h n

नायक-पूजा में साधो जग बौराया

अस्सी साल की स्थिति से जब हम आज की तुलना करते हैं, तो जनता और मीडिया की नायक-पूजा हमें आज और भी व्यापक और विकराल नज़र आती है। हिंदू सेठों की थैलियां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उसी तरह खुली हुई हैं, जिस तरह कल गांधी के लिए खुली हुई थी। बता रहे हैं कंवल भारती

अभी हाल में प्रख्यात मलयालम लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता एम.टी. वासुदेवन नायर ने सत्ताधीशों की तीखी आलोचना की है। हालांकि उनकी आलोचना के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन हैं, जिसने केरल में एक नई बहस छेड़ दी है। लेकिन सच यह है कि नायक पूजा से देश का कोई भी सत्ताधीश बचा नहीं है।

वासुदेवन नायर ने नायक-पूजा की यह आलोचना कोझिकोड में बीते 11 जनवरी, 2024 को डी.सी. बुक्स द्वारा आयोजित केरल साहित्य महोत्सव में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की उपस्थिति में की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे जीवन के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में कोई भी सत्ताधीश अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। वे अपने अहंकार और अपने मन की बात को ही महत्व देते हैं। उनका कहना था कि जिस तरह की नायक-पूजा यहां दिखाई देती है, वैसी नायक-पूजा अन्य देशों में नहीं है। नायक-पूजा के कुछ उदाहरण विचित्र हैं, मसलन एक मंत्री ने कहा, “विजयन केरल के लिए एक वरदान हैं”; तो दूसरे ने कहा, “विजयन सूर्य हैं, जो भी सूर्य के पास जाएगा, भस्म हो जाएगा।”

वास्तव में नायक-पूजा भारत की पुरानी बीमारी है। भारत के इतिहास में इसकी शुरुआत महात्मा गांधी की भक्ति और पूजा से होती है। न केवल राष्ट्रीय आंदोलन में, बल्कि उसके बाद भी गांधी-पूजा पराकाष्ठा पर पहुंच गई थी। सारे राष्ट्रीय हिंदू अखबार गांधी की नायक-पूजा से भरे रहते थे। इसकी आलोचना करते हुए डॉ. आंबेडकर ने 1943 में पूना में रानाडे की वर्षगांठ पर गांधी और जिन्ना पर बोलते हुए कहा था कि भारत में पत्रकारिता कभी एक पेशा हुआ करती थी, लेकिन अब यह एक व्यापार और नायक-पूजा का माध्यम बन गई है। वर्तमान भारतीय राजनीति आधुनिक होने की बजाए हिंदुत्व का एक अंग बन गई है, जिसे पत्रकारिता और व्यापक बना रही है।

भारत के इतिहास में नायक-पूजा का वह एक ऐसा दौर था, जिसने समस्त हिंदू जनता को गांधी के पीछे खड़ा कर दिया था। हिंदू सेठों ने गांधी के लिए अपनी तिजोरियों के मुंह खोल दिए थे। जहां-जहां गांधी के चरण पड़ते थे, वहां-वहां हिंदू सेठ गांधी-धाम बना देते थे। यह भक्ति अकारण नहीं थी, सेठ जानते थे कि स्वतंत्र भारत की आर्थिक बागडोर उन्हीं के हाथों में आने वाली थी। इसलिए सेठों की गांधी-भक्ति सारी सीमाएं लांघ गई थीं। गांधी जो भी योजना रखते, पूंजीपति तुरंत उसको अंजाम दे देते थे। गांधी ने राजनीतिक कारणों से दिल्ली की हरिजन बस्ती में रहने का निश्चय किया, और सेठों ने पंचकुइया की हरिजन कॉलोनी में टेंट के आलीशान कमरे बनाकर खड़े कर दिए, जिनमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं। गांधी वहां जितने दिन रहे, उनका दोनों समय का भोजन बिरला हाउस से आता था। सारी मीडिया उनके यशगान में लगी हुई थी।

जनता में गांधी की जो छवि थी, वह एक अवतार, संत, महात्मा, राष्ट्र-नियंता और हिंदू नेता की थी, और इसे गढ़ने का काम राष्ट्रीय अख़बारों ने किया था। जनता के पास जो भी माध्यम पहुंचता है, वह अपना विचार उसी के आधार पर बनाती है। अख़बारों की गांधी-भक्ति ने जनता को भी गांधी का अंध-भक्त बना दिया था। कैथरीन मेयो ने ‘स्लेव्स ऑफ दि गॉड्स’ में लिखा है कि गांधी-भक्तों की भीड़ ने अहिंसक गांधी के नाम पर सबसे अधिक हिंसा की थी।

अस्सी साल की स्थिति से जब हम आज की तुलना करते हैं, तो जनता और मीडिया की नायक-पूजा हमें आज और भी व्यापक और विकराल नज़र आती है। हिंदू सेठों की थैलियां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उसी तरह खुली हुई हैं, जिस तरह कल गांधी के लिए खुली हुई थी। गांधी का पूरा दर्शन पूंजीवादी था। लोहिया जैसे समाजवादी नेता जिस गांधीवादी समाजवाद की बात करते थे, वैसा कोई समाजवादी दर्शन गांधी का था ही नहीं। समाजवाद सामाजिक स्तर पर नहीं, आर्थिक स्तर पर होता है। मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था भी पूंजीवादी है, जो कारपोरेट के हित में है। मोदी न समाजवाद को पसंद करते हैं और न कम्युनिज्म को, बल्कि वह इस विचारधारा को ही विदेशी कहकर ख़ारिज करते हैं। भारत का नेहरू-मॉडल मिश्रित अर्थव्यवस्था का था। उसमें निजी उद्योगों के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का भी एक बड़ा ढांचा खड़ा किया गया था, जिसमें श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा वाले कानून भी काम करते थे। मोदी सरकार ने आते ही अनेक सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण कर दिया, और आर्थिक सुरक्षा के उन कानूनों को भी खत्म कर दिया, जो श्रमिकों के हित में बनाए गए थे। इसलिए सामाजिक और आर्थिक समानता पर जोर देने वाले समाजवाद और कम्युनिज्म के खात्मे को राजनीतिक लक्ष्य बनाने वाले नरेंद्र मोदी, भारत के पूंजीवादी और औद्योगिक घरानों की पहली पसंद बन गए। इसलिए ‘हर-हर मोदी’ और ‘घर-घर मोदी’ के प्रायोजन में वे सबसे आगे हैं।

इस मुहिम में भारत की कारपोरेटी पत्रकारिता ने, मोदी की नायक-पूजा के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। वह नरेंद्र मोदी की भक्ति में क्या-क्या नही प्रचारित कर रहा है। कुछ बानगियां देखिए– हिंदू सम्राट मोदी; करोड़ों सनातनियों के हृदयों के सम्राट हैं मोदी; यह मोदी ही हैं, जिन्होंने आठ सौ सालों के बाद भारत का हिंदू गौरव लौटाया है; विष्णु का अवतार हैं मोदी; अयोध्या में राम को वापस लेकर आए हैं मोदी। मतलब, इससे पहले राम अयोध्या में थे ही नहीं। मोदी से पहले राम कहां थे, और अयोध्या में कहां से वापस आए हैं? इसे कोई नहीं बताता। मोदी-भक्ति का प्रमाण देने में चित्रकार भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी चित्र बना दिया, मोदी रामजी की उंगली पकड़कर उनको अयोध्या नगरी ले जा रहे हैं। एकाध साल पहले एक चित्र देखने में आया था, एक छोटी बच्ची के हाथ में स्कूली बैग है और डॉ. आंबेडकर उसकी उंगली पकड़कर उसे स्कूल ले जा रहे हैं। यह चित्र दलित वर्गों में शैक्षिक क्रांति पर जोर देता है, पर मोदी-भक्ति की प्रतिक्रांति में मोदी राम की उंगली पकड़कर मंदिर जा रहे हैं। मोदी-भक्ति का साफ़ संदेश है कि शिक्षा नहीं, मंदिर जरूरी है। एक और चित्रकार हैं, जिसने फाइलें देखते हुए मोदी की बगल में राम को बैठा दिया। है न अद्भुत!

बीते वर्ष मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा प्रचार हेतु लगाया गया एक बैनर, जिसमें राम मंदिर के नाम पर वोट मांगा गया

नायक-पूजा यहीं खत्म नहीं होती हैं, बानगियां और भी हैं– कहा गया कि 2014 में मोदी के आने के बाद ही भारत आज़ाद हुआ; इसको सिर्फ़ अभिनेत्री कंगना रनौत ने ही नहीं दोहराया, बल्कि ऐसा कहने वाले मोदी-भक्तों की रातों-रात बाढ़-सी आ गई। गोया, मोदी से पहले भारत गुलाम था, न स्कूल थे, न कॉलेज थे, न विश्वविद्यालय थे, न अस्पताल थे, न रेलें थीं, सब मोदी के आने के बाद पहली बार भारत में हुआ। और तो और अभी एक केंद्रीय मंत्री ने कहा– शंकराचार्य मोदी से बड़े नहीं हैं। राजव्यवस्था की दृष्टि से भी यह बात सही नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री से बड़ा राष्ट्रपति होता है। लेकिन, जिस हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र का डंका पीटा जा रहा है, उसमें प्रधानमंत्री की हैसियत शंकराचार्य के सामने कुछ भी नहीं है। धर्म के क्षेत्र में धर्मगुरु के रूप में शंकराचार्य का पद बड़ा है, जिसके समक्ष आरएसएस-प्रमुख भी नतमस्तक होकर नीचे जमीन पर बैठते हैं। 

मोदी-पूजा के कुछ और नमूने भी हैं– मोदी का विरोध देश का विरोध है; मोदी न होते तो चीन कब का भारत पर कब्ज़ा कर चुका होता; मोदी ही अखंड भारत बनाएंगे; (ऐसे ही एक मोदी भक्त से एक एंकर ने पूछा कि अखंड भारत में कितने देश आते हैं, तो वह एक भी नाम नहीं बता पाया।) विश्व भर में मोदी का डंका बज रहा है; मोदी की एक डुबकी से ही मालदीव डूब गया; मोदी से पंगा लिया, अब मालदीव का बर्बाद होना तय; मोदी ने भारत को विश्व गुरु बना दिया; लेकिन कौन-कौन देश भारत को अपना गुरु मानते हैं, यह कोई नहीं बताता।

नायक-पूजा को शक्ति तभी मिलती है, जब नायक स्वयं हर तरफ अपने नाम का सिक्का चाहता हो। गांधी में भी आत्मप्रचार की भूख थी, तभी उनकी पूजा को बल मिला, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में तो यह भूख इतनी चरम पर है, कि उसकी कोई सीमा ही नहीं है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि छोटे-से-छोटे पुल का भी उद्घाटन मोदी स्वयं करना चाहते हैं, जबकि वह राज्य सरकारों का अधिकार होता है। प्रतिवर्ष उनके आत्मप्रचार और उद्घाटन-लोकार्पण के कार्यक्रमों पर इतना धन खर्च होता है कि उतने में दो नए विश्वविद्यालय स्थापित हो सकते हैं। इसमें रैलियों का खर्च शामिल नहीं है। गंगा में उनकी एक डुबकी भी कई सौ करोड़ की बैठती है। 

अद्भुत कमाल तो भक्तों के प्रबंधन का यह है कि अयोध्या में राम भी मोदी के बिना नहीं आए। यह आत्मप्रचार का अकल्पित उदाहरण है। इस आत्मप्रचार से अयोध्या उतनी राममय नहीं हुई, जितनी कि वह मोदीमय कर दी गई। अयोध्या में रामलला की मूर्ति की स्थापना के प्रचार पर, जिसे प्राण-प्रतिष्ठा नाम दिया गया है, दो हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। प्राण-प्रतिष्ठा भी मोदी के हाथों होगी, शंकराचार्यों के हाथों नहीं। इसका कारण इसके सिवा कुछ नहीं है कि मोदी मंदिर-निर्माण का श्रेय किसी और को देना नहीं चाहते, सारा श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं। और सिर्फ़ इतना ही नहीं है, पूरे देश में रामोत्सव के नाम का ऐसा उन्माद फैला दिया गया है, जैसे इससे बड़ा और जरूरी कोई काम भारत में है ही नहीं। लोकतंत्र और संविधान इस समय हाशिए पर डाल दिए गए हैं, यहां तक कि संवैधानिक संस्थाओं को भी उसकी कोई सुध नहीं है। मोदी ने स्वयं को इस कदर सबसे ऊपर बनाया हुआ है कि उनके सामने बाक़ी सारी चीजें कोई मायने नहीं रखतीं, न विपक्ष और न संविधान। वह विपक्ष के बगैर भी संसद में बिलों को पास कराने की क्षमता रखते हैं। यह निरंकुशता है, और यह निरंकुशता सत्ताधीश में तभी आती है, जब जनता उसकी अंधभक्त होकर पूजा करने लगती है। दूसरे शब्दों में नायक-पूजा ही सत्ताधीश को निरंकुश बनाती है।

इसलिए नायक-पूजा ने वह सब-कुछ करा डाला, जिसकी लोकतंत्र में कल्पना तक नहीं की जा सकती। हिंदुओं से जबरन एक नई दीवाली मनवाई जा रही है। और इसके लिए सरकार द्वारा वातावरण पैदा करने के काम में जिला अधिकारियों को झोंक दिया गया है। है किसी जिला अधिकारी में हिम्मत, जो इस आदेश को न माने? नायक-पूजा में विभोर जिला प्रशासन शहरों की सड़कों को जगमगाने का काम कर रहा है, शहर में जितने भी मंदिर हैं, उनमें रामायण का पाठ करवाने की व्यवस्था कर रहा है, आतिशबाजी बिकवा रहा है, ताकि लोग प्राण-प्रतिष्ठा वाले दिन उसका उपयोग कर सकें। रोडवेज की बसों में राम-धुन बजवाई जा रही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 22 जनवरी का सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया है। वह इस हिंदू इवेंट को पूरे देश का कार्यक्रम बता रही है। और पूरा प्रशासन योगी-मोदी की भक्ति में एक टांग पर खड़ा नज़र आ रहा है।

“मोदी है तो सब मुमकिन है” के अंतर्गत अंधविश्वास भी फैलाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि अनेक देवी-देवता मनुष्य का रूप धारण करके प्राण-प्रतिष्ठा के उत्सव में शामिल हो रहे हैं। कौन-कौन से देवी-देवता मनुष्य-रूप में आ रहे हैं? ये नाम नहीं खोले गए हैं। पर सवाल यह है कि जब कई देवी-देवता मनुष्य का रूप धारण करके आ रहे हैं, तो श्रीराम ही क्यों मनुष्य का रूप धारण करके नहीं आ रहे। श्रीराम भी तो देवता ही हैं। उनको भी मनुष्य रूप में प्रकट हो जाना चाहिए। 

अयोध्या में बड़ी संख्या में हनुमानों (वानर सेना) की उपस्थिति पहले से ही है। लेकिन एक चैनल दिखा रहा है कि अब बहुत से गिद्ध भी राम का दर्शन करने के लिए अयोध्या पहुंच गए हैं। इन्हें राम-भक्त जटायु बताया जा रहा है। अब जो गिद्ध विलुप्त पक्षी माना जा रहा है, कहीं दिखाई नहीं देता, वह बड़ी संख्या में अयोध्या पहुंच गया। कमाल है कि नहीं?  एक चैनल यह भी दिखा रहा है कि प्रभु राम का दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में भालू भी अयोध्या पहुंच गए हैं। इन्हें जामवंत बताया जा रहा है। एक चैनल ने खबर दी है कि अयोध्या में लोगों ने आकाश में पुष्पक विमान भी उड़ता हुआ देखा है। हद तो तब हो गई, जब एक चैनल ने बड़ी संख्या में नागों के भी अयोध्या पहुंचने की खबर चला दी। अब सवाल यह है कि नागों का प्रभु राम से क्या संबंध है? ‘मोदी है तो मुमकिन है’ की यह कितनी भद्दी तस्वीर है? यह नायक-पूजा की पराकाष्ठा है।

असल में ये सब प्रायोजित कार्यक्रम हैं, जो जानबूझकर बनाए जा रहे हैं, और मोदी इसी में अपनी महानता देखते हैं। यहां डॉ. आंबेडकर का वह कथन बहुत प्रासंगिक है, जो उन्होंने 1943 में रानाडे की वर्षगांठ पर बोलते हुए कहा था। उन्होंने कहा था– 

“महान व्यक्ति किसे कहा जा सकता है? यदि अलैक्जेंडर, अटीला, सीजर और तैमूरलंग जैसे सैन्य नायकों की बात की जाए तो उत्तर देना कठिन नहीं है। सैन्य-नायक युग-निर्माता होते हैं और परिवर्तन लाते हैं। वे अपनी महान विजयों से अपने समकालीनों में आतंक और चकाचौंध उत्पन्न करते हैं। वे इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते कि उन्हें महान कहा जाए। जैसा स्थान हिरणों के बीच सिंह का होता है, वैसा ही मनुष्यों में उनका होता है। यह भी सही है कि मानव-समाज के इतिहास में उनका स्थायी प्रभाव बहुत न्यून होता है। उनकी विजयों का महत्व घट जाता है और यहां तक कि महान सेनापति नेपोलियन की समस्त विजयों के उपरांत भी फ्रांस का राज्य ऐसा विशाल नहीं रहा, जैसा कि उसकी विजय-यात्रा के प्रारंभ में था। एक लंबा समय गुजर जाने के बाद, जब उनका मूल्यांकन किया जाता है, तो वे विश्व-आंदोलनों की पृष्ठभूमि में अपने समय के ऐसे महान व्यक्ति प्रतीत होते हैं, जो समकालीन समाज के चरित्र पर अपना कोई चिह्न नहीं छोड़ जाते। उनके चरित्र और मनोबल के विवरण दिलचस्प हो सकते हैं, लेकिन वे समाज को प्रभावित नहीं करते और समाज में समग्र परिवर्तन लाने हेतु उसे उद्वेलित भी नहीं करते।”

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

संबंधित आलेख

गोरखपुर : दलित ने किया दलित का उत्पीड़न, छेड़खानी और मार-पीट से आहत किशोरी की मौत
यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की असंवेदनशील कार्यशैली को उजागर करता है, क्योंकि छेड़खानी व मारपीट तथा मौत के बीच करीब एक महीने के...
फुले-आंबेडकरवादी आंदोलन के विरुद्ध है मराठा आरक्षण आंदोलन (पहला भाग)
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों को जन्म दे रहा है। राजनीतिक स्तर पर अब इस आंदोलन के साथ दलित राजनेता...
ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड : बिहार की भूमिहार राजनीति में फिर नई हलचल
भोजपुर जिले में भूमिहारों की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। एक समय सुनील पांडे और उसके भाई हुलास पांडे की इस पूरे इलाके...
लोकसभा चुनाव के बाद उपचुनावों में भी मिली एनडीए को हार
अयोध्या लोकसभा क्षेत्र में हार के सदमे से अभी भाजपा उबरी भी नहीं थी कि उपचुनाव में बद्रीनाथ विधानसभा सीट हारने के बाद सोशल...
बिहार : दलितों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एससी की सूची से तांती-तंतवा बाहर
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में राज्य की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण और सांविधानिक प्रावधानों के विरुद्ध पायी...