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भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ की गत

आज हिंदुत्व के अर्थ हैं– शुद्ध नस्ल का एक ऐसा दंगाई-हिंदू, जो सावरकर और गोडसे के पदचिह्नों को और भी गहराई दे सके और इस लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद को अपने बुल्डोजर द्वारा कुचल सके। और यह काम इतनी सहजता से हो रहा है कि इस राष्ट्र को इसकी भनक भी लगने नहीं दी जा रही है कि लोकतंत्र को राजतंत्र में बदला जा रहा है। पढ़ें, द्वारका भारती का यह आलेख

भारतीय इतिहास के पन्नों को उठा कर देखें, तो भारत हमें कभी भी एक संपूर्ण राष्ट्र के रूप में देखने को नहीं मिलता। इसलिए नहीं कि यहां प्रत्येक मील के साथ ही यहां के लोगों की भाषा, वेशभूषा और खान-पान भिन्न हो जाता है, बल्कि इसलिए कि संसार भर में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है, जिसमें लोग विचरते हुए तो दिखते हैं, लेकिन एक-दूसरे की पीठ से पीठ सटाए हुए, एक-दूसरे से नजरें चुराए हुए; उनकी तरह, जो देखते हुए भी एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते। इस पर विद्रूपता यह कि भारत के इसी भदेस को एक विशेषता मानते हुए संसार के समक्ष निरंतर प्रस्तुत किया जाता रहा है। क्या यह घोर आश्चर्य की बात नहीं कि एक राष्ट्र अपने भीतर पनपे सांस्कृतिक भदेस के साथ जीता हुआ भी एक संपूर्ण राष्ट्र होने का दावा करता हुआ जरा भी न हिचके? अपने राष्ट्र की तमाम विसंगतियों को ओढ़े हुए ‘सहिष्णुता हिंदू धर्म का सारतत्व’ है, की घोषणा करे, तो हमें यह बार-बार सोचना पड़ता है कि यह सहिष्णुता तब कहां गायब हो जाती है, जब हाड़-मांस से बने अपने जैसे ही मानव को छूना तो क्या देखना भी पसंद नहीं करती। जब यह कहा जाता है कि भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता महान आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित है, तो हमें इस राष्ट्र के उन लोगों के बारे में क्यों नहीं बताया जाता जो अपना जीवन तमाम सामाजिक दरिंदगियों के साथ जीने को अभिशप्त रहे पर उनकी चीखों को इसी आध्यात्मिकता ने सदा दबाए रखने की ही शिक्षा दी।

इन्हीं परिस्थितियों में इधर-उधर बिखरे तिनकों के ढेर को यदि हम एक साबुत राष्ट्र मानने को तैयार हैं, तो सचमुच भारत को एक विलक्षण राष्ट्र कहा जा सकता है। इसे एक तमाशा ही कहा जाना चाहिए कि यहां ‘संस्कृति’ और ‘सभ्यता’ को एक ही पलड़े में रखा जाता है ताकि सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर हजारों दमनकारी एवं अमानवीय कृत्यों पर आध्यात्मिकता का मुलम्मा चढ़ाया जा सके। और सामने यही सभ्यता के रूप में दिखाई देता रहे। ऋषि-मुनियों का देश घोषित किया जाता रहे। संसार के लोग यह न जान सकें कि इसी आध्यात्मिकता की आड़ में मानवता के परखच्चे भी उड़ाए जाते रहे हैं। ‘मनुस्मृति’ जैसे ग्रंथों पर धार्मिक पवित्रता की परत चढ़ाने पर कौन इस बारे में सवाल दागने का साहस जुटाएगा?

अपने झुके हुए कंधों पर संसार भर का सांस्कृतिक बोझ ढोते हुए हांफने वालों को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाना कितना दु:खदायी होता है, इसका अहसास जो राष्ट्र नहीं करना चाहेगा तो उसका मिजाज क्यों न बिगड़ा हुआ माना जाएगा? 

धूमिल नहीं हो रही अवधारणा कि ब्राह्मण ही राष्ट्र है

इस तथ्य को कौन नकारना चाहेगा कि इस देश की सामाजिक संरचना पर ब्राह्मण सबसे ज्यादा भारी भरकम व्यक्तित्व रहा है। आज भी यह जकड़ऩ बहुत ढीली नहीं पड़ी है। भारत के इतिहास में एक ब्राह्मण का दबदबा अचानक नहीं बना है। इस वैदिक सभ्यता के अर्थ ही ‘ब्राह्मण’ से पैदा होते हैं। यह कहने में कोई उज्र नहीं प्रतीत होता कि आज भी यह अवधारणा धूमिल नहीं होती कि ब्राह्मण ही राष्ट्र है और राष्ट्र के अर्थ ब्राह्मण ही होते हैं।

इसके बीज हम पौराणिक ग्रंथ ‘तैत्तिरीय-संहिता’ में देख सकते हैं। इसमें राष्ट्र शब्द का तात्पर्य ऐसे लोगों से है, जो यज्ञ अनुष्ठान में ऋण भाग से लाभान्वित होते हैं। (1.6.10) स्पष्ट है कि यज्ञों में ब्राह्मण प्रमुख होते थे।

हिंदुत्ववादी राष्ट्रीयता दोधारी तलवार रही है

मनुस्मृति में ब्राह्मण के लिए स्पष्ट कहा गया है कि जो भी धन इस पृथ्वी पर है, वह सब ब्राह्मण का है। उत्पत्ति के कारण श्रेष्ठ होने से यह सब ब्राह्मण के ही योग्य है। (अध्याय-1, श्लोक-100)

इस देश की प्रत्येक दीवार पर लिखा हुआ मिलता है कि ब्राह्मण ही सबसे ऊपर है। शेष सब गौण।

हिंदू और राष्ट्रीयता का प्रश्न

बात यहीं पर ही खत्म नहीं होती। यदि हम भारत के इतिहास का विश्लेषण गहन दृष्टि से करें तो इसी ब्राह्मणवाद को आसानी से पकड़ा जा सकता है। जिस ‘हिंदू’ शब्द का जिक्र वेदों में कहीं नहीं मिलता, उसी शब्द को आधार मान कर एक तिलिस्म खड़ा किया जा रहा है। हिंदू शब्द भी दूसरों का दिया गया नाम है, जिसे अपना कर हिंदू आज खुद को गौरवान्वित महसूस करता रहता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसी शब्द को आज राष्ट्रीयता का प्रतीक मानकर यह हिंदुत्ववादी लोग अपनी राष्ट्रीयता सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं।

इसी ब्राह्मणवाद का एक और ऐतिहासिक झूठ आसानी से पकड़ा जा सकता है। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में कहा गया है कि गुप्तकाल, जो कि हिंदुओं का काल रहा है, भारत का स्वर्णयुग रहा है। यहां ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि गुप्तकाल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण काल महान अशोक का तथा अरब सागर से बिहार तक अपना साम्राज्य स्थापित करने वाले कनिष्क का काल स्वर्णयुग बनने का अधिकारी नहीं समझा गया, क्योंकि महान अशोक तथा कनिष्क दोनों हिंदू न होकर बौद्धधर्म के अनुयायी थे।

इन कारणों से गुप्त वंश का काल स्वर्णयुग नहीं था

गुप्तों के बारे में हिंदू इतिहासकारों ने बहुत असावधानी से काम लेते हुए इतना महिमामंडन किया है कि सचमुच के इतिहासकारों की बुद्धि भी चकरा जाती है। गुप्तों के समय आयुर्वेद में कुछ नया नहीं जोड़ा गया, लेकिन यदि हम कुषाण-नरेश कनिष्क की बात करें, तो उसके दरबारी चरक नाम के प्रसिद्ध वैद्य का नाम मिलता है। यह उल्लेखनीय है कि गुप्तों के समय में इस आयुर्वेद से शल्यचिकित्सा को सदा के लिए बाहर कर दिया गया था।

गुप्तकाल में जनता की भाषा प्राकृत थी, किंतु यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत भाषा को प्रश्रय दिया गया। साहित्य की बात करें, तो इस गुप्तकाल के स्वर्णयुग में ऐसा कोई कवि नहीं मिलता, जो गुप्त सम्राट को अपना आश्रयदाता मानता हो। उज्जैन में पैदा हुए कालिदास अपनी किसी कृति में किसी गुप्त सम्राट का उल्लेख नहीं करते।

गुप्तों के साम्राज्य में भारतीय कला के चरम विकास का कोई इतिहास नहीं मिलता। उस काल में अजिंठा (अजंता) व वेरूल नामक साम्राज्य गुप्त सम्राटों के अधीन नहीं थे, लेकिन उस काल में हजारों शिल्पकारों की छेनियां मूर्तियों को तराश रही थीं।

गुप्तकाल में कोई महान वैज्ञानिक पैदा हुआ हो, ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता। इसके विपरीत हिंदू समाज में हमें आज जो रूढ़िय़ां या परंपराएं देखने को मिलती हैं, इन सब का जन्म गुप्तों के काल में ही होता हुआ हम पाते हैं।

यदि भारत में कोई स्वर्णकाल रहा भी है तो उसे कुषाणों के काल में देख सकते हैं। इस कुषाण काल में रोमन साम्राज्य के साथ खूब व्यापार बढ़ता हुआ देखा जाता है। बहुत बड़ी संख्या में रोमन स्वर्ण मुद्राएं भारत पहुंचने लगी थीं। ‘मुद्राओं का इतिहास’ नामक पुस्तक लिखने वाले चर्चित लेखक गुणाकर मुले बताते हैं कि कुषाण काल में कुषाणों ने भी अपनी स्वर्ण मुद्राएं बनानी शुरू कर दी थीं, जिसका नाम दीनार प्रचलित था। कुषाण दीनार तथा रोमन देनेरियस् का तौल लगभग समान हुआ करता था, जो कि 124 ग्रेन या 8 ग्राम था।

गुप्तों के काल में हिंदू धर्म का प्रचार जितनी तेजी से हुआ, वह किसी अन्य काल में देखने को नहीं मिलता। गुप्तों के काल में ही विष्णु को पहली बार लक्ष्मी मिलती है। लक्ष्मी का ब्राह्मणधर्म से कुछ लेना-देना नहीं है, वह तो ब्राह्मणेत्तरों की देवी थी। इसे पहले ‘सिरिमा देवी’ कहा गया है। वास्तव में गुप्तकाल को विष्णुकाल कहना सटीक होगा— ऐसी कई इतिहासकारों की मान्यता है।

आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) हमारे देश के पहले महान गणितज्ञ खगोलविद् हैं। अपने ‘आर्यभटीय ग्रंथ’ में उन्होंने जानकारी दी है कि 449 ई. में वे 23 साल के थे। इसके अर्थ यह हैं कि उस काल में गुप्तों के वैभव का सूर्य अस्त हो चुका था और गुप्तकाल यह दावा नहीं कर सकता कि उनके साम्राज्य में ही आर्यभट्ट जैसे महान वैज्ञानिक पनपे थे। यह सारा खेल इस प्रकार रचा गया कि ऐसा प्रतीत हो कि भारतीय इतिहास के गुप्तकाल में ही स्वर्णयुग था और हिंदूकाल का वैभवशाली युग।

अतीतोन्मुखी है ब्राह्मण धर्म

वास्तव में समूचा ब्राह्मणधर्मी साहित्य अतीतोन्मुखी है। उसके हिसाब से तो हमारा युग कलियुग है, पापयुग है। अतीत में द्वापर, त्रेता युग, आदि युग एक से बढ़क़र एक बेहतर युग थे, इस प्रकार की भावना आज भी प्रभावी है और हिंदू राष्ट्र का मुख्य विचार भी। ब्राह्मण धर्म की सदियों की शिक्षा आज भी भारत राष्ट्र की मुख्य शिक्षा का दर्जा पाए हुए है। इस प्रकार की अवधारणाों का जन्म भी गुप्तकाल जिसे ‘स्वर्णयुग’ कहा जाता है, में ही होता है तो इसका श्रेय हमें उन इतिहासकारों को देना होगा, जिनकी मनोवृति पक्षपाती रही थी। 

आज के संदर्भ में भी हम देखें तो राममंदिर की धूम यदि कुछ ज्यादा ही है, तो इसका कारण इस राम मंदिर की भव्यता नहीं, बल्कि सत्ता के दमदार सहयोग का ज्यादा होना है। ऐसा ही गुप्तकाल को स्वर्णयुग बनाने के मामले में घटित हुआ है।

आज के दौर में राष्ट्रवाद के अर्थों को देखें तो यह सीधे ही सत्ता द्वारा ही ध्वनित हो रहे हैं। हम कह सकते हैं कि भारत का राष्ट्रवाद जिस मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है, वहां राष्ट्रवाद के अर्थ सीधे ‘हिंदू’ नामक शब्द से जुड़े हुए तो हैं ही, बल्कि दो कदम और आगे बढ़ते हुए ‘कटखने हिंदुत्व’ से भी चस्पां कर दिए गए हैं। और यह काम इतनी ढि़ठाई से हो रहा है कि संसार के तमाम मानवाधिकारी संगठन दंग हैं।

हिंसा और हिंदुत्व

आज हिंदुत्व के अर्थ हैं– शुद्ध नस्ल का एक ऐसा दंगाई-हिंदू, जो सावरकर और गोडसे के पदचिह्नों को और भी गहराई दे सके और इस लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद को अपने बुल्डोजर द्वारा कुचल सके। और यह काम इतनी सहजता से हो रहा है कि इस राष्ट्र को इसकी भनक भी लगने नहीं दी जा रही है कि लोकतंत्र को राजतंत्र में बदला जा रहा है।

राष्ट्रवाद की परिभाषा करते हुए ब्रिटिश के प्रसिद्ध दार्शनिक अर्नेस्ट आंद्रे गलेनर ने कभी कहा था कि— “राष्ट्र राष्ट्रवाद को पैदा नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा सही है : राष्ट्रवाद राष्ट्रों को पैदा करता है।” आज का हिंदुत्व ठीक इसी दिशा की ओर तीखे रूप में अग्रसर है। उसे इस देश का हर मुसलमान सम्राट अहमदशाह अब्दाली का वंशज लगता है, लेकिन वे यह नहीं जानना चाहते कि अहमदशाह अब्दाली का सेनापति सदाशिव राव भाऊ था, जिसके नेतृत्व में (1761) को मराठों के साथ युद्ध लड़ा गया था। एक बड़ा प्रश्न पैदा हो गया है कि क्या भारत का राष्ट्रवाद यही मांग करता है कि इस राष्ट्र की भूमि पर पैदा होने वाले मुसलमानों को खदेड़ कर हिंदू राष्ट्रवाद को पत्थर-सा मजबूत किया जाए। यदि इन कथित राष्ट्रवादी हिंदुओं की यही योजना है तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा को समय-समय पर क्यों जमीन पर उतार लिया जाता है? दुनिया को क्यों बताया जाता है कि भारत सारी दुनिया को अपना परिवार समझता है? यदि राष्ट्रवाद की परिभाषा को अपनी नीयत के अनुसार तय कर लिया जाता है तो हमें रवींद्रनाथ टैगोर के बहुत पहले शब्दों को यहां दोहराना होगा कि– “राष्ट्रवाद की सच्ची भावना भारत में कभी नहीं रही। हालांकि बचपन से ही मुझे सिखाया गया है कि इंसानियत के प्रति आदर और ईश्वर की भक्ति से कहीं बेहतर राष्ट्रभक्ति है।” क्या आज के इन राष्ट्रवादियों के पास इसके उत्तर में कुछ कहने को बचता है?

न धर्म, न समाज, बस राजनीति

इसमें कोई शंका नहीं कि यह कथित हिंदुत्ववादी जो राष्ट्रवादी होने का अपना दावा प्रस्तुत कर रहे हैं, महज एक राजनीतिक चाबी से ताला खोलने की कोशिश कर रहे हैं, जो कभी खुलेगा ही नहीं। अर्थात् वे यह जानते हुए भी कि इस देश की संस्कृति में कहीं भी कोई एक ‘वाद’ अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सकता, लोगों पर वेषभूषा व खानपान जैसे नादिरशाही फरमान देश के लोगों पर नहीं लाद सकता और न ही गाय के नाम पर पूरे देश को गावदी (मूर्ख) बना सकता है।

इस राष्ट्र का नागरिक भले ही कम साक्षर हो, लेकिन वह यह कभी नहीं चाहेगा कि यह कथित हिंदुत्ववादी सिर्फ एक विशेष टोटम या गण विशेष को पूरे राष्ट्र पर लादने का प्रयत्न करते हुए राष्ट्रवाद की व्याख्या करने का प्रयत्न करें।

वस्तुत: नस्लवाद, शुद्धतावाद तथा सनातनता का नारा देकर यह हिंदुत्ववादी कुछ देर तक धमाचौकड़ी तो अवश्य मचा सकते हैं; गेरुए वर्ण के वस्त्र धारण कर तथा ललाट पर चवन्नी के आकार का तिलक लगाकर बाजारों में अपनी धाक जमा सकते हैं, लेकिन इस राष्ट्र पर सदा के लिए अपना पांव कभी नहीं जमा सकते।

जातिवादी घृणा इस राष्ट्र की एक दुखती रग है, जिसके बल पर यह नस्लवादी लोग समाज को कई भागों में बंटा हुआ ही देखना चाहते हैं तो उन्हें सावधान होना पड़ेगा कि  यह जातिवाद राष्ट्र के साथ-साथ उनकी भी सेहत को पहुंचाता रहा है। ऐसे लोगों को जानना होगा कि राष्ट्र के माथे पर लगे इस जातिवाद के सहारे वे भले ही स्वयं को सबसे ऊंची मंजिल पर खड़े समझते हों, लेकिन इसके कारण राष्ट्र आज तक ऊंचा नहीं उठ पाया है।

आज नस्ली शुद्धता के कोई अर्थ नहीं रहे हैं। जिन मंदिरों में इसी नस्ली शुद्धता तथा नारी-प्रवेश को लेकर आज भी भेदभाव होता है, उन्हें यह समझ लेना होगा कि पुरातन काव्य-गाथा ‘महाभारत’ में कहीं भी मंदिर की चर्चा नहीं मिलती, तथा न ही किसी धातु की मूर्ति की पूजा-अर्चना का वर्णन मिलता है तो उसकी प्राण-प्रतिष्ठा का काम ही क्या हो सकता है। देश तो तब भी चल ही रहा था।

बौद्ध धर्मावलंबियों की सहिष्णुता

इस राष्ट्र के बौद्धों ने इस्लाम की भयंकर चोट को हिंदुओं से कहीं अधिक सहा है। भारत आने से पहले इस्लाम ने मध्य-एशिया के बुतपरस्तों का सफाया किया था। इन मुसलमानों के हाथों सबसे अधिक तबाही बौद्ध मंदिरों, विहारों की ही हुई है। मुसलमानों की चोट को सबसे अधिक बुतपरस्तों ने ही झेला है। फारसी का ‘बुत’ शब्द ‘बुद्ध’ शब्द से ही बना है। यहां एक तथ्य और भी स्पष्ट कर देना होगा कि भारत में अनेक ऐसे हिंदू देवालय हैं, जिनकी मूर्तियां असल में बुद्ध, बोधिसत्व या तीर्थंकरों की हैं, जिन्हें हिंदू पुजारियों ने इन पर सिंदूर का मुलम्मा चढ़ाकर हिंदू देवता बना लिया है। उदाहरण के लिए बद्रीनाथ की मूर्ति बोधिसत्व की मूर्ति है। इस प्रकार के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह भारत के हिंदू पुजारियों का एक हल्ला-बोल ही कहा जा सकता है, जिन्होंने अपनी आजीविका के लिए आजतक बनाए रखा है।

यही नहीं भारत के बौद्धों ने इस्लाम के सबसे अधिक प्रहार सहे हैं। यह  प्रहार इतने भीषण थे कि बौद्ध भिक्षुओं को नेपाल, तिब्बत, वर्मा (म्यांमार) और सिंहल (श्रीलंका) जैसे देशोंं में छिपकर अपनी जानें बचानी पड़ीं, अन्यथा इस इस्लाम के कारण यहां बौद्ध नामलेवा भी ढूंढने कठिन हो जाते।

नालंदा जैसे बौद्ध विश्वविद्यालयों को बौद्धों ने जलते हुए देखा है। इस दुखांत से इस भारत राष्ट्र के बौद्धों को इस्लाम से ज्यादा घृणा होनी चाहिए थी। लेकिन बौद्धों ने आजतक इस्लाम से अपनी घृणा का प्रदर्शन कभी नहीं किया है, उन्हें ‘कटुआ’ जैसे उपनामों से नहीं पुकारा है। यह शायद इसलिए होता है क्योंकि बुद्ध का अहिंसावाद बौद्धों के लिए सबसे ज्यादा सम्मानजनक संदेश समझा जाता है। यही संदेश राष्ट्रवाद पर भी लागू होता है। 

‘अहिंसा परमो धर्मः’ संदेश यद्यपि बौद्धों का मुख्य नीति वाक्य नहीं है, लेकिन बौद्ध हमेशा इस पर अमल करते रहे हैं। वैसे ‘अहिंसा परमो धर्मः’ जैनों का सिद्धांत वाक्य कहा जाता है। क्या यह वितंडावाद नहीं कहा जाएगा कि इस देश के कथित राष्ट्रवादी हिंदू खुद को अहिंसावादी भी घोषित करते हैं और देश के अल्पसंख्यकों को गोली मार देने के ऐलान भी मंचों से करते हुए देखे जाते हैं।

हिंदुत्ववाद दोधारी तलवार

देश का हिंदुत्ववाद सदैव दोधारी तलवार रहा है। इतिहास बताता है कि वैदिक धर्म सदा हिंसा के प्रति समर्पित रहा है। नरबलि से लेकर पशुबलि तक हिंसा ही हिंसा देखी जाती है।

भारत में इस्लाम के आने के बाद रचे गए तंत्रग्रंथ ‘मेरुतुंग’ में ‘हिंदू’ शब्द की एक कल्पित व्याख्या की गई हैं— ‘हीनं दूषयति स हिंदू’ अर्थात् जो हीन या अधम की निंदा करता है, वह हिंदू है। स्पष्टत: यह हिंदुओं को काफिर कहे जाने की प्रतिक्रिया है।

यदि भारत के राष्ट्रवाद को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ तक सीमित रखा जाता है तो स्पष्ट है कि इस प्रकार के राष्ट्रवाद पर कौन विश्वास करना चाहेगा। संविधान में चाहे कितनी भी राष्ट्रवाद की व्याख्याएं क्यों न हों, जब तक भारतीय जनमानस में इसका प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता, वह सब कागजी हैं।

वस्तुत: राष्ट्रवाद भी एक दोधारी तलवार जैसा ही है जो लोगों को जोड़ता भी है, और दूसरी  तरफ बांटता भी है। यदि इस हिंदूवादी राष्ट्रवाद का मुख्य नारा कुछ को जोड़ते हुए, बहुत-से लोगों को तोड़ देना है तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि आज के राष्ट्रवाद का मिजाज सचमुच बिगड़ रहा है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

द्वारका भारती

24 मार्च, 1949 को पंजाब के होशियारपुर जिले के दलित परिवार में जन्मे तथा मैट्रिक तक पढ़े द्वारका भारती ने कुछ दिनों के लिए सरकारी नौकरी करने के बाद इराक और जार्डन में श्रमिक के रूप में काम किया। स्वदेश वापसी के बाद होशियारपुर में उन्होंने जूते बनाने के घरेलू पेशे को अपनाया है। इन्होंने पंजाबी से हिंदी में अनुवाद का सराहनीय कार्य किया है तथा हिंदी में दलितों के हक-हुकूक और संस्कृति आदि विषयों पर लेखन किया है। इनके आलेख हिंदी और पंजाबी के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में इनकी आत्मकथा “मोची : एक मोची का अदबी जिंदगीनामा” चर्चा में रही है

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