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भाजपा में हाशिए पर कर दिए गए राजपूत

बहुत से राजपूत नेता यह भी कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ का पार्टी के अंदर सम्मान नहीं हो रहा है और इसलिए वह भाजपा का विरोध कर रहे हैं। अंदरखाने में यह भी नारे हैं कि “मोदी तेरी खैर नहीं, योगी तुझसे बैर नहीं”। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

आम चुनाव 2024 की शुरुआत बीते 19 अप्रैल से हो चुकी है और पहले ही दौर के मतदान ने विशेषज्ञों को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि यह मुद्दाविहीन और उत्साहहीन चुनाव है। 

हालांकि दरबारी मीडिया और सत्तापक्ष द्वारा संपोषित विशेषज्ञों ने भाजपा को भारी बहुमत दिखाने के लिए पूरी मशक्कत शुरू कर दी थी, लेकिन पहले दौर के मतदान से राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से भाजपा के लिए बहुत खुश कर देने वाली खबरें नहीं है। भाजपा ने राजपूत प्रतिरोध को हल्के में लिया और नतीजा यह हुआ कि गुजरात में पुरुषोत्तम रुपाला के बयान से चाहे कुछ हुआ हो या नहीं, उत्तर प्रदेश में राजपूतों की खुली बगावत भाजपा के सपनों पर पानी फेर सकती है।

 

असल में इस प्रकार की बगावत केवल राजपूतों में ही नहीं हुए; अपितु जाट, त्यागी और अन्य कई समाजों की भी भाजपा को लेकर ऐसी ही खबरें आ रही हैं। नतीजा यह हुआ कि मेरठ से भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल, जो ‘रामायण’ धारावाहिक में राम की भूमिका में थे और भगवान राम की तस्वीर लगाकर प्रचार करते नजर आए, आखिर में वह यह बात भी कह गए कि उनकी पत्नी ‘ठकुराइन’ है। 

सोशल मीडिया पर राजपूतों के असंतोष को लेकर अनेक खबरें आ रही हैं। विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम को गंभीरता से देख रहे हैं और बहुत-सी पार्टियों के ट्विटर हैंडल लगातार उनके नेताओ के बयान दिखा रहे हैं। अभी भी राजपूत नेताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भाजपा से इसलिए नाराज दिख रहा है, क्योंकि अनेक बड़े नेताओं के टिकट कट गए। ऐसा लग रहा है कि राजपूत विरोध केवल भाजपा का अंदरूनी मामला हो गया है। राजपूत नेता कह रहे हैं कि वे भाजपा में शुरू से ही साथ हैं और वे चाहते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उनकी बात सुने। 

बहुत से राजपूत नेता यह भी कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ का पार्टी के अंदर सम्मान नहीं हो रहा है और इसलिए वह भाजपा का विरोध कर रहे हैं। अंदरखाने में यह भी नारे हैं कि “मोदी तेरी खैर नहीं, योगी तुझसे बैर नहीं”। इन सबके बीच जनरल वी.के. सिंह, जो पिछली लोक सभा चुनाव में गाजियाबाद से जीते थे और जीत का अंतर प्रधानमंत्री के वाराणसी के मार्जिन से अधिक था, का भाजपा ने टिकट काट दिया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

कुछ दिन पूर्व ही जनरल वी.के. सिंह को उत्तराखंड भेजा गया था, जहां पूर्व सैनिकों ने उनसे मिलने का प्रयास किया और रोके जाने पर जमकर विरोध भी किया था। जनरल सिंह ने अपमान के उस घूंट को चुपचाप पी लिया और राजनीति से ही अलग होने की घोषणा कर दी। 

भाजपा ने गुजरात में भी राजपूतों को गंभीरता से नहीं लिया और यही कारण है कि प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश में राजपूत राजनीतिक हाशिए पर चले गए हैं। वहां राजपूतों के हाथ से न केवल जमीनें गईं, अपितु नई उभरती हुई शक्तियों पटेल, जैन, मारवाड़ी, ब्राह्मण और बनियों की आर्थिक शक्ति बढ़ गई। हिंदुत्व के उभार ने गुजरात में पटेलों की राजनीतिक शक्ति को असीमित तौर पर बढ़ाया। हालांकि कुछ समय के लिए पटेल समुदाय भाजपा से अलग हुआ, लेकिन पुनः वे भाजपा की ओर चले गए। इसकी वजह यह रही कि गुजरात में राजपूतों को भाजपा में रहने के अलावा कुछ नहीं सूझा। और इसकी वजह रहे माधव सिंह सोलंकी, जिन्होंने 1980 में जो ‘खाम’ (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) समीकरण बनाया था, उसे गुजरात की ब्राह्मण-बनिया लॉबी ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। यह इसलिए भी मुमकिन हो सका, क्योंकि ‘खाम’ केवल जातियों का राजनीतिक गठबंधन था और सामाजिक तथा सांस्कृतिक तौर पर इन सभी समुदायों के साथ आने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इसलिए सभी बड़ी जातियों को हिंदुत्व का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पसंद आ गया, क्योंकि उसमें मुख्य खलनायक मुसलमान बनाए गए थे। इन जातियों को क्या पता कि बाद में यही हिंदुत्व उनकी अपनी ही राजनीति का अंत कर देगा। 

गुजरात में आज राजपूत सड़क पर हैं। उनकी महिलाएं चिल्ला रही हैं, लेकिन भाजपा चुपचाप है और गैर-राजपूतों के पैसे के दम पर अपनी शक्ति दिखा रही है। 

यह कोई छिपी बात नहीं है कि गुजरात मॉडल पूंजीपति बनियों का मॉडल है, जो हमारे लोकतंत्र को पैसे के दम पर ठेंगा दिखा रहा है। सूरत से भाजपा प्रत्याशी की निर्विरोध जीत यह दर्शाता है कि गुजरात में बनिया-ब्राह्मण गंठजोड़ ने हिंदुत्व को एक ‘नया मॉडल’ दिया है जिसने अन्य गैर-ब्राह्मण व गैर-बनिया समुदायों के नेतृत्व को या तो पूरी तौर पर अपने ऊपर आश्रित कर दिया है या फिर उन्हें हाशिए पर खदेड़ दिया है। 

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया सिंह से भी लगातार बयान दिलाए जा रहे हैं। साफ है कि गुजरात के राजपूत अभी भी अपनी दिशा तय नहीं कर पाए हैं। राजपूत नेतृत्व की अक्षमता के कारण गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला बन गया और उन्होंने कृषक जातियों का भरोसा खो दिया, जिसे माधव सिंह सोलंकी ने बड़ी मजबूती से बनाया था। 

गुजरात और राजस्थान के ठीक अलग, उत्तर प्रदेश में राजपूत नेताओं ने अपनी पंचायत करके भाजपा नेताओं को वोट न देने का सीधे ऐलान कर दिया। सहारनपुर, कैराना, बिजनौर और मुजफ्फरनगर से उन्होंने विपक्षी उम्मीदवारों को समर्थन कर दिया। उसके नेताओं ने कहा है कि वे सभी उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी जाएंगे और समाज को भाजपा के खिलाफ वोट करने को कहेंगे। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पिछले चुनावों में बड़ी संख्या में राजपूत नेताओं को टिकट दिए थे और वे सभी चुनावों में जीत भी गए थे। 

सभी नेता आग उगल कर बाते कर रहे थे। अब जनरल वी.के. सिंह हों या योगी आदित्यनाथ, उन्होंने राजपूतों के लिए क्या किया, इस सवाल पर सभी खमोश हैं। लेकिन आज भी अधिकांश राजपूतों का ‘दुख’ इस बात को लेकर है कि भाजपा में उनके बड़े नेताओं का सम्मान नहीं है और पार्टी में किनारे किया जा रहा है। सहारनपुर से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद, कैराना से समाजवादी पार्टी की इकरा हसन और मुजफ्फरनगर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हरेंद्र मलिक को राजपूतों ने सीधे समर्थन देकर अपनी ताकत का एहसास करवा दिया। नतीजे चाहे जो भी हो, लेकिन प्रथम चरण के मतदान के बाद भाजपा का नेतृत्व अब संघ के साथ हरकत में आ गया है। राजपूत-मुस्लिम समीकरण भाजपा और हिंदुत्व के लिए बड़ा खतरा हो सकता है और इसलिए उसे तोड़ने के लिए ही अलग-अलग तरीके से मुस्लिम विरोधी बयान लगातार आने शुरू हुए हैं और कोशिश की जा रही है कि चुनाव दोबारा से हिंदू-मुसलमान के खांचे में हो ताकि भाजपा उसका लाभ ले सके। 

मसलन, अलीगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ कि भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि उनके नेतृत्व में प्रदेश दिन दूनी-रात चौगुनी प्रगति कर रहा है। उन्होंने योगी को बुलडोज़र से जोड़ने की आलोचना की और कहा उत्तर प्रदेश में बहुत अधिक काम हुआ है। नरेंद्र मोदी के हृदय परिवर्तन का कारण और कुछ नही अपितु उनके लॉयल वोट बैंक को वापस लाने के लिए है। 

बहरहाल, लगभग देश भर के राजपूतों में यह बात जा चुकी है कि मोदी व शाह की गुजराती जोड़ी उनके सभी बड़े नेताओं का राजनीतिक करिअर खत्म कर देना चाहती है ताकि उन्हे कोई चुनौती ही न रहे। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के एक चुनाव क्षेत्र में मोदी द्वारा योगी आदित्यनाथ का अपमान सभी ने देखा और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब पूर्वांचल एक्स्प्रेस हाई-वे पर भारतीय वायुसेना के विमानों की लैन्डिंग का एक कार्यक्रम हुआ तो मोदी ने योगी को अपने साथ गाड़ी में भी नहीं बैठाया। लोगों ने देखा कि मोदी अपने लाव लश्कर के साथ जनता का अभिवादन कर रहे थे और योगी उनसे पचास मीटर पीछे पैदल चल रहे थे। देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के अपमान को सभी देख रहे थे। वहीं आज रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की पार्टी में आज क्या स्थिति है, किसी से छिपी नहीं।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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