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उत्तर प्रदेश : अंतिम संस्कार के लिए जलाने को विवश किए जा रहे दलित-बहुजन

प्रयागराज के फाफामऊ गंगा घाट पर बहुत दूर तक हजारों लाशें दफ़नाई गई हैं, जो पुल के ऊपर से ही दिख जाती हैं। ये कब्रें हाल की प्रतीत होती हैं। मतलब इन कब्रों में नवंबर-दिसंबर में गंगा का जलस्तर कम होने के बाद निनार हुए घाट पर पिछले 6-7 महीनों में दफ़नाई गई लाशें हैं। बता रहे हैं सुशील मानव

पूर्वांचल के इलाके में अधिकांश दलित-बहुजन स्वजनों की मृत्यु के उपरांत उन्हें गंगा किनारे दफना देते हैं। वहीं कुछ जो समृद्ध होते हैं, वे जलाते हैं। लेकिन ऐसे अपवाद ही होते हैं। जलाने वालों में अधिकांश ऊंची जातियों के लोग ही होते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिला प्रशासन गंगा किनारे दफनाने की अनुमति नहीं दे रहा।

दरअसल, बीते जून के प्रारंभ में ही प्रयागराज जिला प्रशासन द्वारा जिले में गंगा के फाफामऊ घाट पर दफ़न लाशों को निकालकर उनको जलाने का फ़रमान ज़ारी किया गया। इसके लिए 10 कर्मचारियो की नियुक्ति भी की गई। साथ ही घाट पर पुलिसकर्मियों को निगरानी पर लगा दिया गया कि कोई लाश न दफ़नाने पाए। अब आलम यह है कि जो लोग लाश के साथ लकड़ियां लेकर आ रहे हैं, सिर्फ़ उन्हें ही घाट पर जाने की इज़ाज़त दी जा रही है। जो लोग बिना लकड़ियों के लाश लेकर आ रहे हैं, उन्हें वापिस लौटा दिया जा रहा है। वहीं घाट पर कई क़ब्रें हैं, जिन्हें लाशों को दफ़नाने के लिए हाल ही में खोदा गया था, लेकिन प्रशासन द्वारा न दफ़नाने देने के फरमान के चलते ये भरी नहीं जा सकीं। 

प्रदूषण का तर्क दे रही सरकार

प्रयागराज के नवनिर्वाचित महापौर गणेश केसरवानी का कहना है कि फाफामऊ घाट पर दफ़नाए गए शवों की वजह से गंगा में प्रदूषण फैल रहा है। प्रदूषण न फैलने पाए, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी  नगर निगम की है। इसके लिए दफ़नाए गए शवों को कब्र से निकालकर उन्हें जलाकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई है। 

हालांकि यह हास्यास्पद ही है कि जो सरकार गंगा में गिरने वाले तमाम शहरों के नालों और सीवरों के पानी का ठीक से ट्रीटमेंट तक नहीं कर रही है, जो लगातार पॉलीथीन का उत्पादन कर रही कंपनियों के साथ है, वही लाशों के दफ़नाने से गंगा के प्रदूषित होने का तर्क दे रही है। 

इससे भी अधिक हास्यास्पद यह कि लाशों के दफ़नाने से गंगा के प्रदूषित होने की दलील वह सरकार दे रही है, जिसने नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा सफाई का प्रोजेक्ट अडानी समूह की एक कंपनी को देते हुए इस करार पर हस्ताक्षर किया है कि किसी समय प्लांट में क्षमता से अधिक गंदा पानी आया तो उसे साफ करने की जवाबदेही कंपनी की नहीं होगी।    

आंखन-देखी बात

प्रयागराज के फाफामऊ गंगा घाट पर बहुत दूर तक हजारों लाशें दफ़नाई गई हैं, जो पुल के ऊपर से ही दिख जाती हैं। ये कब्रें हाल की प्रतीत होती हैं। मतलब इन कब्रों में नवंबर-दिसंबर में गंगा का जलस्तर कम होने के बाद निनार हुए घाट पर पिछले 6-7 महीनों में दफ़नाई गई लाशें हैं। इसकी वजह यह कि बारिश के बाद जब गंगा में जलस्तर बढ़ता है तब कब्र में दबी लाशें बह जाती हैं और क्रब्रों का नामोनिशान मिट जाता है।  

प्रयागराज के फाफामऊ पुल के नीचे का दृश्य (तस्वीर : सुशील मानव)

मौजूदा समय में फाफामऊ में पुल से ही नीचे घाट पर हजारों कब्रें दिख रही हैं। ऐसा दृश्य कोरोना के दूसरी लहर के समय दिखा था, जब सरकार गंगा में दफ़न लाशों के चलते निशाने पर आ गई थी और तब सरकार ने इन लाशों से क़फ़न उतारकर जलाया था, लाशों को नहीं जलाया था, बल्कि दफन करवा दिया था। तब सरकार को गंगा के प्रदूषित होने की चिंता नहीं थी।   

फाफामऊ घाट पर लकड़ी तौलने वाले बबलू बताते हैं कि वैसे तो सभी जातियों के लोग लाशें दफ़नाते हैं, लेकिन अधिक छोटी जातियों के लोग हैं, जो लाशों को दफ़ना जाते हैं। बबलू बताते हैं कि फिलहाल लकड़ी का दाम 800 रुपए प्रति क्विंटल है। लेकिन ग्राहक से मोलभाव के कारण 700 रुपए प्रति क्विंटल तक में दे देते हैं।  

सरकार और पंडों का एक-सा तर्क

फाफामऊ गंगाघाट पर पुरोहितगीरी का काम करने वाले पंडित कमला प्रसाद मिश्रा का भी यही तर्क है कि लाशों को दफ़नाने से गंगा प्रदूषित हो रही है। वे कहते हैं कि गंगा को साफ़-सुथरा रखने की जिम्मेदारी सबकी है। लेकिन ये लोग [छोटी जातियों के लोग] नहीं समझते और लाशों को लाकर गाड़ जाते हैं। वे आगे कहते हैं कि पहले गंगा में कछुए होते थे जो लाशों को खा जाते थे, लेकिन अब गंगा में कछुए नहीं हैं, तो लाशें गंगा में सड़ती रहती हैं। इससे गंगा प्रदूषित होती है।

लेकिन एक लाश को जलाने में तकरीबन तीन से चार क्विंटल लकड़ी लगती है, जिसके लिए पेड़ काटे जाते हैं। पेड़ कटने से भी प्रदूषण फैलता है। फिर लाश और लकड़ियों के जलने से वायु प्रदूषण फैलता है। इसके अलावा लाश और लकड़ियों का जला अधजला अवशेष जो गंगा में बहाया जाता है, तो क्या उससे गंगा नहीं प्रदूषित होती?  इस सवाल को नजरअंदाज करते हुए पंडित कमला प्रसाद कहते हैं कि सरकार फाफामऊ में विद्युत शवदाह गृह बनवा रही है। उम्मीद है कि कुंभ के पहले चालू हो जाएगा।  

सरकार और पंडे एक-सा तर्क दे रहे हैं कि लाशों को दफ़नाने से गंगा में प्रदूषण फैलता है। वे कौन लोग हैं और किस जाति के लोग हैं, जो लाशों को दफ़नाकर गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं?  इस सवाल के जवाब में पंडित कमला प्रसाद मिश्रा पूरे जोश में कहते हैं ये छोटी जातियों के लोग हैं, जो बदमाशी कर रहे हैं। क्यों दफ़ना रहे हैं ये लोग? पैसे की कमी है या फिर कोई सांस्कृतिक कारण है? इसके जवाब में पंडित जी दावा करते हुए कहते हैं– “नहीं, पैसे की कमी नहीं है। आजकल हर आदमी कमा रहा है। तेरही, बरखी, शुद्ध सब कुछ कर रहे हैं। फिर सारी ग़रीबी लकड़ी ख़रीदने में ही है क्या?” 

श्रम और मिट्टी से जुड़े जाति समूहों में ‘मरने’ पर कहा जाता है ‘मिट्टी हो गई’ 

गैर सवर्ण जातियों में जब किसी के परिवार, रिश्तेदार या बिरादरी में किसी की मौत होती है तो कहा जाता है फलां के यहां “मिट्टी” हो गई है। वह लाश को भी “मिट्टी” ही कहते हैं। जैसे कहेंगे कि “मिट्टी गंगा के पहुंचावै गये रहे।” या कि “मिट्टी परवाहै गये रहे”, “मिट्टी दफ़नावै गये रहे” आदि। ये बोलचाल की शब्दावली बता रही है कि “मिट्टी” शब्द जो है वो मिट्टी से जुड़ी जाति वर्ग की संस्कृति का हिस्सा रही है। “मिट्टी देने” का चलन यहीं से आया है। जो मेल-जोल से ब्राह्मणवादी दाह संस्कृति में भी चला गया है। वहां दाह संस्कार के बाद बचे हुए थोड़े से लोथड़े को लोग “मिट्टी देते” हैं और फिर कफ़न में बांधकर गंगा में विसर्जित कर देते हैं।

नदी किनारे ही क्यों?

यह पूछे जाने पर कि नदियों के किनारे ही दफनाने का कारण क्या है, बहुजनकरण पत्र (हिंदी पाक्षिक) के संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता विशम्भर पटेल  बताते हैं– “सही-सही तो नहीं मालूम है कि क्या कारण रहा होगा। लेकिन जहां तक मैं समझ पा रहा हूं, जब सामंती काल रहा और उसके बाद ज़मीदारी प्रथा विकसित हुई तो दलित-बहुजन समाज ज़मीन से वंचित हो गया। उसके पास अपनी कोई ज़मीन नहीं थी। जबकि नदियों के किनारे की जमीन के ऊपर किसी व्यक्ति का मालिकाना हक़ नहीं होता। तो ऐसे में दलित-बहुजनों को नदियों के  किनारे की जगह मुफ़ीद जान पड़ी। ज़रूरी नहीं कि वह नदी गंगा ही हो। बरसाती नदियों के किनारे भी लोग लाशों को दफ़नाते हैं।”

वे आगे बताते हैं– “एक और यह कारण हो सकता है कि खेत की मिट्टी को गहराई में खोदना बहुत मुश्किल काम है। उसकी तुलना में नदियों के किनारे क़ब्र खोदना आसान है, क्योंकि नदियों के किनारे की मिट्टी में बालू शमिल होता है। दूसरा कारण यह है कि नदियों के पास पानी मिल जाता है। दफनाने के बाद जो भी सामाजिक रिवाज होता हो, उसके लिए पानी आवश्यक होता है। मसलन, दफ़नाने के बाद हाथ-पांव धोने के लिए, थकान मिटाने के लिए पानी चाहिए। एक वजह यह भी कि नदियों के किनारे ही तमाम सभ्यताओं का विकास हुआ है तो जन्म-मरण, शादी-विवाह का जो भी रीति-रिवाज होता है, वह नदियों और तालाबों से जुड़ा होता है।”

सांस्कृतिक एकरूपता स्थापित करने का अभियान

सामाजिक मेल-जोल बढ़ने के साथ ही सांस्कृतिक मेल-जोल भी बढ़ा है। आर्थिक संपन्नता आने के बाद कृषक जातियों का भी पिछले एक सदी में तेजी से ब्राह्मणीकरण हुआ है। और इससे जो प्रतिसंस्कृति पैदा हुई है, उसने खेतिहर समाज और श्रमिक समाज की मूल सांस्कृतिक चेतना को नष्ट कर दिया है। आदिवासी समुदायों में अभी उतना सामाजिक-सांस्कृतिक मेलजोल नहीं हुआ है, इसलिए अभी भी उनकी मूल सांस्कृतिक चेतना बनी हुई है। और वे लोग अभी भी मरने वालों को ज़मीन में दफ़नाते हैं। सृष्टि से जुड़ी उनकी मान्यता यह है कि उनकी देह उसी मिट्टी और मिट्टी से उपजे उत्पादों से निर्मित और पोषित है, इसलिए वे कृतज्ञ भाव के साथ मृत देह को मिट्टी सौंपकर (दफ़नाकर) अब तक जो भी देह ने मिट्टी से लिया होता है, उसे वापिस मिट्टी को लौटा देते हैं। यही वह सांस्कृतिक बोध है, जिसके कारण आदिवासी समाज अपनी मिट्टी (ज़मीन) और जल व जंगल को बचाने के लिए लगातार संघर्षरत है।  

दलित-बहुजन समाज में अभी भी इतनी बड़ी मात्रा में गंगा किनारे लाशों का दफ़नाया जाना, या बरसात में नदी का पेट (रिवर बेड) जलमग्न हो जाने के बाद लाशों को प्रवाहित किया जाना इस बात का सबूत है कि दलित-बहुजन अभी भी कहीं-न-कहीं अपनी मूल संस्कृति से जुड़े हैं। लेकिन प्रशासन द्वारा  बिना कोई विकल्प दिए उन्हें लाशों को दफ़नाने से रोककर, जलाने के लिए विवश किया जाना एक तरह का सांस्कृतिक फ़ासीवाद ही कहा जाएगा। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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