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व्याख्यान : वैकल्पिक धारा प्रतिक्रांति की धारा है

समय की सूई सदैव आगे की ओर चलती है। वह पीछे की दिशा में नहीं लौटती। किंतु भारत में दर्शन की सूई शंकराचार्य के ‘ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या’ पर ही अटकी हुई है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि उसे वहीं पर अटकाकर रखा गया है। पढ़ें, कंवल भारती का यह व्याख्यान

(कंवल भारती द्वरा प्रोफ़ेसर तुलसी राम स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ, मऊ में दिनांक 11 फरवरी, 2024 को दिया गया व्याख्यान)

 शिवमूर्ति का अभी एक उपन्यास आया है– “अगम बहै दरियाव”। इस उपन्यास का एक अंतिम प्रसंग इस तरह है–

बैताली को जंगू डाकू के ऊपर लिखी नौटंकी की एक हस्तलिखित पुस्तिका मिल गई है। उसी को खेलने की तैयारी में वह गा रहा है –

सड़क से गुजरता तूफानी बैताली को भीटे पर बैठा देखकर रुक जाता है। मोटरसाइकिल का इंजन बंद करके सुनता है, फिर मोटर साइकिल पटरी पर खड़ी करके पास आता है।

‘जयभीम काका, क्या गा रहे हैं बा-आवाजे बुलंद?’

‘अरे, तूफानी बच्चा, एक खेला मिला है जंगू का। वही याद कर रहे हैं, समय काटने के लिए।’

‘काका, अब समय काटने वाला नहीं, समय बदलने वाला खेला खेलने की जरूरत है।’

‘क्या मतलब?’ बैताली पूछता है।

तूफानी कहता है, ‘अब जंगू की बहादुरी से काम नहीं चलने वाला। दुनिया बहुत खराब हो चुकी है। जंगू के हाथ इतने बड़े नहीं हैं कि दुनिया को खराब करने वाले शैतानों तक पहुंच सकें। खुद हमारे रहनुमा शैतानों से हाथ मिला चुके हैं। अब जरूरत है कि दुनिया को आमूल-चूल बदल दिया जाए।’

बैताली थोड़ी देर तक तूफानी का मुंह ताकते हैं, फिर कहते हैं, ‘इससे अच्छी बात क्या हो सकती है, बच्चा! इतनी खराब तो दुनिया कभी नहीं रही। दुनिया बदलने वाला खेला दीजिए तो वही खेला जाए।’

यह प्रसंग राहुल सांकृत्यायन के ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’ की याद दिलाता है। यही प्रसंग हमें डॉ. तुलसी राम के समाज को बदलने के लिए शुरू की गई जीवन-यात्रा का स्मरण कराता है। यह जो बदलने वाला खेला है, यह भारतीय चिंतन की जरूरी धारा है।

मैं इस धारा को वैकल्पिक नहीं कह सकता, क्योंकि वैकल्पिक धारा प्रतिक्रांति की धारा है। बहुजन-कल्याण की जो भौतिकवादी दर्शन-धारा यहां आजीवकों, चार्वाकों, बुद्ध से शुरू होकर सिद्धों, नाथों, कबीर, रैदास, फुले, आंबेडकर, पेरियार से होती हुई संविधान तक आई है, आज उसे नष्ट करने का काम हो रहा है, और उसके स्थान पर सनातन दर्शन के रूप में हिंदुत्व का विकल्प दिया जा रहा है।

अभी हाल में, आपको याद होगा, सनातन धर्म के मुद्दे पर आरएसएस और भाजपा ने कितना बड़ा उपद्रव किया था, ऐसा उपद्रव कि उस समय हिंदुत्व भी किनारे हो गया था। दक्षिण के कुछ नेताओं ने सनातन धर्म को नष्ट करने की बात कही, और उनके खिलाफ धड़ाधड़ एफआईआर लिखवा दी गईं। आरएसएस और भाजपा ने सनातन धर्म के विरोध को भारत का अपमान बताया। लेकिन फिर अचानक सनातन धर्म का मुद्दा बंद हो गया। हुआ यह कि सनातन धर्म के विरोध में देश भर में दलित-पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हो गए। उन्होंने तर्क दिया कि सनातन धर्म के अच्छे होने का फैसला ब्राह्मण और ठाकुर नहीं कर सकते। उनके लिए सनातन धर्म स्वर्ग की तरह हो सकता है, पर यह शूद्रों के लिए स्वर्ग नहीं है। शूद्रों के इस विरोध से आरएसएस और भाजपा तुरंत बैकफुट पर आ गए। उन्हें महसूस हो गया कि यह मुद्दा उनका भारी राजनीतिक नुकसान कर सकता है। उन्हें लगा कि अगर इस मुद्दे को आगे बढ़ाया, तो दलित-पिछड़ी जातियों के लोग सनातन धर्म के विरोध में खड़े हो जाएंगे, जिससे उनकी राजनीतिक ज़मीन दरक सकती है, क्योंकि आरएसएस और भाजपा जिस हिंदुत्व को स्थापित कर रहे हैं, वो दलित-पिछड़ी जातियों को उससे जोड़े बिना संभव नहीं है।

लेकिन उनके हिंदुत्व का आधार सनातन धर्म ही है। बहुत से हिंदू नेता सनातन धर्म की डींगें मारते हुए नहीं थकते। वे कहते हैं कि मनुष्य और प्रकृति का ज्ञान हिंदुओं के साथ ही शुरू होता है। वे गर्व से कहते हैं कि हिंदुओं ने ही दुनिया को ज्ञान दिया है, और हिंदू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। और तो और, सुप्रीम कोर्ट ने भी 1995 में डॉ. आर.वाई. प्रभु बनाम पी.के. कुंडे मामले में हिंदुत्व पर जो निर्णय दिया, उसमें कहा गया है कि ‘हिंदुत्व एक जीवन-शैली है। वह एक उदार धर्म है, और उसमें सहिष्णुता है।’ सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय बाल गंगाधर तिलक की गीता-रहस्य और डॉ. राधाकृष्णन की ‘दि हिंदू व्यू ऑफ लाइफ’ और ‘इंडियन फिलॉसफी’ के आधार पर दिया। हैरत होती है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय हिंदू विद्वानों की पुस्तकों से बनाई, और न्याय के इस मूल सिद्धांत को हवा में उड़ा दिया कि न्याय के लिए विपक्ष का मत सुनना जरूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व से पीड़ित पक्ष का मत जानने का कोई प्रयास नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट को हिंदुत्व से पीड़ित पक्ष का मत जानने के लिए डॉ. आंबेडकर की ‘फिलॉसफी ऑफ हिंदुइज्म’ को पढ़ना चाहिए था। तब सुप्रीम कोर्ट को मालूम होता कि जिस हिंदू सभ्यता को दुनिया की सबसे प्राचीन, उदार और सहिष्णु सभ्यता बताया जा रहा है, उसने भारत की विशाल आबादी को शिक्षा, मानवीय अधिकारों और जीवन की न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित करके रखा था। आंबेडकर ने पूछा है, कि अगर हिंदू सभ्यता महान थी, तो उस सभ्यता ने अछूतों, आदिवासियों और जरायम पेशा जनजातियों को क्या दिया? उस महान सभ्यता का प्रकाश इन जातियों तक क्यों नहीं पहुंचा? डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि हिंदुत्व वह धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें अस्पृश्य और वंचित जातियों के उत्थान के लिए कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव हिंदुत्व का अनिवार्य अंग है। यह हिंदुओं की मानसिकता बन चुकी है। अभी हाल ही की बात है, एक राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा था कि शूद्रों का कर्तव्य ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा करना है। उसे यह भान कहां से हुआ कि शूद्रों का कर्तव्य द्विजों की सेवा करना है, पढ़ना-लिखना और शासन करना नहीं। जाहिर है कि यह ज्ञान उसे उसी हिंदुत्व ने दिया है, जिसे सनातन धर्म कहा जा रहा है। इसी सनातन धर्म का उपदेश करने वाला एक संत अनिरुद्धाचार्य कह रहा है कि शूद्र के यहां कोई शेर नहीं पैदा हो सकता। शेर का मतलब है ज्ञानी, विद्वान और बहादुर व्यक्ति। यही संत कहा रहा है कि जो द्विज स्त्री, शूद्र से विवाह करती है, वह वेश्या है। ये पूरी तरह अवैज्ञानिक और संविधान-विरोधी बयान हैं। अंधभक्त इन बयानों पर तालियां बजाते हैं और सरकार इनके विरुद्ध कार्यवाही नहीं करती। इसी को शासक वर्ग की प्रतिक्रांति कहते हैं। और प्रतिक्रांति का अर्थ है आधुनिक समाज को पीछे की ओर ले जाना।

व्याख्यान देते कंवल भारती

डॉ. आंबेडकर का विचार है कि किसी दर्शन का परीक्षण दो सिद्धांतों से होना चाहिए। एक है न्याय का सिद्धांत और दूसरा है उपयोगिता का सिद्धांत। न्याय के सिद्धांत से उनका तात्पर्य एक ऐसे सारगर्भित सिद्धांत से है, जिसमें ऐसे सिद्धांत निहित हैं, जो नैतिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। उनके अनुसार, ये तीन सिद्धांत हैं; स्वतंत्रता, समानता और बंधुता, जिन्हें उन्होंने न्याय का नाम दिया है। उनका तर्क है कि यदि सभी मनुष्य समान हैं और सभी में एक ही आत्मा का वास है, तो समान आत्मा उन्हें समान मौलिक अधिकारों और समान स्वतंत्रता का हकदार बनाती है। फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ? भारत में सबको स्वतंत्रता और सबको समानता क्यों नहीं मिली? बंधुता का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता, क्योंकि वह स्वतंत्रता और समानता के ही बाद की चीज है। फिर ऐसा दर्शन उपयोगिता के सिद्धांत पर भी क्या परिणाम देगा? यह बताने की आवश्यकता नहीं है। आंबेडकर ने कहा कि जो सनातन धर्म और दर्शन वर्णव्यवस्था पर आधारित है, उसमें सबके लिए समान न्याय का सिद्धांत हो ही नहीं सकता। 

लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि जब भारत में एक ऐसा दर्शन मौजूद था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित था, जैसे आजीवक दर्शन, लोकायत दर्शन, बौद्ध दर्शन, तो वह नष्ट कैसे हुआ? हमें ऋग्वेद में कुछ प्रमाण मिलते हैं। दसवें मंडल में बाइसवें सूक्त के मंत्र आठ में लिखा है, “हे इंद्र, हमारे चारों ओर ऐसे लोग रहते हैं, जो न यज्ञ करते हैं, न किसी देव को मानते हैं, वे वेद-निंदक हैं। उनसे हमारी रक्षा करो।” सातवें मंडल में अट्ठारहवें सूक्त का अठारहवां मंत्र कहता है, “हे इंद्र, तुम्हारे बहुत-से शत्रु तुम्हारे वश में हो गए हैं, लेकिन इन नास्तिकों को भी वश में करो। ये नास्तिक हमारा बहुत अहित करते हैं।” मुझे लगता है कि हमारे आज के सम्राट ‘इंद्र’ भी बहुत सारे शत्रु अपने वश में कर चुके हैं, नहीं हो पा रहे हैं तो बस नास्तिक कम्युनिस्ट, जो उनके लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

ऋग्वेद के प्रमाण इस बात के साफ़ संकेत हैं कि भारत में पूर्ववैदिक काल में भौतिकवादी विचारधारा स्थापित थी, और उस विचारधारा के लोग, वैदिक ब्राह्मणों के लिए चुनौती बने हुए थे। इन नास्तिक भौतिवादियों का विरोध हमें न केवल मनुस्मृति में, बल्कि रामायण और महाभारत में भी मिलता है। मनुस्मृति में कहा गया है–

  1. वेद-निंदक को राजा नगर से निकाल दे। (9/225)
  2. जिन्होंने अपने धर्म को छोड़ दिया है, और जो प्रतिलोम वर्णसंकर तथा विधर्मी पंथों के सन्यासी हैं, उनको जल नहीं देना चाहिए। (5/89)
  3. शास्त्रों में जिनकी श्रद्धा न हो, जो वेद के विरुद्ध तर्क करता हो, और जो नीचे दृष्टि रखकर चलते हों, उनका सम्मान न करें। (4/30)

रामायण में वाल्मीकि ने बुद्ध और नास्तिकों की निंदा करते हुए उन्हें चोर कहा है। रामायण में ही जाबालि लोकायत का जिक्र मिलता है, जो राम से कहता है कि इस लोक के सिवा दूसरा कोई लोक नहीं है, और जो लोग यह समझते हैं कि श्राद्ध किया गया अन्न मृत पूर्वजों को पहुंचता है, तो परदेश गए व्यक्ति के लिए भी श्राद्ध कर देना चाहिए, उन्हें रास्ते के लिए भोजन क्यों बांधकर देते हो? इसी तरह महाभारत में उल्लेख मिलता है कि जब पांडव विजयी होकर कुरुक्षेत्र लौटते हैं, तो जहां ब्राह्मण उनकी जय-जयकार कर रहे थे, वहीं एक श्रमण चार्वाक ने युधिष्ठिर को ललकारते हुए कहा था कि “तुम्हें अपने बंधुओं और गुरुजनों की हत्या करके क्या मिला? तुम तो पापी हो, तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए।” हालांकि ब्राह्मणों की भीड़ ने उस चार्वाक को उसी समय मार डाला था। पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सत्ता-प्रतिष्ठान की धारा के खिलाफ बोलने वाले लोग उस काल में भी मौजूद थे।

काफ़ी हद तक उपनिषदों का दर्शन भी भौतिकवादी भले न हो, पर वह मानववादी और समतावादी था, जो वैदिक दर्शन और ब्राह्मणवाद के विरोध में आया था। औपनिषदिक दर्शन ने ज्ञान पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोड़ा था। यह दर्शन ब्राह्मणों की यज्ञ और बलि संस्कृति के विरोध में आया था। ज्ञान की यह धारा क्षत्रियों की थी। ब्रह्म-विद्या ब्राह्मणों की नहीं, बल्कि क्षत्रियों की खोज थी। छान्दोग्य उपनिषद में लिखा है कि ब्राह्मणों ने ब्रह्म-विद्या क्षत्रियों से सीखी थी। राजर्षि जैवाल से ब्रह्मविद्या सीखने वाला पहला ब्राह्मण श्वेतकेतु था। उससे पहले किसी ब्राह्मण को यह विद्या नहीं मिली थी। ब्रह्म-ज्ञान को परा और वैदिक ज्ञान को अपरा ज्ञान कहा गया है। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने लिखा है कि परा विद्या वह है, जिसके द्वारा उस अक्षर अर्थात अविनाशी ब्रह्म की प्राप्ति होती है। लेकिन अपरा विद्या वह है, जो अनेक देवताओं और अवतारवाद में विश्वास करती थी। इसलिए एक अविनाशी ईश्वरवादी ज्ञान से ब्राह्मणों का भोगैश्वर्यवादी वर्चस्व डगमगा गया। 

डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि उपनिषदों ने एक बड़ी क्रांति की थी। उपनिषदों का आत्मवाद मानव-मानव के बीच भेदभाव के विरुद्ध था। लेकिन शीघ्र ही ब्राह्मणों ने उसमें घुसकर उसे भी अपने अधीन करके वर्णव्यवस्था-आधारित बना दिया। कौटिल्य ने भी काफ़ी हद तक सामाजिक न्याय को मान्यता दी थी। डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि कौटिल्य ने स्त्री को स्वतंत्रता दी थी। उसने अंतरजातीय विवाह पर रोक नहीं लगाईं थी, यहां तक कि उसने तलाक, पुनर्विवाह और विधवा स्त्री के विवाह को भी मान्यता दी थी। यदि कोई स्त्री पुनर्विवाह के बाद, अपने पूर्व पति से उत्पन्न अपने पुत्र के लालन-पालन के लिए अपनी स्वयं की संपत्ति पर अधिकार चाहती थी, तो वह भी उसे दिया जाता था। आंबेडकर के अनुसार, कौटिल्य के समय में एक विवाहित स्त्री आर्थिक रूप से स्वाधीन थी।

डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि भारत का दर्शन क्रांति और प्रतिक्रांति पर टिका है। यहां जनता ने जो क्रांति की, उसके विरोध में शासक वर्ग ने प्रतिक्रांति की है। इस प्रतिक्रांति ने ही भारत में स्वतंत्रता और समानता की विचारधारा को खत्म किया। भारत में बौद्ध क्रांति एक महान क्रांति थी, जिसकी तुलना डॉ. आंबेडकर ने फ्रेंच रेवोलुशन यानी 1789 की फ्रांस की जनक्रांति से की थी। हालांकि बौद्ध क्रांति की शुरूआत धार्मिक क्रांति से हुई थी, लेकिन बाद में उसने एक बड़ी सामाजिक और राजनीतिक क्रांति को जन्म दिया था। इस क्रांति ने वर्णव्यवस्था के खिलाफ जबरदस्त जागरण किया। बौद्ध क्रांति ने ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की नींव रखी। इसके परिणामस्वरूप व्यापक पैमाने पर निम्न जातियों के लोग बौद्ध धर्म में गए। स्त्रियों और शूद्रों ने स्वतंत्रता का अनुभव किया। एक बड़ी संख्या में पीड़ित स्त्रियों और शूद्रों ने सन्यास लेकर बौद्ध संघ में उच्च स्थान प्राप्त किया।

इस बौद्ध क्रांति के विरुद्ध 184 ईसापूर्व के लगभग एक विशाल प्रतिक्रांति पुष्यमित्र शुंग ने की, जिसने बौद्ध राजा बृहद्रथ को मारकर भारत में पहली बार ब्राह्मण राज्य स्थापित किया था।

मनु का काल वही है, जो पुष्यमित्र शुंग के शासन का है। और यही वह शासन है, जिसने भारी संख्या में बौद्धों का कत्लेआम करवाया था। शुंग शासन ने लगभग चौरासी हजार बौद्ध मठों और स्तूपों को नष्ट करवा कर उनके स्थान पर हिंदू मंदिरों का निर्माण कराया था। उन्होंने बुद्ध की मूर्तियों को लीप-पोतकर अपने देवताओं का रूप दे दिया था। यहां यह उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म में मंदिर-निर्माण की परंपरा इसी काल से आरंभ हुई। इससे पूर्व, वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में हिंदू मंदिरों का अस्तित्व नहीं मिलता है। हिंदू मंदिरों में शूद्रों का प्रवेश भी इसी काल में निषिद्ध किया गया था, क्योंकि एक बड़ी तादाद में अस्पृश्यों और शूद्रों ने बौद्धधर्म अपनाया हुआ था। इसलिए यदि वे उनके मंदिर प्रवेश पर रोक नहीं लगाते, तो शूद्र उनके मंदिरों में हिंदू देवता के रूप में स्थापित अपने बुद्ध को पहचान सकते थे, जिससे एक उपद्रव हो सकता था। असल में शुंग काल के ब्राह्मण, निम्न वर्गों में बौद्धधर्म के तेजी से बढ़ रहे प्रभाव से चिंतित थे, क्योंकि उसने ब्राह्मण-वर्चस्व को लगभग खत्म कर दिया था। इस वर्चस्व को वे स्त्री-शूद्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाकर ही पुन: स्थापित कर सकते थे।

‘मनुस्मृति’ पुष्यमित्र शुंग शासन का कानून है। इस कानून ने हजारों वर्ष तक हिंदू समाज पर शासन किया। ब्राह्मणों और हिंदू राजतंत्रों ने इसे सख्ती से लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप भारत में न केवल स्त्रियों का विकास रुका, बल्कि मनु-पूर्व काल में जो स्वतंत्रता उसे प्राप्त थी, उससे वह हमेशा के लिए वंचित हो गई। इसलिए हम मनु काल से लेकर अंग्रेजों के आने तक एक भी शिक्षित हिंदू स्त्री नहीं पाते हैं। स्थिति यह थी कि शिक्षा और मानवाधिकारों से वंचित स्त्री एक बेबस वस्तु भर थी, जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था। भारतीय स्त्री की जंजीरें तभी टूटीं, जब यहां अंग्रेजों के साथ ज्ञान-विज्ञान आया, और उसके प्रभाव से सुधार आंदोलन आरंभ हुए।

लेकिन इसके बावजूद बौद्ध भारत से नष्ट नहीं हुए थे। उन्हें पूरी तरह नष्ट करने का काम शंकराचार्य ने किया था। उसने अपनी दो सशस्त्र सेनाएं बनाई थी, जिनके बल पर उसने बौद्धों के चारों केंद्र नष्ट करके उनके स्थान पर ब्राह्मण धाम स्थापित किए थे। प्रभात मौर्या ने फेसबुक पर एक किताब के हवाले से अपनी पोस्ट में इसका कुछ वर्णन किया है कि शंकराचार्य ने बौद्धौं को किस तरह नष्ट किया? माधवाचार्य रचित शंकर दिग्विजय (14वीं शताब्दी) से पता चलता है कि शंकर ने बौद्धों को शास्त्र से नष्ट नही किया, बल्कि शस्त्र से नष्ट करवाया थाशंकर द्विग्विजय के प्रथम सर्ग से पता चलता है कि राजा सुधन्वा ने कुमारिल भट्ट के बहकावे में आकर यह आज्ञा अपने सब सेवकों व सैनिकों को दी –

आसेतोराआतुषाराद्रे र्बौद्धानावृद्धबालकम्।
न हन्ति यः स हन्तव्यो भृत्यानित्यन्वशान्नृपः।।(1/93)

[हिमालय से लेकर रामेश्वर तक के इलाके में जो बालक से लेकर बूढ़े तक सभी बौद्धों को जान से नही मारता, मैं उसे मृत्युदंड दूंगा। राजा ने यह आज्ञा अपने भृत्यों (सेवक व सैनिकों) को दी।]

जब शंकर दिग्विजय क़े लिए निकले तो उनके साथ यही राजा सुधन्वा, उसकी सेना, शंकर के अपने बहुत-से शिष्य आदि चले थे (पेज 114); जगन्मिथ्या, ब्रह्म सत्यम् कहने वाले शास्त्रार्थ में शूरता की बातें करते है। यह हाल तो तब है जब वे जगत को मिथ्या मानते है। यदि ये लोग जगत को सत्य (वास्तविक) मानते होते तो हिटलर से कम पर कभी न रूकते। वैसे जो कुछ उन्होंने किया, आठवीं शताब्दी में शायद हिटलर भी इससे ज्यादा न कर पाता। किसी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया, किसी को पीट-पीट कर मार दिया गया (15/170) किसी को पीकदान उठाने के लिए मजबूरन लगा दिया गया। किसी को वैतालिक (भाट व चारण) बना दिया गया तथा किसी को हमेशा की नींद सुला दिया गया (15/173) यह सब इसलिए कि वे शंकर की विचारधारा से अलग किस्म की विचारधारा को मानते थे। यह विचारों की अभिव्यक्ति के अपराध का दंड था, जिसकी न कहीं अपील थी, न वकील, न दलील। वे लोग शंकर की तरह आत्मा परमात्मा को नही मानते थे। अतः इन बकवासी कांटो को उखाड़ फेंका। (बुद्धिज्म के विविध आयाम, पेज 114-115)

समय की सूई सदैव आगे की ओर चलती है। वह पीछे की दिशा में नहीं लौटती। किंतु भारत में दर्शन की सूई शंकराचार्य के ‘ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या’ पर ही अटकी हुई है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि उसे वहीं पर अटकाकर रखा गया है। इस सूई को न दयानंद सरस्वती आगे बढ़ा सके, न स्वामी विवेकानंद और न अरविंदो। क्योंकि सूई के आगे बढ़ने से मानव-मस्तिष्क का विकास होता है, ज्ञान-विज्ञान का विकास होता है, जबकि सूई के ठहरे रहने से ब्राह्मणवाद टिका रहता है। दूसरे शब्दों में यही सनातन दर्शन है, जो एक वैकल्पिक दर्शन के रूप में थोपा जा रहा है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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