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उत्तर प्रदेश : दलित-बहुजनों के वृद्धा पेंशन पर डाका

एक जनकल्याणकारी राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने देश और वंचित समाज के बुजुर्गों को आर्थिक और अन्य ज़रूरी मदद मुहैया करवाये और इसको लेकर सजग रहे कि उसके द्वारा दी जा रही सहायता ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रही है कि नहीं। लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक उदासीनता साफ तौर पर दिखाई देती है। पढ़ें, सुशील मानव की जमीनी रपट

करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग मिठाईलाल दीपावली के पंद्रह दिन पहले से अपने ग्रामसभा पाली (उत्तर प्रदेश, जनपद प्रयागराज, तहसील फूलपुर) के रोज़गार सेवक राजकुमार सिंह के घर के चक्कर लगा रहे हैं। वजह यह कि 18 अक्टूबर, 2023 को साल की तीसरी तिमाही (जुलाई-अगस्त-सितंबर) के पेंशन की 3000 रुपए बुजुर्गों के खाते में ट्रांसफर किए गए थे, लेकिन इस बार बुजुर्ग मिठाईलाल की पेंशन नहीं आई। मिठाईलाल एक ज़माने में ऊंट पर बोझा ढोने का काम करते थे। फिर ट्रक में राख लादने का काम करने लगे थे। अब शरीर में दम नहीं है और लाठी लेकर चलते हैं। बड़ा बेटा मनरेगा और दूसरे के खेतों में काम करता है। बेरोजगारी और ग़रीबी के चलते वह अपनी बीमार पत्नी की दवा नहीं करवा पा रहा है। जबकि छोटा बेटा शटरिंग का काम करके किसी तरह अपना परिवार और बुजुर्ग मां-बाप को दो जून की रोटी खिला पा रहा है। 

मिठाईलाल की पत्नी मलेरिया और टाइफाइड से जूझ रही हैं। 

आखिर वृद्धावस्था पेंशन का रोज़गार सेवक से क्या ताल्लुक़ हो सकता है, इसका जवाब गुलाब देवी से बात करके मिलता है।  

बुआई के लिए बिसार का आलू आंखा-दर-आंखा (आलू में जड़ निकलने का संभावित स्थान) काट रही गुलाब देवी भी वृद्ध हैं और बीमार भी। जिस उम्र में सरकार लोगों को रिटायरमेंट दे देती है, उस उम्र को पार करने के बाद भी उन्हें मजूरी करनी पड़ रही है, ताकि मजूरी के पैसे से वो अपने लिए दवाईयां ख़रीद सकें। कोरोना काल में उनके पति और बड़े बेटे की एक ही पखवारे के भीतर मौत हो गई थी। मंझला बेटा बेरोज़गार है और अधिया खेती करके परिवार का गुज़र-बसर करता है, जबकि छोटा बेटा कृषि मज़दूर है। यानि सिर्फ सीजन में काम मिलता है बाक़ी समय बेगारी में कटती है। ऐसे में दलित बहुजन समुदाय के बुजुर्गों के लिए वृद्धावस्था पेंशन एक बड़ी मदद साबित हो सकती है। 

गुलाब देवी बताती हैं कि पिछले साल उनका छह महीने का पेंशन नहीं आया। किसी के कहने पर वे ठाकुर राजकुमार के पास गईं तो राजकुमार ने उनसे कहा कि अगर वह रुका हुआ छह महीने का पूरा पेंशन उन्हें दे दें तो आगे से उनका पेंशन हर तिमाही समय पर आ जाएगा। गुलाब देवी के पास कोई और विकल्प भी नहीं था अतः वो राज़ी हो गईं। राजकुमार सिंह ने जाने क्या किया कि रुकी हुई पेंशन की राशि उनके खाते में आ गई। पेंशन खाते में आने की ख़बर भी उन्हें राजकुमार सिंह ने ही दी और गुलाब देवी को अपनी बाइक पर बिठाकर बैंक ले गया और पूरी राशि निकालकर ले लिया। उन्हें सिर्फ़ 200 रुपए यह कहते हुए थमाया कि इतनी दूर बैंक तक आई हो तो दो सौ रुपए रख लो। गुलाब देवी मन मसोसकर रह गई। उन्होंने खुद को दिलासा देते हुए रख लिया कि आगे से उनका पेंशन आ जाएगा। लेकिन उनकी उम्मीद उस वक़्त टूट गई जब एक तिमाही का पैसा आने के बाद अगली तिमाही का पैसे फिर से रुक गया। वह भागी-भागी फिर राजकुमार सिंह के पास गयीं। राजकुमार सिंह ने अबकी बार आधी रक़म लेने की शर्त पर पेंशन दिलाने की शर्त रखी। गुलाब देवी बार्गेनिंग करने की स्थिति में नहीं थीं, इसलिए फिर उन्होंने पेंशन की आधी रकम देना मंजूर कर लिया। उनका पेंशन आया और आधा राजकुमार सिंह ले लिया। अब एक बार फिर गुलाब देवी की पेंशन रुकी हुई है। वह कह रही हैं कि उनकी पेंशन कुल मिलाकर राजकुमार सिंह ही खा रहे हैं। कागज पत्तर बार-बार जमा करने का बावजूद जाने क्यों पेंशन रुक जा रहा है। वह कहती हैं कि उन्हें सांस की बीमारी है। यदि पेंशन आ जाती तो वो अपनी दवा ले आतीं।  

गांव के ही मुकुंदलाल बताते हैं कि राजकुमार सिंह का जिले के संबंधित विभाग में किसी अफ़सर से जान-पहचान है। वह अफ़सर जिले के कई गांवों के ऊंची जातियों के लोगों से मिलकर संबंधित गांव के दलित-बहुजन लोगों का पेंशन रोक देता है और फिर पेंशन चालू करने के नाम पर पेंशन डकार जाते हैं। 

सरकारी लालफीताशाही की शिकार गुलाब देवी

तारडीह गांव के एक दलित समुदाय के बुजुर्ग बताते हैं कि जिले के अधिकांश गांवों में पेंशन दिलाने वाले दलाल सक्रिय हैं। ये लोग पहले संबंधित कार्यालय के कर्मचारियों से मिलकर लोगों का पेंशन रुकवाते हैं और फिर पेंशन की आधी रकम लेने की शर्त पर पेंशन चालू करवाते हैं। पाली ग्रामसभा के एक सदस्य बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले एक व्यक्ति की आकस्मिक मौत हो गई थी। उसने मनरेगा में काम किया था और उसका जॉब कॉर्ड बना था। गांव के ही एक दलाल ने बीमा के तहत मृतक व्यक्ति के परिवार को मिलने वाली एक लाख रुपए की बीमा राशि की आधी रकम यानि 50 हजार रुपए उन्हें दिलवाई थी।  

ग्रामीण समाज के दलित-बहुजन वर्ग के बीच काम करने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. कमल उसरी इस बाबत प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि ग्रामीण समाज के लोगों विशेषकर दलित-बहुजन वर्ग, जोकि मजदूरी पेशा जमात है, इनकी आमदनी बहुत कम है। ये लोग मुख्यतः कृषि मज़दूर हैं या फिर शहरों में रोज़ाना दिहाड़ी पर काम ढूंढ़ने जाने वाले असंगठित क्षेत्र के अकुशल मज़दूर है। एक तो इन्हें लगातार काम नहीं मिलता है और जो काम मिलता भी है उसके एवज में मजदूरी बहुत ही कम मिलती है। इसका अधिकांश हिस्सा परिवार का पेट भरने में ख़र्च हो जाता है। ऐसे लोग स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर भी बहुत कम ख़र्च कर पाते हैं। एक ओर जहां इस समाज के बच्चे कुपोषित हैं, वहीं बुजुर्गों की स्थिति सबसे दयनीय है। 

डॉ. कमल उसरी आगे कहते हैं कि परिवार और समाज में निवेश का एक सामान्य-सा व्यवहारिक नियम है। कोई भी व्यक्ति, कोई भी परिवार, कोई भी समाज अपना निवेश बच्चों में करता है, क्योंकि बच्चे ही उनका भविष्य हैं। बच्चे फलदायी होते हैं, उनमें श्रम शक्ति निहित है। जबकि बुजुर्ग बीता हुआ अतीत होता है। वह श्रम संपदा से रीत चुका है। अतः बुजुर्गों में कोई भी व्यक्ति, परिवार, समाज यहां तक की सरकार भी सबसे कम निवेश करती है। जिसके पास पूंजी है, आमदनी है, वो लोक-लाज से थोड़ा बहुत ख़र्च घर के बुजुर्गों की देख-रेख में कर भी लेता है, लेकिन जो जातियां भूमिहीन हैं, जिनके पास न शिक्षा है, न आमदनी का कोई ठोस ज़रिया है, न सामाजिक सुरक्षा – वो कहां से और कैसे अपने बुजुर्गों पर ख़र्च करें। ‘ठलाईकूठल’ या ‘सेनिसाइड’, ‘जेरोन्टिसाइड’ जैसी परंपरा समाज में उपजती है, जिसका उद्देश्य परिवार या समाज को ‘बेकार खाने वाले’ के बोझ से मुक्त करना होता है। वे आगे कहते हैं कि ऐसे में एक जनकल्याणकारी राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने देश और वंचित समाज के बुजुर्गों को आर्थिक और अन्य ज़रूरी मदद मुहैया करवाये और इसको लेकर सजग रहे कि उसके द्वारा दी जा रही सहायता ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रही है कि नहीं।     

गौरतलब है कि 60 साल से अधिक उम्र के बुजर्गों के लिए राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग की ओर से वृद्धावस्था पेंशन योजना चलाई जाती है। इस योजना के तहत बूढ़े लोगों को एक हजार रुपए प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जाती है। उत्तर प्रदेश में वृद्धावस्था पेंशन के एक हजार रुपए में 300 रुपए केंद्र सरकार और 700 रुपए राज्य सरकार की ओर से दिया जाता है। नियम के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र के आवेदक के परिवार की सालाना आय 46,080 रुपए और शहरी क्षेत्र के आवेदक के परिवार का सालाना आय 56,460 से अधिक नहीं होनी चाहिए।  

इस साल आधार सीडिंग यानि पेंशनभोगियों के बैंक खातों को आधार से लिंक कराये जाने के चलते लाभार्थियों की संख्या में 9.80 लाख की छंटनी कर दी गई है। जबकि कुछ पेंशनभोगियों को बैंक खातों में दिक्कत के चलते वंचित कर दिया गया। इस तरह इस साल की शुरुआत में क़रीब 12 लाख वृद्धों को पेंशन से वंचित कर दिया गया। गौरतलब है कि हर तीन महीने में एकमुश्त 3000 रुपए की रक़म पेंशनभोगियों के खाते में डाली जाती है। समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण के मुताबिक केंद्र सरकार ने इस योजना में उत्तर प्रदेश का कोटा 48 लाख पेंशनधारी तय किया है। यानि 48 लाख से अधिक जिन बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी उनमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी नहीं होगी। बता दें कि जनवरी-मार्च 2023 में 54,97237 बुजुर्गों को पेंशन दिया गया था जबकि अप्रैल-जून 2023 में 42,92,856 लोगों को पेंशन दिया गया। यानि 12 लाख लोगों को पेंशन के अधिकार से वंचित कर दिया गया। समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण के मुताबिक आधार सीडिंग न होने की वजह से 9.8 लाख लाभार्थी कम हुए हैं जबकि बाक़ी लाभार्थियों को अलग-अलग वजहों से वृद्धावस्था पेंशन की किस्त नहीं मिल पाई। यानि 2.2 लाख बुजुर्गों की पेंशन गैर-कारणों से रोक दी गई। 

वहीं जुलाई-अगस्त-सितंबर तिमाही में 47 लाख बुजुर्गों को पेंशन देने का दावा यूपी समाज कल्याण विभाग ने किया है। समाज कल्याण विभाग में इस योजना के प्रभारी अधिकारी कृष्णा प्रसाद के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष से अब तक क़रीब ढाई लाख लाभार्थियों का निधन हो गया है जबकि अपना बैंक खाता आधार से लिंक न करवा पाने के चलते क़रीब 5.5 लाख बुजुर्ग पेंशन के अधिकार से वंचित कर दिए गए हैं, जिसका फायदा उठाकर दलाल क़िस्म के लोग विभागीय अफ़सरों से सांठ-गांठ करके ज़रूरतमंद बुजुर्गों की पेंशन डकार जा रहे हैं।  

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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