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बिलकीस बानो को मिला न्याय, लेकिन कबतक?

सुप्रीम कोर्ट ने अवश्य ही केंद्र और गुजरात सरकार को न्याय का सबक सिखाया है। पर क्या वास्तव में वह इस न्याय को मानेगी? ऐसा लगता तो नहीं है। पढ़ें, कंवल भारती का यह आलेख

इधर 15 अगस्त, 2022 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण में नारी-सम्मान और नारी-सशक्तिकरण की बात कर रहे थे, उधर उसी दिन 2002 के गुजरात-दंगों में बिलकीस बानो के बलात्कारियों और उसके परिवार के 7 लोगों के हत्यारों को, जो उम्रकैद की सज़ा काट रहे थे, गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा माफ़ी देकर जेल से रिहा किया जा रहा था। जले पर नमक यह कि जेल से छूटने के बाद इन सभी बलात्कारियों और हत्यारों को भाजपा के नेताओं द्वारा फूल-मालाएं पहनाकर और मिठाई खिलाकर सम्मानित किया गया था, भाजपा ने उन्हें संस्कारी ब्राह्मण कहा था। निश्चित तौर पर यह नारी-सम्मान और आज़ादी के अमृतकाल की वह शुरुआत थी, जिसने गुजरात के नरसंहार में तत्कालीन गुजरात-सरकार की प्रत्यक्ष संलिप्तता को प्रमाणित कर दिया था।

लेकिन बिलकीस बानो ने हार नहीं मानी, और गुजरात सरकार की कार्यवाही के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। हालांकि केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद, देश की अदालतों ने अधिकांश फैसले सरकार के पक्ष में दिए हैं, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी, लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने बिलकीस बानो को उसकी अपील पर न्याय दे दिया। बीते 7 जनवरी, 2024 को दो जजों की पीठ ने न केवल गुजरात सरकार की कार्यवाही को अवैध करार दिया, बल्कि उसे निरस्त कर दिया औरउसे फटकार भी लगाई। पीठ ने दो सप्ताह के भीतर सभी 11 अपराधियों को पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने के आदेश दिए हैं। बिलकीस बानो के लिए यह निर्णय सचमुच ‘हैप्पी न्यू इयर’ है, जैसा कि उन्होंने कहा है। लेकिन सच तो यह भी है कि यह निर्णय ‘न्याय’ के लिए भी ‘हैप्पी न्यू इयर’ है।

अब एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये बलात्कार और हत्या के दोषी आत्मसमर्पण करेंगे, या उन्हें बचाने के लिए गुजरात सरकार कुछ और कानूनी दांव-पेंच खेलेगी? क्या इस चुनावी काल में, जिसके लिए हिंदी पट्टी को पिछले कई महीनों से हिंदुत्व के भगवा रंग से रंगा जा रहा है और राम नाम के आक्रामक उन्माद से गरमाया जा रहा है, मोदी सरकार कोई जोखिम लेगी? अगर अपराधी किसी अन्य पार्टी से जुड़े होते, तो अब तक भाजपा के नेता “गुजरात के मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा दो” के नारे लगा रहे होते। लेकिन नैतिकता से कोसों दूर भाजपा से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह गुजरात के मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा मांगे।  

बिलकीस बानो, पीड़िता

वर्ष 2002 के दंगों के दौरान बिलकीस बानो के साथ तथाकथित ‘संस्कारी ब्राह्मणों’ ने गैंगरेप किया था, और उसके परिवार के 7 सदस्यों को बेरहमी से मार दिया था, जिसमें उसकी तीन साल की बच्ची भी थी। यह दंगा कोई दंगा नहीं था, बल्कि एक सोचा-समझा नरसंहार था। दंगा वह होता है, जिसमें दो समुदाय के बीच संघर्ष होता है, और जिसमें दोनों तरफ के लोग मारे जाते हैं। पर उसे कैसे दंगा कहा जा सकता है, जिसमें एक ही समुदाय के लोगों को मौत के घाट उतारा गया था। इस नजरिए से न वह दंगा था, जो गोधरा में हुआ, और न वह दंगा था, जो गोधरा के बाद हुआ। 2002 में हिंदुत्व के गुंडों ने मुस्लिम बस्तियों में जो तांडव किया था, वह रोंगटे खड़ा करने वाला था। उस नरसंहार की जो रपटें उस समय के अख़बारों में छपी थीं, अगर वह 2014 के बाद होता, तो शायद ही कोई अख़बार उन रिपोर्टों को छापने का साहस करता। उन रपटों के अनुसार, एक मकान का दरवाजा नहीं खुलने पर उसमें पानी छोड़ा गया था, फिर उसमें बिजली का करंट दौड़ाया गया था। घर के लोग किस तरह तड़पे होंगे, यह सोचकर ही रोएं खड़े हो जाते हैं। गर्भवती औरतों के पेट तलवार से चीरे गए थे, और भ्रूण निकाल कर उसे तलवार की नोक पर हवा में उछाला गया था। इस तरह की क्रूर हत्याओं का वर्णन हमें ऋग्वेद में मिलता है। कृष्ण का इंद्र से संघर्ष था। कृष्ण को न जीत पाने के कारण इंद्र ने कृष्ण के देश की गर्भवती स्त्रियों की, प्रसूति गृह में घुसकर, हत्याएं कर दी थीं, और कुछ और अत्याचार करने के बाद वह पीछे लौट गया था। इसी वैदिक हिंसा को गुजरात में दोहराया गया था। मां के सामने बेटियों के साथ और बेटियों के सामने मां के साथ बलात्कार और हत्याएं की गई थीं। जो औरतें-बच्चियां जान बचाने के लिए जंगल में भागी थीं, वहां भी पकड़ कर उनके साथ बलात्कार किया गया, और फिर उन्हें मार दिया गया था। पीड़ितों की ओर से कहीं कोई संघर्ष नहीं हुआ था। वह एक तरफा नरसंहार और अत्याचार था, जो बाकायदा सूची बनाकर पुलिस के संरक्षण में किया गया था। इस नरसंहार का, चुनाव जीतने के बाद, विजय जुलूस निकालकर जश्न मनाया गया था। इस नरसंहार के खिलाफ जिसने भी आवाज उठाई, या कोर्ट में सुबूत पेश करने की कोशिश की, वह या तो मारा गया, या जेल गया। 

बहरहाल, अभी तक भाजपा के किसी भी बड़े नेता ने, सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय का स्वागत करना तो दूर, उस पर प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं की है। जिस भाजपा सरकार ने बिलकीस के दोषियों को अच्छे आचरण वाले संस्कारी ब्राह्मण कहकर उनकी समय-पूर्व रिहाई को न्यायोचित ठहराया हो, उसे सुप्रीम कोर्ट की फटकार पर पश्चाताप होगा, इसका सवाल ही पैदा नहीं होता। उसे ‘सुप्रीम’ न्याय पर तो दुःख हो सकता है, पर अपने ‘किए’ पर नहीं। गुजरात सरकार ने दोषियों को इस आधार पर माफ़ी दी और समय-पूर्व रिहा किया था कि वे संस्कारी ब्राह्मण हैं और जेल में उनका अच्छा आचरण था। निस्संदेह राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी सज़ा-याफ्ता को 14 साल के अच्छे आचरण पर या अन्य अच्छे कारणों से मुक्त कर सकती है। पर क्या बलात्कार और हत्या करने के समय भी वे संस्कारी थे? अगर वे संस्कारी होते, तो क्या वे बलात्कार और हत्या जैसा जघन्य अपराध को अंजाम देते? जेल में रहने के बाद वे संस्कारी कैसे हो गए? सवाल यह भी है कि केंद्र सरकार या गुजरात सरकार ने माफ़ी देने की यह उदारता अन्य आरोपियों के साथ क्यों नहीं दिखाई, जो सिर्फ़ राजनीतिक कारणों से सालों से जेलों में बंद हैं और इंसाफ की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि सच यह है कि बलात्कार और हत्या के दोषियों को माफ़ी नहीं दी जा सकती। उन्हें माफ़ी देकर इसलिए छोड़ा गया, क्योंकि भाजपा को आने वाले गुजरात चुनाव में उनके ‘संस्कारों’ का उपयोग करना था। भाजपा और आरएसएस अपने जत्थे ऐसे ही संस्कारी लोगों से तैयार करते हैं। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब भाजपा और आरएसएस ने देश में उन्माद फ़ैलाने और दंगा कराने में इन संस्कारी लोगों का उपयोग किया हो। आरएसएस और भाजपा ईसाइयों और मुसलमानों के विरुद्ध अपने सांप्रदायिक मिशन में हमेशा ऐसे ही संस्कारी गुंडों का इस्तेमाल करते हैं। अभी हाल में उत्तर प्रदेश की भाजपा ने सचिन अहलावत को बुलंदशहर का जोनल प्रमुख नियुक्त किया है। यह वही सचिन अहलावत है, जो 2018 में गोकशी को आधार बनाकर किए गए सायना दंगों का दोषी है, और बेल पर है, जिसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या हुई थी। क्या यह अजीब नहीं लगता कि ऐसे अपराधी बेल पर बाहर हैं, जबकि राजनीतिक कारणों से बनाए गए अनेक झूठे आरोपी जेल में हैं, और उनकी बेल की अर्जियों पर सुनवाई तक नहीं हो रही है?

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने गुजरात सरकार के ‘माफ़ी आदेश’ को इस आधार पर खारिज किया है कि इस तरह का आदेश पारित करने का अधिकार गुजरात सरकार के पास था ही नहीं। इसे उन्होंने न्याय क्षेत्र का उल्लंघन और अपने विवेक का दुरूपयोग करने के साथ-साथ दोषियों के साथ मिलीभगत का कृत्य भी बताया। उन्होंने कहा कि इस आधार पर कि अपराध गुजरात राज्य में हुआ था, 11 दोषियों की माफ़ी-याचिका पर गुजरात सरकार निर्णय नहीं कर सकती, क्योंकि अपराध-दंड-संहिता के अनुसार यह अधिकार उस राज्य के पास है, जहां अपराधियों को सज़ा मिलती है, न कि उस राज्य के पास, जहां अपराध होता है। 

इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अवश्य ही केंद्र और गुजरात सरकार को न्याय का सबक सिखाया है। पर क्या वास्तव में वह इस न्याय को मानेगी? ऐसा लगता तो नहीं है। भले ही सभी 11 दोषी आत्मसमर्पण कर दें और वापस जेल चले जाएं। लेकिन उनके पास यह विकल्प है कि वे अपनी माफ़ी-याचिका नए सिरे से महाराष्ट्र सरकार को भेजें। और ऐसी संभावना लगती नहीं है कि मोदी-सरकार के संरक्षण में गठित की गई एकनाथ शिंदे की सरकार याचिका को ठुकरा दे।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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