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दूसरी बार नोटबंदी : फिर मार असंगठित क्षेत्र के दलित-बहुजनों पर

आरबीआई के आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले साल में संगठित क्षेत्र की 2700 कंपनियों का मुनाफ़ा 24 प्रतिशत बढ़ा है और उनकी बिक्री में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह इस बात की पुष्टि करता है कि संगठित क्षेत्र की बिक्री और मुनाफा बढ़ा तो इसके पीछे असंगठित क्षेत्र का कमजोर होना है। बता रहे हैं सुशील मानव

गत 19 मई, 2023 को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक सर्कुलर ज़ारी करके कहा कि आगामी 30 सितंबर, 2023 से दो हजार रुपए के नोट अमान्य हो जाएंगे। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल की दूसरी नोटबंदी की संज्ञा दी जा रही है। वहीं सत्ता समर्थक मीडिया द्वारा इसे कालेधन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक बताया जा रहा है। जबकि एक बार फिर यह असंगठित क्षेत्र के ऊपर मारक प्रहार साबित होगा, जिसके शिकार दलित-बहुजन होंगे।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 50 करोड़ का जो कार्यबल है, उसका 94 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है और केवल 6 प्रतिशत संगठित क्षेत्र में। श्रम मंत्रालय, भारत सरकार के तिमाही रोज़गार सर्वे के मुताबिक साल 2022 के आखिरी तिमाही में संगठित क्षेत्र में 3.18 करोड़ कर्मचारी कार्यरत हैं। वहीं न्यूज-18 द्वारा प्रकाशित खबर के अनुसार ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 27.69 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों में से 74 प्रतिशत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग से हैं। जबकि केवल 25.56 फ़ीसदी कार्यबल सामान्य वर्ग व अन्य वर्गों के मज़दूरों का है। ई-श्रम पोर्टल पर नामांकित मज़दूरों में से 94 प्रतिशत से अधिक की आमदनी 10 हजार रुपए मासिक से कम है। जबकि महज 4.36 प्रतिशत की आमदनी 10-15 हज़ार रुपए के बीच है। 

उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि असंगठित क्षेत्र में देश के दलित बहुजन ग़रीब-गुरबा वर्ग समुदाय के अकुशल और कम शिक्षित या अशिक्षित वर्ग समुदाय को काम मिलता है। जबकि संगठित क्षेत्र छोटे-से-छोटे पद और काम के लिए खास शैक्षणिक योग्यता की मांग करते हैं। कार्पोरेट वर्चस्व वाले संगठित क्षेत्र में दलित-बहुजन वर्ग के लिए मौके भी कम होते हैं।  

 नकदी पर चलता है असंगठित क्षेत्र

असंगठित क्षेत्र में मज़दूर रोज़ाना की दिहाड़ी पर काम करते हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के तमाम काम कारोबार नकदी पर चलते हैं। जैसे ऑटो या बस का संचालन पूरी तरह से कैश का कारोबार है। छोटे-छोटे ठेलों, खोमचों और फुटपाथ पर होने वाला कारोबार नकदी पर चलता है। दिहाड़ी मजदूर कमाने के बाद उसे वापिस असंगठित क्षेत्र में ही ख़र्च कर देते हैं। जैसे दिहाड़ी पाने के बाद एक निर्माण मजदूर या साइकिल ट्राली चलाने वाला, या खेत मज़दूर शाम को ढाई सौ ग्राम खुल्ला सरसों तेल, ढाई सौ ग्राम दाल, आधा किलो आटा और आलू प्याज सब्ज़ी ख़रीदकर वापस जाएगा। वह घर-परिवार के लिए कपड़े, फुटवियर आदि फुटपाथ से ख़रीदेगा, जिसका उत्पादन असंगठित क्षेत्र में ही हुआ है। लेकिन यदि नकदी ही ग़ायब कर दिया जाएगा तो असंगठित क्षेत्र का कामकाज और कारोबार यानि पूरी शृंखलाबद्ध प्रक्रिया ही ठप्प हो जाएगी।  

नोटबंदी से फिर बदहाल होंगे लघु, छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योग

पहली नोटबंदी से टूट गयी थी असंगठित क्षेत्र की कमर

साल 2014 के बाद असंगठित क्षेत्र ने दो सत्ता निर्मित त्रासदियां झेली हैं। पहली नोटबंदी और दूसरी वस्तु-सेवा कर (जीएसटी)। जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि असंगठित क्षेत्र की सबसे बड़ी परेशानी नोटबंदी के चलते आयी, क्योंकि असंगठित क्षेत्र कैश पर चलता है। और जैसे ही कैश की कमी हुई, बहुत सारी उत्पादन इकाईयां बंद हो गईं, और वे फिर खुल नहीं पाईं। थोड़ी बहुत खुलीं भी तो पूर्व की तरह काम नहीं कर पाईं। 

प्रो. कुमार कहते हैं कि जुलाई 2017 में थोपी गई जीएसटी ने भी बहुत बुरी तरह से असंगठित क्षेत्र को धराशायी किया। असंगठित क्षेत्र को जीएसटी से बाहर रखा गया और यह कहा गया कि वे बहुत छोटी इकाईयां हैं। इसे और स्पष्ट करते हुए प्रो. कुमार कहते हैं कि असंगठित क्षेत्र को जीएसटी से बाहर रखा गया, यही इनका नुकसान है। जब उनको इनपुट नहीं मिला तो दाम बढ़ गया। और जो संगठित क्षेत्र है, उसका दाम कम हो गया। तो डिमांड जो है वह असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र की ओर चली गई। इसके चलते एक ओर संगठित क्षेत्र की – बिक्री और मुनाफे – दोनों में तेजी से वृद्धि हुई है तो दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र गिरावट की ओर अग्रसर है। 

असंगठित क्षेत्र के मज़दूर होंगे बेरोज़गार

आरबीआई के आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले साल में संगठित क्षेत्र की 2700 कंपनियों का मुनाफ़ा 24 प्रतिशत बढ़ा है और उनकी बिक्री में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह इस बात की पुष्टि करता है कि संगठित क्षेत्र की बिक्री और मुनाफा बढ़ा तो इसके पीछे असंगठित क्षेत्र का कमजोर होना है। एक उदाहरण यह कि पड़ोस के परचून की दुकान की बिक्री घटी है और ई-कॉमर्स व मॉल आदि की बिक्री बढ़ी है। यह इससे भी स्पष्ट है कि ई-कॉमर्स कंपनियों की बिक्री 30-40 प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि अर्थव्यवस्था स्थिर है तो इसका मतलब है कि असंगठित क्षेत्र में खुदरा बिक्री में गिरावट आई है। आस-पास की दुकानों में मांग कम हो गई है। मांग में आए इस तरह के बदलाव के कारण संगठित क्षेत्रों का मुनाफा 24 प्रतिशत बढ़ गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाज़ार में उनका एकाधिकार बढ़ने के बाद से उनकी प्राइसिंग पॉवर बढ़ गयी है और यह ऐसा इसलिए है क्योंकि असंगठित क्षेत्र में गिरावट आई है। 

आंकड़ों से अदृश्य है असंगठित क्षेत्र

असंगठित क्षेत्र के लिए नीतियों पर केंद्र सरकार का ध्यान नहीं है। कहा जा रहा है कि हमारी अर्थव्यवस्था का ग्रोथ बहुत तेज है। जनता को बताया जा रहा है कि सब कुछ सही हो रहा है। लेकिन वे खुशहाली संगठित क्षेत्र की है, जहां केवल 6-10 प्रतिशत लोग काम कर रहे हैं। यह वह कार्पोरेट सेक्टर है, जिसको फायदा पहुंचाया जा रहा है। असंगठित क्षेत्र को आंकड़ों से अदृश्य कर दिया गया है। सीधे शब्दों में कहें तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले दलित बहुजन वर्ग को ही अदृश्य कर दिया गया है। 

लघु, कुटीर उद्योग को नष्ट करने के लिए नकदी को किया जा रहा खत्म

असंगठित क्षेत्र के लघु, कुटीर उद्योग किसी भी अर्थव्यावस्था की जान होते हैं। लघु कुटीर उद्योग में ही वंचित समुदाय को काम मिलता है। और यही वो क्षेत्र है जो देश की अर्थव्यवस्था को मंदी की मार से बचाते हैं। 

तो एक तरफ देश में महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है तो दूसरी ओर देश की 94 फ़ीसदी कार्यबल को काम देने वाले असंगठित क्षेत्र को खत्म किया जा रहा है। जाहिर तौर पर जब असंगठित क्षेत्र नहीं होगा तो उन्हें संगठित क्षेत्र में भी काम नहीं मिलेगा और वे लोग भूख और बीमारी से मरने को अभिशप्त होंगे। 

 (संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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