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मुसलमानों का घटता राजनीतिक प्रतिनिधित्व : एक आंबेडकरवादी नज़रिया

भाजपा को ही ले लीजिए तो इस बार वह कुल 440 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन उसने केवल एक मुसलमान उम्मीदवार को टिकट दिया है। जबकि देश में मुसलमानों की आबादी करीब 14 फीसदी है। इस हिसाब से भाजपा को उन्हें कम-से-कम 61 सीटें देनी चाहिए थीं। मगर उन्हें केवल एक सीट दी गई और वह भी केरल से, जहां भाजपा बहुत कमजोर है। पढ़ें, अभय कुमार का यह आलेख

6 मई, 1945 को बंबई में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ के वार्षिक अधिवेशन में बोलते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक समुदाय को यह इजाज़त नहीं होनी चाहिए कि वह दूसरे समुदाय पर अपना प्रभुत्व थोपे। ‘सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय’ के विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि बहुसंख्यक वर्ग को संख्या के आधार पर अल्पसंख्यक वर्ग पर अपनी राय थोपने का कोई अधिकार नहीं है। डॉ. आंबेडकर के ये विचार आज और भी प्रासंगिक दिख रहे हैं, जब अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक तौर पर अलग-थलग किया जा रहा है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब राजनीतिक चेतना का प्रसार पसमांदा समाज में भी तेजी से हुआ है।

संतुलित प्रतिनिधित्व के बारे में डॉ. आंबेडकर ने कहा था– “कोई भी समुदाय ऐसी स्थिति में नहीं रहे कि वह अपने सदस्यों की अधिक संख्या के कारण अन्य समुदायों पर अपना आधिपत्य जमाए।” (डॉ. बाबासाहेब राइटिंग्स एंड स्पीचेज, वॉल्यूम 1, पृष्ठ 374)

यहां डॉ. आंबेडकर यह बतलाने की कोशिश कर रहे हैं कि संख्या के आधार पर शासन करना सैद्धांतिक रूप से किसी भी जम्हूरियत में सही नहीं है। उनके ही शब्दों में– “बहुसंख्यक वर्ग का शासन सैद्धांतिक रूप से असमर्थनीय और व्यवहार में असंगत होता है। बहुसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व में सापेक्षिक बहुमत स्वीकार किया जा सकता है, परंतु यह कभी भी पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर सकता है।” (वही, पृष्ठ 373)

डॉ. आंबेडकर के उपरोक्त कथन यह स्पष्ट करते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुसंख्यक समुदायों के वोटों से सरकार का गठन होता है। अकेले अल्पसंख्यकों के वोटों के आधार पर सरकार नहीं बनाई जा सकती है। मगर इसका यह बिलकुल भी मतलब नहीं है कि अल्पसंख्यक वर्गों की भागीदारी को संख्या के ज़ोर पर नज़रअंदाज़ किया जाए और उनके उचित प्रतिनिधित्व की उपेक्षा करनी चाहिए। डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सांप्रदायिक प्रश्न की सबसे बड़ी कठिनाई हिंदुओं का इस बात पर ज़ोर देना है कि बहुमत का शासन अनुल्लंघनीय है और इसे हर हालत में बनाए रखना चाहिए।” (वही, पृष्ठ 376)

हालांकि डॉ. आंबेडकर गैर-हिंदुओं में दलितों को भी शामिल करते थे और यही कारण रहा कि उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की थी।

खैर, आजादी के समय डॉ. आंबेडकर ने इसी दृष्टिकोण से हिंदू-मुस्लिम समस्याओं को देखा था। उनका मानना ​​था कि अगर ऐसी सरकार बनाई जाए, जिसमें अल्पसंख्यक वर्गों के हितों को पूरा किया जाए और उनको बराबर के अधिकार दिये जाएं और उन पर बहुसंख्यक समुदाय ज़ोर-ज़बरदस्ती न करे, तो देश का विभाजन रोका जा सकता है। लेकिन उस वक़्त उनकी बातों को नज़रअंदाज़ किया गया और सत्ता पाने को व्याकुल नेताओं को लगा कि विभाजन ही हिंदू-मुस्लिम प्रश्न का एकमात्र हल है। परिणामस्वरूप देश के दो टुकड़े हुए। लाखों लोगों की जानें गईं और लाखों बेघर हुए। दुखद यह कि आजादी के सात दशक बाद भी अल्पसंख्यक समुदाय को न्याय नहीं मिला है। आज़ादी के पहले मुसलमानों को पृथक निर्वाचन के अधिकार प्राप्त थे। मगर यह सब कुछ देश की एकता और राष्ट्र निर्माण के नाम पर रोक दिया गया। आज मुसलमानों के लिए आरक्षण की बात करना गुनाह के माफिक है। कांग्रेस पार्टी ने तो मुस्लिम शब्द का ज़िक्र तक अपने चुनावी घोषणा पत्र में नहीं किया है, मगर फिर भी भाजपा के नेतागण उसके ऊपर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं कि वह एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण छीन कर मुस्लिम को दे देना चाहती है। इसके लिए राहुल गांधी को ख़ास कर निशाना बनाया जा रहा है और वोटरों के बीच में भाजपा द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है। यह मुल्क के लोकतंत्र के लिए ख़तरा है और यह निष्पक्ष चुनाव की राह में बड़ा बाधक है।

राजनीतिक हाशिए पर मुसलमान

अल्पसंख्यकों के घटते प्रतिनिधित्व को समझने और उसका समाधान ढूंढने में डॉ. आंबेडकर का राजनीतिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। दुख की बात यह है कि नेहरू के दौर से लेकर आज तक मुसलमानों को उनका वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। मसलन, 1952 में निर्वाचित लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व सिर्फ़ 4.3 प्रतिशत ही रहा था। जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का बड़ा प्रतीक माना जाता है, के दौर (15 अगस्त, 1947 – 27 मई, 1964 तक) में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व 6 प्रतिशत से नीचे ही रहा। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव के बाद लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ कर 9.3 तक पहुंच गया, जो उसके बाद से लेकर अब तक के लोकसभा चुनावों में सबसे ज़्यादा है। वर्ष 1977 के बाद जब 1980 में चुनाव हुए तब यह हिस्सेदारी 6 प्रतिशत से ऊपर रही। लेकिन फिर इसमें कमी आनी शुरू हो गई। तब से सामान्य तौर पर यह आंकड़ा 5-6 प्रतिशत के आसपास रहा। लेकिन भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व तेज़ी से कम होना शुरू हो गया।

दरअसल, 2014 के बाद भारतीय राजनीति में मुस्लिम लगातार अपने आपको असुरक्षित समझ रहे हैं। भाजपा ने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की कि अल्पसंख्यक मुसलमानों का नाम लेना भी चुनावी तौर पर एक ‘रिस्क’ समझा जाने लगा है। जैसे कि ऊपर ज़िक्र किया गया है कि पिछली सरकारों ने भी मुसलमानों का हक़ मारा था, उनसे वोट लिया और उनपर ही राज किया। उनको सियासी तौर पर मज़बूत करने के नाम पर ‘टोकेनिज्म’ से काम लिया गया। मगर अब यह प्रतीक की राजनीति भी बंद होने लगी है। मोदी के उभार के बाद धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने भी अपनी रणनीति बदल ली है। उसके नेता भी अब खुल कर पूजा-पाठ कर रहे हैं और उससे ज़्यादा उसकी नुमाइश कर रहे हैं। ऐसा महसूस होता है कि सेक्युलर जमात ने यह तय कर रखा है कि जब तक सत्ता में नहीं आएंगे, तब तक ‘मुस्लिम’ शब्द बोलेंगे ही नहीं। हिंदुत्व के राजनीतिक उभार का ही यह असर है कि सेक्युलर पार्टियां भी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर चल रही हैं और अपने चुनावी घोषणा पत्र से भी ‘मुस्लिम’ शब्द से परहेज कर रही हैं।

दैनिक अंग्रेजी समाचार पत्र ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ में गत 19 मई, 2024 को एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर पिछले तीन आम चुनावों का विश्लेषण किया गया। इस रिपोर्ट में दिखाया गया है कि सभी प्रमुख राष्ट्रीय दल मुसलमानों को टिकट देने से पीछे हट रहे हैं। मुसलमानों को राजनीतिक तौर पर हाशिए पर धकेलने में जहां एक ओर भाजपा सबसे आगे है, तो दूसरी ओर अन्य पार्टियां भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं देने की होड़ में शामिल हैं।

अब भाजपा को ही ले लीजिए तो इस बार वह कुल 440 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। लेकिन उसने केवल एक मुसलमान उम्मीदवार को टिकट दिया है। जबकि देश में मुसलमानों की आबादी करीब 14 फीसदी है। इस हिसाब से भाजपा को उन्हें कम-से-कम 61 सीटें देनी चाहिए थीं। मगर उन्हें केवल एक सीट दी गई और वह भी केरल से, जहां भाजपा बहुत कमजोर है। याद रहे कि केरल का मलप्पुरम ज़िले में करीब 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। भाजपा ने वहां से एम. अब्दुस सलाम को अपना उम्मीदवार बनाया है। लेकिन उन्हें भी भाजपा नेताओं द्वारा भेदभाव का शिकार झेलना पड़ा है। उदाहरण के लिए 19 मार्च को जब मोदी केरल के पलक्कड़ में रोड शो कर रहे थे तो अब्दुस सलाम को रैली में जाने की इजाजत नहीं दी गई। जबकि पहले अब्दुस सलाम को रैली में जाने की इजाजत दी गई थी, लेकिन आखिरी वक्त पर उन्हें रोक दिया गया, क्योंकि वह एक मुस्लिम हैं और भगवा पार्टी को डर था कि उनके रैली में शामिल होने से उनके कट्टरपंथी समर्थक नाराज़ हो सकते हैं।

हाल के वर्षों में भाजपा ने खुद को पसमांदा मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी होने का दावा किया। इसके अलावा भाजपा की ओर से यह भी प्रचारित किया गया कि वह मुस्लिम महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी है और यह भी कि बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं भाजपा को वोट देती हैं। मगर टिकट वितरण करते वक़्त भाजपा को न तो पसमांदा मुसलमानों और न ही मुस्लिम महिलाओं का ख़याल रहा। हालांकि 2019 के संसदीय चुनावों में भाजपा ने 3 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। जबकि 2014 में उसने 7 मुस्लिम उम्मीदवारों को उम्मीदवार बनाया था।

विरोधाभास का आलम देखिए कि मोदी की लोकप्रियता के बारे में मुख्यधारा की मीडिया दिन-रात महानायक के रूप में स्तुति करती रहती है। जबकि उसी महानायक में इतनी भी क्षमता नहीं कि वह एक मुस्लिम उम्मीदवार को लोकसभा भेजने में सहयोग दे सके।

मुस्लिम को उचित प्रतिनिधित्व के सवाल पर वे पार्टियां भी खामोश हैं, जो खुद को सेक्युलर कहने से गुरेज नहीं करतीं। हालांकि इन पार्टियों ने मुसलमानों को कुछ टिकट दिए हैं, लेकिन वह मुस्लिम आबादी के अनुपात से काफ़ी कम है। चिंता की बात तो यह है कि पिछले चुनावों के मुक़ाबले इस बार लगभग तमाम सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों को टिकट देने में कटौती की हैं। मिसाल के तौर पर साल 2019 में; कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, राजद, एनसीपी और सीपीएम ने कुल 115 सीटें मुसलमानों को दी थीं, जो इस बार घटकर सिर्फ़ 78 रह गई हैं। इस तरह पिछले आम चुनावों की तुलना में इस बार मुसलमानों को 32 फीसदी कम सीटें मिलीं। मुसलमानों के टिकट काटने में कांग्रेस भी कम नहीं है। उसने 2014 में 44 मुस्लिमों को टिकट दिया था, जो 2019 के चुनाव में घट कर 34 पर आ गया। इस बार कांग्रेस ने सिर्फ 19 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जो 2014 की संख्या से लगभग आधा है या कहिए कि आधे से केवल दो सीट ज्यादा है।

बाक़ी सेक्युलर दलों का भी हाल बुरा है। पिछले संसदीय चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 8, राजद ने 5 और बसपा ने 39 मुसलमानों को टिकट दिया था। लेकिन इस बार उन्होंने भी मुसलमानों की सीटें काट लीं। इस बार समाजवादी पार्टी ने केवल 4, राजद ने 2 और बसपा ने 35 मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया है। हाल तो यह है कि सीपीआई और डीएमके ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है, जबकि उनके नेता धर्मनिरपेक्षता पर भाषण देने में आगे-आगे रहते हैं।

बहरहाल, राजनीति का सांप्रदायीकरण भी बड़ी तेज़ी से हुआ है, जो बहुसंख्यक समाज की राजनीतिक करने वाली पार्टियों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो रहा है और माइनॉरिटी कम्युनिटी और भी हाशिये पर पहुंच गई हैं। संख्या की ताक़त, पैसा का ज़ोर और समाज में व्याप्त वर्चस्व का लाभ उठाकर भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टियां सफल हो रही हैं और देश का कमज़ोर तबका अपने अधिकारों से वंचित होते जा रहा है। इन समस्याओं को लेकर डॉ. आंबेडकर ने आज से 80 साल पहले ख़बरदार किया था। उनका पैग़ाम था कि लोकतंत्र भीड़-तंत्र नहीं है। सच्चा लोकतंत्र वह है, जहां माइनॉरिटी को वाजिब और असरदार प्रतिनिधित्व मिले और उनको नीतियां बनाने में बराबर का सहयोगी बनाया जाए।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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