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कार्यपालिका के दबाव में न्यायपालिका : कॉलिन गोंज़ाल्विस

गत 26 अगस्त, 2023 को इलाहाबाद में आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने न्यायपालिका से जुड़े अनेक आयामों पर प्रकाश डाला। उनके संबोधन का दस्तावेजीकरण सुशील मानव ने किया है। पढ़ें इसका संपादित अंश

“न्यायपालिका का काम शक्तिशाली व्यक्ति, समूह और सरकार से व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि लोकतंत्र की जगह किसी एक व्यक्ति या समूह की तानाशाही न ले ले। मूल अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका भारत के लोकतांत्रिक ताने बाने को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। क़ानून के शासन के सिद्धांत के तहत न्यायपालिका का काम क़ानून के शासन की रक्षा और क़ानून की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करना है। उपरोक्त पैमाने पर क्या मौजूदा समय में न्यायपालिका खरी उतरती है?” ये बातें वरिष्ठ अधिवक्ता और ह्युमन राइट लॉ नेटवर्क के संस्थापक निदेशक कॉलिन गोंज़ाल्विस ने गत 26 अगस्त, 2023 को इलाहाबाद में आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए कही। परिचर्चा का विषय था– ‘संविधान, कानून का राज और राजनीति [से] प्रेरित हिंसा’।

  

अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयुक्त तत्वावधान में इलाहाबाद के रूह-ए-अंजुमन सभागार में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि आज तमाम जज डरे हुए हैं, जिसके चलते न्यायपालिका अपने उत्तरदायित्व का निर्वाहन करने में बुरी तरह से विफल हो चुकी है। उन्होंने  फरवरी, 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक हिंसा में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और दिल्ली भाजपा विधायक कपिल मिश्रा के नफरती बयान का उल्लेख करते हुए बताया कि दोनों के ख़िलाफ़ ‘हेट स्पीच’ पर कार्रवाई के लिए उनके वीडियो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किया। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर ने एक मिनट में प्वाइंट पकड़ लिया और उन्होंने कहा कि यह ‘हेट स्पीच’ है। फिर उन्होंने सरकारी वकील को कहा कि तुरंत एफआईआर दर्ज़ करो। यह बात उन्होंने जिस वकील से कही, वह सीनियर वकील थे। उस सीनियर वकील ने जज से कहा कि मैंने वीडियो नहीं देखा है और अगले दिन सुबह तक का समय मांगा। उसी रात जस्टिस मुरलीधर का तत्काल प्रभाव से ट्रांसफर का आदेश आ गया। आप समझ सकते हैं कि इन लोगों [नफ़रती भाषण देने वालों] को सरकार का पूरा समर्थन हासिल है। 

कॉलिन ने अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा कि जस्टिस एस. मुरलीधर उनके साथ वकील थे। एक जज ने उनको कहा था कि तुम जज बनकर देश की सेवा करो। पैसा कम मिलेगा, लेकिन देश की सेवा करो। उनकी बात मानकर मुरलीधर जज बन गए, लेकिन एक फैसले से सब खत्म हो गया। उसी दिन उस जज का 15 साल का सर्विस खत्म हो गया। रिटायर हो गया। कोई भी जज उनके पक्ष में नहीं खड़ा हुआ। कॉलिन ने कॉलेजियम पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि कॉलेजियम ने भी कुछ नहीं किया। एक काबिल जज का कैरियर खत्म कर दिया गया।   

मणिपुर का सवाल उठाते हुए कॉलिन ने जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि वे सीनियर जज हैं और दिल्ली हाईकोर्ट में हैं। वरिष्ठता के आधार पर उन्हें मणिपुर हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनना था, लेकिन केंद्र सरकार ने नहीं बनाया। मुख्य बात यह कि सरकार की यह दादागीरी नहीं चलती, यदि सभी जज और कॉलेजियम चाहती तो रिजोल्यूशन पास करके भेज देती। तब सरकार को मानना ही पड़ता। लेकिन मणिपुर के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह जज नहीं चाहिए तो केंद्र ने मना कर दिया। यह दुखद है कि कहां कौन जज होगा, यह फैसला सरकारें कर रही हैं। जस्टिस मृदुल ने दिल्ली के पिंजरा तोड़ ग्रुप के पक्ष में एक फैसला दिया था। जबकि सरकार ने पिंजरा तोड़ ग्रुप के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज़ किया। यह औपनिवेशिक मानसिकता है कि सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर राजद्रोह का केस दर्ज़ करके जेल में फेंक दिया जाएगा।

कॉलिन गोंज़ाल्विस ने आगे कहा कि केदारनाथ केस में भारत के जजों ने कहा कि यह ठीक नहीं है। आलोचना करने के साथ-साथ में एक्शन [घटनाक्रम, असर] होना चाहिए। यदि यह सब नहीं है तो राजद्रोह की धारा नहीं लागू होगी। रंगराजन केस में ‘बोलने की आज़ादी’ का निर्णय है कि मानहानि और ‘हेट स्पीच’ छोड़कर कुछ भी कहा जा सकता है। कड़ी से कड़ी भाषा में आलोचना निंदा की जा सकती है। जब जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल के सामने पिंजरा तोड़ का केस आया तो उन्होंने कहा– “प्रोसिक्युटर साहेब, मैने आपका चार्जशीट पढ़ा। इसमें कौन-सा एक्शन है। मैं उनका जवाब नहीं देखना चाहूंगा। आपके केस के आधार पर बोल रहा हूं कि कहां है एक्शन?” यह कहते हुए जस्टिस मृदुल ने पिंजरा तोड़ के ख़िलाफ़ राजद्रोह के केस को ख़ारिज़ कर दिया। लेकिन सरकार के लिए यह मामला सम्मान का सवाल बन गया था। कॉलिन ने कहा कि अच्छे जजों को हतोत्साहित किया जा रहा है। वैसे ही इस केस में भी किया गया। असम के अखिल गोगोई का केस भी ऐसा ही था। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चार्जशीट देखा और पूछा एक्शन कहां हुआ है और रिहा करने का आदेश दिया। 

परिचर्चा को संबोधित करते कॉलिन गोंजाल्विस

इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस गोविंद माथुर ने एनआरसी के मामले में संरक्षणवादी फ़ैसले दिए। वे एक अच्छे जज थे और सुप्रीम कोर्ट के जज की योग्यता रखते थे। लेकिन सरकार ने उनकी वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए दूसरे जजों को उनके ऊपर भेज दिया। इस तरह अच्छे जजों को लगातार नीचे ढकेला गया। इनके अंजाम देखकर जजों के मन में डर आ गया है कि अगर वे सरकार से जुड़े मामलों में न्याय करेंगे तो उन्हें पदोन्नति नहीं दी जाएगी। 

जजों के फोन टैप हो रहे हैं

कॉलिन ने आरोप लगाते हुए कहा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो और गृह मंत्रालय का दबाव जजों पर काम करता है। इनके फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की 50वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में अरविंद केजरीवाल ने सबके सामने यह बात कही है। और सरकार को थोड़ा-सा मटेरियल मिल गया तो जज ब्लैकमेल होने लगते हैं। और ऐसा हुआ भी शायद। तो जज लोगों के भीतर डर है और डर होने की वजह से उनकी जो क्षमता है, संवैधानिक पद का जो कर्तव्य है, उसको पूरा करने में उन्हें मुश्किलें आती हैं। कॉलिन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट सभी कहते हैं कि भारत में सूचना का अधिकार है, पारदर्शिता है। लेकिन क्या यह न्यायपालिका में लागू है? ऐसे कई उदाहरण हैं जब अक्षम जजों को सुप्रीम कोर्ट भेज दिया गया और अच्छे जजों को बिना किसी कारण हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आईटी सेल के एक मीडिया इंचार्ज को चेन्नई हाईकोर्ट का जज बना दिया गया। उसका एक कुख्यात बयान है कि – “दो तरह का आतंकवाद है भारत में, हरा आतंकवाद और सफेद आतंकवाद। सफेद आतंकवाद ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि उसके पास स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल हैं।” 

ऐसे बयान देनेवाले की जज के तौर पर नियुक्ति को जब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तब कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हम संवैधानिक पद पर आसीन होने की उपयुक्तता तय नहीं कर सकते। केवल योग्यता पर विचार कर सकते हैं। हाई कोर्ट का जज बनने के लिए 15 साल की प्रैक्टिस न्यूनतम योग्यता होती है। सवाल है कि आखिर कॉलेजियम क्या कर रही है, अगर वह उपयुक्तता नहीं देख सकती। 

कॉलिन ने अपने संबोधन में गुजरात दंगा मामले, भीमा कोरेगांव आदि का उदाहरण देकर यूएपीए एक्ट पर कहा कि नागपुर के क्रिमिनल लॉयर सुरेंद्र गडलिन और सुधा भारद्वाज को वकील होने के नाते मैं निजी तौर पर जानता हूं। वे मेरे खास दोस्त हैं। पांच साल हो गए उनको गिरफ्तार हुए और अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ। पुलिस के पास कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। यूएपीए में ट्रिक क्या है। उसमें दोषसिद्धि दर बहुत कम है। केवल 10-20 प्रतिशत ही। आप कहेंगे कि तब तो यह अप्रभावी क़ानून है, लेकिन इस क़ानून का इस्तेमाल करने का मक़सद दोष सिद्ध करना नहीं है। अगर आरोपी पांच साल तक बिना ट्रायल के जेल में रहेगा और ट्रायल शुरू होने के बाद 8-10 साल लग जाता है तो फिर उसे सजा हो या बरी हो जाए, क्या फर्क पड़ता है। उसके पंद्रह साल तो जेल में बीते। सुरेंद्र गडलिन मशहूर वकील हैं। वे ग़रीब आदिवासी लोगों के लिए लगातार काम करते आ रहे थे। कोई नक्सली आए या साधारण आदमी, वकील सबका केस लड़ेगा, यही देश का संविधान कहता है। सुधा भारद्वाज पूरी जिंदगी उसी क्षेत्र में रहकर आदिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए केस लड़ती हैं। आधा पन्ने का एक लेटर जिसमें न तो सुधा का हस्ताक्षर है, न हैंडराइंटिंग है, न तो वह सुधा के कमरे से बरामद हुआ और न उनके लैपटॉप से। तो उस लेटर से बिना किसी संबंध होने के बावजूद उनको साढ़े चार साल जेल में डालकर रखा गया। 

उन्होंने न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस अभी कहानी गढ़ती है। और बिना किसी साक्ष्य, दस्तावेज और गवाह के सिर्फ़ मनगढ़ंत कहानी के बिनाह पर लोगों को जेल में डाल देती है। खालिद के केस में वकील जज के सामने व्हील ट्राली पर लादकर फाइल ले आए। एक ड्रामा क्रिएट किया और कहा कि तीन हजार पन्ने का है चार्जशीट। इसे फाइल करने में वक्त़ लगेगा। जज चाहे तो कह सकता है कि एक पन्ना दिखाओ जिसमें यह हो कि आरोपी ने आतंक मचाने की कोशिश की हो। 

परिचर्चा में मौजूद गणमान्य

कॉलिन ने मणिपुर के एक पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम पर लगे यूएपीए केस का जिक्र करते हुए कहा कि यह एक हास्यास्पद केस है। उसने मुख्यमंत्री के कांफ्रेंस में उसे बेवकूफ कहते हुए कड़वे शब्द कहे। किसी मुख्यमंत्री को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करना अपराध नहीं है, बल्कि फ्रीडम ऑफ स्पीच है। सिर्फ़ अच्छी-अच्छी बातें बोलना ही अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, गुस्से में कड़वी बात बोलना भी इसी में आता है। अगर इसमें जेल होने लगे तो पूरा देश जेल में होगा। लेकिन नहीं उस पत्रकार को उठाकर यूएपीए में जेल में डाल दिया। उसे जेल से निकालने में एक साल लग गए। जेल से बाहर आने के बाद फिर उसने वैसा ही किया और फिर जेल गया। फिर बाहर आया और फिर अंदर गया। तो यह देश का मूड है। सरकार को लगा कि एक बार दबा देने पर उठेगा नहीं। पर पत्रकार किशोरचंद्र ने उन्हें देश का मूड बता दिया। किसी ने सरकार के ख़िलाफ़ कॉर्टून बना दिया तो उस पर यूएपीए लगा दिया। ऐसे ही एक हास्य कलाकार के ऊपर यूएपीए का मामला दर्ज किया गया।

मणिपुर में जारी हिंसा का जिक्र करते हुए कॉलिन ने कहा कि वहां आदिवासियों के ख़िलाफ़ प्रायोजित हिंसा में बहुसंख्यक समुदाय की सहायता मुख्यमंत्री के स्तर पर की जाती है। करण थापर के साक्षात्कार कार्यक्रम में एक उग्रवादी ने कहा कि मैं तुम्हारे कार्यक्रम में इसलिए आया क्योंकि मैं पूरे देश को बताना चाहूंगा कि अगर ये कुकी ट्राइबल सुधरेगा नहीं तो हम एनाइलेट करेगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘हेट स्पीच’ को लेकर फैसला सुनाया गया है कि यदि कोई हेट स्पीच करेगा और कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराया गया है तब पुलिस स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई करे। मैतेई लीपुन हेड प्रमोत सिंह ने टीवी पर खुलेआम बोला, उसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं हुआ। पुलिस उसका समर्थन कर रही है। मणिपुर में 200 गावों को जलाया गया है, लोगों के जगहों पर क़ब्ज़ा किया गया है। ढाई सौ चर्च जलाए गए। किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। गोया उन्हें आदेश है कि थोड़ा रुक जाओ। 

उन्होंने कहा कि गुजरात दंगों, मुंबई दंगों, सिख दंगों आदि में लोगों ने पारंपरिक घरेलू हथियारों चाकू, त्रिशूल, तलवार आदि का इस्तेमाल किया। लेकिन मणिपुर दंगे में ऑटोमैटिक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां तक कि स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल किया गया। ये सांप्रदायिक दंगों का आधुनिक मॉडल है। इसे नियंत्रित करना बहुत ज़रूरी है। लेकिन यह तो तभी होगा जब मुख्य दंगाई को पकड़ा जाएगा।। इन लोगों को लगता है कि इन्हें नहीं पकड़ सकता है कोई। इनके समर्थकों को लगता है कि इनके लीडर को नहीं पकड़ सकता है। पुलिस को ऊपर से ऑर्डर होता है कि हाथ नहीं डालना है। सरकार यदि चाह ले तो कोई भी दंगा दो दिन से ज्यादा नहीं चल सकता है। 

मणिपुर में हिंसा के पीछे कार्पोरेट साजिश को उजागर करते हुए कॉलिन ने कहा कि मणिपुर के पहाड़ों पर वैसे तो कुछ भी नहीं है। ज़मीन सूखी है और पानी भी नहीं है। वहां खेती भी नहीं हो सकती है। सवाल उठता है कि फिर हिंसा को अंजाम क्यों दिया जा रहा है? दरअसल, 4-5 साल पहले जुबिलेंट तेल कंपनी ने वहां तेल और गैस की खोज की। पेट्रोलियम की वर्मा लाइन मणिपुर में भी है। तो उन लोगों ने रिपोर्ट बनाया कि इतना पेट्रोलियम है कि मणिपुर एक बहुत अमीर क्षेत्र हो गया है। कुछ उद्योगपतियों ने उधर तेल और गैस ब्लॉक के लिए अप्लाई किया है। इसलिए आदिवासियों को वहां से हटाना है। 

आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम को लेकर मौजूदा सरकार द्वारा लाए गए नए क़ानून पर उन्होंने कहा कि सरकार कह रही है कि वह अंग्रेज़ों के क़ानून को हटाकर ग़ुलामी की विरासत को हटा रहे हैं और नया क़ानून ला रहे हैं। लेकिन ये लोग देश से झूठ बोल रहे हैं। अपराधी या अभियुक्त के परिवार को जो अधिकार मिले थे, उन्हें खत्म कर दिया गया। जब किसी को गिरफ्तार किया जाता है तो पूरी सूचना दी जाती है कि कहां से गिरफ्तार किया और कहां रखा गया है। यह बताना ज़रूरी है। लेकिन अब कानून ऐसा है कि किसी को भी गिरफ्तार कर लिया तो परिवार खोजता रहे। मेडिकल जांच की अनिर्वायता को खत्म कर दिया गया है। पहले पुलिस कस्टडी से एक बार जेल जाने पर वापिस पुलिस कस्टडी में नहीं जा सकते थे। लेकिन अब जेल से पुलिस, पुलिस से जेल क़ानून बना दिया। भारत में 50 प्रतिशत से ज़्यादा गिरफ़्तारियां ग़लत होती हैं। उन्होंने लेबर कोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि 44 श्रम क़ानूनों के खात्मे के साथ ही इस देश में लेबर कोर्ट ने पांव पसारा। किसान आंदोलन करता है तो जीतता है। लेकिन मज़दूर आंदोलन करके नहीं जीत पाता क्योंकि बीच में लेबर कोर्ट खड़ा है। पिछले तीन साल में दिल्ली में डेमोलिशन के हजारों केस हैं। स्टे मिलने के बाद अगले ही दिन तोड़ दिया जाता है। दस साल पहले किसी मामले में स्टे मिलने पर लोग खुश हो जाते थे। लेकिन अब राजनीति प्रेरित हिंसा के तौर पर ऐसी कार्रवाईयां हो रही हैं।

उन्होंने बुलडोजर को ग़ुलामी से जोड़कर कहा कि बंधुआ मज़दूरी एक तरह की ग़ुलामी है। तो जो भी जबरन करवाया जाता है वो ग़ुलामी है। फिर चाहे जबरन काम करवाओ चाहे ज़बरन घर तोड़ो। बुलडोज़र एक तरह की ग़ुलामी है। हाशिए के समाज को टारगेट करके उनके घरों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें गुलाम बनाया जा रहा है। हर ज़बरन कार्रवाई, जबरन हिंसा को बंधुआ मज़दूरी और ग़ुलामी से जोड़कर देखना और आवाज़ उठाना होगा।   

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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