h n

छत्तीसगढ़ के लोरमी में चुनाव हारकर भी सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हैं संजीत बर्मन

संजीत बर्मन को मिले 25,126 मत इस कारण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे दलित समुदाय से आते हैं और लोरमी विधानसभा के सामान्य सीट होने के बावजूद चुनाव लड़ने का साहस किया। फुले, पेरियार, आंबेडकर के विचारों को दलित-बहुजन समाज के बीच प्रचारित करने वाले संजीत ने इस चुनाव से चुनावी राजनीति में पहली बार कदम रखा। इस लिहाज से देखें तो उन्हें प्राप्त मतों के गहरे निहितार्थ हैं

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आ चुके हैं। परिणाम भाजपा के पक्ष में गया है। उसे 54 सीटें प्राप्त हुई हैं। वहीं सत्तासीन रही कांग्रेस को 35 सीटें और एक सीट गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के पक्ष में गया है। इस पूरे चुनाव में लोरमी विधानसभा क्षेत्र हाई प्रोफाइल वाला सीट माना गया, क्योंकि यहां से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव चुनाव लड़ रहे थे। वे भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में एक माने जा रहे हैं।

लोरमी विधानसभा क्षेत्र एक और खास वजह से भी सुर्खियों में रही और यह वजह थी करीब 36 साल के सामाजिक कार्यकर्ता संजीत बर्मन की दावेदारी। हालांकि उन्हें इस चुनाव में 25,126 मत प्राप्त हुए और वे कांग्रेस के थानेश्वर साहू को मिले 29,179 मतों के बाद तीसरे स्थाने पर रहे। 

संजीत बर्मन को मिला यह जनमत इस कारण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे दलित समुदाय से आते हैं और लोरमी विधानसभा के सामान्य सीट होने के बावजूद चुनाव लड़ने का साहस किया। फुले, पेरियार, आंबेडकर के विचारों को दलित-बहुजन समाज के बीच प्रचारित करने वाले संजीत ने इस चुनाव से चुनावी राजनीति में पहली बार कदम रखा। इस लिहाज से देखें तो उन्हें प्राप्त 25,126 मतों के गहरे निहितार्थ हैं। यह इसलिए भी कि लोरमी से जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ पार्टी के उम्मीदवार सागर सिंह बैस को 15,910 मत प्राप्त हुए। यहां तक कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार संतोष कैवर्त को केवल 2689 मत मिले।

यह भी पढ़ें – जाति ने छुड़ाया खेल तो बहुजन नौजवान संजीत बर्मन ने बना ली अलग राह

जाहिर तौर पर संजीत बर्मन को दलित-बहुजन समाज का व्यापक समर्थन मिला। इस बारे में पूछने पर संजीत बर्मन ने दूरभाष पर बताया कि केवल दो महीना पहले ही उनके संघर्ष में शामिल रहनेवाले साथियों ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा और प्राप्त जनमत केवल दो महीने के चुनावी अभियान का परिणाम है। एक ऐसा चुनाव अभियान जिसमें आर्थिक संसाधन नदारद था। समाज के लोगों ने आगे बढ़कर आर्थिक सहयोग और अपना समर्थन दिया। यहां तक कि बच्चों ने अपने गुल्लक तोड़कर अपनी जमापूंजी दी।

बताते चलें कि संजीत बर्मन ताइक्वांडो के खिलाड़ी रहे हैं। जूनियर वर्ग में वे राष्ट्रीय प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करनेवाले थे। लेकिन ऊंची जाति के एक कोच ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर खेलने ही नहीं दिया। परंतु संजीत ने हार नहीं मानी। प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के क्रम में उनकी नियुक्ति एक सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षक के रूप में हुई। हालांकि उन्होंने बाद में इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया और दलित-बहुजन वैचारिकी के प्रचार-प्रसार में जुट गए। 

चुनाव प्रचार के दौरान लोगों के बीच संजीत बर्मन

संजीत बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें जातिगत भेदभाव का भी सामना करना पड़ा। उनके मुताबिक, तेली (वैश्य) जाति की महिलाओं ने केवल उनके दलित होने की वजह से उनकी प्रचार सामग्री लेने से इंकार कर दिया। वहीं एक जगह चुनाव प्रचार के क्रम में ठाकुर (राजपूत) जाति के एक उम्मीदवार के समर्थकों ने पोस्टर दिखाकर चिढ़ाने का प्रयास किया।

संजीत बताते हैं कि गत 3 दिसंबर, 2023 को मतगणना केंद्र पर भाजपा के समर्थक ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे थे तब उन्होंने ‘जय भीम, जय सतनाम’ का उद्घोष किया। सभी यह देखकर हैरान थे कि वे हार रहे हैं और इसके बावजूद उनके चेहरे पर दुख नहीं है। 

आर्थिक संसाधनों की कमी और तमाम चुनौतियों के बावजूद संजीत बर्मन का यह चुनावी अभियान उनके मुताबिक सफल रहा। हालांकि मिले मतों की संख्या से उन्हें संतुष्टि नहीं है। लेकिन वे निराश नहीं हैं। वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के सभी हिस्से से, जहां उन्होंने सामाजिक संघर्ष में भागीदारी दी, लोग उनके समर्थन में आए और आर्थिक सहायता दिए।

आगे की योजना के बारे में पूछने पर संजीत बर्मन कहते हैं कि यदि उनके साथियों ने इसी तरह से हौसला दिया, तब वे लोकसभा का चुनाव लड़ने के बारे में सोचेंगे।  

(संपादन : राजन/अनिल)

लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

संबंधित आलेख

बसपा : एक हितैषी की नजर में
राजनीति में ऐसे दौर आते हैं और गुजर भी जाते हैं। बसपा जैसे कैडर आधरित पार्टी दोबारा से अपनी ताकत प्राप्त कर सकती है,...
यूपी के पूर्वांचल में इन कारणों से मोदी-योगी के रहते पस्त हुई भाजपा
पूर्वांचल में 25 जिले आते हैं। इनमें वाराणसी, जौनपुर, भदोही, मिर्ज़ापुर, गोरखपुर, सोनभद्र, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संत कबीरनगर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, ग़ाज़ीपुर, बलिया, सिद्धार्थनगर,...
बांसगांव लोकसभा क्षेत्र से मेरी हार में ही जीत की ताकत मौजूद है : श्रवण कुमार निराला
श्रवण कुमार निराला उत्तर प्रदेश के बांसगांव लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी रहे। हालांकि इस चुनाव में उन्हें केवल 4142 मत प्राप्त हुए। लेकिन...
उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलितों के रूख से कांग्रेस के लिए बढ़ीं उम्मीदें
संविधान बचाने का मुद्दा इतना असरदार था कि दलित समाज की दो बड़ी जातियां – कोरी और धोबी – को इंडिया गठबंधन द्वारा एक...
दो कार्यकाल से ज्यादा न हो किसी एक व्यक्ति का प्रधानमंत्रित्व काल
इंदिरा गांधी ने अपनी दूसरी पारी में इमरजेंसी लगाई, मगर 1977 के चुनाव ने देश को बचा लिया। अपनी तीसरी पारी में वे हत्यारों...