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उत्तर प्रदेश में बसपा : राजनीतिक फलक पर दलित प्रतिनिधित्व की वैचारिक भूमि (दूसरा भाग)

उत्तर प्रदेश की स्थिति भिन्न थी। यहां दलित समुदाय में जातिगत पहचान की भावना मुखर थी। खासकर, पूर्वी उत्तर प्रदेश में चमार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव समुदाय में। आगरा के इलाके में पशुओं से जुड़े काम के खिलाफ जाटव समुदाय का आंदोलन 1950 के दशक में शुरू हुआ और तेजी से फैल गया। पढ़ें, अंजनी कुमार के विस्तृत आलेख का दूसरा भाग

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कांशीराम ने उत्तर प्रदेश का ही चयन क्यों किया?

कांशीराम 14 अप्रैल, 1984 को जब बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर रहे थे, उस समय तक बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में संसदीय आयोग की रिपोर्ट आ चुकी थी। यह आयोग पिछड़े वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुशंसा कर चुका था। जिस समय बसपा का गठन हो रहा था, उसके पहले ही 1980 में जनता पार्टी की सरकार बिखर चुकी थी। लेकिन, उससे जुड़े पिछड़े वर्ग का नेतृत्व बिहार और उत्तर प्रदेश में स्वयं को पुनर्गठित करने में लगा हुआ था। उनके एजेंडे में मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू कराना था। जबकि, कांग्रेस को केंद्र सरकार के रूप में पूर्ववर्ती सरकार के निर्णयों को लागू करने की कोई इच्छा नहीं थी। जनसंघ का विघटन हो चुका था और उसकी जगह पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। यह पार्टी खुद को दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद और गांधी के मानवतावादी समाजवाद का सहारा लेकर भविष्य का रास्ता तलाश रही थी। बिहार में पिछड़ी जातियों का राजनीतिक गठन स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आ गया था। 

कुल मिलाकर यह वह राजनीतिक पृष्ठभूमि थी, जिसमें बसपा का गठन हो रहा था। यह एक नए सामाजिक गंठजोड़ का अवसर प्रदान करने वाली स्थिति थी, जिसके माध्यम से चुनावी राजनीति में दखल देना था। जिस समय बसपा का गठन हुआ, उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग से आने वाली जातियों में सर्वाधिक मुखर यादव और कुर्मी जातियां थीं। जनता दल के रूप में इनका प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी जनता के विभिन्न धड़ों के साथ जुड़ी हुई थीं। हालांकि 1960 के उत्तरार्द्ध तक तक डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में और उनके निधन (12 अक्टूबर, 1967) के बाद उनके समर्थक दलित और पिछड़ों की संख्या के आधार पर बहुमत हासिल करने के प्रयास में लगे हुए थे, जिसमें यदाकदा उन्हें सफलता भी मिल रही थी। लेकिन, उनका प्रयोग समाज में कोई ऐसी पहलकदमी नहीं ले रही थी, जिससे कांग्रेस और उनके बीच स्पष्ट फर्क दिखे।

यहां एक बड़ा सवाल रहा है कि अपने गृह राज्य पंजाब – जहां की कुल आबादी का 29 प्रतिशत हिस्सा दलित है – को छोड़कर कांशीराम ने उत्तर प्रदेश को ही क्यों चुना? कुछ प्रमुख कारण हैं– पंजाब में ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म की जगह सिक्ख धर्म का होना, आर्य समाज का प्रभाव और आदि धर्म का प्रभाव, अपेक्षाकृत बेहतर जमीन की हकदारी और कारीगरी के काम की उपलब्धता। इसके अलावा यहां 37 जातियों में विभाजित विभिन्न दमित जातियां खुद को दलित पहचान से नहीं जोड़ती थीं। एक अन्य कारण यह भी रहा है कि वहां विभिन्न पार्टियों ने दलित समुदाय को विधायिका चुनाव में प्रतिनिधित्व का अवसर देने में सतर्क रहे। (बद्रीनारायण : उपरोक्त पुस्तक) 

कांशीराम (15 मार्च, 1934 – 9 अक्टूबर, 2006)

उत्तर प्रदेश की स्थिति भिन्न थी। यहां दलित समुदाय में जातिगत पहचान की भावना मुखर थी। खासकर, पूर्वी उत्तर प्रदेश में चमार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव समुदाय में। आगरा के इलाके में पशुओं से जुड़े काम के खिलाफ जाटव समुदाय का आंदोलन 1950 के दशक में शुरू हुआ और तेजी से फैल गया। इसका असर यह हुआ कि आगरा में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) की स्थापना हुई, जिसमें जाटव समुदाय ने बढ़कर हिस्सेदारी निभाई। इसके बाद, दलित आंदोलन का विस्तार अलीगढ़, इटावा, कानपुर से आगे बढ़ते हुए पूर्वी हिस्से तक फैल गया। इन इलाकों में, कांशीराम के आने के पहले समाजवादियों के द्वारा आंदोलन की जमीन बनाई हुई थी। खासकर, रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ बनाकर जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ निरंतर संघर्ष चलाते हुए एक राजनीतिक जमीन तैयार कर रखी थी, जिसमें ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक आंदोलन चलाया जा सकता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में जाट समुदाय का आंदोलन कांग्रेस की वर्चस्वादी राजनीति को चुनौती दे रहा था और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी के लिए लगातार भिड़ता भी रहा था। इन स्थितियों में कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक जमीन के दरकने के हालात तेजी से बन रहे थे।

डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहणकर धार्मिक और सांस्कृतिक विकल्प की राह खोल दी थी। उत्तर प्रदेश की एक सीमा पर बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी (नेपाल) से सटा सिद्धार्थनगर था, तो दूसरी ओर उनका निर्वाण स्थल कुशीनगर। एक ओर बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली वाराणसी (सारनाथ) था तो दूसरी ओर उनकी प्रिय भूमि संकिशा (फर्रुखाबाद जनपद में)। साथ ही कबीर, रैदास और स्वामी शिवनारायण जैसी विचारधाराएं थीं, जिनके आधार पर सांस्कृतिक दावेदारी मजबूती से रखी जा सकती थी और मनुस्मृति आधारित ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था पर करारा प्रहार किया जा सकता था। 

हालांकि इस तरह के आधार अन्य राज्यों में भी उपलब्ध हो सकते थे और उस आधार पर एक व्यापक बहुजन राजनीति का आगे ले जाया जा सकता था। जैसे, बिहार, जिसमें उस समय झारखंड भी शामिल था, जहां दलित, आदिवासी और पिछड़ा समुदाय का राजनीतिक नेतृत्व बसपा के गठन के समय तक अपने संघर्षों के साथ उभरकर आ चुका था। लेकिन, ऐसा लगता है कि कांशीराम द्वारा उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रियता को बढ़ाने में अधिक जोर देने के पीछे अनुसूचित जाति में बढ़ती शैक्षिक अवस्थिति थी। सन् 1961 में यह 7.1 प्रतिशत थी, जो 1971 में 10.2 प्रतिशत, 1981 में 15 प्रतिशत और 1991 में 27 प्रतिशत हो गई। इसी तरह उत्तर प्रदेश कैडर में आईएएस अधिकारियों की संख्या ब्राह्मण और कायस्थों के बाद अनुसूचित जाति से आने वाले सदस्यों की थी। (इंडियाज साइलेंट रिवोल्यूशन : क्रिस्टोफर जैफरलो) 

उत्तर प्रदेश की अपेक्षा बिहार की दलित और भूमिहीन जातियां अपनी पहचान के साथ-साथ राजनीतिक आंदोलन में वर्गीय अवधारणा की राजनीति के साथ गोलबंद होकर नवजनवाद आधारित कम्युनिस्ट आंदोलन का एक वैकल्पिक रास्ता चुन लिया था और यह आगे बढ़कर झारखंड के आदिवासी समुदाय के साथ जुड़ गया था। यह नक्सलबाड़ी से उपजी राजनीति थी और जनता की जनवादी राजसत्ता की बात कर रही थी और उसके एजेंडे पर भारतीय लोकतंत्र में वोट का माध्यम राज्यसत्ता का माॅडल नहीं था। इसके साथ संयुक्त बिहार में आदिवासी समुदाय एक अलग पहचान के साथ एक अलग राज्य की मांग को संगठित करने की ओर बढ़ रहा था। उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड की मांग की आधारभूमि भी इसी दौरान बन रही थी, लेकिन इस राज्य की मांग करने वालों का नेतृत्व सवर्ण जातियों के नेतृत्व में आया। यद्यपि इस राज्य की मांग के पीछे का एक बड़ा कारण इस राज्य की सांस्कृतिक और आर्थिक अवस्थिति थी। बसपा ने इस आंदोलन के प्रति नकारात्मक रुख लिया। बसपा ने जिस तरह झारखंड को समझने में गलती की, वैसी ही गलती उत्तराखंड के संदर्भ में भी रही। इस गलत समझदारी से बसपा को खासकर उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक नुकसान पहुंचा। दोनों ही नवगठित राज्यों में दलित और ओबीसी की जनसंख्यात्मक हिस्सेदारी लगभग एक समान है, लेकिन उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय के लोगों की संख्या बिहार से थोड़ी अधिक है। विविध राजनीतिक आंदोलनों के कारण बिहार की जनता उत्तर प्रदेश की अपेक्षा अधिक परिपक्व थी, इस कारण वहां नए आंदोलन की संभावना कम थी। बसपा के मानदंडों के अनुसार उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति का आधार बिहार की अपेक्षा अधिक सुगठित और सामाजिक आधार की संभावनाएं थीं।

कांशीराम जिस सामाजिक अवस्थिति पर सांस्कृतिक आंदोलन बनाते हुए अपने राजनीतिक फलक का विस्तार देना चाहते थे, उसमें उत्तर प्रदेश एक बेहतर जगह थी। यहां उनके 85 प्रतिशत का जादुई गणित अपनी सांस्कृतिक भूमि को बनाते हुए राजनीतिक रूपाकार दे सकता था। इस गणित के प्रयोग की एक सीमाबद्धता थी तो वहीं इसकी जीत की सुनिश्चितता भी। इसमें ऐतिहासिक विकास और स्थितिजन्य संयोग की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। साथ ही, कांशीराम की अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता और इसके लिए उनके अपने व्यक्तिगत जीवन की आम आकांक्षाओं का त्याग, उत्तर प्रदेश में एक ऐसे माहौल को बनाने में सफल रहा, जिसका उदाहरण राजनीतिक पटल पर कम ही था। घोर अपमान, बदहाली, दमन, शोषण और अनाम जिंदगी जीने वाले लोगों के बीच जब कांशीराम त्याग का उदाहरण रखते हुए साइकिल यात्रा के जरिए गांव-गांव गए और गीत, पोस्टर, भाषण, बातचीत और वोट का गणित समझाते हुए राजसत्ता हासिल करने और एक उच्चतर धर्म और संस्कृति की विरासत को पाने का जो रास्ता समझाया, तब वह देखते ही देखते एक वैकल्पिक राजनीति के माॅडल बन गए। ऐसा करते हुए उन्होंने न तो खुद को किसी घोषणापत्र से बांधना उचित समझा और ना ही ऐसी किसी संरचना को बनाना जरूरी समझा, जिसकी कार्यशैली आम पार्टियों की तरह हो। उनका मुख्य उद्देश्य बहुजन राजनीति के जरिए पर सत्ता पर काबिज होना था। ऐसा करते हुए वह उत्तर प्रदेश से कांग्रेस की आधारभूमि को खत्म भी कर रहे थे। इस बात को वह खुलेआम बोल भी रहे थे। (कांशीराम नामक पहेली, आनंद तेलतुंबडे, ईपीडब्ल्यू, अंक-43-44, 2006) 

क्रमश: जारी

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अंजनी कुमार

श्रम-समाज अध्ययन, राजनीति, इतिहास और संस्कृति के विषय पर सतत लिखने वाले अंजनी कुमार लंबे समय से स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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