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गदर : कुछ यादें, कुछ बातें

गदर के क्रांतिकारी गीतों का पहला एलबम 1971 में ही आया। वह जन संघर्षों का हिस्सा थे और अपने लोगों की भावनाओं को समझते थे। आपातकाल में तो लोगों ने बहुत परेशानियां झेलीं, लेकिन 1980 के बाद गदर पूरी तरह से तथाकथित पीपुल्स वॉर ग्रुप के साथ जुड़ गए और बहुत वर्षों तक भूमिगत रहे। स्मरण कर रहे हैं विद्या भूषण रावत

तेलंगाना के क्रांतिकारी जनकवि, लेखक, गायक और विचारक गुम्मदी विट्ठल राव, जिन्हें देश भर में गदर के नाम से जाना जाता है, का निधन गत 6 अगस्त, 2023 को हो गया। वे 77 वर्ष के थे। उनका जन्म हैदराबाद रियासत के मेडक जिले में तुपरान नामक स्थान पर एक दलित परिवार में सन् 1949 में हुआ था, जब पूरे राज्य में कम्युनिस्ट आंदोलनकारियों ने भूमि अधिकारों के लिए रजाकारों और जमींदारों के दमन के विरुद्ध अपनी लड़ाई तेज कर दी थी। सन् 1953 में केंद्र सरकार द्वारा गठित राज्य पुनर्गठन आयोग ने तेलंगाना राज्य की मांग के पक्ष में बात कही थी लेकिन वृहद आंध्र प्रदेश की लॉबी ने एक भाषा के नाम पर आंध्र प्रदेश की स्थापना की और हैदराबाद वहां की राजधानी बना। तेलंगाना के लोगों के दिल में हमेशा के लिए एक चुभन बन कर रह गई, क्योंकि अपनी ही जमीन पर वे बाहरी लोगों के नेतृत्व में काम करने को मजबूर थे। फिर 1969 में अलग तेलंगाना राज्य की मांग ने जोर पकड़ लिया और अलग-अलग स्थानों पर लोगों में विरोध प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनों के दौरान हैदराबाद में ही 369 से अधिक लोगों की मौत हो गई। तेलंगाना आंदोलन और उग्र हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विभिन्न लोगों से बातचीत शुरू की और अंत में उन्होंने पूरे आंदोलन को एक राजनीतिक चाल से शांत करने की कोशिश की, जो कुछ समय तक तो सफल रहा, लेकिन लोगों के अंदर तेलंगाना राज्य की मांग बनी रही।

  

दरअसल हुआ यह कि एम. चन्ना रेड्डी, जो अपनी तेलंगाना प्रजा समिति के तहत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और बाद में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। किसी भी जन आंदोलन को खत्म करने का यह तरीका सबसे खतरनाक है कि उसके राजनीतिक नेतृत्व को ही खरीद लिया जाए। गदर इसी दौर में एक जनकवि के तौर पर उभर रहे थे। 

निजाम कॉलेज उस समय आंदोलन का गढ़ था और गदर ने अपने आसपास ऐसी शक्तियों को देखा जिनका जनता से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन जनता के नाम पर वे ही शासन कर रहे थे। जब इस प्रकार के राजनीतिक गठजोड़ होते हैं तो उसका एक कारण यह भी होता है कि विरोध में लोकतांत्रिक शक्तियां प्रभावी नहीं होती हैं। उस दौर में एक बड़ा समूह नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित हो गया और क्रांतिकारी बदलाव के सपने देखने लगा। 

गदर के क्रांतिकारी गीतों का पहला एलबम 1971 में ही आया। वह जन संघर्षों का हिस्सा थे और अपने लोगों की भावनाओं को समझते थे। आपातकाल में तो लोगों ने बहुत परेशानियां झेलीं, लेकिन 1980 के बाद गदर पूरी तरह से तथाकथित पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) के साथ जुड़ गए और बहुत वर्षों तक भूमिगत रहे। इसी दौरान उन्होंने पीडब्ल्यूजी के सांस्कृतिक मंच ‘जन नाट्य मंडली’ के माध्यम से जनता में चेतना फैलाने का काम शुरू कर दिया। 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में महाभारत की कथाओं को लोक संस्कृति के माध्यम से सुनाने का चलन रहा है। इसे बुर्रा कथा कहा जाता है। गदर के लोक संगीत में बुर्रा कथा का व्यापक असर है। जब वह अपनी कविताओं को गाते थे तो उनके विशेष अंदाज से जनता को उसमें भागीदार भी बनाते और इस प्रकार उनके लोकसंगीत की एक विशिष्ट शैली विकसित हुई। यह दलितों के विलाप पर आधारित नहीं, अपितु अन्याय के खिलाफ उनको खड़े होने के लिए प्रेरित करती थी। 

गदर की इस सांस्कृतिक परंपरा का आंध्र और तेलंगाना में बहुत असर हुआ और आज भी प्रचलित जन आंदोलनों में गदर की परंपराओं पर आधारित गीतों का चलन ही रहा है। आपको चाहे तेलुगु आती हो या नहीं, लेकिन जब गदर मंच पर होते तो सबके अंदर जोश का संचार स्वत: ही हो जाता। इसलिए तेलंगाना-आंध्र के जन-आंदोलनों की चर्चा गदर की बात किए बिना कभी पूरी नहीं हो सकती।  

गुम्मदी विट्ठल राव उर्फ गदर

सार्वजनिक जीवन में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जिन्हें गुम्मादी विट्ठल राव जैसे बड़ी संख्या में लोगों का प्यार, स्नेह और सम्मान मिलता है और अपने क्षेत्र विशेष के लिए वह गदर अन्ना हो गए। उनकी सफेद धोती और उसके ऊपर काले और लाल रंग का कंबल, पैरों में घुंघरू उनकी पहचान बन गए थे। जहां भी उनके पैर थिरकते लोग उनकी तरह झूमना शुरू कर देते। उनके गीतों में मुख्यतः जातीय उत्पीड़न, दलितों-मजदूरों का शोषण, जल, जंगल और जमीन के सवाल और बाजार का सवाल रहते। जब तक वे मंच पर गाते, लोग पूरी तन्मयता से सुनते। 

तेलंगाना के लोगों को जैसे उनकी बात में अपनी दिल की आवाज सुनाई देती थी। यह तो एक हकीकत है कि तेलंगाना में नक्सल आंदोलन के चलते जल, जंगल और जमीन के प्रश्नों पर युवा हमेशा मुखर रहे हैं। शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने में उग्र वामपंथी आंदोलन की बड़ी भूमिका रही है।

नक्सलवाद का तेलंगाना में एक समय में जो असर था, वह धीरे-धीरे राज्य की बढ़ती शक्ति और दलितों में आंबेडकरवादी विचारधारा के बढ़ने के कारण कम भी होने लगी। फिर 1990 का दौर देश भर में दलितों व पिछड़ों में एकता का दौर था। दलितों में आंबेडकरवादी आंदोलन की धमक को तेलंगाना में भी बहुत से लोगों ने आगे बढ़ाया। अब मसला केवल यही नहीं था कि लोग असहाय होकर इंतज़ार करेंगे कि क्रांतिकारी आएंगे और उनका कल्याण होगा। अब सवाल प्रतिनिधित्व और भागीदारी का भी बन गया था। आंबेडकरवादी आंदोलन जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगा, लोग छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ खुद ही बोलने लगे और यह बात सामंती जातिवादी तत्वों को कभी भी रास नहीं आई। 

आंध्र प्रदेश में दलितों के दो बड़े नरसंहार वास्तव में इस तथ्य को प्रतिबिंबित करते हैं कि दलित भूमिहीन लोगों के लिए कुछ भी नहीं बदला और सामंती प्रभु वर्ग बेखौफ बना हुआ था। उन्हें दलितों द्वारा स्वाभिमान के साथ जीने से ही परेशानी है। आंध्र और तेलंगाना की दो बड़ी जातियों के नाम दलितों की दो प्रमुख समुदायों के नरसंहार जुड़े हुए हैं। सबसे पहले आंध्र प्रदेश के बापटला जिले का एक गांव करमचेडु दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया था। वहां कम्मा जाति के सामंती जमींदारों का प्रभुत्व था और उन्हे दलितों के अधिकारों की लड़ाई से सख्त परेशानी थी। जब माडिगा समुदाय के एक युवा ने कम्मा समुदाय के भैंस के चरवाहे से उनके पीने के पानी के तालाब को गंदला न करने को कहा तो उसका जवाब उस दलित युवा की पिटाई से मिला। लेकिन जब गांव के अन्य लोगों ने इस हमले के विरुद्ध बोला तो अगले दिन कम्मा लोगों की आतंकी भीड़ ने माडिगावाडा में हमला कर दिया। यह तारीख थी 17 जुलाई, 1985 जब आतंकी भीड़ ने माडिगा समुदाय के 6 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी, तीन महिलाओ के साथ बलात्कार किया और कई अन्य घायल कर दिए गए। इस घटना ने पूरे देश में दलितों को आक्रोशित कर दिया। 

आंध्र प्रदेश में दलित आंबेडकरवादी आंदोलन के तहत एक हो रहे थे और कानून की प्रक्रिया के जरिए इस मामले को लड़ रहे थे, लेकिन पीडब्ल्यूजी ने मुख्य आरोपियों में से एक की हत्या करके नरसंहार का बदला लिया। लेकिन आंबेडकरवादी समूह ऐसे हिंसक कदम का विरोध करता था और संवैधानिक रास्ते पर चलता था। गदर की क्रांतिकारी कविताओं और जन-गीतों ने लोगों में एक नए जोश का संचार किया और दलितों ने प्रदेश भर में इस नरसंहार के विरुद्ध अपनी आवाज उठाना शुरू कर दिया। लेकिन इससे करमचेडु के अपराधियों का ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट तक जाते-जाते केवल एक ही आरोपी को आजीवन कारावास की सजा हुई और बाकी तीन साल के बाद छूट गए। गांव से लगभग 500 से अधिक दलित पलायन करके कुछ किलोमीटर दूर चिराला नामक स्थान पर बस गए। 

हालांकि गदर की लोकप्रिय कविताएं और उनकी अपनी लोकप्रियता हमेशा राज्य की शोषणकारी व्यवस्था और सामंती संरचना के विरुद्ध संदेश फैलाने के लिए उपयोगी थी, फिर भी उसमें जाति व्यवस्था और इसके मूल कारणों के बारे में बातें कम ही होती थीं। उस समय तक अधिकतर वामपंथी आंदोलन जाति के बारे में बात करने के लिए कतई उत्साहित नहीं था और ‘राज्य’ को अपना मुख्य दुश्मन मानता था। वह उस आंबेडकरवादी वैचारिकी के बिल्कुल विपरीत था, जो दलितों के सम्मान और हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत राज्य चाहता था। फिर भी करमचेडु नरसंहार के खिलाफ गदर के सांस्कृतिक विद्रोह ने उनके क्रांतिकारी गीतों को और अधिक लोकप्रिय बना दिया और वह जनता की आवाज़ बन गए।

करमचेडु की घटना के लगभग छह साल बाद 6 अगस्त, 1991 को गुंटूर जिले के चुनडुरु नामक स्थान में रेड्डी समुदाय के लोगों द्वारा एक नरसंहार किया गया और इस बार जिस समुदाय को क्रूरता का सामना करना पड़ा, वह माला समुदाय था, जो आंध्र प्रदेश का सबसे बड़ा और मुखर दलित समुदाय है। रेड्डी समुदाय के हमलावरों ने लगभग 22 दलितों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इससे देश हिल गया, क्योंकि यह दलितों पर अत्याचार की सबसे भयावह घटनाओं में से एक था। यह इलाका भी करमचेडु से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर था। यहां भी एक माला समुदाय के युवक का शरीर एक रेड्डी समुदाय के व्यक्ति को छू गया था। इस पर रेड्डी समुदाय के उस व्यक्ति ने उसे खूब गालियां दीं। जब माला समुदाय के लोगों ने इन जातिसूचक गालियों का विरोध किया तो उनके एक युवक को महिला से छेड़खानी के आरोप में पुलिस मालावाड़ा में प्रवेश किया, जिसके कारण सभी युवा पुरुष भागकर खेतों में चले गए, जहां रेड्डी समुदाय के लोग गंडासे, बंदूक लेकर पहले से ही तैयार खड़े थे। इस नरसंहार में 22 दलितों की हत्या हो गई और पूरी घटना को 24 घंटे तक दबाकर रखा गया। ज्यादातर दलित परिवार वहां से भाग कर तेनाली नामक स्थान पर रहने लगे। इस मामले में विशेष अदालत का गठन हुआ और 212 लोगों पर आरोप लगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक किसी के ऊपर आरोप ‘साबित’ नहीं हुए। 

जब गांव में मामला चल रहा था और वहां गवाहों को धमकाया जा रहा था, ऐसी शिकायतें आ रही थीं तो मैंने चुनडुरु का दौरा किया। मैं रेड्डी समुदाय की क्रूरता की कहानियां सुनकर स्तब्ध रह गया। मैंने घर-घर जाकर लोगों से बात की और कहीं-कहीं पर भाषाई समस्या आ रही थी। मेरे साथ एक स्थानीय मित्र थे, जिन्होंने मुझसे सहयोग का वादा किया। वहां आंध्र प्रदेश के एक बड़े संगठन के व्यक्ति थे, जिसका इस क्षेत्र में दबदबा था। लेकिन जैसे-जैसे मैंने सवालों में जाति के प्रश्नों पर फोकस करना शुरू किया, मेरे मित्र कोशिश करते रहे कि मैं ऐसे प्रश्न न उठाऊं, क्योंकि वह इसे सामंती ढाल के तौर पर बताना चाहते थे। बाद में मुझे समझ में आ गया कि वह मेरी बातों और लोगों के जवाबों को अपनी सुविधा के अनुसार ही मुझे बता रहे हैं तो मुझे बेहद अफसोस हुआ। 

खैर, गांव का दौरा करने पर मुझे यह अंदाज हो गया था कि दलितों के बढ़ते स्तर से और युवाओ की अच्छी पढ़ाई, कथित ‘अच्छे घर’ के लोगों के दिलों को दुखा रहे हैं। मुझे इस बात का अंदाज हो गया कि हमें यहां का ‘दौरा’ करवाने वाले क्रांतिकारी साथी नहीं चाहते थे कि हम कुछ अधिक सवाल करें, विशेषकर जाति के प्रश्नों को लेकर। उसी से मुझे यह भी लगा कि क्रांति की बातें करनेवाले लोगों और संगठनों के होने के बावजूद भी आंध्र प्रदेश में दलित भूमिहीनों की संख्या अधिक क्यों है और दलितों पर अत्याचार क्यों बढ़ रहे हैं। मैंने सोचा कि जाति और वर्ग के सवालों और पीडब्ल्यूजी में दलितों के प्रश्न पर धारणाओं को लेकर कामरेड गदर से बात करनी चाहिए। इसलिए मैंने हैदराबाद जाने का निर्णय लिया और फिर एक मित्र के जरिए कॉमरेड गदर से साक्षात्कार के लिए समय मांगा। 1997 में गदर के ऊपर एक हमला हुआ था और उसके बाद से बाहर आने के बावजूद भी उनके घर के विषय में सभी को जानकारी नहीं थी और वह भी सबको समय नहीं देते थे। बाकायदा बहुत जांच-परख कर ही उनसे मिलने दिया जाता था।  

खैर, उन्होंने प्रेमपूर्वक मुझे बुलाया और बातचीत शुरू हुई। मैंने उन्हें अपनी एक पुस्तक भी दी और बात करते करते आंबेडकरवाद की चर्चा हुई। उन्होंने अपने घर में डॉ. आंबेडकर की फोटो लगाई हुई थी। मैंने उनसे उनके अनुभवों के विषय में पूछा। मैंने कहा कि क्या इतने वर्षों तक कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहने के बाद आपको कभी महसूस हुआ कि जाति के प्रश्न को कम्युनिस्ट आंदोलन द्वारा अधिक महत्व दिया जाना चाहिए था? उन्होंने कहा था कि अब तो वैश्वीकरण हो रहा है, सरकारें जमीनें ले रही हैं और निजीकरण बढ़ रहा है, इसलिए सत्ता का विरोध होना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि बाबा साहब तो राज्य सत्ता को दलितों के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानते थे, इसलिए यह कह देना कि संविधान खराब है या हम इसे नहीं मानते तो इसका लाभ तो वे शक्तियां उठाएंगी ही, जो संविधान से चिढ़ती हैं। मैंने उनके क्रांतिकारी गीतों के विषय में बात करते हुए यह भी पूछ लिया कि इतने वर्ष पीडब्ल्यूजी के साथ काम करते हुए क्या उन्हें कभी यह महसूस हुआ कि जाति के कारण उनकी योग्यता के साथ न्याय नहीं हुआ है? मेरी यह बातचीत 2005 के समय की है जब गदर अन्ना भूमिगत आंदोलन से अलग हो चुके थे, लेकिन फिर भी पार्टी के विरुद्ध कोई स्टैंड नहीं लेना चाहते थे। 

खैर, मैंने उन्हें अधिक परेशान नहीं किया। वह पार्टी के सवालों को लेकर बात नहीं करना चाहते थे। मैं यह सोच कर ही गया था कि उनसे यह पूछूं कि इतने बड़े आंदोलनों के बावजूद भी आंध्र प्रदेश में दलितों पर बड़े हत्याकांड होते हैं और करनेवालों का कुछ भी नहीं बिगड़ पाता। मैंने जनता पर गदर के प्रभाव, उनकी कविता और वैचारिक स्पष्टता के बारे में सुन रखा था। मैंने सोचा था कि मैं उनसे कुछ सवाल पूछूंगा कि क्या उनकी अपनी पार्टी के आलाकमान से कोई सवाल है? 

गदर पीडब्ल्यूजी का सबसे लोकप्रिय चेहरा थे, फिर भी उन्हें कभी भी उनका मुख्य विचारक नहीं माना गया। क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि वामपंथी ताकतों का शीर्ष डोमेन अभी भी आंध्र तेलंगाना के सत्ताधारी ताकतवर समुदायों के हाथों में था, जो वैचारिक तौर पर जाति का विरोध करते रहे हों, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसके लिए किसी किस्म के कोई विशेष प्रयास न किए हों? 

गदर इन प्रश्नों पर बात करने को राजी नहीं थे, हालांकि उनके चेहरे पर परेशानी दिखाई देती थी। वह दुखी थे, लेकिन अपनी पार्टी की वैचारिकी की आलोचना नहीं करना चाहते थे। बोलने के बजाय उन्होंने राज्य सत्ता के विरुद्ध जनता को ताकत का एक जन-गीत सुनाया। मैंने उनसे विदा ले ली। 

कुल मिलाकर मैं इस मुलाकात से बेहद निराश था। मुझे लगा कि शायद अब गदर जाति के मुद्दे पर खुलकर बोलेंगे, क्योंकि उन्होंने आंबेडकर और बुद्ध की तस्वीर लगाना शुरू कर दिया था। उस समय समस्या यह थी कि उनके अधिकांश गीत भेदभाव की बात करते थे, लेकिन अधिकतर राज्य को शोषण और दमन का प्रतीक मानते थे और ‘सामंतवाद’ की बात करते थे, लेकिन इसका मूल कारण क्या था, इसको वह राज्य सत्ता की उपज बताते और ब्राह्मणवादी तंत्र पर चुप्पी साधते? सामंतवाद का मूल कारण हमारी जाति संरचना है और जब तक आप सामाजिक अत्याचार के खिलाफ नहीं बोलते, केवल राज्य को हर बात के लिए जिम्मेदार ठहराने का मतलब तो यह होगा कि हमने समाज में व्याप्त जातिवादी तंत्र को बहुत हल्के में लिया है। 

यह बात अक्सर मैं लोगों से कहता हूं कि किसी भी व्यवस्था की मात्र आलोचना करने से कुछ नहीं होगा। चाहे आंबेडकर हों, फुले हों, पेरियार हों या मार्क्स, सभी ने समाज को विकल्प भी दिया। इसलिए यदि जो लोग क्रांति की बात कह रहे हैं क्या उनका जनतंत्र में विश्वास है या वे जनता के गुस्से का इस्तेमाल अपने अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को सही ठहराने हेतु कर रहे हैं? 

इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक लोग तेलंगाना के सशस्त्र विद्रोह को दलितों में बढ़ती चेतना से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि जब कोई लोग उनके पास नहीं पहुंचे तब क्रांतिकारी आंदोलन उनके सवालों को उठा रहा था। हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि 1990 में जातीय चेतना के सवालों के बाद आंध्र प्रदेश में भी क्रांतिकारी आंदोलनों के सांस्कृतिक संगठनों ने जाति के सवाल को उठाना शुरू कर दिया था, लेकिन यह आंबेडकरवादी आंदोलन के बढ़ते प्रभाव और जातिगत अस्मिताओं की नई संस्कृति का दवाब भी कहा जा सकता है।

आम भूमिहीनों को चाहे कभी जमीन मिली या नहीं मिली, लेकिन गदर की सांस्कृतिक टीम ने यह धारणा प्रचलित कर दी थी कि वामपंथी देश में क्रांति लाएंगे। जैसे-जैसे सरकार की पहुंच और शक्ति दिन-ब-दिन बढ़ती गई, क्रांतिकारियों को छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की ओर जंगल में पीछे हटना पड़ा। जहां एक ओर लोगों में गदर और उनकी कविताओं के प्रति जबरदस्त सम्मान था, वहीं दूसरी ओर वामपंथी उग्रवाद को लेकर दलितों की दिलचस्पी कम हो रही थी। हालांकि जंगलों पर निजी कंपनियों के आक्रमण के चलते आदिवासियों का अभी भी जंगल के प्रश्नों के कारण उन पर विश्वास कायम था। 

बहरहाल, गदर की लोकप्रियता असीमित थी। दलितों और आदिवासियों को उनमें अपनी आवाज सुनाई दी। लेकिन सवाल यह है कि जिस आंदोलन को उन्होंने अपने क्रांतिकारी गीतों के जरिए जनप्रिय बनाया, उसके लोगों के लिए वह क्या मात्र एक ‘जन नाट्य मंडली’ के कलाकार या गायक होने के अलावा क्या कुछ और भी थे?

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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