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हिंदी पट्टी बनाम हिंदू पट्टी

अपने आलेख में बद्री नारायण ने यह नहीं लिखा कि यह प्रक्रिया क्रांति और प्रतिक्रांति की रही है, जिसमें ब्राह्मणवाद ने चुनौती देने वाली अपनी सभी विरोधी धाराओं को कहीं ध्वस्त और कहीं आत्मसात करके खत्म कर दिया था। आजीवकों और चार्वाकों तक का कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है। पढ़ें, कंवल भारती की टिप्पणी

द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) के लाेकसभा सांसद सेंथिल कुमार का यह कहना कि भाजपा को गो-मूत्र राज्यों में ही सर्वाधिक वोट मिलते हैं, प्याले में तूफान खड़ा करने जैसा तो नहीं है। एक तरह से उन्होंने सही ही कहा है। लेकिन इसने हिंदुत्ववादियों की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। इसलिए प्याले में तूफ़ान लाने की कोशिश की जा रही है। पर मज़े की बात यह है कि इस बहस में भाजपाई नेता कम, और अकादमिक लोग ज्यादा मुखर हैं। इस बहस में जी.बी. पंत समाज विज्ञान संस्थान, झूंसी, इलाहाबाद के निदेशक बद्री नारायण तिवारी भी कूद पड़े हैं। आजकल भाजपा और आरएसएस के पक्ष में बोलना-लिखना ही उनका मुख्य जॉब बन गया है। भाजपा के खिलाफ विपक्ष जो भी बोलता है, बद्री नारायण तुरंत लपक लेते हैं और उसका खंडन करना शुरू कर देते हैं, और इस खंडन में उन्हें यह तक एहसास नहीं होता कि वह स्वयं हास्यास्पद हो जाते हैं।

ऐसा ही उनका एक हास्यास्पद खंडन गत 8 दिसंबर, 2023 के ‘हिन्दुस्तान’ में “हिंदी पट्टी पर बार-बार सियासी प्रहार” शीर्षक से छपा है। सवाल यह है कि भाजपा पर राजनीतिक टिप्पणी द्रमुक के सांसद ने की है, तो उसका राजनीतिक जवाब भाजपा के नेताओं की ओर से ही आना चाहिए था। लेकिन, द्रमुक सांसद की टिप्पणी ने बद्री नारायण तिवारी के पेट में दर्द क्यों कर दिया? उनका हाजमा क्यों खराब हो गया? असल में हुआ यह कि गो-मूत्र राज्यों में भाजपा को सर्वाधिक वोट मिलने वाली टिप्पणी से प्रोफ़ेसर बद्री नारायण नहीं आहत हुए, बल्कि उनके अंदर का भाजपाई ब्राह्मण आहत हो गया। उन्होंने यह साबित किया कि वह भाजपाई पहले हैं, प्रोफ़ेसर बाद में। 

अगर यह लेख एक प्रोफ़ेसर लिखता, तो अकादमिक होता, और हिंदी पट्टी में भाजपा की विजय का सही आधार भी स्पष्ट होता। लेकिन चूंकि उनका जवाब एक हिंदू मानस का जवाब है, इसलिए वह इतिहास की गलियों में तो घूमे, पर जवाब नहीं निकाल पाए।

बद्री नारायण ने हिंदी पट्टी की महानता का बखान करते हुए लिखा है कि यह वह क्षेत्र है, “जहां प्राचीन काल में वेद, पुराण, उपनिषद, बुद्ध, जैन, श्रमण जैसे विचार एवं चिंतन-मनन की प्रक्रिया चलती रही है।” लेकिन उन्होंने यह नहीं लिखा कि यह प्रक्रिया क्रांति और प्रतिक्रांति की रही है, जिसमें ब्राह्मणवाद ने चुनौती देने वाली अपनी सभी विरोधी धाराओं को कहीं ध्वस्त और कहीं आत्मसात करके खत्म कर दिया था। आजीवकों और चार्वाकों तक का कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है। इतिहास में दर्ज है कि ब्राह्मणों ने उनका भारी कत्लेआम करवाया और उनके साहित्य को जलवा दिया। पुष्यमित्र शुंग के समय में जिस तरह बौद्ध मठों, विहारों और मंदिरों का विध्वंस तथा बौद्ध भिक्षुओं का संहार किया गया, वह भी इतिहास में मौजूद है। और यह बताने की जरूरत नहीं कि उत्तर भारत में ब्राह्मणवाद का उदय विशाल श्रमिक जनता का उत्थान करने के लिए नहीं, बल्कि उसका दमन करके उसे अपने अधीन रखने के लिए हुआ। 

सेंथिल कुमार, सांसद, डीएमके

बद्री नारायण ने रामविलास शर्मा के हवाले से यह सही लिखा है कि हिंदी पट्टी में पुनर्जागरण हुआ। नवजागरण इस क्षेत्र में ब्राह्मणों ने होने ही नहीं दिया। आजीवक, चार्वाक, बुद्ध, सिद्धों, नाथों और यहां तक कि कबीर-रैदास आदि निर्गुणवादी संतों के नवजागरण को भी ब्राह्मणों ने चलने नहीं दिया, और उनको ठिकाने लगाकर ही दम लिया। इस पट्टी में क्रांति-प्रतिक्रांति नवजागरण बनाम पुनर्जागरण का मामला है। यह पुनर्जागरण अब भाजपा के शासन में हिंदुत्व के रूप में किया जा रहा है, जिसमें अयोध्या, काशी, मथुरा, सनातन धर्म, राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम नफरत का हिंसक उन्माद है। 

बद्री नारायण का कहना है कि यहां “गणतंत्रों की सुदीर्घ परंपरा रही है।” लेकिन यह आधा सच है, पूरा सच नहीं। आधा सच यह है कि निस्संदेह वे गणतंत्र थे, पर वे गणतंत्र सामंतों के द्वारा सामंतों के लिए सामंतों के थे। वे जनता के लिए, जनता के द्वारा जनता के गणतंत्र नहीं थे। उन गणतंत्रों में आम जनता की कोई भागीदारी और कोई भूमिका नहीं थी। उन गणतंत्रों में शासन हमेशा सामंतों के हाथों में रहता था, और वे ऐसा कोई कानून नहीं बनाते थे, जो सामंतों के हित में न हो। गणतंत्रों की उस परंपरा ने राजतंत्रों का ही मार्ग प्रशस्त किया था, जिसे हम सुल्तानों, मुगलों और अंग्रेजों के समय तक भी देखते हैं। 

यह हिंदी पट्टी, जिस पर बद्री नारायण गद-गद हैं, सामंतों के इलाके हैं, जिनका दबदबा आज भी उसी तरह कायम है, जिस तरह पहले था। आज भी राजनीति में इनके बिना पत्ता नहीं हिलता है। याद है, जंतर-मंतर पर गोंडा के सामंत सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों का धरना, जिसका कोई परिणाम नहीं निकला। क्या बद्री नारायण को नहीं मालूम कि उत्तर प्रदेश में गोंडा से लेकर अयोध्या, बलरामपुर, बहराइच, गोरखपुर और श्रावस्ती तक का सारा इलाका सामंतों का है, और वहां जनता की मजाल नहीं कि वह उनके खिलाफ चले जाएं। पूरी हिंदी पट्टी में, भाजपा के हिंदुत्व ने हिंसक तांडव मचा रखा है। यहां राजपूतों की अपनी सेनाएं हैं, यहां तक कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी हिंदू युवा वाहिनी है। बिहार की रणवीर सेना और राजस्थान-हरियाणा की करणी सेना की हिंसा से कौन परिचित नहीं है? फिर आरएसएस की चौरासी हजार भुजाएं, तो पता नहीं, कितनी हिंदू सेनाओं की भुजाएं हैं, जो अपना सर्वाधिक जौहर इसी ‘गाय-पट्टी’ में दिखाती हैं।

पाखंड : वाराणसी में गंगा नदी को आरती दिखाते ब्राह्मण पुरोहित

बद्री नारायण का यह कहना सही है कि दक्षिण में भी कांग्रेस को बहुमत मिला है, पर बहुमत तो उसे इस गाय-पट्टी में भी मिलता था। फिर अब क्या हो गया कि भाजपा को सर्वाधिक वोट मिलता है, और सर्वाधिक नोट भी? मैं बद्री नारायण को बताना चाहता हूं कि यह इसलिए कि मंदिर आंदोलन के जरिए आरएसएस और भाजपा ने इसे हिंदुत्व की पट्टी बनाने के जो उपक्रम सत्ता के बल पर किए, वैसे उपक्रम कांग्रेस ने नहीं किए थे। तब परिणाम तो भाजपा के पक्ष में आने ही हैं।

बद्री नारायण ने प्रश्न किया है कि “जो क्षेत्र अंग्रेजों के समय में गोरों द्वारा सर्वाधिक दमित किया गया, जहां सन् 1857 के विद्रोह के रूप में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम कहा एवं माना जाने वाला विद्रोह आरंभ हुआ, उस क्षेत्र को ‘तार्किकता’ से परे पिछड़ा एवं मात्र कर्मकांडीय प्रतीक के रूप में रूपायित करना कहां तक उचित है?”

असल में गाय-पट्टी को ‘तार्किकता से परे कर्मकाण्डीय प्रतीक’ के रूप में रूपायित करना ही बद्री नारायण को सबसे अधिक चुभा। अयोध्या में राम लला का उन्माद, मूर्ति में ब्राह्मणों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा करने का अनुष्ठान (जबकि मेरा दावा है कि वे अपने मृतक पिता के शरीर में प्राण नहीं डाल सकते, पर मूर्ति में डालने का दावा करते हैं), घर-घर से एक मुट्ठी मिट्टी मांगने का उपक्रम, और अयोध्या में लाखों रुपए के सरकारी धन से दीपोत्सव, प्रधानमंत्री की गंगा आरती आदि कार्यकलाप अगर बद्री नारायण को तार्किकता से परे कर्मकांड नहीं लगते, तो इसीलिए कि वह उसे ब्राह्मण-धर्म की दृष्टि से देखते हैं, तर्क और विज्ञान की नज़र से नहीं।

और जिस 1857 के ग़दर को बद्री नारायण भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं, तो इसके पीछ भी उनकी सावरकर की नज़र है, क्योंकि उसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सावरकर ने ही लिखा था। लेकिन मैं स्पष्ट कर दूं कि वह भारत के, ख़ास तौर से इसी गाय-पट्टी के ब्राह्मणों और सामंतों का ग़दर था, जो सामंती संस्कृति और राजे-रजवाडों को बचाने के लिए किया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी जो समाज-सुधार कर रही थी, सती, अस्पृश्यता और ब्राह्मणों की क्रूर सामाजिक प्रथाओं के खिलाफ जो क़ानून उसने बनाए थे, कानून के द्वारा जो उसने सामंतों, नवाबों, ब्राह्मणों और आम आदमी को बराबर कर दिया था, 1857 की बगवात उसके खिलाफ थी। वह देश की आज़ादी की नहीं, बल्कि सामंतो और ब्राह्मणों की अपनी आज़ादी की लड़ाई थी, जिसे सामंतो और ब्राह्मणों द्वारा उत्पीड़ित की गई दलित जनता ने ही कुचला था। अगर सामंतों और ब्राह्मणों का वह गदर कामयाब हो जाता, तो भारत में लोकतंत्र कायम होने और दलित-पिछड़ी जनता को स्वतंत्रता और समानता के अधिकार मिलने में पता नहीं कितनी शताब्दियां और लगतीं।

इसलिए इस तथ्य को नि:संकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी-पट्टी में ब्राह्मणवाद और सामंतवाद (ठाकुरवाद) का मजबूत गठजोड़ ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है, और यहां की जनता इसी गठजोड़ के अधीन है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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