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एक दलित बस्ती की कथा – कैथ का पेड़ (अंतिम भाग)

एक दिन मैंने देखा कि कारखाने के अंदर एक कारीगर मुर्गा बना हुआ है और उसके ऊपर दो ईंटें रखी हुई हैं। मैं उस समय 14-15 साल का रहा होऊंगा, स्कूल में ऐसे दृश्य देख चुका था, इसलिए किसी के मुर्गा बनने का मतलब अच्छी तरह जानता था। मैं डर गया। मेरे पिता ही नहीं, वहां के सभी कारीगरों के चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। कंवल भारती द्वारा लिखित आत्मकथात्मक शृंखला का अंतिम भाग

[दलित साहित्य में आत्मकथाओं का खास महत्व रहा है। सामान्य तौर पर आत्मकथाओं के लेखक अपने जीवनानुभवों को उद्धृत करते हैं। इसमें उनकी सफलताएं व असफलताएं भी शामिल होती हैं। कंवल भारती ने आत्मकथा के बजाय सामुदायिक स्तर पर कथा लिखी है। अपनी इस कथा में वह अपने पैतृक शहर रामपुर के उस मुहल्ले के बारे में बता रहे हैं, जहां उनका जन्म और परवरिश हुई।]

सातवें भाग से आगे 

डॉ. आंबेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि “जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों की तरह मिलते हैं।” दुखद रूप से यह आज भी सच है। यह यथार्थ सिर्फ गांवों का ही नहीं है, शहरों का भी है। शहर में भी एक और शहर पीड़ितों, उपेक्षितों और दलितों का होता है। इस पृथक शहर के साथ किसी की कोई सहानुभूति नहीं होती है। हम कह सकते हैं कि वे सदैव अजनबियों की तरह जीते हैं। एक ही शहर में रहने वाले एक समुदाय के लोग सड़क पार करते ही दूसरे समुदायों के लिए अजनबी हो जाते हैं। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि गांवों में दलित जातियों के लोग इसलिए सामाजिक बहिष्कार के शिकार होते हैं, क्योंकि वे परंपरा के विरुद्ध खड़े होते हैं। सामाजिक बहिष्कार और अत्याचारों के कारण ही वे गांव छोड़कर शहरों में जाकर बसते हैं। लेकिन यह पलायन गांवों में ही नहीं होता, बल्कि शहरों में भी होता है। वह परिस्थिति बहुत पीड़ादायी होती है, न केवल विस्थापितों के लिए, बल्कि उनके प्रियों के लिए भी। एक बार बहुजन नायक कांशीराम ने दलित विस्थापितों पर बहुत ही सही सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार सिर्फ कश्मीरी पंडितों की चिंता करती है, जिन्होंने आतंकवाद से बचने के लिए विस्थापन किया था। वह उनके लिए दिल्ली में पुनर्वास मंत्रालय कायम करती है, पर उसे उन लाखों विस्थापित दलितों की कभी चिंता नहीं हुई, जो दबंगों, सूदखोरों और जमींदारों के आतंक से बचने के लिए अपनी जड़ों से उखड़ते हैं। क्या उनके लिए कोई मंत्रालय सरकार ने कायम किया?

इस अंतिम भाग में मैं इसी विस्थापन पर बात करूंगा, जिसकी यादें आज भी शूल-सी चुभती हैं। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्र कैराना में कुछ हिंदुओं के पलायन पर नेताओं ने बहुत हो-हल्ला मचाया था। उसके पीछे वोट की राजनीति थी। वोट की राजनीति तो सत्तर के दशक में भी थी, पर उसे दलितों की चिंता नहीं थी। उस समय भी मीडिया के अपने सामाजिक-राजनीतिक सरोकार थे। इसलिए, हमारी बस्ती के जाटवों का विस्थापन किसी के लिए भी चिंता का विषय नहीं बन सका था। मैं भी आज आधी सदी के बाद उसे इतिहास में इसलिए दर्ज कर रहा हूं, क्योंकि कबीर साहेब के शब्दों में वह मुर्दों का गांव था– संवेदनहीन, पाषाणतुल्य, प्रतिरोध-विहीन, घोर अशिक्षित और घोर दयनीय। हालांकि, औरतें प्रतिरोध-विहीन नहीं थीं, वे खूब विरोध करती थीं और लड़ती भी थीं, लेकिन, मर्द उन्हें, पता नहीं क्यों, चुप करा देते थे। इसलिए वे लोग पलायन या विस्थापन को समाज-व्यवस्था से जोड़कर नहीं देखते थे, बल्कि उसे अपने नसीब का खेल समझते थे।

चूंकि हिंदू समाज व्यवस्था में दलित-पिछड़ी जातियों के सारे काम-धंधे पैतृक समझे जाते हैं, इसलिए हमारी बस्ती के जाटव दूध या सब्जी बेचने-जैसा कोई काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि अगर वे ऐसा करते, तो कोई भी उनसे यह सामान नहीं खरीदता। इसी का फायदा कारखाना-मालिक और साहूकार उठाते थे। मैं पीछे लिख चुका हूं कि कारखाना-मालिक कारीगरों को उधार में कच्चा माल देकर अपने कारखाने में ही उनसे जूते तैयार करवाते थे, और वही जूते वे उनसे सस्ते में खरीद कर अपना उधार काटकर, जो धन बचता था, वह उन्हें दे देते थे। कच्चा माल और जूते की कीमत कारखाना-मालिक ही तय करते थे। इस जाल में सारा लाभ मालिकों को ही मिलता था, कारीगरों के हाथ में उतना पैसा भी नहीं आता था, जिससे वे हफ्ते भर की दाल-रोटी चला लेते, या घर की कोई और जरूरत पूरी कर लेते। शोषण के इस जाल को वे इस खूबसूरती से बुनते थे कि उन भोले-भाले कारीगरों का उसे समझना मुश्किल था। फिर भी किसी प्रकार दाल-रोटी तो उनकी चल जाती थी, एकाध वक्त चूल्हा नहीं भी जलता था, तो उसे वे भगवान की मर्जी मानकर सब्र कर लेते थे, लेकिन इसके सिवा भी जीवन-निर्वाह की जरूरतें थीं, हारी-बीमारी थी, तीज-त्योहार थे, बरसात से पहले घर की मरम्मत और बच्चों के शादी-ब्याह की चिंता थी। हालांकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उन गरीबों की भी चिंता में नहीं थी, पर जिनकी चिंता में थी, उनके लिए घर चलाना और भी मुश्किल होता था। इन सारी जरूरतों को वे कर्ज लेकर पूरा करते थे, जो वे बनियों से लेते थे या अपने कारखाना-मालिकों से। कुछ लोग दोनों से कर्ज लेते थे। और उनकी पूरी जिंदगी उस कर्ज को चुकाते हुए ही गुजर जाती थी। वे बनिए का ब्याज देते रहते थे, और कारखाना-मालिक का तो जाल ही इतना मजबूत था कि वे उसमें बंधे रहते थे। ऐसे लोग इज्जत की नहीं, जिल्लत की जिंदगी जीते थे। कारखाने का मालिक और बनिए का मुनीम उनके साथ गारी-गुफ्तारी (गालियां) से लेकर मारपीट तक करता था।

एक दलित बस्ती (फाइल फोटो)

1980 के दशक के आरंभ में शहर में जूतों के एक नए कारखाने का उदय हुआ। यह कारखाना पुरानागंज के इशरत अली खां ने अपनी कोठी के नजदीक कुम्हारों के मोहल्ले में खोला था। यहां तक मुझे याद है, वह उस वक्त या तो रामपुर नगरपालिका के चेयरमैन थे, या भूतपूर्व हो चुके थे। लोग कहते थे कि वह स्मगलिंग का धंधा करते थे। खैर, शटर लगे एक बड़े से हॉल में उनका कारखाना था। शटर हालांकि खुला रहता था, पर जब गिराते, तो सारे कारीगर अंदर बंद हो जाते थे। उसमें न कोई खिड़की थी, न अन्य कोई छोटा दरवाजा था। इसलिए उस स्थिति में उनके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। कारखाने में अच्छी मजदूरी और एडवांस रुपए देकर कुछ कारीगरों को लाया गया था, जिनमें हमारी बस्ती से नत्थूलाल, उनके बेटे रामकिशोर और मेरे बाप भी काम करने चले गए थे। कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक रहा, पर जल्दी ही इशरत अली खां के बेटों और मैनेजर का थर्ड डिग्री व्यवहार कारीगरों के साथ शुरू  हो गया। मैं दोपहर में अपने पिता को रोटी देने जाता था। एक दिन मैंने देखा कि अंदर एक कारीगर मुर्गा बना हुआ है और उसके ऊपर दो ईंटें रखी हुई हैं। मैं उस समय 14-15 साल का रहा होऊंगा, स्कूल में ऐसे दृश्य देख चुका था, इसलिए किसी के मुर्गा बनने का मतलब अच्छी तरह जानता था। मैं डर गया। मेरे पिता ही नहीं, वहां के सभी कारीगरों के चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। पिता ने मुझसे रोटी का कटोरदान नहीं लिया, और मुझे तुरंत रोटी वापस ले जाने के लिए कह दिया। उस दिन मैं उन्हें खाना खिलाए बिना ही लौट आया था। लेकिन रास्तेभर मेरे दिमाग में यही चलता रहा कि वह कौन था, जो मुर्गा बना हुआ ईंटों का दर्द झेल रहा था? भैये भाई या हाजी जी के कारखानों में शोषण का जाल तो था, पर वहां इस तरह का हिंसक अत्याचार नहीं था। यहां अगर चार रुपए की दिहाड़ी थी, और एक कारीगर अगर पूरे दिन में अपर के साथ दो जोड़ी और बिना अपर के चार जोड़ी जूते बनाता था, तो एक जोड़ी जूते पर मालिक का एक रुपया ही मानव-श्रम पर खर्च होता था। अगर कोई कारीगर एडवांस लेने के बाद किसी दिन काम पर नहीं आता था, तो उसे जबरदस्ती पकड़कर लाया जाता था, भले ही उसकी तबीयत ठीक न हो। कोई कारीगर अगर कई दिन नहीं आता था, या मालिकों के दुर्व्यवहार से डरकर काम छोड़ देता था, तो उसे पकड़वाकर टार्चर किया जाता था। ऐसा ही एक टार्चर दिल दहला देने वाला था। मुझे उसका नाम याद नहीं है, और यह भी नहीं पता कि वह किस मुहल्ले का था। उसने उनसे कुछ रुपए एडवांस लिए थे। कुछ दिन काम करके उसने वहां के माहौल से डरकर काम छोड़ दिया था। इस अपराध की उसे भारी सजा दी गई। उसे पकड़कर कारखाने में लाया गया, और मुर्गा बनाकर उसके नीचे मोमबत्ती जला दी गई। जब मोमबत्ती की लौ उसके चूतड़ को जलाने लगी, तो उसकी चीखें शटरबंद हॉल के अंदर से बाहर तक जा रहीं थीं। पर, राह चलते किसकी हिम्मत थी कि वह शटर खुलवा कर देखता कि अंदर क्या हैवानियत चल रही थी? 

इस हैवानियत ने जाटवों के दिलों पर जख्म तो कर दिए थे, लेकिन उनमें विरोध करने का साहस नहीं हो रहा था। सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां थीं, और सब ही उसके कर्जदार थे। वे कर्जा चुका नहीं सकते थे और कर्जे की राजनीति को जानते नहीं थे। वे पहली पीढ़ी के लोग थे, जिनकी दूसरी पीढ़ी भी उन जैसी ही थी, पर उसके अचेतन में गुस्सा जरूर जमा हो रहा था। फिर भी बिरादरी के कुछ जिम्मेदार लोग इस घटना पर विचार करने के लिए हमारी बस्ती में नेतराम के घर में इकठ्ठा हुए। इनमें बन्नीराम, रामसरन, प्यारेलाल, मुरारी लाल, नत्थूलाल और मेरे बाप थे। मेरे बाप ने धूमी खां से बात करने का सुझाव रखा था। वह हमारे मुहल्ले के करीब ही घेर नज्जू खां में रहते थे और कांग्रेस के नेता थे। पर रामसरन बोले, “हमें बात को बढ़ाना नहीं है। हमें इशरत मियां से जाकर शिकायत करनी चाहिए।” पर किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि इस हैवानियत की रिपोर्ट प्रशासन में जाकर करनी चाहिए। अगर वे उस दिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कर लेते, तो, भले ही ताकत के सामने वे हार जाते, पर जाटवों के प्रतिरोध का इतिहास बन जाता। लेकिन, जब मैंने अपने बाप से पूछा, “इशरत मियां ने क्या इंसाफ किया था?” तो उनका जवाब था कि “इशरत मियां के पास कोई गया ही नहीं था।” इतना खौफ था, उस समय के जाटवों में, कि अपने ऊपर हो रहे जुल्म का बदला लेना तो दूर, उसकी शिकायत भी वे नहीं कर सकते थे। लेकिन बाप ने बताया कि उस घटना के बाद, फिर कोई कारीगर वहां काम करने नहीं गया था, और वह कारखाना बंद हो गया था। यह भी एक प्रतिरोध ही था।

इस घटना के बाद हमारी बस्ती में रोजी-रोटी का संकट गहरा गया था। बरसात का मौसम भी आने वाला था, जिसमें रामपुर में जूते के सभी कारखाने बंद हो जाते थे। बरसात के मौसम में अधिकांश कारीगर बेरोजगार हो जाते थे। कुछ पेट के लिए नाली पर बैठकर मोची का काम भी करने लगते थे, जो  मेरे बाप  और भाई भी करते थे। यहां कारखाने ही नहीं, जूतों का बाजार भी मुसलमानों के ही हाथों में था। उनका इस क्षेत्र में एकाधिकार था। यह अजब खेल था कि जूते बनाने वाले जाटव कारीगर बरसात में एक जून की रोटी तक के लिए तरसते थे, और जिनके हाथों में बाजार था, वे ठाठ की जिंदगी जीते थे। इस सामाजिक अर्थशास्त्र को जाटवों ने ही क्या, किसी भी कारीगर समुदाय ने नहीं समझा था। 

अब दो ही स्थितियां थीं। या तो लोग भूखें मरें, या जीविका का कोई दूसरा साधन तलाश करें। दूसरा साधन वे अपना नहीं सकते थे, क्योंकि, अस्पृश्यता का कलंक उनके माथे पर लगा हुआ था। वैसे 1990 के दशक में इसके प्रतिरोध की शुरुआत हो चुकी थी। मुहल्ला बड़ी बस्ती में रामसरन का बेटा महेश किसी ट्रांसपोर्टर के साझे में ट्रांसपोर्ट के धंधे में आ गया था। उसी खानदान के रामजीमल ने ‘दुर्बल की आवाज’ नाम से अखबार निकालना आरंभ कर दिया था। पर, 1960-65 के कालखंड में जाटवों में यह साहस नहीं आया था। 

हमारी बस्ती में बाबूराम और नत्थूलाल की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। छप्पर-फूस के उनके घरों और उनके अस्थिपिंजरों पर चीथड़ों को देखकर लगता ही नहीं था कि हमारी बस्ती इसी भारतीय सभ्यता में जी रही थी? क्या यह सच नहीं था कि वे उसी हिंदू सभ्यता की देन हैं, जिसके ऊपर आज की भाजपा सरकार गर्व करती है? खैर! उनमें इतनी चेतना थी कि उनके पास पलायन का विकल्प था। तुलसीदास ने ठीक ही कहा था कि अगर इज्जत नहीं है, तो अपनी जन्मभूमि को भी छोड़ देना चाहिए। यहां इज्जत क्या, रोटी भी नहीं मिल रही थी। ऊपर से वे गरीब कर्जदार भी थे। इसलिए, जहां रोजगार के लाले पड़े हों, और कर्ज लेने वाले पीछे पड़े हों, वहां समझदारी इसी में है कि जितनी जल्दी हो सके, अपने जन्म का ठिकाना छोड़ देना चाहिए। बाबूराम अपने परिवार को लेकर अपनी ससुराल संभल चले गए थे, और आजीवन वहीं रहे। बीच में आकर वह अपनी मड़ैया भी बेच गए थे। संयोग से मेरी ननिहाल संभल में ही थी, रुकुन्दीन सराय में। पर मैं वहां बचपन में एक बार ही गया था, उसके बाद कभी नहीं गया। तब भी नहीं, जब संयोग से ही 1975 में मेरी शादी भी संभल से ही हुई थी। लेकिन, मैं अपनी ससुराल डेरेसराय जाता ही रहता था। तब मैंने बहुत बार बाबूराम और उनके बेटे खचेड़ू को तहसील के सामने सड़क पर मोची का काम करते हुए देखा था। कई बार उनसे मिलकर भावुक भी हुआ था। मैं सड़क पर ही उनकी पेटी पर बैठकर घंटों उनसे बतियाता रहता था। वह वहीं पास की गुमटी से मुझे चाय मंगाकर पिलाते थे, मंगाते सिगरेट भी थे, पर मैं उनके सामने सिगरेट नहीं पी सकता था, इसलिए मना कर देता था। वह मुझसे एक ही बात कहते थे– “लल्ला, हमारे मुहल्ले में दो लोग पढ़े थे, जिन्होंने नौकरी में आने के बाद शहर ही छोड़ दिया था, और कभी लौटकर नहीं आए थे। तीसरे लल्ला तुम हो, जो पढ़े हो। भगवानदास ने तुझे पढ़ाने खातर घणे कष्ट उठाए हैं। रोता था तेरा बाप, कहता था, मेरा कमल पढ़ने में बहुत तेज है, वह मेरे सब दलिद्दर दूर कर देगा।” अक्सर यह सुनकर मैं भावुक हो जाता था। पर उन्हें क्या पता था कि उनका कमल कींचड़ में खिला था, महलों में नहीं। मैंने सिर्फ इतना ही कहा था, “दादा, आपने अपने किसी बेटों को नहीं पढ़ाया, आप सुखी हैं, क्योंकि आप दलिद्दर दूर करने का सपना नहीं देखते।” पता नहीं, मेरी बात को वह कितना समझे थे। कई साल हुए, बाबूराम भी सदा के लिए दुनिया छोड़ गए। पर असल में तो वे तभी विदा होंगे, जब मैं दुनिया छोड़ूंगा।

कुछ दिनों के बाद, नत्थूलाल और उनका परिवार भी एक रात बीस गज की अपनी मड़ैया को छोड़कर पंजाब चला गया था। उनके चार बच्चे थे, जिनमें दो लड़कियां– विमला और शकुंतला, और दो लड़के– रामकिशोर और सुरेश थे। बस्ती के रिश्ते से वह मेरे चच्चा लगते थे, पर हमारी मां की तरफ से उनकी पत्नी बिरमा हमारी मौसी लगती थीं। रामकिशोर मेरा हमउम्र था, और सुरेश एकाध साल छोटा था। हम साथ खेलते थे, घंटों बतियाते थे। रामकिशोर में बांसुरी बजाने का गुण था। पता नहीं, उसने उसे कब और कहां बजाना सीखा था, पर मस्त बजाता था। मैं तब दसवीं कर चुका था, या दसवीं में पढ़ रहा था। मुझे उन सबके जाने की खबर सुबह मिली। तब मुझे इस बात का इल्म नहीं था कि वे सब हमेशा के लिए चले गए हैं और कभी लौटकर नहीं आएंगे। मैं कई दिन तक सदमे में रहा था। रामकिशोर और सुरेश के चेहरे दिलदिमाग से हटते ही नहीं थे। मुझे रामकिशोर की बांसुरी याद आती थी। मैं यही सोचता रहता था कि अब वह पंजाब में अपने नए दोस्तों को जरूर सुनाता होगा। पर, मैं जानता हूं कि वह गुण अब उसमें यकीनन नहीं रहा होगा। गरीबों के शौक जितनी तेजी से शुरू होते हैं, उतनी ही तेजी से मर भी जाते हैं। कोई छह महीने के बाद नत्थूलाल पंजाब से अकेले लौटे, तो उनके चेहरे पर रौनक थी। बोलने का लहजा भी पंजाबी हो गया था। उनके चेहरे से ही लग रहा था कि वे पंजाब में यहां से बेहतर थे। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी विमला का रिश्ता पीलीभीत में पकड़िया मुहल्ले में तय कर दिया था। गरीब घर था, लड़का रिक्शा चलाता था। उसी शादी का न्यौता देने के लिए वह रामपुर आए थे। उनकी बेटी विमला इतनी खूबसूरत थी कि आज की अभिनेत्री साक्षी तंवर उसकी डुप्लीकेट लगती है। मेरे बाप ने कहा था, “नत्थू, तुम अपनी बेटी का भाग्य फोड़ि आये।” उन्होंने जवाब में कहा था, “सब भाग्य का ही खेल है। जहां भी जूड़ी का संजोग ले जाये।” यह बातें जब मैं सुन रहा था, तो कौन जानता था कि मेरे बाप भी एक दिन इसी तरह मेरी बहिनों का भाग्य फोड़कर आएंगे? कुछ देर के बाद मैंने नत्थूलाल से कहा, “चच्चा, रामकिशोर और सुरेश कैसे हैं? उनको साथ में क्यों नहीं लाए?” 

उन्होंने उत्तर दिया, “बेटे वो तो भौत सई हैं। तुझे भौत याद करें हैं, पर अब उन पे बेटा टेम ना  हैं।” 

“क्या अब भी बांसुरी बजाता है वह?” मैंने पूछा। 

“अरे अब कां? अब तो उसे टेम ई ना मिलता।”

“मुझे याद करता है?” 

वे बोले, “बेटा, याद तो तेरी मौसी भी करै है। पर अब यां रै का गया, जो वह आवे। चलते बखत पूछ रिया था कि अब तू कौन सी में है?” 

बात सही थी। अब यहां था क्या? सब कुछ तो खत्म हो गया था। 1979 में मैं ‘मूक भारत’ अखबार के सिलसिले में रमेश प्रभाकर के साथ पीलीभीत गया था, जहां हमारी मुलाकात बहुत से लोगों से हुई थी। पकड़िया मुहल्ले में ही मुंशी रामस्वरूप बौद्ध से मिलना हुआ था। तभी याद आया था कि नत्थूलाल की लड़की विमला इसी मुहल्ले में ब्याही है। मैंने मुंशी जी से पूछताछ की, तो उसके घर का पता चल गया। मैं जब वहां गया, कच्ची मिट्टी का एक घर था, जिस पर खपरैल पड़ी थी, आंगन में ही रिक्शा खड़ा था। वहां एक अधेढ़ उमर की औरत थी, वह उसकी सास थी। मैंने उससे कहा, “मैं रामपुर से आया हूं, विमला से मिलना है।” उसने “कौन हो, कहां से आए हो, क्या काम है” जैसे बेतुके सवाल पूछकर बड़ी रूखाई से मना कर दिया, “नहीं है वह।” मैं अपना-सा मुंह लेकर वापिस आ गया था। मैंने मुंशी रामस्वरूप जी को बताया। वह बोले, “हां वह बहुत दुखी है।” वह तो मुझे लग ही रहा था। पर वह अपने मायके में भी कौन सी सुखी थी? मुझे तुलसीदास की एक चौपाई याद आ गई, जो उन्होंने पता नहीं किन परिस्थितियों में लिखी थी– “पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।” आज उस घटना को लगभग पचास साल हो रहे हैं। वह परिवार रामपुर कभी नहीं लौटा। नत्थूलाल चौपाल द्वारे की जमीन के मुकदमे के सिलसिले में कभी-कभी रामपुर आ जाते थे। पर, कई साल हुए, वह भी दुनिया छोड़ गए। और विमला से आज तक मिलना नसीब नहीं हुआ।

‘जाने वाले लौटकर नहीं आते, जाने वालों की याद आती है।’ दिवाकर राही ने यह शेर किसी मशहूर शख्सियत के दुनिया से गुजर जाने पर लिखा था, पर यह मुझे उन लोगों के संदर्भ में भी याद आता है, जो बस्ती से विस्थापित होने के बाद कभी नहीं आए, बस उनकी याद आती है। 

(समाप्त)

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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