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‘कटहल’ : निर्देशक का उच्च जाति प्रेम छिपाए नहीं छिपता

इस फिल्म को देश की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था पर व्यंग्य के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन एक ऊंची जाति के पुरुष और एक नीची जाति की महिला के बीच प्रेम को दिखाकर वह इस धारणा को मजबूती देती दिखाई पड़ती है कि ऊंची जातियां दया और करुणा का सागर है और जाति प्रथा का अंत करना चाहतीं हैं। बता रहे हैं नीरज बुनकर

‘कटहल – ए जैकफ्रूट मिस्ट्री’ भारत के एक काल्पनिक कस्बे मोबा की कहानी कहती है। कथानक में हास्य और व्यंग्य दोनों है। कहानी यह है कि एक प्रभावशाली विधायक के घर में लगे कटहल के पेड़ से दुर्लभ ‘अंकल होंग’ प्रजाति के दो कटहल गायब हो जाते हैं। अब इलाके की पुलिस पर जबरदस्त दबाव है। उसे वह कटहल जल्द-से-जल्द ढूंढ निकालने हैं, क्योंकि अगर वे पक गए तो चोर उन्हें खा लेगा। 

फिल्म का निर्देशन यशोवर्धन मिश्रा ने किया है और उन्होंने ही अपने पिता अशोक मिश्रा के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा लिखी है। फिल्म का निर्माण शोभा कपूर, एकता कपूर, गुनीत मोंगा और अचिन जैन ने बालाजी मोशन पिक्चर्स और सिखया एंटरटेनमेंट के बैनर तले किया है। इसमें सान्या मल्होत्रा ने मज़बूत दिल-जिगर वाली इंस्पेक्टर महिमा बसोर का किरदार निभाया है। अम्बरीश सक्सेना प्रमुख संदेही बिरवा माली बने हैं। विजय राज़ ने विधायक और अनंत वी. जोशी ने महिमा के प्रेमी पुलिस कांस्टेबल की भूमिका निभाई है। राजपाल यादव पत्रकार हैं। ब्रिजेंद्र कला श्रीवास्तव की भूमिका में हैं। नेहा सराफ कांस्टेबल कुंती परिहार की भूमिका में हैं और रघुबीर यादव गुलाब सेठ बने हैं। इन सभी ने अपनी-अपनी भूमिकाओं का शानदार निर्वहन किया है। 

महिमा बसोर, जो कि एक कार्यकुशल और होशियार पुलिस इंस्पेक्टर हैं, को कटहल चोरी मामले की जांच सौंपी जाती है। जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगता है और वह यह कि माली, जिसे कुछ ही समय पहले काम से हटा दिया गया था और जो मुख्य संदेही है, की लड़की गायब है। महिमा को लगता है कि लड़की के गायब होने और कटहलों के गायब होने में कुछ संबंध है। लेकिन पुलिस अधिकारी लड़की के गायब होने के मामले में कोई रूचि ही नहीं ले रहे हैं। वे केवल कटहल के मामले को सुलझाने में लगे हुए हैं।  

महिमा एक चाल चलती है। वह अपने अधिकारियों को यह विश्वास दिला देती है कि माली की लड़की ही कटहल चोर है। उसे उम्मीद है कि उससे पुलिस लड़की को खोजने का प्रयास शुरू कर देगी, उसके गायब होने का रहस्य सुलझ जाएगा और साथ ही कहने को यह भी होगा कि पुलिस कटहल चोर को ही तो ढूंढ रही थी। महिमा कटहल और लड़की दोनों के गायब होने के मामलों की जांच में भिड़ जाती है और इससे बवाल मच जाता है। फिल्म व्यंग्यात्मक ढंग से सरकार के काम करने के अजीबोगरीब तरीकों और उसके कारण होने वाली गड़बड़ियों को उजागर करती है। वह यह भी बताती है कि पुलिस को किस तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है। उसकी प्राथमिकताओं में किस तरह की असंगतियां होतीं हैं और लालफीताशाही के कारण मज़ेदार हालात बनते हैं। फिल्म मज़ाकिया है, उसके कथानक में अप्रत्याशित मोड़ हैं और वह समाज पर टीका-टिप्पणी भी है। सरसरी निगाह से देखने से ऐसा लगता है कि ‘कटहल – ए जैकफ्रूट मिस्ट्री’ मनोरंजक तरीके से सामाजिक विक्षिप्ताओं और विसंगतियों को उजागर करती हुई फिल्म है।

अनुसंधान अधिकारी महिमा बसोर दलित है। वह ऊंची जाति के कांस्टेबल सौरभ द्विवेदी की ओर आकर्षित है। महिमा को नीची जाति की एक लड़की के गायब हो जाने की जांच करना है और वह इसलिए क्योंकि लड़की का गायब होना, कटहल के गायब होने से जुड़ा हुआ है। महिमा निर्धनों के प्रति करुणा भाव से परिपूर्ण है और वह गलतियों के लिए अपने कांस्टेबल प्रेमी को फटकारने से भी नहीं सकुचाती। कभी-कभी वह जान-बूझकर अपने चेहरे पर ऊटपटांग भाव लाती है– जैसे अपने दांत दिखाना। शायद इसका उद्देश्य पात्र के मज़ाकिया चरित्र को रेखांकित करना है। 

‘कटहल – ए जैकफ्रूट मिस्ट्री’ के एक दृश्य में सान्या मल्होत्रा इंस्पेक्टर महिमा बसोर के पात्र में

इस फिल्म को देश की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था पर व्यंग्य के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन एक ऊंची जाति के पुरुष और एक नीची जाति की महिला के बीच प्रेम को दिखाकर वह इस धारणा को मजबूती देती दिखाई पड़ती है कि ऊंची जातियां दया और करुणा का सागर है और जाति प्रथा का अंत करना चाहतीं हैं। कांस्टेबल मिश्रा परेशान है कि जो कार उसने अपनी लड़की को दहेज़ में देने की लिए खरीदी थी, वह चोरी हो गयी है। दहेज़ देने की अनिवार्यता से मुक्ति और अपनी परेशानी के हल के लिए वह द्विवेदी से अपनी लड़की की शादी करवाने का प्रयास करता है। एक अन्य कांस्टेबल, पहाड़ सिंह, मिश्रा के प्रस्ताव को और आकर्षक बनाने के लिए द्विवेदी को बताता है कि मिश्र घृत कौशिक गोत्र का सरयूपारीण ब्राह्मण है। लेकिन द्विवेदी के जवाब से यह जाहिर है कि वह जाति व्यवस्था को ख़ारिज करता है और उसमें यकीन नहीं करता। वह जाति प्रथा से जनित अवरोधों की अवहेलना करता है, जिससे उसकी उदार और प्रगतिशील मानसिकता और उभर कर सामने आती है। 

द्विवेदी का पिता महिमा की निम्न जाति का प्रश्न तो उठाता है, लेकिन उसकी मुख्य चिंता यह है कि महिमा उसके लड़के से बड़ी अधिकारी है। अर्थात, अगर महिमा का पद नीचा होता तो वह उसे सहर्ष बहू के रूप में स्वीकार कर लेता। इस बीच अपनी सारी सीमाओं के बावजूद, द्विवेदी, महिमा की मदद करने की कोशिश करता है जिसके नतीजे में उसके ऊपर शारीरिक हमला होता है। महिमा को उससे हमदर्दी है और वह अपने कांस्टेबल प्रेमी के प्रति अपने प्रशंसा भाव को अभिव्यक्त करने के लिए कहती है– “ओ हैंडसम, हवलदार मुझे तुम पर गर्व है।” यह ध्यान देने योग्य बात है कि वह ऊंची जाति के अपने कांस्टेबल प्रेमी के लिए ‘हैंडसम’ शब्द का लगातार इस्तेमाल करती है। इससे इस धारणा को मजबूती मिलती है कि शारीरिक सुंदरता पर ऊंची जातियों का विशेषाधिकार है। उच्च जातियों की यह एकतरफा तारीफ, सामाजिक ऊंच-नीच को चिरायु बनाती दिखती है।  

कांस्टेबल द्विवेदी का पात्र ‘योग्यता’ की धारणा का प्रतिनिधित्व करता है। वह खूब मेहनत करता है, मगर उसकी पदोन्नति नहीं होती। लेकिन निम्न जाति की कांस्टेबल महिमा बसोर पहले इंस्पेक्टर बन जाती है और अंततः डीएसपी। लेकिन वह डीएसपी पद पर अपनी पदेन्नति को अस्वीकार कर देती है। वह अनुरोध करती है कि उच्च जाति के उसके प्रेमी को पदोन्नत कर दिया जाए ताकि दोनों का दर्जा बराबर हो जाए। वह अपने वरिष्ठ अधिकारी से कहती है, “सर, मेरे प्रमोशन से ज्यादा महत्वपूर्ण है सौरभ का प्रमोशन। वो दो बार पीएससी की लिखित परीक्षा पास कर चुका है, पर वह इंटरव्यू में पास नहीं हो पाता।” इससे निर्देशक का उच्च जाति प्रेम जाहिर होता है। 

फिल्म जो दिखाती है, असल में उसका उल्टा होता है। अक्सर निम्न जातियों के उम्मीदवारों को साक्षात्कार में कम अंक मिलते हैं और उन्हें “उपयुक्त नहीं पाया गया” कहकर नियुक्ति नहीं दी जाती है। लेकिन इस मामले में लिखित परीक्षा में अपनी योग्यता साबित करने के बाद भी द्विवेदी का प्रमोशन नहीं होता। ऐसा लगता है कि निर्देशक को ईडब्ल्यूएस (आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्ग) से काफी सहानुभूति है। महिमा अपने उच्च जाति के प्रेमी की जितनी चिंता करती है, शायद वह अपने समुदाय की उतनी चिंता नहीं करती।

फिल्म की मुख्य महिला किरदार के चरित्र का चित्रण में वह गहराई नहीं है, जो होनी चाहिए। वह कटहल खोजने के बहाने गुमशुदा लड़की की तलाश इसलिए करती है, क्योंकि उससे यह वायदा किया गया है कि अगर वह सफल हो जाती है तो उसके उच्च जाति के प्रेमी को पदोन्नत कर दिया जाएगा। वह स्वप्रेरणा से ऐसा नहीं करती। निर्देशक एक व्यक्ति के रूप में महिमा के चरित्र की पड़ताल नहीं करता। वह उसके दलित समुदाय और उसके परिवार से उसके संबंधों के बारे में कुछ नहीं बताता। उसे एक ऐसे अधिकारी के रूप में चित्रित किया गया है, जिसे अकेलापन भाता है और जो केवल अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित है। जब ऊंची जाति का विधायक उसके साथ अनादरपूर्ण व्यवहार करता है, उसे झिड़कता है और विधायक के परिवारवाले उसे नीची निगाहों से देखते हैं, तब भी वह कुछ नहीं कहती। उसे गलीचे पर कदम न रखने के लिए कहा जाता है, लेकिन वह इस अपमान को भी चुपचाप पी जाती है और विधायक और उसके परिवार से सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखते हुए जांच जारी रखती है। इसके विपरीत, विदु विनोद चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘एकलव्य : द रॉयल गार्ड’ (2007) में संजय दत्त द्वारा अभिनीत पात्र, जो दलित समुदाय का डीएसपी है, जब उच्च जाति के एक परिवार की हवेली में जांच करने जाता है, तब वह किसी प्रकार का तिरस्कार बर्दाश्त नहीं करता और साधिकार हवेली के ऊंची जाति के मालिक के बगल में बैठता है। समानता का यह दावा, हाल में रिलीज़ वेब सीरीज ‘दहाड़’ में भी दृष्टव्य है। 

‘कटहल’ में माली का पात्र न तो बहुत दिखाई पड़ता है और ना ही कथानक को आगे बढ़ाने में उसकी कोई ख़ास भूमिका है। वह अपने समुदाय से जुदा है। माली का नाम है बिरवा और उसकी लड़की का नाम है अमिया। ये दोनों नाम, नीची जातियों के लोगों के नामों के संबंध में रूढ़ धारणाओं को पुष्ट करते हैं। इससे पता चलता है कि ऊंची जातियों की कल्पना में भी वे निम्न जातियों से कितना दूर हैं।

ऐसा लगता है कि यह फिल्म ऊंची जातियों द्वारा, ऊंची जातियों के लिए और ऊंची जातियों के बारे में बनाई गई है। उदाहरण के लिए, एक दृश्य में इंस्पेक्टर महिमा बसोर को एक ठाकुर की बारात के निकलने के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए भेजा जाता है। बारात में कुछ लोग हवा में गोलियां दाग रहे हैं, जो गैर-कानूनी है। वह इसे रोकना चाहती है, लेकिन ऊंची जाति का कांस्टेबल उसे इस पचड़े में न फंसने की सलाह देता है। अब निर्देशक को यह दिखाना था कि महिमा अपने समुदाय के प्रति सहानुभूति रखती है, इसलिए बारातियों द्वारा उड़ाए जा रहे नोटों को बटोर रहे गरीब भिखारियों की जब द्विवेदी पिटाई लगा रहा होता है तो महिमा उसे रोकती है। लेकिन अगले ही दृश्य में महिमा की अपने समुदाय के प्रति सहानुभूति गायब हो जाती है और ऊंची जाति का उसका प्रेमी, जिसे अपने किए पर पछतावा है, फिर फोकस में आ जाता है। वह अचानक बहुत दयालु बन जाता है। कांस्टेबल पहाड़ सिंह अपने साथी मिश्रा से कहता है, “अब कौए भी कबूतरों को बता रहे हैं कि व्यवहार कैसे करना चाहिए।” मिश्र का जबाब है, “ये मुझसे तो ऐसा कहकर देखे। मैं इस बसोर से लड़ पडूंगा, फिर चाहे मैं सस्पेंड क्यों न हो जाऊं।” ऊंची जातियों के इस अहंकार के चलते, दलित मुख्य पात्र के एक मज़बूत और स्वीकार्य व्यक्ति के रूप में उभरने की संभावना कम हो जाती है।   

फ़िल्म का गीत “मथुरा में रहना है तो राधे-राधे कहना होगा”, उसके कथानक से मेल नहीं खाता। उसके बोल, व्यंग्यपूर्ण हैं, लेकिन वे हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े लगते हैं, भले ही मजाकिया लहजे में। ऐसा लगता है कि गीत यह कह रहा है कि बिरवा माली और इंस्पेक्टर महिमा जैसे लोगों को, भले ही उनका दर्जा कुछ भी हो, समाज में अपनी स्वीकार्यता बनाने के लिए उच्च जातियों द्वारा स्थापित नियमों और वर्जनाओं का पालन करना ही होगा। इस गीत से कोई भी यह सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि यह फिल्म समाज की व्यंग्यात्मक समालोचना है या हिंदुत्व की विचारधारा का चित्रण? 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल) 


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लेखक के बारे में

नीरज बुनकर

लेखक नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी, नॉटिंघम, यूनाईटेड किंगडम के अंग्रेजी, भाषा और दर्शनशास्त्र विभाग के डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। इनकी पसंदीदा विषयों में औपनिवेशिक दौर के बाद के साहित्य, दलित साहित्य, जाति उन्मूलन, मौखिक इतिहास व सिनेमा आदि शामिल हैं

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