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आंखों-देखी : बढ़ रही जागरूकता, कम हो रहा धर्म के नाम पर भिक्षाटन का पाखंड

अमूमन दलित जातियों और खेत से जुड़ी बहुजन जातियों में ही यह प्रथा प्रचलित है। आर्थिक उदारीकरण के पहले तक ये जातियां मुख्य रूप से खेती से जुड़े कामों को करके ही अपना गुज़ारा करती थीं और दिहाड़ी में भी कैश के बजाय अनाज मिलता था। बता रहे हैं सुशील मानव

पूर्वी उत्तर प्रदेश यानि पूर्वांचल के अधिकांश जिलों में धार्मिक भिक्षाटन होता है। प्रयागराज, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, जौनपुर, सुल्तानपुर, गोंडा, बहराइच, गोरखपुर, देवरिया, बनारस, मिर्ज़ापुर, भदोही, ग़ाज़ीपुर आदि कई जिलों में यह प्रथा अब प्रचलित है। हालांकि गोरखपुर निवासी दीपक बताते हैं कि उनके यहां गर्मियों में पहले बहुत लोग देवी माई का भीख मांगने आते थे। अब भी आते हैं, लेकिन उतने नहीं। करीब 60-70 प्रतिशत तक की कमी आई है। 

दरअसल, मेरे रू-ब-रू जेठ का महीना, खड़ी दोपहरी, प्रचंड धूप है। लू भी चल रही है। तापमान है 42-43 डिग्री सेल्सियस। क़रीब तीन दर्ज़न औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ ढोल की थाप पर देवी गीत गाते हुए आंचर फैलाए महारानी माई का भीख मांग रही हैं। एक गांव के किसी टोले में ये  प्रवेश करती हैं और फिर 4-6 के समूह में बंटकर अलग-अलग घरों से मांगते हुए एक जगह इकट्ठा होती हैं। मांगा हुआ अनाज एक बोरी में इकट्ठा करके पुरुष के हवाले कर देती हैं और फिर दूसरे टोले में घुस जाती हैं। इस तरह फिर एक गांव से होते हुए दूसरे गांव तीसरे गांव और पूरे तहसील में कई गांवों में मांगती हैं।   

राजेंद्र पटेल बताते हैं कि महारानी माई का भीख मांगने के लिए दिन का हिसाब लिया जाता है। ढाई दिन, पांच दिन, सात दिन, ग्यारह दिन। सबसे ज़्यादा प्रचलन ढाई दिन भीख मांगने का है। ढाई दिन यानि दो दिन पूरा और तीसरे दिन का आधा दिन। ढाई दिन में जितना मांग सकते हैं, बस उतना ही लेते हैं। उतनें में ही पूरा प्रयोजन निपटाते हैं। 

रामसजीवन भारतीया राजमिस्त्री का काम करते हैं और राम प्रकाश भारतीया दिहाड़ी मज़दूर हैं। उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले के कड़ा मानिकपुर स्थित शीतला देवी की मनौती उतारने के लिए इनके परिवार और रिश्तेदार की औरतें धार्मिक भिक्षाटन कर रही हैं। दरअसल इस प्रयोजन के लिए सिर्फ़ परिवार या समुदाय भर नहीं, रिश्तेदार भी बुलाए जाते हैं। मूलतः औरतें और लड़कियां भिक्षा मांगती हैं। पुरुष भी साथ होते हैं, लेकिन वे ढोल-ताशा बजाते हैं या फिर साइकिल सम्हालते हैं। पुरुषों की संख्या अधिक होने पर वे भी भिक्षा मांगते हैं। विवाहित स्त्रियां अपनी धोती-साड़ी के कोंछ (आंचल के कोने), लड़कियां दुपट्टे में मांगती हैं और पुरुष गमछे में मांगते हैं। फिर प्राप्त अनाजादि को बोरी में इकट्ठा किया जाता हैं। अनाज की बोरी पुरुष साइकिल पर लेकर चलता है।

प्रतापगढ़ जिले के खाखापुर गांव के अरविंद कुमार के यहां पिछले साल महरानी माई का भीख मांगा गया था। कुर्मी समुदाय से आने वाले अरविंद बताते हैं कि कुछ साल पहले उनकी बेटी की पूरी देह में माता (चेचक) निकल आई थी। तब घरवालों ने देवी माई का भीख मांगकर धाम जाने, रोट चढ़ाने की मनौती मानी थी। तब से वो मनौती अधूरी पड़ी थी। अरविंद बताते हैं कि उन्होने पिछले साल जब बेटे की शादी तय की तो बड़े-बुजुर्गों ने सलाह दी  कि पहले बेटी की मनौती उतार लो, फिर शादी फानो। तो उन्होंने अपने रिश्तेदारों की औरतों को बुलवाया और सबने मिलकर पूरे पांच दिन देवी माई का भीख मांगा। फिर एक बस बुक करके सबको शीतला माई के धाम लेकर गए, वहां कड़ाही चढ़ी। अरविंद कहते हैं कि मनौती उतारने के बाद बेटे की शादी की, जो देवी माई की कृपा से बिना किसी बाधा के संपन्न हो गई। 

आंचर या सूप से दिया लिया जाता है महारानी माई का भीख 

इस परंपरा में दान देनेवाली औरतें अमूमन अनाज को अपने आंचर से या फिर सूप से मांगने वाली स्त्री के आंचर में देती हैं। एक ब्राह्मण स्त्री शोभा पांडेय बताती है कि भिखारी को भीख देने और महारानी माई को भीख देने, दोनों में फर्क होता है। वह ज़ोर देकर कहती हैं कि भिखारी को भीख देने में दाता का भाव प्रबल होता है। वहां श्रद्धा नहीं, करुणा होता है। इसीलिए जिस पात्र में हम खाते हैं, उस पात्र से यानि कटोरी, कटोरा, भऊंकी, थाली आदि से उन्हें अनाज, चावल आटा आदि दिया जाता है। 

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के फूलपुर तहसील के एक गांव पाली में भिक्षाटन करती महिलाएं

धन की कमी या सामूहिकता का बोध

अमूमन दलित जातियों और खेत से जुड़ी बहुजन जातियों में ही यह प्रथा प्रचलित है। आर्थिक उदारीकरण के पहले तक ये जातियां मुख्य रूप से खेती से जुड़े कामों को करके ही अपना गुज़ारा करती थीं और दिहाड़ी में भी कैश के बजाय अनाज मिलता था। ऐसे में इन लोगों के पास बहुत पैसा तो होता नहीं था। तो धार्मिक यात्रा के लिए भिक्षाटन करना पड़ता था। खेत के कामों में अभी भी मज़दूरी बहुत कम मिलती है। अभी कुछ जातियों या कुछ लोगों के पास पैसा आने से इस प्रचलन में कुछ कमी ज़रूर आई है। लेकिन इस प्रथा से जो एक मानसिक कंडीशनिंग हुई है, उसके चलते संपन्न परिवार के लोग भी धार्मिक भिक्षाटन करते हैं। 

क्या है वजह?

सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ी जातियों में कुपोषण और शोषण के चलते असाध्य और मौसमजनित मानसिक शारीरिक बीमारी होना आम बात है। तो अक्सर बीमारियों से निजात पाने और बच्चा होने और शादी होने के लिए भी देवी मां के धाम में कड़ाही चढ़ाने की मनौती मान दी जाती है। फिर परिवार और रिश्तेदारों के साथ देवी धाम जाने के लिए किराया भाड़ा और वहां होने वाले ख़र्च को मैनेज करने के लिए फिक्स मियाद का धार्मिक भिक्षाटन किया जाता है। पहले जहां इस मियादी धार्मिक भिक्षाटन के पीछे का मुख्य कारण मूल रूप से आर्थिक ही था। लेकिन फिर इस प्रक्रिया से उपजी एक धार्मिक मानसिक कंडीशनिंग ने उसमें श्रद्धा और भाव का एंगल भी जोड़ दिया। 

सेवइत निवासी पंडित पवन कुमार बताते हैं कि पहले के समय में कोई भी धार्मिक काम अकेले नहीं होता था। सामूहिक या सामाजिक होता था। वह कहते हैं कि अकेले दम पर कुछ करने से मन में अहम् की भावना बलवान होने लगती है कि आपने देवी-देवता के लिए कुछ किया है। यानि आप इस योग्य हो गए हैं कि देवी-देवता के लिए भी कुछ कर सकते हैं। इस भाव के आते ही व्यक्ति में भक्ति और श्रद्धा का क्षरण हो जाता है। और उसमें घमंड आ जाता है।   

बहरहाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह प्रचलन नहीं है। बुलंदशहर जिले के निवासी सुशील गौतम बताते हैं कि उनके यहां स्त्रियां तो नहीं, पर पुरुष लोग मांगते हैं। वे लोग बैलगाड़ियां लेकर एक जिले से दूसरे जिले तक धार्मिक भिक्षा मांगते हैं। और बैलगाड़ी में नधे बैल को शिव की सवारी नंदी बताते हैं। अधिकांशतः ओबीसी और दलित जातियों के लोग ही ऐसा करते हैं। इसमें औरतें शामिल नहीं होतीं। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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