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जंतर-मंतर पहुंचे तुगलकाबाद के बेदखल गरीब

दिल्ली के तुग़लकाबाद गांव में पिछले कई सालों से मज़दूर और मज़लूम लोगों पर बेदख़ली की गाज़ गिरती आ रही है। कई दशक पहले ग़रीबी और भूख लिये देश के तमाम राज्यों के गांवों से निकलकर हज़ारों मज़दूर राजधानी दिल्ली अपनी रोटी कमाने आए। बता रहे हैं सुशील मानव

भारी बारिश के बीच बीते 30 अप्रैल, 2023 और 1 मई, 2023 को रात-दिन चले 18 बुलडोज़रों ने तुगलकाबाद में लगभग 2 हज़ार घरों को ज़मींदोज़ कर दिया। इसके ख़िलाफ़ 4 मई को तुग़लकाबाद गांव के हजारों लोग विरोध का झंडा उठाए जंतर-मंतर पहुंचे। लोगों की आंखें आंसुओं से नम थीं। सविता देवी नामक एक महिला तो चक्कर खाकर गिर पड़ी। भयंकर बारिश में भी धरना चलता रहा। धरने पर बैठे मजदूर नारे लगाते रहे और सरकार को पुनर्वास के लिए पुकारते रहे। धरना के अंत में पुनर्वास की मांग को लेकर एक ज्ञापन-पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपा गया।

 

बता दें कि मजदूर आवास समिति बनाम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन एस.एन. भारद्वाज बनाम भारत सरकार के मामले में 24 अप्रैल, 2023 को दिल्ली हाईकोर्ट ने 4 सप्ताह के अंदर घर खाली करवाने के आदेश जारी किए। इस आदेशानुसार दक्षिण-पूर्वी दिल्ली उपायुक्त, उप खंड अधिकारी कालका जी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, डीडीए ने 2000 घरों को आनन-फानन में तोड़ दिया और लगभग दस हजार से ज्यादा लोगों को बेघर कर दिया। इस बेदख़ली के बाद सरकार का कोई भी अधिकारी मज़दूरों का हाल जानने तक नहीं आया और ना ही किसी ने आश्रय या पुनर्वास की बात की।

तुगलकाबाद गांव की रहने वाली कृष्णा देवी बताती हैं कि उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और उनके बच्चे भी नहीं हैं। इस वृद्धावस्था में वह कहां जाएंगी। यह सवाल उनके चेहरे पर है। 

स्वप्ना देवी के ऊपर तो बिजली ही गिर गई। उनके पति घर की तोड़-फोड़ का सदमा बर्दाश्त न कर सके और चल बसे। अभी स्वप्ना देवी के पास न रोजी-रोटी का साधन है और ना ही कोई सहारा। 

नीतू देवी बताती हैं कि किराए पर कोई घर नहीं दे रहा और कोई देता भी है तो किराया आसमान से बातें करता है। इतना अधिक किराया देने में वह असमर्थ हैं। इसलिए उन्होंने तय किया है कि वह अपने टूटे घर के मलबे के ढेर पर ही रहेंगी। 

वाल्मीकि सोसाइटी के माणिक कुमार बताते हैं कि सरकार अब बस अपने कदम रोक ले। वह दो हजार से ज़्यादा घर तोड़ चुकी है। काेई उसे समझाए कि सबको इस तरह बिना पुनर्वास के बेघर न करे। दलित समुदाय के लोगों को कहीं घर नही मिल रहे हैं। कमजोर तबका इस धक्के को सह नही पाएगा। 

जिन लोगों का बसेरा पिछले दो दिनों की कार्रवाई में तोड़ दिया गया है, वे लोग दिल्ली में हो रही भारी बारिश में अपना सरों-सामान भीगते देखने को मज़बूर हैं। बिना घर, बिना छत तेज बारिश में चूल्हा कैसे जले। तेज बारिश में बच्चे भूख से बिलबिलाते हैं। इन लोगों के पास न पैसा है, न ही इतनी बड़ी जनसंख्या को अचानक से कहीं किराये का घर मिल सकता है। बुलडोजर की कार्रवाई से सिर्फ़ उनके घर नहीं टूटे हैं,  बल्कि उनके हौंसले, उनकी उम्मीदें, उनके सपनें, उनकी जिजीविषा भी टूटी है। अपने वज़ूद की तरह टूटे बिखरे घर के मलबे पर खड़ी सपना देवी ने टूटे मन से कहती हैं – “मेरा घर टूट गया।” सामूहिक दुख का सामूहिक दुख-बोध उन्हें बिखरने से बचा लेता है। सामूहिकता की चेतना से भरी सपना देवी कहती हैं– “मेरा घर टूट गया, लेकिन अभी हजारों घर असुरक्षित है। मज़दूर दिवस पर हम खून के आंसू रो रहे है। हमारे पुनर्वास पर सरकार का मौन होना गंभीर सवाल है।”

जंतर-मंतर पर धरना देतीं महिलाएं

सविता देवी अकेले ही अपना परिवार संभालती हैं। उनकी पांच बेटियां हैं। वह सवाल करती हैं –“परिवार की सिंगल वूमेन हूं। पांच बच्चियों को लेकर कहां जाऊं? कहां सिर छिपाऊं?” वहीं मां के बग़ल में खड़ी मासूम बच्चियों की आंखों में गुस्सा और कई सवाल बाग़ी की तरह आवाज़ उठा रहे हैं।

प्रदीप कुमार मौजूदा व्यवस्था में ग़ैरबराबरी और अन्याय के प्रति रोष व्यक्त करते हुए अपना दुखड़ा सुनाते हैं। वह बताते हैं कि इस महंगाई में पाई-पाई जोड़ कर आशियाना बनाया था। लेकिन अशिक्षा और प्रवासी होने की वजह से डीलर्स के हाथों वे लोग लूट लिए गए। वे कहते भी हैं कि सरकार और प्रशासन की डीलर्स के साथ मिलीभगत ने उन्हें कल फिर से बेघर कर दिया।

तुग़लकाबाद गांव निवासी संजय कुमार कहते हैं कि पुनर्वास उनका अधिकार है। वे मांग करते हैं कि नरेला में बने घरों को भी हाल-फिलहाल उन लोगों को आवंटित किया जाए ताकि वो लोग अपने बच्चों और महिलाओं को लेकर अपना सिर तो महफूज रख सकें। 

बताते चलें कि दिल्ली के तुग़लकाबाद गांव में पिछले कई सालों से मज़दूर और मज़लूम लोगों पर बेदख़ली की गाज़ गिरती आ रही है। कई दशक पहले ग़रीबी और भूख लिए देश के तमाम राज्यों के गांवों से निकलकर हज़ारों मज़दूर राजधानी दिल्ली अपनी रोटी कमाने आए। ये मज़दूर पिछले तीन दशकों में बिहार, बंगाल और नेपाल से आए और उन्होंने आवास की बुनियादी आवश्यकता को पूरा करने के लिए स्थानीय जमींदारों से ज़मीन ख़रीदी। वहीं शोषण की हद पर मिलने वाली दिहाड़ी में जब किराए के कमरे लेकर रहने की कूव्वत नहीं रही तो बाद में आए लोग भी तुगलक़ाबाद में झुग्गी डालकर परिवार संग रहने लगे। वे ज्यादातर घरेलू कामगार, निर्माण मज़दूर, दिहाड़ी मजदूर हैं, जो न केवल शहर में अपना जीवनयापन करते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी चलाते हैं। 

तुगलकाबाद गांव में ढाहे गए घरों के बीच साबूत एक धार्मिक स्थल

वहीं इस मामले में मज़दूर आवास समिति एक याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां सुनवाई एक-एक दिन टलती रही। इस बीच घरों को ढाह दिया गया। थक-हारकर मज़दूर आवास संघर्ष समिति ने याचिका वापिस ले ली। 

आवास संघर्ष समिति की मांग है कि दिल्ली में खाली पड़े 28 हजार घरों में तुग़लकाबाद से बेदख़ल किए गये तमाम परिवारों को पुनर्वासित क्यों नहीं किया जा सकता है। लेकिन उनकी मांग पर न तो केंद्र की सरकार जवाब दे रही है और न ही राज्य की सरकार। 

मजदूर आवास संघर्ष समिति के निर्मल गोराना अग्नि ने बताया की सुप्रीम कोर्ट ने बेदख़ली के आदेश भले जारी किए, लेकिन पुनर्वास देने से मना नहीं किया। डीडीए एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को तत्काल पुनर्वास के लिए ज़मीन देना चाहिए। 

निर्मल गोराना कोर्ट के रुख पर सवाल खड़े करते हैं कि सरकार तो असंवेदनशील है ही, कोर्ट ने भी बेदख़ल परिवारों के प्रति अपनी कोई जवाबदेही नहीं समझी। वह दलील देते हैं कि न्यायालय में अंतिम व्यक्ति के हितों और कोर्ट द्वारा दिए गए पूर्व के आदेशों को ध्यान में रखकर फैसले लिए जाते है। लेकिन कोर्ट का यह फैसला दिहाड़ी मजदूरों के परिवारों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। गौर तलब है कि 11 जनवरी, 2023 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने ऐतिहासिक तुगलकाबाद किले के 100 मीटर के क्षेत्र के भीतर सभी “अनाधिकृत” घरों को खाली करने का नोटिस ज़ारी करते हुए निवासियों को 15 दिनों के भीतर अपनी लागत पर परिसर खाली करने को कहा था।

इसके बाद, लोगों ने डिमोलिशन से पहले पुनर्वास के लिए अदालतों से गुहार लगायी। हाईकोर्ट ने डीयूएसआईबी, डीडीए और एएसआई को एक साथ बैठकर समाधान निकालने को कहा था। डीयूएसआईबी ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनके आश्रय गृह विस्थापित लोगों को समायोजित करने के लिए तैयार हैं। 

जबकि आश्रय गृह अस्थायी घर हैं और किसी भी तरह से स्थायी समाधान नहीं हैं। बावज़ूद इसके विस्थापित लोगों को बहुत दूर स्थित आश्रय घरों में भेजा गया है जो उनके कार्यस्थलों और उन स्कूलों से बहुत दूर हैं, जहां उनके बच्चे पढ़ते हैं। इस तरह पीड़ित लोगों को बिना कोई उचित समाधान दिए ही उनके घरों को ज़मीदोंज़ कर दिया गया है।

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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