग रामदास पुरोहित के वल्लभाचारी महाप्रभु के प्रति नहीं था।

एक और वार्ता उल्लेखनीय है, जिसमें कृष्णदास अधिकारी मीरा का अपमान कर रहे हैं। यह वार्ता इस प्रकार है–

“सो वे कृष्णदास शूद्र एक बेर द्वारिका गए हुते। सो श्री रणछोर जी के दर्शन करिकें तहां ते चले। सो आपन मीराबाई के गांव आयौ। सो वे कृष्णदास मीराबाई के घर गए। तहां हरिवंश व्यास आदिक विशेष वैष्णव हुते। सो काहू को आए आठ दिन, काहू को आए दस दिन, काहू को आए पंद्रह दिन भए हुते। तिनकी विदा न भई हुती। और कृष्णदास ने तौ आवत ही कही मैं तो चलूंगो। तब मीराबाई ने कही जो बैठो। तब कितनेक मोहर श्रीनाथजी को देन लागी। सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तू श्रीआचार्यजी महाप्रभून को सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं। सो ऐसे कहि कें कृष्णदास उहाँ ते उठि चले।”[13]

इन वार्ताओं के बारे में अधिकांश विद्वानों का मत है कि इनका कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं है। लेकिन इससे मीरा के व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पड़ता। ये वार्ताएं दो बातें बताती हैं, एक यह कि मीरा वल्लभाचार्य की समकालीन थीं[14], और दूसरी यह कि इन वैष्णवों में मीराबाई के प्रति कोई सम्मान-भाव नहीं था। डॉ. श्रीकृष्ण लाल के अनुसार, “इन अवतरणों से पता चलता है कि वल्लभ संप्रदाय वालों के उचित और अनुचित सभी प्रकार के प्रभाव डालने पर भी मीरा कभी उस संप्रदाय में दीक्षित नहीं हुई। फिर भी वे अत्यंत उदार थीं और अन्य भक्तों तथा संतों की भांति उनमें सांप्रदायिक संकीर्णता न थी। जबकि पुरोहित रामदास एक जरा-सी बात पर गालियों की बौछार करते हैं, उस समय मीरा उन्हें घर बैठे भेंट भेजती है। जहां कृष्णदास अधिकारी मीरा का अपमान करना ही अपना कर्तव्य और धर्म समझते थे, वहीं मीरा ने उनका उचित आदर किया और ‘श्रीनाथजी’[15] के लिए भेंट भी भेजना चाहा। यह उनके चरित्र की महानता को सूचित करती है।”[16]

लेकिन मीरा इस कारण महान नहीं थीं कि वह ब्राह्मणों को भेंट देती थीं, बल्कि इसलिए महान थीं कि उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह किया था। इस पूरी परिस्थिति को समझना आवश्यक है, जिसने मीरा के लिए भक्ति और विद्रोह का वातावरण पैदा किया। भारत में, खास तौर से उत्तरी भारत में ब्राह्मणवाद और सामंतवाद के गठजोड़ ने ऐसी कई पितृसत्तात्मक प्रथाओं का निर्माण किया था, जो ब्राह्मण और राजपूत स्त्रियों के लिए यंत्रणादायक थीं। ब्राह्मणों ने मानव-समाज का विभाजन करने वाली अपनी वर्णव्यवस्था में प्रत्येक वर्ण के लिए कर्तव्य निर्धारित किए थे। उन्होंने स्त्री का कोई पृथक वर्ण निर्धारित नहीं किया था, वरन उसे भी शूद्र वर्ण में स्वीकार किया था, और उसके लिए भी बहुत से प्रतिबंधों और निषेधों का बाड़ा बनाया था। यह पूरी तरह स्त्री की दासता की व्यवस्था थी। इस बाड़े में पति-भक्ति और पति-सेवा ही स्त्री का धर्म था, पति ही उसका परमेश्वर था, और उसी का आज्ञाकारी बनकर रहना उसका काम था। इस व्यवस्था ने स्त्री को सिर्फ एक वस्तु के रूप में स्वीकार किया था, व्यक्ति के रूप में नहीं। इस सामंती व्यवस्था में पति की मृत्यु पर पत्नी को भी उसकी चिता पर जीवित जलकर मरना होता था, जिसे सती प्रथा कहते थे।

मीरा का संबंध राजस्थान के मेवाड़ राजघराने से था। राजस्थानी रनिवासों में स्त्रियां किस स्थिति में रहती थीं, उसका अत्यंत ही मार्मिक वर्णन महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘राजस्थानी रनिवास’ में किया है। उन्होंने ‘प्राक्कथन’ में लिखा है, “इतिहास से विस्मृत हो जाने वाले इस जीवन का लिपिबद्ध होना जरूरी है, ताकि असूर्यम्पश्याओं की अगली संतानें तथा इतिहास के प्रेमी भी उनके बारे में जान सकें।”[17]

असूर्यम्पश्या का अर्थ है सूर्य न देखने वाली स्त्री, जो अंधेरे में रहती थी। राहुल सांकृत्यायन ने 1910 ई. से 1952 ई. तक की घटनाओं के आधार पर गौरी नाम की एक राजपूत स्त्री की कहानी लिखी है। मीरा का समय पंद्रहवीं शताब्दी का है। जब बीसवीं शताब्दी में यह हाल था, जिसका आगे जिक्र आया है, तो पंद्रहवीं शताब्दी की स्थिति कितनी भयावह रही होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है–

“स्त्रियां ठाकुरवंश और राजवंश में पैदा होने के कारण पुण्यभागिनी नहीं, बल्कि वस्तुत: अभागिनी थीं। पर्दा इतना जबरदस्त था कि अंत:पुर से बाहर झांक तक नहीं सकती थीं। उसी घर में या आंगन में उन्हें अपना सारा जीवन बिताना पड़ता था। यदि सास कठोर न हुई, तो वह अपनी बहुओं और लड़कियों को आंगन में आंख-मिचौनी या दूसरे साधारण से खेल खेलने को छुट्टी दे देती, नहीं तो सास के जीवित रहने तक हाथ-पैर बांधकर पड़ा रहना ही उनकी एक मात्र जीवन-चर्या थी।

“पति के मरते ही ठाकुरानियों को छह महीने के लिए कोठरी में बंद कर दिया जाता। इसी कोठरी में खाना-सोना ही नहीं, बल्कि शौच-स्नान भी करना पड़ता। वहां सूर्य का भला दर्शन कहां? दरवाजे पर भी मोटा परदा डाल दिया जाता। ऐसी अंधेरी कोठरी में यदि वह तपेदिक के चंगुल में न फंसे, तो आश्चर्य की बात होती। छह महीने के बाद कोई-कोई सौभाग्यशालिनी विधवा पीहर चली जाती।

“यद्यपि रानियों और ठाकुरानियों के लिए यह अनावश्यक-सी चीज थी, लेकिन तो भी चिट्ठी लिखने भर उन्हें सिखला दिया जाता था फिर धार्मिक पूजापाठ के लिए तुलसी-रामायण, गंगालहरी, गोपाल-सहस्रनाम आदि का पाठ अंत:पुरिकाओं की शक्ति के भीतर की चीज थी। ठाकुरों के गढ़ के भीतर अपने मंदिर हुआ करते थे, जिनमें पूजा-दर्शन के लिए अंत:पुरिकाएं भी पहुंच जाती थीं। घोर परदे के कारण गढ़ के भीतर के गोपालजी के मंदिर में पुजारी ब्राह्मणी होती थी।

“पुराने जमाने के रनिवासों की कोठरियां कितनी तंग और बुरी होती थीं, इसे आज भी हम आगरा या ग्वालियर के किलों में देख सकते हैं। इन कोठरियों में दरवाजा छोड़कर हवा या रोशनी के लिए और कोई रास्ता नहीं होता था। कोठरियां बनाने वाले जानते थे कि यह किसी मुक्त व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि आजन्म बंदिनी के लिए बनाई जा रही हैं; क्या जाने किसी वक्त वह मुक्त होने की चेष्टा करें। अक्सर ठाकुरों और राजाओं की कई-कई पत्नियां होतीं, और उनमें से जिसका मान पति या बेटे के कारण ज्यादा होता, उसी का शासन चलता। बाकी सासें भी अपने नीरस जीवन को अपनी कोठरियों में बैठकर बिता देतीं। पर्दा तो इतना सख्त था कि नब्बे वर्ष की परदादी की भी मजाल नहीं थी, कि अपनी छाया को भी बाहर फेंक सके। एक बार रथ में जाते, सोई हुई किसी रानी की अंगुली पर्दे से बाहर हो गई, उसी वक्त उसके पति ने तलवार से अंगुली को काटकर निकाल दिया।”[18]

रनिवास में इन राजपूत स्त्रियों को जीने के लिए भक्ति का नशा ही एक सहारा था, जो उन्हें पागल होने से बचाए रखता था। पर बीमार तो वे पड़ती थीं, और अधिकांश  तपेदिक से ग्रस्त होकर मरती भी थीं। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि मीरा को राजमहल की इन कठोर यंत्रणादायक परिस्थितियों से गुजरना नहीं पड़ा होगा? लेकिन मीरा ने एक सीमा तक ही उन परिस्थितियों को स्वीकार किया होगा। वह उन्हें अपनी नियति मानकर किसी तरह जीने वाली वाली स्त्रियों में नहीं थी। मीरा के पीहर का परिवेश भी ससुराल के परिवेश से अलग नहीं रहा होगा, और भक्ति के संस्कार भी उनमें पीहर में ही पड़े होंगे। अत: एक प्रकार से वह उस परिवेश को जी ही रही थीं। लेकिन पति की मृत्यु के बाद उनके लिए ज्यादा कष्टदायक परिस्थितियां पैदा की गईं, जिनका जिक्र भी उनकी कविताओं में मिलता है, जिसमें उनको सर्प-दंश और विष से भी मारने का प्रयास किया गया। संभव है, मीरा ने पति के निधन के बाद उस कष्टदाई वैधव्य को स्वीकार करने से इंकार कर दिया हो, जिसके लिए ससुराल वालों ने उनके ऊपर दबाव बनाया होगा। इसका उल्लेख भी हमें मीरा के इस पद में मिलता है–

सास लड़े मेरी नन्द खिजावे, राणा रह्या रिसाय।
पहरों भी राख्यो चौकी बिठारयो, ताला दियो जड़ाय।
नहिं सुख भावे थारो देसलड़ो रंगरूड़ो।
थारे देसा में राणा साध नाहीं छै, लोग बसें सब कूड़ो।
गहणा गाँठो राणा हम सब त्यागा, त्याग्यो कर रो चूड़ो।
काजल टीकी हम सब त्यागा, त्याग्यो छै बाँधन जूड़ो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो छै पूरो।‘[19]

पति की मृत्यु के बाद विधवा मीरा को क्या-क्या त्यागना पड़ा, उन सबका जिक्र इस पद में है, और यह भी कहा है कि राणा तेरे देश में अच्छे लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग बसते हैं। मीरा अपने स्वभाव से विद्रोही थी। इसीलिए उसने उन पितृसत्तात्मक प्रथाओं के खिलाफ विद्रोह किया, जो स्त्री की स्वाधीनता को कुचलती थीं। मीरा राजघराने की पहली स्त्री थी, जिसने पितृसत्ता, वर्णव्यवस्था और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाई। मीरा ने राजमहल के बंधनकारी वैभव के स्थान पर अपनी मुक्ति को महत्व दिया और राजमहल त्याग दिया। यह बहुत बड़ी क्रांति थी, जो मीरा ने की। मुक्ति के सुख को वही अनुभव कर सकता है, जो गुलामी या कैद में रहा हो। अन्य कोई भी व्यक्ति मुक्ति के सुख को अनुभव नहीं कर सकता। मीरा ने राजमहल से निकलकर खुली हवा में सांस ली और सड़कों पर नाचकर मुक्त आकाश में अपनी स्वाधीनता को महसूस किया। यथा–

पग बाँध घूंघरयां णाच्यां री।
लोग कह्यां मीरा बाबरी, सासू कह्यां कुलनासी री।
लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाए जस पाणी।
अपणे घर का पर्दा करले, मैं अबला बौराणी।[20]

ब्राह्मण आलोचकों ने इस ‘मुक्ति’ को ‘वैराग्य’ की संज्ञा दी है, और लिखा है कि उन्हें ऐसा वैराग्य हुआ कि वह मेड़ता (ससुराल) त्यागकर तीर्थयात्रा पर निकल गईं। इसमें भी वह सिर्फ वृंदावन गईं, और वहीं रहीं।[21] लेकिन वे उनके काशी जाने का उल्लेख नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें काशी में संत रैदास से मीरा की भेंट करानी पड़ जाती। लेकिन यह सच है कि जब मीरा काशी गईं, तो ब्राह्मणों ने मीरा को धर्म-नाशक कहकर उनका बहिष्कार किया था। इसी दौरान उनकी भेंट संत रैदास से हुई। संभव है कि वह कबीर से भी मिली हों, कबीर साहेब का नाम उनकी वाणी में नहीं आता। संत रैदास के साथ मीरा का सत्संग हुआ, और इस सत्संग में वह निर्गुण विचारधारा के संपर्क में आईं, जिसके अनुसार ईश्वर का कोई नाम नहीं है, उसे किसी भी नाम से बुला लीजिए, राम, कृष्ण, माधव, हरि, अल्लाह, रब, मौला आदि किसी भी नाम से उसे पुकारा जा सकता है। उसका कोई रंग, रूप, कुल, गोत्र, वर्ण और जाति नहीं है। वह अजन्मा है, अविनाशी है, वह न किसी को पैदा करता है, और न मारता है। निर्गुणवाद में न परलोक है, और न आवागमन। निर्गुणवाद न वर्णव्यवस्था में विश्वास करता है और न वेद, पुराण, कुरआन आदि शास्त्रों में। निर्गुणवाद मंदिर और मूर्तिपूजा के विरुद्ध है, क्योंकि वहां पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है। वह समतावादी है, प्रत्येक स्त्री-पुरुष की स्वाधीनता और गरिमा में विश्वास करता है। कहना न होगा कि मीरा पर निर्गुण-दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने संत रैदास को गुरु-रूप में स्वीकार किया, जिसे हम उनके इन पदों में देख सकते हैं–

सतगुरु मिलिया सांसा भाग्या, सैन बताई साँची।
ना घर तेरा ना घर मेरा, गावै मीरा दासी।[22]
गुरू रैदास मिले मोहिं पूरे, धुर से कलम भिड़ी।
सतगुरु सैन गई जब जाके, जोत में जोत रली।
गुरू ज्ञान रंगू तन कपड़ा, मन मुद्रा फेरुंगी हो।
प्रेम प्रीत सूं हरि गुण गाऊं, चरणन लिप्त रहूंगी हो।
सतगुरु ओषद ऐसी दीन्हीं, रूम रूम भई चैना।
सतगुरु मिलिया सूंज पिछाणी ऐसा ब्रह्म मैं पाती।[23]
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।
खोजन फिरो भेद वा घर को, कोई न करत बखानी।
रैदास संत मिले मोहिं सतगुरु, दीन्ह सुख सहदानी।[24]

मीरा के इन पदों में ‘सतगुरु’, ‘रैदास संत’ और ‘सतगुरु रैदास’ तीनों नाम आए हैं, इसलिए यह शंका भी समाप्त हो जाती है कि ‘सतगुरु’ कोई और है। इसमें साफ़ कहा गया है कि सतगुरु रैदास ने जो ज्ञान दिया, उसी को पाकर मीरा को सुख-चैन प्राप्त हुआ। लेकिन मीरा की यह भेंट संत रैदास के जीवन के अंतिम काल में हुई थी, इसलिए मीरा को उनके साथ सत्संग करने का और अधिक अवसर नहीं मिला पाया था। लेकिन इस एक सत्संग ने ही मीरा के विचारों में भारी परिवर्तन ला दिया था और वह सगुण से निर्गुण की ओर चली गई थीं। यह प्रभाव और परिवर्तन उनकी कविताओं में दिखाई भी देता है। यथा–

साहब पाया आदि अनादी, नातर भव में जाती।[25]
राम हमारे हम हैं राम के, हरी बिन कछु न सुहावे।
मेरो तो एक राम नाम दूसरा न कोई।
दूसरा न कोई साधो सकल लोक जोई।[26]
सील संतोष धरूं, घट भीतर, समता पकड़ रहूंगी हो।
जाको नाम निरंजन कहिए, ताको ध्यान धरूंगी।[27]
पवण पाणी दोनों ही जायेंगे, अटल रहे अविनासी।[28]
मैंने राम रतन धन पायौ।
वसतु अमोलक दी मेरे सतगुरु, करि किरपा अपणायौ।
जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सब खोवायौ।[29]
लगी मोहि राम खुमारी हो।
सतगुरु भेद बताइया, खोली भरम किवारी हो।
सब घट दीसै आतमा, सबहीं सूं न्यारी हो।
दीपक जोऊं ज्ञान का, चढूं अगम अटारी हो।
मीरा दासी राम की, इमरित बलिहारी हो।[30]

इन पदों में कृष्ण-भक्त मीरा राम-भक्त हो गई हैं। वह कह रही हैं, मेरा तो बस एक राम है, दूसरा कोई नहीं है। मेरा साहब अनादि है। अब मैं शील, संतोष और समता के मार्ग पर हूं, और उस परमात्मा के ध्यान में हूं, जो निरंजन और अटल अविनासी है। मुझे राम नाम का रतन-धन मिल गया है, जो मेरे सतगुरु की मुझे अनमोल वस्तु (भेंट) है। अब तक मैंने जो कुछ पाया था, वह इस धन के आगे सब खो गया है। अब मुझ पर राम का नशा चढ़ गया है। सतगुरु ने सारे भेद समझा दिए हैं, जिससे मेरे सारे भ्रम दूर हो गए हैं। अब मुझे सभी के हृदयों में न्यारी यानी परम आत्मा के दर्शन हो रहे हैं। मीरा अब राम की दासी हो गई है।

मीरा का सगुणवाद

इसके बाद अब मीरा के सगुण-काव्य पर भी चर्चा जरूरी हो जाती है। विद्यानिवास मिश्र का मत है, “मीरा को गुजरात के वैष्णव कवियों की तरह एकांत रूप से न निर्गुणभक्ति की कवयित्री कहा जा सकता है, न सगुणभक्ति धारा की। वे दोनों हैं, पर चूंकि उनका झुकाव एक मूर्त लीलावितान में अपने को स्थापित करने की ओर अधिक है, इसलिए उन्हें सगुणभक्ति धारा में ही सम्मिलित किया जाता है। वस्तुत: हिंदी भक्तिकाव्य धारा के इतिहास में मीरा और कुछ हद तक (अपने थोड़े से पदों में) सूर सेतु का काम करते हैं। वे दोनों साकार-निराकार के मिलन की क्षितिज रेखा बनाते हैं।”[31]

यहां मेरे समक्ष सूर नहीं, जिनका काव्य निर्गुण के विरुद्ध सगुण को स्थापित करने का उपक्रम है, बल्कि मीरा का सगुणभक्ति काव्य विचारणीय है। मैं पीछे राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘राजस्थानी रनिवास’ के हवाले से बता आया हूं कि रजवाडों और ठाकुरों की हवेलियों में स्त्रियों के जीने का एकमात्र आधार भक्ति ही थी। धर्म-शास्त्रों और पति को परमेश्वर मानकर स्त्री-कर्तव्यों का पाठ उन्हें बचपन से ही पढ़ाया जाता था। मीरा को भी बचपन से भगवद-भक्ति और पूजापाठ में रखा गया था। उनका परिवार वैष्णवों का था।[32] वल्लभाचार्य ने जिस कृष्ण-भक्ति शाखा का विकास किया था, उसका चरम रूप उसी दौर में राजस्थान में था। सभी रजवाड़ों और जागीरों में हवेलियों के भीतर ही कृष्ण के मंदिर थे, जिनमें स्त्रियों में भक्ति-भाव भरने के लिए विशेष ब्राह्मण नियुक्त थे। इसलिए जब मीरा के भीतर काव्य-कला ने जन्म लिया, तो निश्चित रूप से आरंभ में भक्तिभाव की कविताएं ही उनके अंतस से फूटीं। अत: मीरा के काव्य में भगवान कृष्ण का जो रूप-वर्णन, लीला-वर्णन और भक्ति-भाव मिलता है, वह उनके आरंभिक समय का ही काव्य है। चूंकि मीरा द्वारा लिखित काव्य का कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, उनकी कविताएं भीलों और निम्न जातियों में लोकप्रिय थीं, जिनसे सुनकर ही लोगों द्वारा उनकी कविताओं का संग्रह तैयार किया गया था[33], इसलिए यह कहना मुश्किल है कि उनको अपने हिसाब से लिखा और ढाला न गया होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि मध्यकाल में पुरुष ही नहीं, स्त्री कवि भी भक्ति की ही कविताएं लिखा करते थे। यहां तक कि आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र तक अपनी कविताओं में ‘जय-जय राम’ और ‘जय-जय कृष्णा’ ही कर रहे थे।[34] इसका एकमात्र कारण यह था कि वे उच्च जातियों और वर्गों के कवि थे, जिनकी सामाजिक और आर्थिक समस्याएं नहीं थीं। इसलिए उनके सामाजिक सरोकार भी नहीं थे। वे भक्ति की कविताएं ही लिख सकते थे। लेकिन, इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि स्त्री कवयित्रियों ने भी पितृसत्तात्मक बंधनों और उनमें अपनी इच्छाओं के दमन को भी नजरंदाज करके भक्ति की कविताएं लिखीं। वे बंद दीवारों में रहकर पितृसत्तात्मक प्रथाओं को तोड़ने का साहस नहीं कर सकती थीं, और कविता में भी विद्रोह की अभिव्यक्ति का खतरा वे अच्छी तरह जानती थीं। वे सिर्फ भक्ति-कविताएं लिखकर ही अपने जीवन और सम्मान को सुरक्षित रख सकती थीं। उदाहरण के लिए उस काल की ‘स्त्री-काव्यधारा’ को देखा जा सकता है, जिसका बहुत परिश्रम के साथ जगदीश्वर चतुर्वेदी और सुधा सिंह ने मिलकर संकलन-संपादन किया है। उन्होंने इस संकलन में 16वीं से 20वीं शताब्दी तक की कवयित्रियों को शामिल किया है।[35] उन्हें पढ़ते हुए मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं होता कि ये कवयित्रियां राम-कृष्ण की स्तुति और भक्ति के सिवा कुछ और क्यों नहीं लिख सकीं। मैं स्थानाभाव और विषयान्तर के भय से उनकी कविताओं के उद्धरण यहां नहीं दे पा रहा हूं। लेकिन मीरा के संदर्भ में उनका उल्लेख इसलिए किया गया, क्योंकि मीरा अन्यों के जैसी साधारण स्त्री नहीं थी। उसके स्वाभाव में विद्रोह था। उसे जब स्त्री-अस्मिता और स्वतंत्रता का ज्ञान हुआ, तो वह गूंगी-बहरी बनकर नहीं रह सकी। उसने पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह किया, और महलों के सुख त्यागकर साधारण स्त्री के रूप में सड़कों पर आ गई।

मीरा के गिरधर नागर कौन?

लेकिन मीरा का यह तथ्यात्मक विश्लेषण है, जो मैंने किया। मीरा का वास्तविक मूल्यांकन अभी शेष है। और इसलिए शेष है, क्योंकि मीरा के व्यक्तित्व और काव्य के जितने भी आलोचक हुए, उनमें से अधिकांश ने लौकिक जगत में मीरा को समझने का प्रयास ही नहीं किया। वे मीरा के विरह और प्रेम की व्याख्या सिर्फ भक्ति और रहस्य के अलौकिक, सही अर्थ में काल्पनिक जगत में ही करते रहे। किसी ने मीरा को नाथ-पंथ से जोड़ा, तो किसी ने सूफीवाद से। इन आलोचकों ने सत्य को देखते हुए भी उपेक्षित किया, क्योंकि वे पितृ सत्तात्मक प्रथाओं के विरुद्ध जाने का साहस नहीं कर सकते थे। परशुराम चतुर्वेदी ने सही लिखा कि उन्हें पति-वियोग हुआ था, पर वह उनके काव्य में एक विधवा के दर्द को नहीं देख सके। उन्होंने लिखा, “पतिदेव का वियोग होते ही उन्होंने सारे लौकिक संबंधों के बंधन सहसा छिन्न-भिन्न कर दिए और चारों ओर से चित्त हटाकर अपने इष्टदेव के प्रति वे और भी अनुरक्त हो गईं।”[36] इसी मत का समर्थन विश्वनाथ त्रिपाठी ने किया है।[37] क्या यह मीरा का वास्तविक मूल्यांकन है? नहीं, यह गलत मूल्यांकन है। मीरा के प्रेम को समझने के लिए उनके एक पद पर फिर से विचार करते हैं। इस पद में वह कहती हैं—

लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।
अपणे घर का पर्दा कर ले, मैं अबला बौराणी।[38]

इस पद के संदर्भ में मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि महलों को त्यागकर सड़कों पर आना लोकलाज त्यागना नहीं था। प्रत्युत, मीरा का विधवा होकर परपुरुष की ओर आकर्षित होना, उससे प्रेम करना और पुनर्विवाह की कामना करना लोकलाज का त्याग था। मीरा इसीलिए चीखकर कह रही थी कि अपने घरों का पर्दा कर लो, क्योंकि वह जानती थी कि उनके घरों की चारदीवारियों में कितनी विधवाएं कैद हैं, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अंतर्गत कष्टकारी वैधव्य जी रही थीं, पर उन्हें पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था। मीरा कह रही थी कि जिन्हें तुम अबला कहते हो, उनमें मैं अबला तो बौरा गई, मैंने तो परंपरा के इस परदे को तोड़ दिया कि विधवा प्रेम नहीं कर सकती। मैंने तो लोकलाज को पानी में बहा दिया, तोड़ दिया वह पर्दा, जिसमें विधवा प्रेम नहीं कर सकती। मैं करने लगी प्रेम। अब तुम बचा लो अपनी विधवाओं को, क्योंकि आने वाला समय पितृसत्ता की प्रथाओं के टूटने का है।

मीरा के लौकिक प्रेम का एक और पद लेते हैं, जो इस प्रकार है–

मैं गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैण पड़े तब ही उठि जाऊं, भोर पड़े उठि आऊं।
रैण दिना जाके संग खेलूँ, ज्यूं त्यूं वाहि लुभाऊं।
जो पहिरावै सोई पहिरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उसकी प्रीत पुराणी, उण बिण पल न रहाऊं।
जहं बैठावे तितही बैठूं, बेचे तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।[39]

मीरा के आलोचकों ने इस पद की व्याख्या भक्त और ईश्वर के रूप में की है। इसे उन्होंने सबसे ऊंची प्रेम-साधना माना है, जिसमें भक्त भगवान के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है। एक आलोचक का मत है, “इस पराकाष्ठा पर पहुंचकर भक्त अपनी भक्ति को गंभीरता और जीवन के आनंद अथवा विरह-वेदना की अतिशयता के कारण उन्मत्त-सा हो उठता है।”[40]

असल में, इन आलोचकों ने ब्राह्मणी परंपराओं के आगे समर्पण कर दिया है। यह इनकी मुख्य समस्या है कि यहां भी ये ब्राह्मणी प्रथाओं से जुड़ा मामला देखते हैं, इनका दिमाग काम करना बंद कर देता है। शायद ही किसी द्विज आलोचक ने मीरा के इस पद को लौकिक अर्थ में समझने का प्रयत्न किया हो। इस पद में मीरा बिना किसी लाग-लपेट के अपने प्रियतम अर्थात प्रेमी से मुखातिब हैं, और साफ कह रही हैं कि मैं अपने गिरधर के घर जाऊंगी। यह गिरधर वल्लभाचार्य संप्रदाय वाला विष्णु-अवतार कृष्ण नहीं है, बल्कि यह उनके प्रेमी का नाम है, जो जीता-जागता हाड़-मांस का खूबसूरत पुरुष है, जिससे वह मुहब्बत करती थीं। उसका रूप उनको इस कदर लुभाता था कि वह रातभर उसके घर रहना चाहती थीं और भोर में उसके पास से आना चाहती थीं। क्या भगवान के घर में कोई रात भर रहकर सुबह वापस आ सकता है? और इस भगवान का घर है कहां? द्विज आलोचकों ने इस प्रश्न पर विचार क्यों नहीं किया? रात-दिन उसके साथ खेलना, यानी क्रीड़ा करना, उसे अपनी चेष्टाओं से लुभाना, क्या भगवान की मूर्ति के साथ संभव है? मीरा अपने प्रेमी के साथ पूर्ण समर्पण के साथ रहना चाहती हैं। उसे कोई शिकायत नहीं होगी, वह उसे जो भी पहिनने को देगा, उसी को प्रेम से पहनेगी; जो कुछ भी वह उसे खाने को देगा, मीरा उसी को ग्रहण करेगी, और कोई शिकायत नहीं करेगी। कौन से भगवान की मूर्ति अपने भक्त को पहनने और खाने को देती है? हमने तो देखा है कि भक्त मूर्ति को जो भोग लगाते हैं, उसे भी मूर्ति नहीं खाती, और वह भोग मूर्ति के मुख पर ही लगा रहता है। मीरा कहती है कि उनकी प्रीत नई नहीं है, बहुत पुरानी है। कुछ पदों में मीरा ने इस प्रीत को पूर्व जन्म की प्रीत कहा है।[41] लोग मुहावरे में जन्म-जन्मांतर का साथ कहते ही हैं। इसलिए ध्यान पूर्व-जन्म पर नहीं, इस बात पर रहना चाहिए कि यह प्रीत इतनी पुरानी है कि उसके बिना एक पल भी रहना मुश्किल है। इस भावना को वे ही सच्चे प्रेमी समझ सकते हैं, जिन्होंने हीर की तरह रांझा से और मजनू की तरह लैला से प्रीत की होगी। इस प्रीत में प्रेमी का हर हुक्म मंज़ूर होता है। मीरा का गिरधर उसे जहां भी बैठायेगा, वह वहीं बैठ जाएगी—‘जहं बैठावे तितही बैठूं’। लोगों ने मीरा को समझाने के लिए जरूर यह ताना भी दिया होगा कि जिससे तू प्रेम कर रही है, वह तुझे धोखा दे सकता है, तुझे कोठे पर ले जाकर बेच भी सकता है। इस तरह प्रेम-जाल में फंसाकर लड़कियों को कोठों पर बेचने की घटनाएं हुई भी होंगी, पर मीरा इसके लिए भी तैयार थी– ‘बेचे तो बिक जाऊं।’ यह सच्चा प्रेम था।

आलोचकों ने गिरधर नागर की कृष्ण के रूप में गलत व्याख्या की है। जैसे कोई रामस्वरूप नाम रखने से राम नहीं हो जाता, बजरंगी नाम रखने से कोई हनुमान नहीं हो जाता, उसी तरह कोई गिरधर नामधारी भी कृष्ण नहीं हो जाता। इन आलोचकों ने गिरधर को तो कृष्ण के रूप में देख लिया, पर गिरधर के साथ जुड़ा सरनेम नागर क्यों नहीं देखा? नागर गुजरात और राजस्थान में निवास करने वाला एक पुराना ब्राह्मण समुदाय है। प्रसिद्ध साहित्यकार रमनलाल वसंतलाल देसाई के अनुसार, “मेवाड़ के प्रथम पुरुष बप्पा रावल एक नागर थे।”[42] हालांकि वर्तमान में नागर गुर्जर भी होते हैं, पर गिरधर नागर, जिससे मीरा की प्रीत थी, वास्तव में एक ब्राह्मण योगी था, जिसके प्रेम में मीरा जोगन बनने के लिए भी तैयार ही नहीं, बल्कि जोगन बन भी गई थी। मीरा का यह पद देखिए–

तेरे खातिर जोगण हूंगी, करवत लूंगी कासी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कँवल की दासी।[43]

मीरा को अलौकिक व्यंजनाओं में नहीं, लौकिक अभिधा में समझने की जरूरत है। जैसे मीरा के इस पद को—

हेरी म्हा तो दरद दीवाणा, म्हारा दरद न जाण्या कोय।
घायल री गत घायल जाण्या, हिवड़ो अगण सँजोय।
जौहर की गत जौहर जाण्या, क्या जाण्या जिण खोय।
दरद की मारयां दर-दर डोल्यां, वैद मिल्या णा कोय।[44]

इस पद में भक्त मीरा नहीं बोल रही है, बल्कि विधवा मीरा का दर्द बोल रहा है। यह उस स्त्री का दर्द है, जो 18-20 साल की जवान अवस्था में विधवा हो गई थी, और जिसे मां बनने का भी अवसर नहीं मिला था। मीरा दर्द-दीवानी थी, और यह वह दर्द था, जिसे किसी ने नहीं जाना—‘म्हारा दरद न जाण्या कोय।’ घायल के दर्द को वही महसूस करता है, जो घायल होता है। आगे इससे भी मार्मिक उपमा मीरा ने जौहर की दी है। राजे-रजवाड़ों में राजाओं के मरने पर उनकी रानियों को ही नहीं, दासियों तक को, जिनके अपने बाल-बच्चे और पति होते थे, जलती आग में कूद कर प्राण देने होते थे। इसी को जौहर कहते थे। यह जौहर करने वाली स्त्रियों के लिए अत्यंत भयानक, लोमहर्षक और दर्दनाक दृश्य होता था। एक जौहर का दर्द क्या होता है, इसे जौहर करने वाली स्त्री ही जान सकती थी, जो अपना सब कुछ खो रही होती थी। इसी तरह विधवा मीरा के दर्द को भी वही स्त्री जान सकती थी, जो विधवा होने के दर्द से गुजरी हो।

मीरा का एक और पद प्रस्तुत है–

जोगी मत जा, मत जा, मत जा, पाँइ परूँ मैं तेरी चेरी हौ।
प्रेम भगति को पैड़ों ही न्यारी, हमकूं गैल चला जा।
अगर चंदण की चिता रचाऊं, अपने हाथ जला जा।
जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग जला जा।
मीरा कहें प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा।[45]

मीरा इस पद में अपने प्रेमी जोगी से अर्ज कर रही है। यह प्रेमी मीरा से विवाह करने का इच्छुक नहीं है, और उसे छोड़कर जा रहा है। मीरा उसके पैरों में पड़कर उससे विनती कर रही है कि उसे छोड़कर मत जा। वह जोगी से कह रही है कि प्रेम-भक्ति का मार्ग निराला होता है, तू अगर जा ही रहा है, तो हमको भी साथ ले जा। आगे की पंक्तियों में मीरा बड़ी ही मार्मिक बात कहती हैं : “मेरी जब चंदन और अगरबत्ती की चिता जले, तो अपने अंग भी जला जाना। मैं इतने से ही तेरे प्रेम को महसूस कर लूंगी।” यह उसी तरह का भाव है, जैसे यह कि “कागा सब तन खाइयो, चुनि-चुनि खइयो मांस; दुई नैना मत खाइयो, जामे पिया मिलन की आस।” “मैं तो पहले ही जलकर राख हो गई हूं, आकर अपने अंग लगा ले। हे मेरे स्वामी गिरधर, मेरी जोत में अपनी जोत मिला जा।” मीरा इस पद में मिलन की याचना करती है। मीरा के आलोचकों से मेरा सवाल यह है कि क्या भगवान की मूर्ति से इस तरह की बातें कही जा सकती हैं? इसी संदर्भ में मीरा का यह पद भी विचार करने योग्य है–

जोगिया जी आज्यो जी इण देस।
नैनन देखूं नाथ नै, धाई करू आदेस।
आया सावण भादवा भरीया जल थल ताल।
रावल कुण विल्माइ राखो, विरहणी है बेहाल।
बिछरया बौहो दिन भया बिसरयो पलक न जाइ।
एक बेरी देह फेरी, नगर हमारे आइ।
वा मूरति म्हारे मण बसे छिन भरि रह्यौइ ण जाइ।
मीरा रे कोई नाहीं दूजौ, दरसण दीजै आइ।[46]

मीरा कह रही है– सावन-भादो का महीना आ गया है, वर्षा के जल से मार्ग और ताल भर गए हैं। मैं विरहिणी तुमको एक पलक भी बिसरा नहीं पा रही। जोगी जी आ जाओ हमारे देश, मैं नयन भर के तुमको देखूंगी, दौड़-दौड़कर तुम्हारे आदेश का पालन करूंगी। हे मेरे रावल (राजा, प्रियतम), तुम्हें किसने लुभाके रोक रखा है? तुमसे बिछड़े हुए बहुत दिन हो गए। एक बार हमारे नगर में घूम जाओ। तुम्हारी छवि मन में ऐसी बस गई है कि क्षण-भर भी अलग नहीं रह पाती। तुम्हीं मीरा के प्रियतम हो, दूसरा कोई नहीं है। क्यों नहीं आकर दर्शन देते?

इसी भाव का एक और खूबसूरत पद है–

भीजे म्हारो दांवन चीर, सावणियो लूम रह्यो रे।
आप तो जाय बिदेसां छाये, जिवड़ो धरत ण धीर।
लिख लिख पतियाँ संदेसा भेजूं, घर आवै म्हारो पीव।
डगर बुहारूं, पंथ निहारूं, रोम रोम अँखियाँ राती।
राति दिवस मोहि कल ण पड़त है, हीयो फटत मेरी छाती।[47]

सावन में अपने प्रियतम को पुकारते हुए मीरा कह रही हैं कि सावन झूम रहा है और मेरे दामन का वस्त्र भीग रहा है। पर आप तो परदेस में बैठे हुए हो। मैं कैसे धीर धरूं? मैंने कितने पत्र लिखकर आने के लिए संदेश भिजवाए, पर आप नहीं आते। रात-रात भर मेरी आंखें आपकी राह देखती हैं। पर आपको आता न देखकर मेरी छाती फटने लगती है।

ऐसे अनेक पद हैं, जिनमें विधवा मीरा ने अपने प्रियतम के साथ अपने आत्मिक और दैहिक प्रेम का निरूपण किया है। डॉ. गणपति चंद्र गुप्ता ने ‘हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’, (खंड 1) में लिखा है कि मीरा कृष्ण को अपना पति मानती हैं। उनका प्रणय-निवेदन एक प्रेयसी का नहीं, बल्कि एक पत्नी का है। इसके आधार पर डॉ. धर्मवीर ने निष्कर्ष निकाला है कि “मीराबाई की पूरी कविता एक विधवा हिंदू औरत की कविता है। कृष्ण-भक्ति के नाम में किसी हिंदी समीक्षक ने इस बात को समझने की कोशिश नहीं की कि वह उनकी एक विधवा हिंदू बेटी की पीड़ा है, जो पुनर्विवाह में अपना पति मांग रही है। पुरानी समाज व्यवस्था ने और हिंदी साहित्य के समीक्षकों ने मीरा की गोद में कृष्ण की पत्थर की मूर्ति थमा कर हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह की मांग को साढ़े तीन सौ सालों तक ठुकरा दिया था।”[48]

डॉ. धर्मवीर ने सिर्फ विधवा के पुनर्विवाह का सवाल उठाया है, प्रेम का सवाल नहीं। वह प्रेम के पक्ष में थे भी नहीं। पर, प्रश्न है कि एक विधवा किसी अन्य पुरुष से प्रेम क्यों नहीं कर सकती? हिंदू विधवा का पुनर्विवाह एक अलग समस्या है। इसे हिंदू समाज ने उसी तरह मान्यता दी है, जिस तरह साधारण विवाह को, लेकिन विधवा द्वारा अन्य पुरुष से प्रेम को अभी भी सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है। मीराबाई का विद्रोह प्रेम और पुनर्विवाह दोनों की मान्यता के लिए था।

[1] देखिए, मेरी पुस्तक ‘संत रैदास : एक विश्लेषण’, दूसरा संस्करण, 2000, बोधिसत्व प्रकाशन, रामपुर, पृ. 31
[2] मीराबाई की पदावली, संपादक : परशुराम चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, बीसवां संस्करण, 1998, देखिए पृ. 18 और 25
[3] मीराबाई और उनकी पदावली, प्रो. देशराज सिंह भाटी, अशोक प्रकाशन, नई सड़क, दिल्ली, नया संस्करण 2000, पृ. 31-32
[4] देखिए, हिंदी की तत्कालीन मासिक पत्रिका ‘चाँद’ का अक्टूबर, 1929, (वर्ष 7, खंड 2, संख्या 6) का अंक, पृ. 737 से 743 तक।
[5] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 74-75
[6] वही, देखिए विषय-प्रवेश
[7] मीराबाई, डा. श्रीकृष्ण पाल, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 1970, पृ. 14
[8] मीराबाई की पदावली, उपरोक्त, पद 38, पृ. 111
[9] वही, पृ. 24
[10] वही।
[11] वही, पद 18, पृ. 104
[12] गोस्वामी गोकुलनाथ कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’, सं. डा. कमलाशंकर त्रिपाठी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, संस्करण 2008, पृ. 114
[13] वही, देखिए अंतिम वार्ता ‘अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता’, पृ. 188
[14] मीराबाई और उनकी पदावली, उपरोक्त, पृ. 24
[15] कृष्ण का एक नाम। कहा जाता है कि जब वल्लभाचार्य ने गोकुल में अपनी गद्दी कायम की और स्वयं को गोस्वामी घोषित किया, उन्हीं दिनों गोवर्द्धन पर्वत पर श्रीनाथजी के रूप में कृष्ण का आविर्भाव हुआ, तभी से यह नाम प्रचलित हुआ। (भारतीय धर्म-शाखाएं और उनका इतिहास, वाचस्पति गैरोला, चौखम्बा, वाराणसी, 1988, पृ. 410)
[16] डा. श्रीकृष्ण लाल, मीरांबाई, उपरोक्त, पृ. 23
[17] राहुल सांकृत्यायन, राजस्थानी रनिवास, 1952, किताब महल, इलाहाबाद, देखिए प्राक्कथन।
[18] वही, पृ. 5, 12, 30 और 32
[19] मीराबाई की पदावली, उपरोक्त, पद-32, 42, पृ. 109, 112
[20] वही, पद 36, 38, पृ. 111
[21] वही, पृ. 24
[22] देशराज सिंह भाटी, मीराबाई और उनकी पदावली, उपरोक्त, पृ. 46
[23] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, उपरोक्त, पद 16, पृ. 243
[24] वही, पद 118, पृ. 135, पद, (परिशिष्ट) पद 11, 13, पृ. 242-243,
[25] वही, पद 17, पृ. 244
[26] वही, पद (परिशिष्ट) 2, पृ. 239
[27] वही, पद 12, पृ. 242
[28] वही, पद 24, पृ. 106
[29] वही, पद 13, पृ. 243
[30] वही, पद 14, पृ. वही
[31] विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, देखिए, विद्यानिवास मिश्र की भूमिका का दूसरा पृष्ठ।
[32] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, देखिए, पृ. 228-229
[33] विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, उपरोक्त, पृ. 80
[34] जयति जयति श्री राधिका चरण जुगल करि नेम।
जाकी छटा प्रकाश तें पावत पामर प्रेम।
नमो नमो श्री हरि-चरण शिव-मन-मंदिर रूप।
वास हमारे उर करो जानि परयौ भाव-कूप।
– भारतेंदु काव्यामृत, रामचन्द्र श्रीवास्तव ‘चन्द्र’ एवं डा. कैलाशचन्द्र अग्रवाल द्वारा संपादित, रवि प्रकाशन, आगरा, पृ. 53
[35]  देखिए, जगदीश्वर चतुर्वेदी और सुधा सिंह द्वारा संपादित, स्त्री-काव्यधारा, अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली,
[36] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, उपरोक्त, पृ. 21
[37] विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, उपरोक्त, पृ. 62-63
[38] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पद 38, पृ. 111
[39] वही, पद 20, पृ. 104-105
[40] डा. श्रीकृष्ण लाल, मीराबाई, उपरोक्त, पृ 146-147
[41] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पद 51, पृ. 115
[42] देखिए, विकिपीडिया, नागर ब्राह्मण समाज
[43] परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, उपरोक्त, पद 49, पृ. 114
[44] वही, पद 70, पृ. 120-121
[45] वही, पद 46, पृ. 114
[46] वही, पद 116, पृ. 134
[47] वही, पद 122-123, पृ. 136-137
[48] डा. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, पृ. 18-19

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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किसानों की नायिका बनाम आरएसएस की नायिका
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