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कर्नाटक में जीत के बाद क्या दलित मल्लिकार्जुन खड़गे पर दांव लगाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस पार्टी खड़गे के मार्फत 21वीं सदी की भारतीय राजनीति की नई इबारत लिखने जा रही है। यह सवाल राजनीतिक हवाओं में खुशबू बनकर तैर रहा है कि आजादी के 75 साल बाद क्या खड़गे पहले दलित प्रधानमंत्री हो सकते हैं? बता रहे हैं प्रो. रविकांत

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 135 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की है। इस चुनाव पर पूरे देश की निगाहें लगी थीं। सियासी गलियारों और हिंदी मीडिया में भी पहली बार कर्नाटक चुनाव खास चर्चा में रहा। भाजपा का दक्षिणी सिंहद्वार पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन गया था। इस जीत के बाद यह सवाल सियासी गलियारे में है कि क्या कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे को अगले साल होनेवाले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करेगी। 

दरअसल, यह चुनाव आने वाले वक्त की राजनीतिक दिशा तय करने वाला माना गया। राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकसभा चुनाव-2024 का पहला सेमीफाइनल कह रहे थे। इस आधार पर यदि मूल्यांकन करें तो कांग्रेस की सफलता ने नरेंद्र मोदी और भाजपा की दिग्विजयी छवि पर बट्टा लगा दिया है। इस जीत से अचानक कांग्रेस की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। जाहिर तौर पर इससे विपक्ष की राजनीति मजबूत होगी और इसमें कांग्रेस की भूमिका भी असरदार होगी। इसीलिए कई दृष्टिकोणों से कांग्रेस की जीत का विश्लेषण किया जा रहा है। भाजपा की पराजय की पड़ताल भी हो रही है।

पहला सवाल तो यह है कि कांग्रेस को इतनी बड़ी जीत क्योंकर प्राप्त हुई? दरअसल, लंबे समय के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक में बहुत व्यवस्थित और संगठित होकर चुनाव लड़ा। एक तरफ सिद्दारमैया और डी.के. शिवकुमार जैसे स्थानीय नेताओं ने सत्ता संघर्ष के बावजूद एकजुट होकर चुनाव लड़े। दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने गृहराज्य में भाजपा के चेहरे नरेंद्र मोदी पर जोरदार हमला बोला। बेहद वरिष्ठ, अनुभवी और दलित समुदाय से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के सामाजिक समीकरण को भी मजबूत बनाया। इस जीत से कांग्रेस के भीतर उनका कद और अधिक प्रभावशाली हो गया है।

कर्नाटक के चुनाव नतीजे कांग्रेस के लिए बहुत मायने रखते हैं। ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने 14 दिन कर्नाटक में गुजारे थे। इस दरमियान उन्होंने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया। राहुल गांधी ने लोगों से मिलकर उनकी मुश्किलों और जरूरतों को जाना-समझा। कांग्रेस का दावा है कि लोगों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर ही उसका संकल्प पत्र तैयार किया गया। इन उम्मीदों को पूरा करना कांग्रेस की प्रतिबद्धता है। यह चुनाव राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का सोशल ऑडिट था। इस जीत ने यात्रा की सफलता की इबारत लिख दी है। खुद राहुल गांधी ने इसे मुहब्बत की जीत और नफरत की हार बताया है। 

वैसे यह चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का भी सोशल ऑडिट था। अध्यक्ष होने के बाद उनका भी अपने गृह राज्य कर्नाटक में यह पहला चुनाव था। विदित है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत के इंकार के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे गांधी परिवार के अघोषित आधिकारिक प्रत्याशी बने। केरल के कुलीन शशि थरूर के मुकाबले कन्नड़ दलित खड़गे अध्यक्ष चुने गए। लगता है, कांग्रेस पार्टी खड़गे के मार्फत 21वीं सदी की भारतीय राजनीति की नई इबारत लिखने जा रही है। यह सवाल राजनीतिक हवाओं में खुशबू बनकर तैर रहा है कि आजादी के 75 साल बाद क्या खड़गे पहले दलित प्रधानमंत्री हो सकते हैं? क्या खड़गे को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस पार्टी ऐसा नॅरेटिव तैयार कर रही है? क्या कांग्रेस डॉ. आंबेडकर के सपने को पूरा करने जा रही है? 

मल्लिकार्जुन खड़गे, राष्ट्रीय अध्यक्ष, कांग्रेस

विदित है कि 25 नवंबर, 1949 को 20वीं सदी के सबसे प्रबुद्ध, अविस्मरणीय और संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “दलित समाज द्विजों की गुलामी का बोझा ढोते-ढोते थक गया है। अब उसे सत्ता चाहिए।” यही समाज सच्चे अर्थ में विषमता ग्रस्त भारत में सामाजिक न्याय स्थापित कर सकता है। संभवतया इसीलिए गांधी ने नेहरू और पटेल को सलाह दी थी कि संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर को बनाया जाय।

कर्नाटक में 17 फ़ीसदी दलित आबादी है। खड़गे की मौजूदगी के कारण बड़े पैमाने पर दलित समाज कांग्रेस के साथ आया है। राष्ट्रीय स्तर पर 16.7 फीसदी दलित है। दलित कांग्रेस का आधार वोट रहा है। बसपा के कमजोर होने से दलित समाज की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। जाहिर तौर पर उत्तर भारत में खोई हुई जमीन पाने के लिए दलित प्रधानमंत्री का नॅरेटिव मददगार साबित हो सकता है।

कर्नाटक चुनाव कई मायने में खास है। पिछले 8-9 साल में पहली बार कांग्रेस ने आक्रामक प्रचार किया। कांग्रेस ने प्रदेश भाजपा नेतृत्व पर ही नहीं, बल्कि भाजपा के सुपरस्टार प्रचारक – मीडिया और समर्थकों के लिए देवतुल्य बन चुके नरेंद्र मोदी – पर भी जमकर निशाना साधा। दरअसल, पिछले 9 साल में यह मिथ बना दिया गया था कि नरेंद्र मोदी पर हमला करना विपक्ष के लिए आत्मघाती है। किंचित जीते गए चुनावों के जरिए इसको इतना प्रचारित किया गया कि विपक्ष ही नहीं, बल्कि अनेक विश्लेषक भी भयभीत हो चुके हैं। इसलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला करना लगभग भुला दिया है। लेकिन कर्नाटक चुनाव में इस मिथ को दरकिनार करके कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने जब भाजपा की विचारधारा को जहरीला सांप कहा तो नरेंद्र मोदी ने 91 गालियों की लिस्ट जारी करके विक्टिम कार्ड खेला। 

इसके जवाब में प्रियंका गांधी ने बेहद हल्के और मजाकिया अंदाज में मोदी मिथ को हवा में उड़ा दिया। राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार और देश की बदहाली से जुड़े सवालों को उठाया। नरेंद्र मोदी की विभाजनकारी राजनीति का पर्दाफाश किया। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी पूरे चुनाव में नॅरेटिव पकड़ने की कोशिश करते रहे। जैसे ही कांग्रेस ने अपने संकल्प पत्र में पीएफआई और बजरंग दल जैसे कट्टरपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया, मोदी व उनके समर्थकों को लगा बूटी मिल गई है। उनके समर्थक यूरेका, यूरेका चिल्लाने लगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और धर्मनिरपेक्ष भारतीय संविधान की परवाह किए बगैर नरेंद्र मोदी ने चुनाव को धार्मिक रंग देना शुरू कर दिया। उन्होंने बजरंग दल को बजरंगबली के साथ जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस बजरंगबली को ताले में बंद करना चाहती है। मीडिया ने भी इस मुद्दे को बेहद आक्रामकता के साथ उठाया। हिंदी पट्टी के लोगों को लगने लगा गया कि आखिरी क्षणों में मोदी ने चुनाव को बदल दिया है। खासकर धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी चिंतित होकर कांग्रेस को कोसने लगे कि मोदी जैसे प्रभावशाली वक्ता को बैठे-बिठाए धार्मिक मुद्दा दे दिया। यह भी उसी तरह का नॅरेटिव है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी हारते हुए चुनाव को विपक्ष के पाले से खींच लाते हैं। इसलिए विपक्ष और बौद्धिक समाज भयभीत रहता है।

कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव में बेखौफ होकर भाजपा और नरेंद्र मोदी की प्रोपेगेंडा राजनीति का डटकर मुकाबला किया। हालांकि राहुल गांधी पिछले दो-तीन सालों से आरएसएस और उनके विचारकों पर हमलावर हैं। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान महाराष्ट्र में उन्होंने सावरकर की देशभक्ति पर सवाल उठाते हुए माफी वीर कहा। तब भी कुछ विश्लेषकों ने इसे सेल्फ गोल कहा था। लेकिन राहुल गांधी अपनी बात पर डटे रहे। उन्होंने कांग्रेस के भीतर के दक्षिणपंथियों को भी स्पष्ट संकेत दिया कि उनकी जरूरत पार्टी को नहीं है। राहुल गांधी विभाजनकारी सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं। इसीलिए संभवतया कांग्रेस ने साहसिक कदम उठाते हुए बजरंग दल को प्रतिबंधित करने की बात की। कर्नाटक की जीत ने कांग्रेस पार्टी के इस कदम पर मुहर लगा दी है। 

क्या यह नई कांग्रेस है, जिसे राहुल गांधी की कांग्रेस कहा जा रहा है? राहुल गांधी पंथनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के रायपुर अधिवेशन का संकल्प पत्र इसकी गवाही देता है। 

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने पिछले दिनों कहा था कि देश की राजनीति का मुद्दा सनातन बनाम सामाजिक न्याय है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की जीत सामाजिक न्याय की राजनीति की जीत है। राहुल गांधी ने अपने चुनाव प्रचार में रायपुर अधिवेशन के बिंदुओं को दोहराया। एक तरफ कांग्रेस ने खड़गे, सिद्दारमैया और डी.के. शिवकुमार जैसे दलित-पिछड़ी जातियों के नेताओं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने पिछड़ी जातियों के नेताओं को हटाकर बी.एल. संतोष और प्रहलाद जोशी जैसे ब्राह्मण नेताओं को आगे रखकर चुनाव लड़ा। कर्नाटक के मतदाताओं ने भाजपा के ब्राह्मणवादी अनुक्रम वाले नेतृत्व को नकार दिया। अब राजनीति की दिशा स्पष्ट होती दिख रही है। इससे संकेत मिलता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित-वंचित जातियों का सबलीकरण और सामाजिक न्याय ही केंद्रीय मुद्दा होगा।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'समाज और आलोचना', 'आजादी और राष्ट्रवाद' , 'आज के आईने में राष्ट्रवाद' और 'आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता' शामिल हैं। साथ ही ये 'अदहन' पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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