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‘सीमांत इतिहास’ में शामिल हैं सभी धर्मों के हाशिए के लोग : प्रो. विक्रम हरिजन

दरअसल जाति को आमतौर समाजशास्त्र का हिस्सा मान लिया जाता है और जेंडर को ह्युमन स्टडीज के पाले में डाल दिया जाता है। लेकिन जो लेस्बियन हैं, गे हैं, विकलांग हैं, डायन प्रथा की पीड़ित स्त्रियां है, ये सब कहीं किसी विषय में नहीं शामिल होते। पढ़ें, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. विक्रम हरिजन से सुशील मानव का यह साक्षात्कार

जेएनयू से पीएचडी करने के बाद प्रोफ़ेसर विक्रम हरिजन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी, शिमला में फेलो रहे, जहां उन्होंने चमड़ा छीलने वाली जातियों समेत व्यवसायिक जातियों पर उच्च स्तर का शोध किया है। इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में उन्होंने चमड़ा छीलने वाली जातियों का इतिहास विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार करवाया है। जातियों की समस्या और उसका समाधान विषय पर भी वे दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार करवा चुके हैं। उनका बनाया पाठ्यक्रम ‘भारतीय इतिहास में सीमांत समुदाय’ पिछले पांच-छह सालों से इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाया जा रहा है। इस विषय पर उनसे सुशील मानव ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश 

सीमांत इतिहास लिखने या बनाने का विचार कैसे आया?

केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद में एक कार्यशाला आयोजित हुआ था। उस वक्त डॉ. रतनलाल हांगलू कुलपति थे। उन्होंने उस वर्कशॉप में कहा था कि अब पुराने सिलेबस के बदले नया सिलेबस बनाया जाए और नए सिरे से बनाया जाए। हांगलू साहेब की वजह से और उनकी सलाह पर नया सिलेबस तैयार किया गया। 

मैं पहले असम यूनिवर्सिटी में था। वहां भी सिलेबस के लिए एक कमेटी बुलाई गई थी। मैंने दलित इतिहास पर एक पाठ्यक्रम बनाया था, जिसे कमेटी द्वारा खारिज कर दिया गया, तो जाति को लेकर जो पाठ्यक्रम मैंने असम यूनिवर्सिटी के लिए डिजाइन किया था, उसे परिमार्जित करके कुलपति हांगलू साहेब के पास लेकर गया तो उन्होंने कहा कि दलित एक सीमित क्षेत्र हो जाएगा। फिर ‘मार्जिनल’ शब्द सुझाते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि ‘मार्जिनल सोसायटी’ पर ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करें कि उसमें हाशिए के सारे लोग आ जाएं। उनकी सलाह पर मैंने ‘भारतीय इतिहास में सीमांत समुदाय’ (मार्जिनल कम्युनिटी इन इंडियन हिस्ट्री) नाम से पाठ्यक्रम बनाया। यह पाठ्यक्रम फिलवक़्त एम.ए. के तीसरे और चौथे सेमेस्टर में चलता है। यह ऐच्छिक कोर्स है। 

आपने सीमांत समाज का वर्गीकरण कैसे किया है और कौन-कौन लोग इसमें शामिल हैं?

दरअसल जाति को आमतौर समाजशास्त्र का हिस्सा मान लिया जाता है और जेंडर को ह्युमन स्टडीज के पाले में डाल दिया जाता है। लेकिन जो लेस्बियन हैं, गे हैं, विकलांग हैं, डायन प्रथा की पीड़ित स्त्रियां है,  ये सब कहीं किसी विषय में नहीं शामिल होते। वहीं समाजशास्त्र में जाति का वर्तमान संदर्भ लिया जाता है, उसका इतिहास नहीं देखा जाता है। जबकि हर जाति का एक महत्वपूर्ण इतिहास है, जिन्हें इतिहास में हमेशा से दरकिनार किया जाता रहा है। इन सभी को सीमांत समुदाय में वर्गीकृत किया गया है। इसमें अनाथालय के बच्चे, विधवा महिलाएं, वृद्धाश्रम के लोग, भौगोलिक अल्पसंख्यक, लैंगिक अल्पसंख्यक, विकास से विस्थापित लोग और विकलांग लोग हैं। सारे धर्मों के हाशिए की जातियां हैं, सारी जातियों में हाशिए की उपजातियां हैं। 

क्या-क्या है पाठ्यक्रम में, कुछ बताइए?

चाहे इलाहाबाद के इतिहासकार हों, चाहे कैंब्रिज-ऑक्सफोर्ड के हों, चाहे जेएनयू के; सभी लोग यह नैरेटिव सेट करते हैं कि ये निम्न जाति का है, वो उच्च जाति का है। यही नैरेटिव सभी स्कूलों में लागू होता है। मैं इससे इतर हटकर सोचता हूं कि इस नैरेटिव को कैसे समाप्त करूं। इसलिए सिलेबस में सबसे पहला हिस्सा ‘दृष्टिकोण’ पर रखा है कि किस-किस स्कूल का अप्रोच सीमांत समुदाय के प्रति क्या रहा है। इनके प्रति इतिहास का संबंध कैसा रहा है। 

पाठ्यक्रम का दूसरा हिस्सा हमने ‘विचारधारा’ पर रखा है कि कैसे हम कथित निम्न जातियों के बारे में समझें। कैसे सीमांत समाज को समझें। जाति की उत्पत्ति कैसे हुई, या जाति कैसे समाप्त करना है। जाति को क्या कार्ल मार्क्स, आंबेडकर, लोहिया और गांधी की विचारधारा से समाप्त किया जा सकता है? इस तरह हमने देश-विदेश के विभिन्न महापुरुषों के विचार, चाहे एंटोनियो ग्राम्शी का सांस्कृतिक आधिपत्यवाद हो, अल्थुसर का संरचनावाद हो, या मैक्स वेबर का समाजिक क्रिया सिद्धांत हो, इन सबके माध्यम से छात्रों को सीमांत समुदाय और जाति के अंतर्संबंधों को समझाने का प्रयास करते हैं। 

मार्जिनल हिस्ट्री में तीसरा हिस्सा है– ‘टेक्स्ट’ और उससे अगला हिस्सा ‘धर्म और हाशिए के लोग’ है।

टेक्स्ट वाले हिस्से में क्या-क्या शामिल है? 

जो भी सीमांत समाज से जुड़ा महत्वपूर्ण टेक्स्ट है, जैसे कि आंबेडकर के ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ पढ़ा रहे हैं। मनुस्मृति को कोर्स में यह बताने के लिए रखा है कि वाकई में मनुस्मृति में क्या लिखा गया है। बच्चे पढ़कर खुद से निर्णय लें कि मनुस्मृति अच्छी है कि बुरी है। इसी तरह गोलवलकर का ‘वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ रखा है ताकि जो दक्षिणपंथी झुकाव वाले बच्चे हैं, वो समझ पायें कि उनकी किताबों में क्या है। जोतीराव फुले की ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ शामिल किया है। इसके अलावा प्राचीन काल के बौद्ध टेक्स्ट को पढ़ा रहे हैं। मध्य काल में ‘आइन-एअक़बरी’ का तीसरा भाग भी पाठ्यक्रम में रखा है क्योंकि उसमें मनुस्मृति को उद्धृत किया गया है। यहां के स्थानीय लोगों ने कैसे दस्तावेज़ मुस्लिम इंटिलेक्चुअल को दिया और उसके आधार पर जाति की बात की गई। फिर अंग्रेजों को यहां के लोगों ने दस्तावेज़ दिया तभी उन्होंने ‘कास्ट एंड ट्राइब्स ऑफ साउथ इंडिया’ किताब लिखी। इनके अलावा बहुजन समाज के लेखकों को टेक्सचुअल नैरेटिव में रखने की कोशिश की गई है। तमाम दलित आत्मकथाओं को इतिहास के साथ जोड़ करके पढ़ा रहे हैं। इस विचार के साथ कि क्या जो आत्मकथाएं हैं, वो वर्तमान इतिहास को रिप्लेस कर सकती हैं। इनसे क्या नैरेटिव सेट होगा। ओमप्रकाश वाल्मीकि, शरण कुमार लिंबाले, तुलसीराम, मोहनदास नैमिशराय, बिरहा गायक काशीनाथ यादव, रमाशंकर विद्रोही आदि की आत्मकथाएं पाठ्यक्रम के तहत रखी गई हैं। इनके अलावा अर्जक संघ, राम स्वरूप वर्मा, पेरियार, ललई सिंह यादव, सावित्रीबाई फुले, जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर आदि की जीवनी पाठ्यक्रम में शामिल है। 

क्या ज्ञान और विमर्श वाले इस खंड में दलित आदिवासी महिलाओं की भी भागीदारी है?

हां, हम दलित महिला आत्मकथाओं में रजनी तिलक आदि को पढ़ा रहे हैं। इसके अलावा महाश्वेता देवी की आत्मकथा को और महिला विचारकों में सिमोन द बोउआ, पंडिता रमाबाई, तारा शिंदे, सावित्रीबाई फुले, महाश्वेती देवी आदि के विचारों और किताबों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। 

धर्म किस रूप में पाठ्यक्रम का हिस्सा है?

हर धर्म में एक टैबू जैसा है। अतः पाठ्यक्रम के अगले हिस्से में ‘धर्म और हाशिए के लोग’ खंड में पढ़ा रहे हैं कि हिंदू धर्म में विकलांगों की स्थिति क्या है, महिलाओं की स्थिति क्या है, दलितों की स्थिति क्या है, गे और लेस्बियन की स्थिति क्या है, युद्ध पीड़ितों की स्थिति क्या है। इसी तरह इस्लाम में पसमांदा मुसलमानों की स्थिति क्या है। पसमांदा मुस्लिमों में भी कई उपजातियां है। पसमांदा में अंसारी बहुत आगे है, जबकि बेहना मुसलमान बहुत पीछे है। ऐसे ही दलित वर्ग में भी कुछ उपजातियां बहुत आगे हैं। ओबीसी में भी कुछ बहुत आगे हैं कुछ बहुत पीछे हैं तो इनके साथ किस तरह से स्तरीकरण या वर्गीकरण में भी भेदभाव होता है, यह सब सिलेबस का हिस्सा है। इसी तरह सिख में जो मजभी (मज़हबी) सिख है, रामदसिया चमार है इन सबके इतिहास को पढ़ाने की कोशिश की है नए पाठ्यक्रम में। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रौनकी राम ने रामदसिया चमार के बारे में लिखा है। रामदसिया एक प्रतिरोधी धर्म चला, जो न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी इसकी एक धारा है। रामदसिया चमार को समझने के लिए प्रोफ़ेसर रौनकी राम का टेक्स्ट शामिल किया है। इसी तरह ईसाइयों में दलित ईसाई को पाठ्यक्रम में रखा है। कहने का आशय यह कि तमाम धर्मों में दलितों का क्या स्थान है, क्या स्थिति है, उसे पढ़ाने की कोशिश करते हैं। 

प्रो. विक्रम हरिजन, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

अमूमन धर्म और संस्कृति को एक साथ सम्बद्ध करके देखा जाता है। पाठ्यक्रम में संस्कृति के सवाल धर्म के साथ आते हैं या अलग?

‘सीमांत समुदाय संस्कृति, सौंदर्य शास्त्र और वैश्वीकरण’ के नाम से सीमांत संस्कृति पर पाठ्यक्रम में एक अलग ही खंड है, जिसमें पॉपुलर सिनेमा में सीमांत समुदाय, सीमांत समुदाय और कला, भारतीय सिनेमा में सीमांत समुदाय, वैश्वीकरण के दौर में सीमांत समुदाय आदि अध्याय हैं। सीमांत समुदाय की अपनी संस्कृति क्या है, वह हेजेमनिक है या ब्राह्मणवादी है, इस पर विचार करते हैं। जैसे चमार जातियों में मृदंग नाच होता है। मृदंग क्यों हुआ? इसमें क्या होता है। मृदंग वाद्य भी चमार जाति के लोग ही इस्तेमाल करते हैं। धोबी जाति है, उनके यहां धोबिया गीत होता है, धोबी नाच होता है। तो उनके गीतों में कैसे धर्म हावी है या कैसी हेजेमनी है, यह सवाल हैं। इसी तरह से शीतला माई और चमरिया माई कौन हैं और सीमांत जातियों में इनसे जुड़ी क्या मान्यताएं और जीवन संस्कृति है।

तमाम जातियों में धर्म से अलग उनकी संस्कृति, उनके वाद्य यंत्र, उनके गीत, उनका नाच आदि सबके बारे में अलग से छात्रों को बताने की कोशिश है। जैसे दक्षिण भारत में डिपेंडेट कास्ट (निर्भर रहने वाली जातियां) एक अनन्य जाति है। जजमानी की तरह एक प्रथा थी इनमें। ये जातियां वर्तमान में आंध्र प्रदेश-तेलांगाना में और तमिलनाडु के कुछ हिस्से में दिखाई देती है। इनमें दिलचस्प यह है कि जो इनकी पितृ जाति है उसी की स्तुति गान ये करते हैं उनके ही घर जाते हैं, नाचते गाते हैं।

जैसे अभी हिंदुत्व का उभार है तो इसके प्रभाव में खान-पान की संस्कृति के हिंदूकरण पर ज़ोर है, खान-पान भी संस्कृति का हिस्सा होता है। लेकिन क्या यह पाठ्यक्रम का भी हिस्सा है? 

हां बिल्कुल है, पाठ्यक्रम का आखिरी हिस्सा इसी पर ही है। ‘सीमांत समुदाय और भोजन इतिहास’, ‘सीमांत समुदाय और उनकी वेशभूषा और नज़रिया’ के नाम से बाक़ायदा दो चैप्टर हैं। 

सीमांत समुदाय और खेल इतिहास भी पाठ्यक्रम में है ऐसा मैंने सुना है छात्रों से। इस पर भी कुछ बताइए?

सही सुना है आपने। दरअसल खेल का क्षेत्र इतिहास का हिस्सा नहीं है। खेल किस तरह से उच्च वर्गीय हैं, यह तथ्य़ भी सामने आना चाहिए। पर किसी भी विभाग में खेल का इतिहास नहीं है। रामचंद्र गुहा ने पावलंकर बालू बंधुओं के बारे में लिखा है। दलित समुदाय से आनेवाले पावलंकर बालू चार भाई थे और वे भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बने। इनमें एक फास्ट बॉलर, एक कप्तान बना। लेकिन उनके साथ अश्पृश्यता उसी तरह से थी। जैसे कि उनके लिए अलग ड्रेसिंग रूम होता था। टीम के साथ पानी नहीं पी सकते थे। बैठ नहीं सकते थे। केवल खेलते समय ही वो टीम का हिस्सा होते थे। यहां तक कि कई बार गेंद भी अछूत की कैटेगरी में आ जाती थी। इनको अंग्रेजों ने ट्रेंड किया था और शुरुआती दौर में ये खेल देखते थे, गेंद कलेक्ट करते थे। तो ऐसे बहुत से दलित, आदिवासी खिलाड़ी हुए जिनके जीवन को दस्तावेजीकरण करने की ज़रूरत है। उनके साथ जाति, और जेंडर के स्तर पर जो भेदभाव होता है, उसे देखने-दर्ज़ करने की ज़रूरत है।

लैंगिक सीमांत समुदाय पर पाठ्यक्रम में क्या है? 

गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर, किन्नर आदि को लैंगिक सीमांत समुदाय के अंतर्गत वर्गीकृत करके इनके बारे में क्लासरूम में छात्रों से विस्तार से चर्चा करते हैं कि इनके मुद्दे, इनके संघर्ष क्या हैं। क्यों ये समाज से उपेक्षित और दरकिनार हैं। इनके प्रति समझ और सम्मान विकसित करने के लिए इनको लेकर संवेदनशीलता विकसित करने और आम लोगों के बीच गंभीर विमर्श की ज़रूरत है। किन्नरों से जुड़ी तमाम धार्मिक और सामाजिक भ्रांतियां समाज में फैली हुई हैं। किन्नर समाज का एक इतिहास है, हम इसे सामने ला रहे हैं। बच्चों को फील्ड वर्क करने के लिए एसाइनमेंट देते हैं। किन्नर महामंडलेश्वर का इंटरव्यू बच्चों से करवाया है। 

सीमांत समुदायों में जादू टोना, अंधविश्वास एक बड़ी समस्या है, मौजूदा माहौल में क्लासरूम में इससे कैसे मुठभेड़ करते हैं? 

सीमांत समुदाय में कुरीतियों, धार्मिक मान्यताओं, अंधविश्वासों, वैज्ञानिक ज्ञान पर दो चैप्टर हैं। एक चैप्टर तो सीमांत समुदाय में डायन प्रथा को लेकर है। महिलाओं के एक रूप डायन के बारे में दुनिया में विचक्राफ्ट पढ़ाया जाता है। लेकिन हमारे यहां ऐसा कोई अध्ययन नहीं है। यूरोप के देशों में तो पुरुष डायन भी होते हैं। झारखंड प्रमुख क्षेत्र है, जहां हर साल कई स्त्रियों को लोग डायन घोषित करके मार देते हैं। हम क्लास में पढ़ाते हैं कि डायन होती ही नहीं है। जो महिलाएं किसी न किसी चीज को विरोध करती हैं, मुखऱ होती हैं, ऐसी महिलाओं पर जादू-टोना की बात की जाती है। झारखंड में एक केस में एक महिला को एड्स हो गया था। तो उसको डायन साबित करके पत्थर मार-मार कर मार डाला गया। किन्नर और डायन के पहलुओं को जोड़कर हम पढ़ाते हैं। छात्रों के लिए जो प्रश्नपत्र तैयार करते हैं, उनमें इनसे जुड़े प्रश्नों की भरमार होती है। अंधविश्वास सारे समाज में होते हैं पर सीमांत समुदाय में ज़्यादा अंधविश्वास होता है। उस अंधविश्वास को जैसे डायन, जाटू-टोना, चमरिया माई, शीतला माई आदि को पढ़ाते हैं। चमार जातियों में सुअर चढ़ावा एक अंधविश्वास है। जैसे मेरी दादी कहती थी कि मेरे गांव के यादवों ने हमारी गाय को चुरा लिया तो हमने अपनी माई को उखाड़कर फेंक दिया। वो नाराज़ हो गईं तो गांव में सभी लोगों के पेशाब के रास्ते ख़ून आने लगा। सब लोग डर गये कि अरे जगदेइया ने चमरिया माई को नाराज़ कर दिया। तो ऐसी कई कहानियां है। इन अंधविश्वासों के पीछे जो कहानियां हैं, हम उन कहानियों को नैरेट करते हैं ताकि बच्चों को समझ में आए कि किस तरह से जाति को हम अंधविश्वास के रूप में देखते हैं। इस तरह की तमाम गतिविधियों को पढ़ाने की कोशिश की जाती है। फिर यह भी कि इनका उपाय क्या है। जाति के लिए जाति की समाप्ति ही उपाय है। धर्म के लिए धर्म की समाप्ति हो। लिंग समानता के लिए पितृसत्ता की समाप्ति हो। वर्ग के लिए कहता हूं कि वर्ग की बाइनरी को खत्म करने की ज़रूरत है। 

सीमांत समुदायों के इतिहास को लेकर ऐसी कोई ठोस पहल क्या देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी हो रही है?

देश के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम उच्च वर्ग, उच्च जाति के स्तर के हैं। मैंने जो सिलेबस देखे हैं, चाहे वह अशोका यूनिवर्सिटी का सिलेबस हो या असम यूनिवर्सिटी का सिलेबस हो। यहां तक कि जेएनयू के सिलेबस में भी सीमांत समुदाय को लेकर इतिहास से जुड़े बहुत तत्व नहीं हैं। 

जैसे कि नवजागरण काल के इतिहास में फुले के बारे में कभी नहीं पढ़ाया गया। लाल बहादुर वर्मा अपने लेख ‘इतिहास में न होने के दर्द, दलित नज़रिया’ में कहते हैं कि फुले की भूमिका राजा राममोहन राय से ज़्यादा बड़ी थी। बावजूद इसके राममोहन राय को आधुनिक पुरुष की संज्ञा दी गयी और फुले उपेक्षित रहे। जबकि स्कूल और स्त्री शिक्षा के अलावा फुले ने विधवाओं और गर्भवती स्त्रियों के लिए आश्रम खोला और एक विधवा ब्राह्मण महिला के बच्चे को गोद लिया। ब्रजरंजन मणि की किताब ‘डिब्रह्मनाइजिंग हिस्ट्री’ नवजागरण काल में फुले के योगदान को रेखांकित करती है। इस किताब को हमने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। इसी तरह वीर भारत तलवार की किताब ‘रस्साकशी’ में दयानंद सरस्वती के बारे में बहुत कुछ लिखा है। वहां से पता चला कि पाठ्यक्रमों में नवजागरण काल के बारे में विपिन चंद्रा, सुमित सरकार, शेखर बंदोपाध्याय, इरफ़ान हबीब आदि ने नवजागरणकाल को आधुनिक बताकर उसके सकरात्मक पहलुओं को पेश किया। 

इसी तरह दलित महिलाओं को इतिहास से नदारद कर दिया गया। शिकागो और पेनसिलवेनियन यूनिवर्सिटी के इतिहासकार राम देश रावत ने ‘दलित स्टडीज’ किताब लिखी है, जिसे हम पढ़ाते हैं। प्रोफ़ेसर चिन्नाराव ‘कास्ट स्टडीज’ पर लगातार सेमिनार करवाते आ रहे हैं। लेकिन ‘जाति अध्ययन’ पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पा रहा है। तो पाठ्यक्रमों में जाति की बातें पढ़ाई तो जा रही हैं, लेकिन जाति अध्ययन को धर्मनिरपेक्षता के ढांचे में नहीं पढ़ाया गया। 

इसी तरह आंबेडकर या दलित आंदोलनों के बारे में कभी पढ़ाया नहीं गया। एक बार इतिहासकार विपिन चंद्रा की क्लास थी। जब उन्होंने गांधी के बारे में पढ़ाया तो मैंने उनसे पूछा कि क्या डॉ. आंबेडकर ने कभी चमारिस्तान की मांग किया है। इस पर सारे छात्र हंस पड़े और खुद विपिन चंद्रा ने मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे नहीं पता कि डॉ. आंबेडकर ने चमारिस्तान की मांग की थी या नहीं, लेकिन उन्होंने अस्पृश्यों के लिए अलग निर्वाचन की मांग की थी। यह 2000-03 का बैच था। उस समय तक डॉ. आंबेडकर के बारे में डॉ. चंद्रा जैसे इतिहासकारों को भी नहीं मालूम था कि उनकी कितनी बड़ी भूमिका थी, तो आम लोगों की तो बात ही क्या करें।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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