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हिंदी प्रदेशों में दो चरणों के मतदान प्रतिशत में कमी के मायने

बिहार के बांका और भागलपुर में मैंने यह पाया कि नरेंद्र मोदी के प्रति खासतौर पर उत्पीड़ित जाति-समुदायों में जो उत्साह दिखाई पड़ता था, वह इस बार नहीं था। पढ़ें, रिंकु यादव की यह रपट

नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ‘370 पार’ और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ‘400 पार’ के दावे के साथ चुनाव मैदान में उतरी है। दावे के अनुरूप भाजपा को अपनी तथाकथित उपलब्धियों की ऊंचाई बनाए रखते हुए नये क्षेत्रों में चुनावी सफलता हासिल करनी है। लेकिन 2014 और 2019 के उलट मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय गिरावट दीख रही है। इस गिरावट की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। मतदान प्रतिशत में गिरावट का एक कारण वातावरण के तापमान को भी बताया जा रहा है। लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण कारण नहीं दीखता है, क्योंकि पिछले दो लोकसभा चुनावों का समय भी लगभग यही था।

बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषक इसे मोदी लहर के अंत के बतौर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि मोदी समर्थक वोटरों का एक समूह सत्ता से निराश होकर वोट डालने नहीं निकला है। 

जब हम वोट प्रतिशत की गिरावट और मोदी लहर या भाजपा की राजनीतिक ताकत के बीच के संबंध पर बात कर रहे हैं तो यह ध्यान में रहना चाहिए कि मोदी लहर का राष्ट्रव्यापी चरित्र नहीं रहा है। देश का एक बड़ा हिस्सा इसकी जद से बाहर रहा है। 

देखा जाय तो खासतौर पर हिंदी प्रदेश ही मोदी लहर का आधार क्षेत्र रहा है। यहां की अधिकांश सीटों पर भाजपा काबिज है। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में मतदान दर में गिरावट ने ही भाजपाई खेमे में हलचल मचा रखा है।

अनेक राजनीतिक विश्लेषक मोदी लहर के कमजोर पड़ने या खत्म होने से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि लगातार दो बार नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा और एनडीए को मिली ऐतिहासिक जीत के बाद मोदी के अजेय होने की धारणा के साथ और उनके सामने किसी वैकल्पिक चेहरा के नहीं होने से विपक्षी गठबंधन के वोटरों में निराशा है। वे वोट डालने के प्रति उदासीन हुए हैं। 

भाजपा की प्रतिक्रिया भी कुछ इसी तरह की है। उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने एक निजी न्यूज चैनल के साथ बातचीत में पहले चरण में हिंदी प्रदेशों में वोट प्रतिशत कम रहने के सवाल पर कहा कि विपक्ष के लोगों ने शायद उस तरह से चुनाव नहीं लड़ा, जैसे उन्हें लड़ना चाहिए था। इसलिए वोटिंग प्रतिशत कम हुआ। उनका कहना है कि विपक्ष का वोटर घर से नहीं निकला। 

वहीं, इसके उलट विपक्षी गठबंधन के दलों में वोटिंग की गिरावट से आत्मविश्वास पैदा हुआ है। अखिलेश यादव के शब्दों में कहें तो “दूसरे चरण में दिन भर यह एक अजब रूझान देखने को मिला कि हर बूथ पर ‘इंडिया गठबंधन’ के समर्थन में वोट डालनेवाले हर समाज और वर्ग के मतदाताओं का आना लगातार बढ़ता गया, वहीं दूसरी तरफ़ भाजपा के मतदाता कम से और कम होते चले गए। दूसरे चरण ने तस्वीर और साफ़ कर दी है– ‘अबकी बार, भाजपा साफ़!’”

वैसे यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि विपक्ष बहुत कारगर भूमिका नहीं निभाता रहा है। उसके अंदर कमजोरियां रही हैं। लेकिन, 2019 की तुलना में 2024 में बहुत फर्क आया है। एक तो 10 वर्षों से नरेंद्र मोदी की सरकार चली आ रही है। ऐसे में सरकार विरोधी गुस्सा स्वाभाविक है और पिछले दौर की अपेक्षा विपक्ष ज्यादा संगठित और लड़ता हुआ दीख रहा है, इसलिए विपक्ष के वोटरों में नाउम्मीदी पैदा होने का ठोस कारण दिखलाई नहीं पड़ता है। वोटिंग प्रतिशत की गिरावट का रिश्ता विपक्षी गठबंधन समर्थक वोटरों के वोट नहीं डालने से जोड़ देना संगतिपूर्ण व तर्कसम्मत नहीं लगता है।

एक नजरिया यह भी है कि मोदी समर्थक वोटर समूह का एक हिस्सा मोदी की जीत की गारंटी मानकर आश्वस्त हो जाने के कारण वोट डालने नहीं निकला है, तो फिर भाजपा के व्यापक व मजबूत सांगठनिक नेटवर्क की भूमिका पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। भाजपा ने बूथ स्तर ही नहीं, उससे भी नीचे ‘पन्ना प्रमुख’ तक तय कर रखा है, जो हर मतदाता पर निगाह रखता है। दस साल के सरकार विरोधी स्वाभाविक गुस्से से निपटते हुए हिंदी पट्टी में अपनी उपलब्धियों की ऊंचाई को बनाये रखने की चुनौती से वह बेखबर नहीं हो सकती है। उसके नेता अमित शाह हर बूथ पर 370 नए वोट बढ़ाने के लक्ष्य पर जोर दे रहे हैं। 

बिहार में वोट देने के बाद एक दलित-बहुजन वृद्धा

खैर, भाजपा के नेतागण जो भी दावा करें, कम वोटिंग प्रतिशत ने मोदी खेमे में खलबली पैदा कर दी है। यह अकारण नहीं है कि भाजपा का नेतृत्व वोटिंग प्रतिशत को बढ़ाने को लेकर बेहद चिंतित व गंभीर है। 

दूसरी तरह यह भी साफ दीख रहा है कि पहले दो चरणों के वोटिंग प्रतिशत की गिरावट ने नरेंद्र मोदी को अपनी भाषा को आक्रामक बनाने पर बाध्य कर दिया है। अब वे जिस भाषा और शैली में बातें कह रहे हैं, उससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचती है। 

मसलन, उन्होंने कांग्रेस के घोषणापत्र के बारे में झूठी कहानी गढते हुए खुलकर मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरु कर दिया। उनकी टीम के अन्य सदस्य भी इस रास्ते पर उतर आए हैं। वहीं,नरेंद्र मोदी सभाओं में भाषण के अंत में अधिक से अधिक मतदान की लगातार अपील कर रहे हैं। दूसरे चरण के चुनाव के लिए सोशल मीडिया पर भी उन्होंने पोस्ट साझा करते हुए सभी सीटों के मतदाताओं से रिकॉर्ड संख्या में मतदान करने की अपील की। युवाओं और महिलाओं से वोट डालने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आने के लिए कहा। सनद रहे कि वे लगातार बूथ जीतने का आह्वान भी कर रहे हैं।

पिछले दो चुनावों में वोटिंग प्रतिशत और भाजपा की चुनावी उपलब्धियों के आंकड़ों को देखें तो वोटिंग प्रतिशत के उछाल का रिश्ता सीधे तौर पर मोदी लहर के साथ दीखता है। मसलन, 2014 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के घोषित चेहरा के बतौर नरेंद्र मोदी ने पार्टी के चुनाव अभियान की अगुआई की थी। तब कुल मतदान 66.44 प्रतिशत हुआ था। एक तरह से भारत के लोकसभा चुनावों के इतिहास में यह एक नया इतिहास रचा गया था। इसके पहले 2009 में 58.19 प्रतिशत मतदान हुआ था। वर्ष 2014 में भाजपा ने लोकसभा में पहली बार 282 सीटें जीत कर सत्ता पर निर्णायक कब्जा किया। मोदी एक लहर के साथ प्रधानमंत्री पद पर काबिज हुए और भारतीय राजनीति में मोदी युग की शुरुआत हुई। फिर वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव ने 2014 के भी मतदान के रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। उस चुनाव में 67.40 प्रतिशत मतदान हुआ था और लोकसभा में भाजपा के 303 सांसद पहुंचे थे। इस चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 6.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 37.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। वहीं 2019 में मोदी लहर ने नई ऊंचाई ग्रहण कर ली। लेकिन इस बार के दो चरणों के चुनाव में वोटिंग प्रतिशत की गिरावट मोदी लहर के बारे में नई तस्वीर प्रस्तुत कर रही है।

वर्ष 2014 और वर्ष 2019 के आंकड़ों और वातावरण के तापमान से इतर अब राजनीतिक वातावरण के तापमान के बदलाव पर गौर करने की ओर बढ़ते हैं।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी रैली में कहा है कि वह 2014 में लोगों के बीच आशा, 2019 में विश्वास और 2024 में गारंटी लेकर आए हैं। यह सच है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा ने 2014 में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ जनविक्षोभ के बीच अच्छे दिन के वादे और सबका साथ, सबका विकास के दावे के साथ भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी जैसे सवालों के जवाब में ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे को प्रस्तुत किया था। लोकप्रिय नारों और लोक-लुभावन वादों के जरिए छात्र-नौजवान, किसानों-गरीबों, महिलाओं और आम अवाम में आशा-उम्मीद के प्रतीक बनते हुए नरेंद्र मोदी सत्ता में आए। उनके पीछे कॉरपोरेट लॉबी थी और वे व्यापक तौर पर प्रचारित किए गये रहे गुजरात मॉडल पर सवार थे। गुजरात मॉडल की आकर्षक पैकेजिंग की गयी थी। वर्ष 2019 में देश के मतदाताओं ने ‘फिर एक बार, मोदी सरकार’ नारे को एक बार फिर स्वीकार किया और मोदी पर विश्वास किया। हर घर शौचालय और रसोई गैस जैसी लाभकारी योजनाएं का लाभार्थी समूह, पीएम आवास योजना सहित कई नई घोषणाओं के साथ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नया नारा था। हिंदू पहचान को उभारने के एजेंडा और पुलवामा के जवाब में बालाकोट हवाई हमले पर खड़ा किए गए राष्ट्रवादी उन्माद ने मोदी लहर को नई ऊंचाई दे दी थी। 

इस बार 2024 में नरेंद्र मोदी ‘मोदी की गारंटी’ के साथ आए हैं। 2014 के मुद्दे हल नहीं हुए, जो मुद्दे 2019 में खड़ा नहीं हो पाए। लेकिन अब नये सिरे से उभर कर मोदी की गारंटी के रूप में सामने ला दिए गए हैं।

अब थोड़ा आंकड़ों की बात कर लेते हैं। सीएसडीएस-लोकनीति ने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में बेरोजगारी को 27 प्रतिशत, महंगाई को 23 प्रतिशत, विकास को 13 प्रतिशत, भ्रष्टाचार को 8 प्रतिशत, आरक्षण को 2 प्रतिशत लोग बड़ा मुद्दा मानते हैं। वहीं, अयोध्या में राम मंदिर को 8 प्रतिशत, हिंदुत्व को 2 प्रतिशत,भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को 2 प्रतिशत लोगों ने सबसे बड़ा मुद्दा बताया है। 

सर्वेक्षण के अनुसार, 17 फीसदी लोग राज्य सरकारों को, 21 फीसदी लोग केंद्र को और 57 फीसदी लोग केंद्र व राज्य दोनों को नौकरी के अवसरों को कम करने के लिए जिम्मेदार मानते हैं। महंगाई के मुद्दे पर भी केंद्र को 26 प्रतिशत, राज्य को 12 प्रतिशत और दोनों को 56 प्रतिशत लोग ज़िम्मेदार मानते हैं।

ध्यान दिया जाना चाहिए कि 2019 के सीएसडीएस-लोकनीति चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के अनुसार, 2019 में क़रीब 16 फ़ीसदी लोगों ने बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों का उल्लेख किया था। सर्वेक्षण यह भी बता रहा है कि राम मंदिर मोदी लहर में नई जान फूंकने और हिंदू पहचान को उभारने का पॉवर हाऊस नहीं बन पाया है।

पिछले दिनों राजनीतिक चिंतक और कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने मेरठ से बनारस तक 15 संसदीय क्षेत्रों में सैकड़ों ग्रामीण वोटर से बातचीत के आधार सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया कि वोटर के मन में महंगाई और बेरोज़गारी है। बहुत वोटर परिवर्तन चाहते हैं। चूंकि मोदी अगर तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गए तब तो तानाशाही शुरू हो जाएगी। उनका कहना है कि भाजपा के अधिकांश सांसदों और स्थानीय नेताओं के ख़िलाफ़ बहुत ग़ुस्सा है। लेकिन, मोदी के प्रति ग़ुस्सा नहीं, उदासीनता है। उन्हें पांच किलो राशन का श्रेय मिलता है, लेकिन इस बार उनके नाम पर वोट नहीं पड़ेगा। वे बताते हैं कि कुल मिलाकर भाजपा के एक चौथाई वोटरों का कहना है कि इस बार मोदी को वोट नहीं देंगे। उधर सपा और कांग्रेस का वोट क़ायम रहने की उम्मीद है। बसपा के वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट है, लेकिन वह भाजपा को नहीं जा रहा। सभी जगह सभी जातियों में भाजपा का वोट खिसक रहा है।

अब बात बिहार की। यह उन कुछ राज्यों में है, जहां भाजपा और एनडीए की सीटें उल्लेखनीय तौर पर घटने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। चुनाव की घोषणा से पहले ही नीतीश कुमार के फिर से पाला बदलने के बाद यह तय मान लिया गया था कि अब यहां एनडीए को कोई खास नुकसान नहीं होगा। लेकिन दो चरणों के चुनाव में पलड़ा विपक्षी गठबंधन की ओर झुका हुआ दीख रहा है। बिहार वैसे कुछ राज्यों में है, जहां वोटिंग प्रतिशत उल्लेखनीय तौर पर अधिक गिरा है। यह गिरावट 2014 से नीचे पहुंच गयी है। दूसरे चरण में 2019 की तुलना में किशनगंज में सबसे कम 2.35 प्रतिशत की गिरावट है। यही एक मात्र सीट है जो 2019 में एनडीए के बजाय कांग्रेस के खाते में गयी थी। पूर्णियां में 5 प्रतिशत से अधिक और कटिहार में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट है। भागलपुर में 6.17 प्रतिशत और बांका में 4.60 प्रतिशत की गिरावट है। भागलपुर और बांका लोकसभा क्षेत्र में चुनाव के दरम्यान जमीन पर क्या कुछ चल रहा है, यह जानने-समझने का मौका मुझे मिला। 

मैंने यह पाया कि नरेंद्र मोदी के प्रति खासतौर पर उत्पीड़ित जाति-समुदायों में जो उत्साह दिखाई पड़ता था, वह इस बार नहीं था। विपक्षी गठबंधन का सामाजिक आधार पहले की अपेक्षा ज्यादा एकजुट रहा तो दलितों का पहले की तुलना में उल्लेखनीय हिस्सा भाजपा/एनडीए के खिलाफ खड़ा हुआ। अतिपिछड़ों का एक हिस्सा भी भाजपा/एनडीए के खिलाफ जाता दीख रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, गहराता आर्थिक संकट, निजीकरण और संविधान पर लगातार हमला व बदलने का खतरा, आरक्षण पर हमले के साथ ही तानाशाही जैसे सवाल मोदी लहर पर लगाम लगता दिखा। राम मंदिर हिंदू गोलबंदी को आवेग प्रदान करने में नाकमयाब दिखाई पड़ा। वहीं, उत्पीड़ित समाज में यह समझ बढ़ी है कि नरेंद्र मोदी की सरकार सवर्णों और पूंजीपतियों की है। गहराते आर्थिक संकट के बीच केंद्र सरकार की व्यापक तौर पर प्रचारित गरीबों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं नरेंद्र मोदी के पक्ष में राजनीतिक गोलबंदी की ताकत भी खोती दिखाई पड़ी। स्थानीय सांसदों के प्रति गुस्सा भी सुनाई पड़ रहा था। दूसरी तरफ एक सत्य यह भी कि विपक्षी गठबंधन उत्पीड़ित समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचने और उभर कर आए मुद्दों पर सशक्त अभियान चलाने में कमजोर दिखाई पड़ा। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुद्दों के साथ पीड़ित समुदाय खड़ा दिखाई पड़ रहा था।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रिंकु यादव

रिंकु यादव सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक हैं

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