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हल्द्वानी सांप्रदायिक हिंसा : तुम्हीं गवाह, तुम्हीं कातिल और तुम्हीं मुंसिफ!

इस देव-भूमि में हिंदुत्व की पहली चिंगारी 1994 में, जब वह उत्तर प्रदेश का अंग था, पिछड़ी जातियों को मुलायम सिंह यादव द्वारा दिए गए 27 प्रतिशत आरक्षण के विरोध में भड़काई गई थी, जिसने बाद में पृथक उत्तराखंड राज्य के आंदोलन का रूप ले लिया था। हल्द्वानी में हाल ही में हुई हिंसा पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं कंवल भारती

सबसे पहले उत्तराखंड के बारे में एक काल्पनिक आख्यान (नॅरेटिव) यह गढ़ा गया कि वह देव-भूमि है। जब किसी राज्य को देव-भूमि, अर्थात हिंदुओं की भूमि कह दिया जाता है, तो उसी क्षण दो बातें होती हैं। एक यह कि उस राज्य के गैर-हिंदू, ख़ास तौर से मुसलमान और ईसाई बेगाने हो जाते हैं; और दूसरी यह कि किसी राज्य को देव-भूमि कहते ही अन्य सभी राज्य ‘राक्षस-राज्य’ हो जाते हैं। इस देव-भूमि में हिंदुत्व की पहली चिंगारी 1994 में, जब वह उत्तर प्रदेश का अंग था, पिछड़ी जातियों को मुलायम सिंह यादव द्वारा दिए गए 27 प्रतिशत आरक्षण के विरोध में भड़काई गई थी, जिसने बाद में पृथक उत्तराखंड राज्य के आंदोलन का रूप ले लिया था। यह आंदोलन आरएसएस और भाजपा ने चलाया था, जिसकी सफलता का कारण यह था कि कांग्रेस का ब्राह्मण-तंत्र इसका सहयोग कर रहा था। 

उसके बाद उत्तराखंड में बारी-बारी से कांग्रेस और भाजपा की सरकारें बनती रहीं, और दोनों ही पार्टियों की सरकारें अपने-अपने राजनीतिक तरीकों से हिंदुत्व का एजेंडा चलाती रहीं। लेकिन केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब कई राज्यों में भाजपा की सरकारें कायम हुईं, तो उन राज्यों में मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत की राजनीति ने हिंदुत्व की धार तेज कर दी। गोकशी, लव-जिहाद, मॉब लिचिंग, धर्म-परिवर्तन के खिलाफ कानून आदि के नफरती मुद्दों ने मुसलमानों की ऐसी छवि बना दी, जैसे वह आतंकी, अराष्ट्रीय और अवांछित तत्व हों। इसके बावजूद, भाजपा और आरएसएस को उत्तराखंड में वह सफलता नहीं मिल रही थी, जो योगी आदित्यनाथ के कारण उन्हें उत्तर प्रदेश में मिल रही थी। इसलिए भाजपा आलाकमान को उत्तराखंड में अपने कई मुख्यमंत्री बदलने पड़े। अंतत:, पुष्कर सिंह धामी के साथ उनकी उम्मीद पूरी हुई। भाजपा हाईकमान जो चाहता था, वह उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने करके दिखा दिया।

पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री का पद संभालते ही पहली घोषणा की मुसलमानों को ठिकाने लगाने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) बिल लाने की, और विधानसभा के अपने पहले ही सत्र में उन्होंने इस बिल को पास भी करा दिया। यह एजेंडा आरएसएस का ही है, जिसे भाजपा ने प्रयोग के तौर पर उत्तराखंड में लागू करवाया है। लेकिन, इस क़ानून में प्रदेश की जनजातियों को शामिल नहीं किया गया है, जिनमें बहुविवाह की प्रथा प्रचलित है। इसलिए इस नज़रिए से यह एक पाखंडी कानून है, जिसे ‘कॉमन’ अर्थात ‘समान’ कहना ही ‘समान’ शब्द का मजाक बनाना है।

मुख्यमंत्री धामी जानते थे कि मुसलमानों का उत्पीड़न करके ही उत्तराखंड में हिंदुत्व को धार दी जा सकती है। इसलिए 6 फरवरी, 2024 को यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल सदन में रखा गया और उसके दो दिन बाद 8 फ़रवरी को मुख्यमंत्री धामी ने हल्द्वानी के बनभूलपूरा इलाके में स्थित एक मुस्लिम मदरसे और मस्जिद पर बुलडोज़र चलवा दिया। फिर मुस्लिम विरोध का दमन करने के लिए मुख्यमंत्री ने देखते ही गोली मारने का आदेश कर दिया, और पुलिस की इस हिंसा में पांच लोगों की मौत हो गई। कहा जा रहा है कि मुसलमानों ने अपने घरों की छतों से पत्थर फेंके, जिससे कई पुलिस कर्मी ज़ख्मी हो गए। लेकिन इस पत्थरबाजी का भी वीडियो वायरल हो गया, जिसमें पत्थर फेंकने वाले “अरे कटुओ” की गाली दे रहे हैं। इससे साफ़ पता चलता है कि पत्थर मुसलमानों ने नहीं, आरएसएस और भाजपा के लोग फेंक रहे थे। अगर मुसलमान फेंकते तो क्या वे खुद को ही “कटुए” की गाली देते? 

कहा यह भी जा रहा है कि उपद्रवियों ने आगजनी भी की, जिसमें पुलिस थाना और एक वाहन जला दिया गया। लेकिन इस बात की जांच शायद ही हो कि ये आगजनी करने वाले लोग मुसलमान थे या हिंदू? अब आग लगाने के बाद मुख्यमंत्री धामी कह रहे हैं कि यह सुनियोजित हिंसा थी, और देव-भूमि की फ़िज़ा खराब करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री का संकेत मिलते ही पुलिस अपने काम पर लग गई। घरों में घुस-घुसकर मुस्लिम युवकों को पुलिस ने उठा लिया। मुस्लिम इलाकों में पुलिस कहर बनकर टूट पड़ी। जो परिवार अपने घरों में बाहर से ताला लगाकर अंदर रह रहे थे, पुलिस उन तालों को भी तोड़कर घरों में घुस गई, और जितना जुल्म वह कर सकती थी, उसने किया। खबर तो यहां तक है कि सरकार ने कुछ गरीब मुसलमानों के घरों को भी बुलडोजर से गिरा दिया है। जिन गरीब मुसलमानों के घर गिराए गए हैं, उन घरों की औरतों के बयान के वीडियो भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। पुलिस के खौफ से बहुत से मुस्लिम परिवार आसपास के जिलों में पलायन कर गए हैं। और खबर है कि पुलिस उनकी तलाश में भी आसपास के जिलों में छापे मार रही है। यह देखना कितना खौफ़नाक है कि माहौल खराब किया मुख्यमंत्री ने, बारूद बिछाकर चिंगारी छोड़ी मुख्यमंत्री ने, और वही इसको सुनियोजित हिंसा बताकर पीड़ितों को और प्रताड़ित करवा रहा है। मतलब, तुम्हीं गवाह, तुम्हीं कातिल और तुम्हीं मुंसिफ।

लेकिन भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खुश है, क्योंकि उत्तराखंड में मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत की जो योगी आदित्यनाथ वाली धार उसे चाहिए थी, वह मुख्यमंत्री धामी ने बना दी। भाजपा इसे हिंदू राज्य की राजनीति के लिए अच्छी शुरुआत मान रही है।

सवाल है कि मदरसा क्यों तोड़ा गया? क्या यह आकस्मिक कार्यवाही है? बिल्कुल नहीं। इस घटना को अंजाम देने के लिए महीनों से इसकी पटकथा लिखी जा रही थी। अगर यह कहा जाए कि इस विध्वंस में सिर्फ़ सरकार ही नहीं, बल्कि अदालत भी शामिल है, तो गलत नहीं होगा। कहा जा रहा है कि हल्द्वानी में बनभूलपूरा का मदरसा और मस्जिद इसलिए ध्वस्त किए गए, क्योंकि वे नज़ूल की ज़मीन पर बने हुए थे, जो सरकारी ज़मीन है। पहले यह समझते हैं कि नज़ूल की ज़मीन क्या होती है? असद रहमान ने इंडियन एक्सप्रेस (13 फ़रवरी, 2024) में नज़ूल भूमि की कानूनी व्याख्या की है। यह सच है कि नज़ूल की भूमि पर मालिकाना हक़ सरकार का होता है, लेकिन प्रशासन अक्सर इसका उपयोग सरकारी संपत्ति के रूप में नहीं करता है। आमतौर से राज्य इस भूमि को किसी भी इकाई को एक निश्चित अवधि के लिए, सामान्यत: 15 से 90 वर्ष के लिए पट्टे पर आवंटित करता है, जिसका कुछ वार्षिक किराया होता है। सरकार आमतौर से नज़ूल भूमि का उपयोग सार्वजनिक उद्देश्यों, जैसे स्कूल, अस्पताल, ग्राम-पंचायत भवन आदि के निर्माण के लिए करती है। कुछ शहरों में हाउसिंग सोसाइटीज़ के लिए भी नज़ूल भूमि पट्टे पर दी गई है। यह भूमि कहां से आई? इसका इतिहास यह है कि ब्रिटिश शासन के दौरान, राजे-रजवाड़े अक्सर उनके खिलाफ विद्रोह करते थे, जिसके कारण उनके और अंग्रेज-सेना के बीच कई लड़ाईयां हुईं। इस लड़ाई में राजाओं के हारने पर, अंग्रेजों ने उनकी ज़मीनों को जब्त कर लिया था। भारत को जब आज़ादी मिली, तो उसके बाद उन ज़मीनों को मुक्त कर दिया गया। लेकिन बहुत-से राजाओं के पास उन ज़मीनों के मालिकाना हक़ के दस्तावेज न होने के कारण उनकी ज़मीन को नज़ूल घोषित कर दिया गया, और उसकी मालिक राज्य सरकार हो गई। उत्तराखंड में हल्द्वानी के बनभूलपूरा में स्थित मदरसा और मस्जिद का निर्माण इसी नज़ूल की ज़मीन पर हुआ बताया जा रहा है।

हल्द्वानी के बनभूलपूरा में मौजूद पुलिस और बुलडोजर

हल्द्वानी ज़िला प्रशासन के अनुसार, जिस ज़मीन पर मदरसा और मस्जिद थे, वह नगर निगम की नज़ूल भूमि के रूप में पंजीकृत है। प्रशासन कहता है कि वह ट्रैफिक जाम से सड़कों को मुक्त करने के लिए पिछले 15-20 दिनों से नगर निगम के साथ मदरसा और मस्जिद को ध्वस्त करने के संबंध में बातचीत कर रहा था। बीते 30 जनवरी को उसने नोटिस दिया कि तीन दिन में यह अतिक्रमण हटा लिया जाए, या ज़मीन के स्वामित्व वाले कागज़ात हों, तो वे प्रस्तुत किए जाएं। इस नोटिस के विरुद्ध वे हाईकोर्ट गए, पर हाईकोर्ट ने सुनवाई के लिए 14 फ़रवरी की तारीख तय कर दी, लेकिन नोटिस के अमल पर रोक नहीं लगाई। अत: 3 फ़रवरी को मदरसे के इंतजामिया लोगों ने नगर निगम के अधिकारियों से भेंट की और उन्हें प्रार्थना-पत्र देकर 14 फ़रवरी तक का समय मांगा, और कहा कि हाईकोर्ट जो भी निर्णय देगा, वह उन्हें मंज़ूर होगा। लेकिन, प्रशासन ने हाईकोर्ट में सुनवाई होने से पहले ही मदरसे और मस्जिद पर बुलडोज़र चलवा दिया।

यह पूरा घटनाक्रम प्रथम दृष्टया ही शासन-प्रशासन द्वारा रचा गया अवैधानिक, मनमाना और नफरत की कार्यवाही के सिवाय कुछ नहीं है। यह वह सुनियिजित पटकथा है, जो हिंदुत्व को धार देने के लिए साजिशन दंगा कराने के इरादे से लिखी गई थी। कुछ सवाल ज़हन में उभरते हैं। पहला यह कि मदरसा और मस्जिद तोड़ने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? ऐसी क्या जल्दी थी कि प्रशासन ने हाईकोर्ट की सुनवाई तक का इंतज़ार नहीं किया? क्या किसी निर्माण को हटाने के लिए तीन दिन का नोटिस पर्याप्त था? इस तरह के मामलों में कानूनन कम-से-कम 15 दिन से तीन महीने तक का समय दिया जाता है। लेकिन इस मामले में तीन दिन का समय दिया गया, जिससे ज़ाहिर होता है कि प्रशासन का मकसद मुसलमानों का उत्पीड़न ही करना था। इसलिए यह नोटिस विधि-सम्मत नहीं था। जिस ट्रैफिक जाम का बहाना बनाया गया, वह भी झूठ है। जनता में इसकी कोई शिकायत नहीं थी। इस मदरसे का निर्माण लगभग बीस साल पहले अब्दुल मलिक द्वारा कराया गया था। तब ट्रैफिक की कोई समस्या नहीं थी। फिर ट्रैफिक की समस्या आज कैसे पैदा हो गई? अचानक प्रशासन को ट्रैफिक कैसे परेशान करने लगा? सच यह है कि जिला प्रशासन को मदरसा और मस्जिद पर बुलडोज़र चलाना ही था, क्योंकि यह दबाव उस पर मुख्यमंत्री धामी की ओर से था। इस बात की भी कम संभावना नहीं है कि हाईकोर्ट द्वारा नोटिस पर रोक न लगाने के पीछे भी कोई बड़ा दबाव रहा हो; वरना यह सवाल तो बनता ही है कि कोर्ट के समक्ष ऐसी क्या मजबूरी थी, जो उसने यह जानते हुए भी कि नोटिस पर ‘स्टे’ न देने से उसकी वैधता बनी रहती है, और प्रशासन उस पर कार्यवाही कर सकता है, उसने स्टे आर्डर पास नहीं किया? अब अगर 14 फ़रवरी को सुनवाई हुई भी, तो उसका क्या औचित्य? निर्माण तो उसने गिरवा ही दिया? और उस जगह को सरकार ने अपने कब्जे में भी ले लिया।

सवाल है कि अगर मस्जिद की जगह मामला किसी हिंदू मंदिर का होता, तो क्या तब भी सरकार, प्रशासन और कोर्ट का यही रवैया रहता? ऐसे एक नहीं, अनगिनत स्थल हैं, जहां अतिक्रमण करके मंदिर बनाए गए हैं। क्या भाजपा सरकार की हिम्मत है उन्हें तोड़ने की? देशभर की मस्जिदों को हिंदू मंदिर बताकर तोड़ने की गैर-कानूनी राजनीति तो भाजपा की सरकारें चला ही रही है, अब अतिक्रमण के नाम पर भी मदरसा और मस्जिद तोड़ने की परंपरा उत्तराखंड से शुरू कर दी गई है। अब मुख्यमंत्री धामी कह रहे हैं कि जहां मदरसा और मस्जिद गिराई गई थी, वहां एक बगीचा था, उसे हटा दिया गया है, और अब वहां पुलिस स्टेशन स्थापित किया जाएगा। इसका मतलब है कि ट्रैफिक जाम एक छलावा था। एक सवाल यह भी है कि इस ज़मीन को, जो नज़ूल की बताई जा रही है, मदरसे के नाम पर भी आवंटित किया जा सकता था। पर जहां भाजपा राज्यों में मस्जिदों पर बुलडोज़र चलाना एक फैशन बन गया हो, उससे ऐसी दरियादिली की कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है? 

कहा यह भी जा रहा है कि बनभूलपूरा में उस ज़मीन पर, जहां मदरसा और मस्जिद थी, गोशाला बनाई जाएगी। यह भी हो सकता है कि किसी भाजपाई नेता को ही गोशाला के नाम पर वह ज़मीन मुफ्त में दे दी जाए। इससे साफ़ होता है कि निर्माण गिराने के पीछे सरकार का कोई आधिकारिक उद्देश्य नहीं था, सिर्फ हिंदू-मुस्लिम दंगा कराने की सोची समझी राजनीति थी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हल्द्वानी की मुस्लिम प्रतिक्रिया को जिस तरह हिंसा और आतंकवाद का नाम दे रहे हैं, वह वास्तव में भाजपा की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है। उन्हें यही कहना है, और यही वह कह सकते हैं। कहावत है न, कि “जबरा मारे और रोने भी न दे।” सत्ता जुल्म करे, उत्पीड़न करे और पीड़ित समुदाय अगर एक पत्थर भी विरोध में उठाता है, तो भाजपा की संस्कृति में उसे आतंकवादी कहा जाता है। ख़बर है कि शासन ने अब्दुल मलिक और उसके बेटों की संपत्ति भी जब्त कर ली है। जहां पीड़ित पर ही जुल्म हो और पीड़ित की कहीं सुनवाई न हो, उसी को देव-भूमि का रामराज्य कहते हैं। कबीर साहेब का दोहा है, “दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय/ मुई खाल की स्वांस सो, सार भसम हो जाए।” भले ही दुर्बलों की हाय से कोई अत्याचारी भसम नहीं हुआ है, पर अगर इसी तरह लगातार किसी समुदाय को जुल्म के निशाने पर रखा जाता रहेगा, उसे बराबर सताया जाता रहेगा, और उसके खिलाफ मुसलसल नफ़रत फैलाई जाती रहेगी, तो सत्ता के खौफ से भले ही वह खामोश रहे, पर अधिक समय तक नहीं; एक दिन उसके सब्र का बांध टूट भी सकता है। इसका संकेत हल्द्वानी कांड के दूसरे दिन बरेली में धर्मगुरु तौकीर रज़ा ने दे भी दिया है। मशहूर शायर कलीम आजिज ने भी क्या खूब कहा है–

दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग,

तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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