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एक नया नॅरेटिव ‘इंडिया’

देश भर में भाजपा द्वारा एक नॅरेटिव चलाया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए आएगा तो मोदी ही। हालांकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन असल परिवर्तन तब दिखाई दिया जब कर्नाटक में कांग्रेस ने भाजपा को बुरी तरह से परास्त कर दिया। बता रहे हैं विद्याभूषण रावत

अगले वर्ष 2024 में होने वाला आम चुनाव देश के भविष्य के लिए बड़े महत्व का है, क्योंकि इसके परिणाम यह तय कर देंगे कि हम किस प्रकार के भारत में रहेंगे और क्या सत्ता उन्ही संवैधानिक मूल्यों पर चलेगी, जिनकी स्थापना से हमारा लोकतंत्र बना है। आजादी के बाद भारत में इतना बड़ा सांप्रदायिक विभाजन शायद ही कभी रहा हो, जिसे सत्ता का खुले तौर पर संरक्षण प्राप्त हो। अक्सर राजनीतिक चर्चा के समय हम आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बुरा दौर मानते हैं, लेकिन ऐसा कहने वाले वे लोग अधिक हैं, जिन्हे वर्तमान समय में सत्ताधारियों के कारनामों से कोई परेशानी नहीं है। 

साफ है कि वे लोग यह भूल जाते हैं कि आपातकाल के दौरान तत्कालीन सरकार देश के लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ नहीं लड़वा रही थी और न ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रही थी, जैसे आज हो रहा है। असल में संविधान के मूल अधिकारों में हमारे संवैधानिक कर्तव्यों की खूबसूरत अध्याय इसी दौर में आया। आंबेडकरवादी विचारक चंद्रभान प्रसाद तो यहां तक कहते हैं कि आपातकाल का अध्याय दलितों की प्रगति के हिसाब से बहुत अच्छा था या यह कहें कि उनके लिए स्वर्णिम काल था। ऐसा कहने के पीछे उनका तर्क है कि इस दौरान दलित वर्ग के लिए आरक्षित पदों पर ईमानदारी से नियुक्तियां की गईं। इसमे कोई संदेह नहीं कि आपातकाल में लोगों के अधिकारों का हनन हुआ, लेकिन आज के दौर में तो अधिकारों का न केवल हनन हो रहा है, अपितु उसको सही ठहराने के लिए संवैधानिक संस्थाओं और मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। कम-से-कम अभी तक के पूर्व प्रधानमंत्रियों पर आप सीधे-सीधे सांप्रदायिक और जातीय घृणा को बढ़ाने का आरोप तो नहीं लगा सकते हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार पिछले नौ वर्षों से सत्ता में काबिज है और उसके क्रियाकलापों से देश भर के दलित, पिछड़े व आदिवासी वाकिफ हैं कि उनके अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है। वह चाहे किसान आंदोलन हो या राष्ट्रीय नागरिक राजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरुद्ध आंदोलन, देश भर में लोगों ने सरकारी दमन के विरुद्ध संघर्ष किया, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकारें बनीं और बहुत से राज्यों में दूसरे दलों में विघटन कर निर्वाचित सरकारों को गिरा दिया गया। 

देश भर में भाजपा द्वारा एक नॅरेटिव चलाया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए आएगा तो मोदी ही। हालांकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन असल परिवर्तन तब दिखाई दिया जब कर्नाटक में कांग्रेस ने भाजपा को बुरी तरह से परास्त कर दिया। कर्नाटक में भाजपा ने अपने सारे हथकंडे अपनाए, जिसमें विपक्षी नेताओं के घर पर छापे से लेकर उनकी गिरफ़्तारी तक शामिल है। कर्नाटक की हार ने भाजपा को अंदर से हिलाकर रख दिया है और उस नॅरेटिव को बदलने के लिए वह नित नए-नए नॅरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रही है। 

भाजपा को अपने मीडिया प्रबंधन और नरेंद्र मोदी के ब्रांड पर बहुत भरोसा है, लेकिन बिहार के नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के एक होने के कारण उनकी अनेक रणनीतियों पर पानी फिर गया। नीतीश कुमार द्वारा एनडीए से नाता तोड़ने के बाद से ही भाजपा परेशान है, क्योंकि उसे यह पता है कि उसे चरम की प्राप्ति हो चुकी है और अब किसी भी राज्य में उन्हें जितनी सीटें मिली हैं, उससे अधिक मिलने की संभावना ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार एनडीए के लिए प्रमुख प्रदेश था। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को अधिकतम सीटें मिल चुकी हैं। भाजपा या एनडीए के लिए अब राष्ट्रीय नॅरेटिव बनाना जरूरी हो गया है, लेकिन भाजपा जानती है कि केवल सोशल मीडिया से काम नहीं चल सकता और केवल हिंदुत्व या मुसलमान विरोधी नॅरेटिव अथवा केवल मोदी का नाम ही नैया पार नहीं लगा सकता, इसलिए वह अलग-अलग तरीके से काम कर रहे हैं। मसलन, एक तरफ क्षेत्रीय दलों को तोड़ा जा रहा है, दूसरी तरफ सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग कर उन्हें अपनी तरफ मिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। मसलन, महाराष्ट्र जैसे राज्य में अभी तक सभी दलों को तोड़-फोड़ करने के बाद भी भाजपा चैन से नहीं बैठ पाई है। शिव सेना को तोड़ने के बाद भी भाजपा को महाराष्ट्र मे व्यापक जनसमर्थन का भरोसा नहीं है और इसलिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को पूरी तरह से तोड़ दिया गया। लेकिन शरद पवार ने हार नहीं मानी है। 

बेंगलुरु में बैठक के दौरान मौजूद नेतागण

विपक्षी दलों की जो पहली बैठक पटना में हुई थी, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी थी। लेकिन भाजपा उनके अंतर्विरोधों को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी, इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम राज्य स्तर पर कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों के तनाव का इस्तेमाल करने की कोशिश की। 

विपक्षी एकता की मुहिम में नीतीश कुमार द्वारा बुलाई गई पटना की बैठक में अरविंद केजरीवाल शामिल तो हुए, लेकिन दिल्ली राज्य की शक्ति के संदर्भ में केंद्र सरकार के अध्यादेश के प्रश्न पर मुद्दा बनाकर कांग्रेस को सीधे संदेश भेज दिया कि यदि वह अध्यादेश के मामले में उनका समर्थन नहीं करेगी, तो वह इस गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगे। परिणामस्वरूप कांग्रेस ने अपने अंदरूनी चर्चाओं के बाद दिल्ली अध्यादेश के विषय में विरोध करने का निर्णय किया। इस निर्णय का असर यह हुआ कि केजरीवाल बड़े जोश के साथ बेंगलुरु की बैठक में शामिल हुए। 

पटना की बैठक विपक्षी दलों के साथ आने के प्रयासों की शुरुआत थी। इनमें से अनेक दल तो आपस में पहले से सफलतापूर्वक तालमेल कर चुके हैं। जैसे केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के बीच आपसी समझ है। तमिलनडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), कांग्रेस, वामपंथी दलों और विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके) का गठबंधन मजबूती और सफलता के साथ चल रहा है। इसी प्रकार से बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल यूनाइटेड (जदयू), कांग्रेस और भाकपा माले सफलतापूर्वक गठबंधन में हैं। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस पहले से गठबंधन की सरकार चला रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) का गठबंधन मजबूती से बना हुआ है।

उत्तर प्रदेश इस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है। समाजवादी पार्टी ने अपने स्तर पर यहां पर एक गठबंधन बनाया था, जिसमें पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाली पार्टियों– राष्ट्रीय लोकदल और चंद्रशेखर आजाद के साथ तालमेल की बात चल रही थी। अखिलेश पहले कांग्रेस के साथ बात करने के लिए राजी नहीं थे। बसपा अभी भी अपनी अलग राजनीति कर रही है और विपक्षी एकता की मुहिम से हमेशा से ही दूर रही है। 

पटना में नीतीश कुमार द्वारा बुलाई गई बैठक में बिहार की कई पार्टियां नहीं थीं। दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान का न होना भी लोग नए गठबंधन की कमजोरी मान रहे हैं। लेकिन यदि पुराने रिकार्ड को देखा जाए तो इन नेताओं का इतिहास कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है और वे स्वयंभू हो गए हैं, जो यह सोचते हैं कि उनके पीछे उनकी जाति के लोग चलते रहेंगे। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान ने बिल्कुल अंतिम समय में भाजपा का दामन थाम लिया। 

बेंगलुरु में महागठबंधन की बैठक में सोनिया गांधी के आने से उसकी ताकत बढ़ गई। इसके अलावा पटना में 16 दलों की भागीदारी के बाद अब इसकी संख्या 26 हो चुकी है। बेंगलुरु की बैठक में पहली शाम को सोनिया गांधी ने जो रात्रिभोज दिया, उससे पार्टियों के नेताओं को एक-दूसरे को समझने और जानने का अवसर मिला। बेंगलुरु की बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने की। 

बेंगलुरु की बैठक से साफ जाहिर हो गया कि कांग्रेस इसमें बड़ी भूमिका निभाने जा रही है। साथ ही यह भी कि गांधी परिवार अभी भी कुर्सी की राजनीति से दूर ही रहेगा। हालांकि संकेतों में यह जरूर कहा जा रहा है कि यदि परिस्थतियां अनुकूल रहीं तो कांग्रेस की तरफ से मल्लिकार्जुन खड़गे ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। 

बेंगलुरु की बैठक में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जिसमें सबसे बड़ा था कि इस महागठबंधन का नाम क्या होगा। चर्चा के बाद सभी पार्टियां इस नतीजे पर पहुंचीं कि गठबंधन का नाम आई.एन.डी.आई.ए. यानि ‘इंडिया’ होगा, जिसका पूरा नाम है– इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायेंस। 

जैसे ही इस नाम की आधिकारिक घोषणा हुई देश भर में एक सकारात्मक संदेश चला गया। चूंकि आज के चुनावों में नॅरेटिव का बहुत महत्व है और नारों का भी, जो लोगों को ध्यान आकृष्ट करते हों। 

नहीं भूला जाना चाहिए कि 2014 के बाद से ही भारत में चुनावों के तौर-तरीकों में बहुत फेरबदल हो चुका है। अब सोशल मीडिया और लोगों की राय महत्वपूर्ण है। इस लड़ाई में जो जीत गया, वह आधी जंग जीत गया। इतने वर्षों से भाजपा और नरेंद्र मोदी एजेंडा तय कर रहे थे, लेकिन पहली बार ऐसा लगा कि विपक्ष एजेंडा तय कर रहा है। अब विपक्ष ने एक नया टैगलाइन तय कर दिया है– ‘जीतेगा INDIA [भारत] ही’। मौजूदा सियासत के लिहाज से यह महत्वपूर्ण है कि इससे पहले भारत और इंडिया शब्द का इस्तेमाल भाजपा करती रही थी। 

बहरहाल, विपक्षी दलों ने तय किया है कि 11 सदस्यों की एक समन्वय समिति बनेगी और दिल्ली में उसका एक सचिवालय होगा। इसके साथ ही चुनाव प्रचार की तैयारी से संबंधित फैसला भी जल्द ही लिया जाएगा। अगली बैठक मुंबई मे बुलाई गई है। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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