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कॉमरेड ए.के. राय कहते थे, थोपा गया विकास नहीं चाहते आदिवासी

कामरेड राय की स्पष्ट धारणा थी कि झारखंडी नेतृत्व के अंदर समाजवादी एवं वामपंथी विचारधारा उनके अस्तित्व रक्षा के लिए नितांत जरूरी है। लेकिन एक साजिश के तहत इसे पीछे ढकेला जा रहा है और उसकी जगह संप्रदायवादी, जातिवादी और उपभोक्तावादी रुझान पैदा किया जा रहा है। स्मरण कर रहे हैं विनोद कुमार

कामरेड अरुण कुमार राय (15 जून, 1935 – 21 जुलाई, 2019) झारखंड के पुनर्निर्माण की एक मुक्कमल दृष्टि रखते थे। और आदिवासी जनता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का गवाह तो है यह तथ्य कि कट्टर मार्क्सवादी होते हुए भी उन्होंने उस दौर में झारखंड अलग राज्य की मांग का समर्थन किया जब लगभग सभी वाम दल इस मांग का समर्थन तो दूर, इसका विरोध करते थे। सिर्फ वामदल ही नहीं, लगभग सभी गैर-झारखंडी दल इस मांग के विरोध में खड़े थे। कांग्रेस ने जयपाल सिंह मुंडा के साथ छल किया था। भाजपा झारखंड अलग राज्य के गठन के कुछ वर्ष पूर्व तक इस मांग का विरोध करती रही। जबकि राय न सिर्फ इस मांग का समर्थन करते थे, बल्कि झारखंड को समाजवादी आंदोलन के लिए उर्वर भूमि मानते थे। उनका कहना था कि आदिवासी से अधिक सर्वहारा आज की तारीख में है कौन?

मेरा उनसे सन् 1986 से संपर्क रहा। बोकारो स्टील सिटी में उनके श्रमिक संगठन बोकारो प्रोग्रेसिव फ्रंट का दफ्तर था। उसके बगल के क्वार्टर में मैं कुछ वर्ष रहा। वे अक्सर बगल में डायरी दबाए गुजरते दिख जाते। टखनों तक पहुंचते पायजामे और सफेद मगर थोड़े मलीन गोल गले के कुर्ते में। सड़क से गुजरते दिख जाते। मैंने उनसे कई बार आग्रह भी किया कि दादा, आपको कही ड्रॉप कर दूं, लेकिन उन्होंने हमेशा विनम्रता से मना कर दिया। हां, पत्रकार की हैसियत से उनसे कई बार मेरी अंतरंग बातें हुई। कभी बोकारो प्रोग्रसिव फ्रंट के दफ्तर में। कई बार धनबाद स्थित उनके कार्यालय में और कुछ अवसरों पर रांची में भी। मेरे पहले उपन्यास ‘समर शेष है’ में कोयलांचल की राजनीति और माफिया के खिलाफ झारखंडी जनता के संघर्ष का खाका उनसे हुई बातचीत के आधार पर ही मूलतः तैयार हुआ था। ट्रेड यूनियन मूवमेंट को लेकर मेरा उनसे विरोध था। मेरा मानना था कि ट्रेड यूनियन मूवमेंट बोनस-इनसेंटिव की लड़ाई में बदल कर रह गया है। इससे कुछ उम्मीद करना बेकार है। लेकिन उनका कहना होता कि वे मजदूरों को बोनसमुखी नहीं बनाते हैं।

कॉमरेड राय से मेरी एक विशेष बातचीत संभवत: 2013 में हुई। उस बातचीत में उन्होंने झारखंड और आदिवासियों के सवालों को वामपंथी दृष्टिकोण से विश्लेषित किया।

कामरेड राय की सोच रही कि झारखंड में एनडीए की अपनी एक राजनीति है। भाजपा की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच है। इससे झारखंडी परंपरा और सोच का बुनियादी विरोध है। भाजपा की सोच बाजारवादी सोच है, जो पूंजीवादी सोच की एक विशेष विकृति है। यह सोच उत्पादन से ज्यादा व्यापार को महत्व देती है। वर्ग चरित्र के रूप में भी यह खूब स्पष्ट है कि भाजपा सेठ साहूकारों, और इस प्रकार बिचौलिया वर्ग की पार्टी है जो पिछले कुछ वर्षों से उद्योग पर भी अपने बाजारवादी सोच के साथ हस्तक्षेप कर रही है। उदारीकरण, निजीकरण और विदेशीकरण का जो उफान आज झारखंड में देखा जा रहा है, यह उन्हीं की देन है।

कामरेड राय कहते थे कि दूसरी तरफ झारखंडी सोच, संस्कृति और परंपरा यदि पूर्णरूपेण समाजवादी नहीं, निश्चित रूप से समाजमुखी है। बाजार से ये अक्सर दूर रहते हैं। बहुत जरूरी होने पर ही बाजार का रूख करते हैं। झारखंडी श्रम पर विश्वास करते हैं और उत्पादन करके अपने बलबूते जीवित रहना चाहते हैं। सही मायने में वे व्यापारी वर्ग के विरोधी हैं और उन्हें ठग के रूप में देखते हैं।

गत 15 जून को झारखंड के धनबाद में कामरेड ए के राय की आदमकद प्रतिमा का अनावरण करते भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य वह अन्य

कामरेड राय कहते थे कि झारखंड की असली ऊर्जा झारखंडी भावना है। इसलिए तमाम झारखंडी नेताओं को खरीद कर भी पूर्व में झारखंड आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सका और अंत में झारखंड अलग राज्य का गठन उन्हें करना पड़ा। तत्कालीन केंद्र सरकार की समझ थी कि झारखंडी जनता इस बात से उपकृत होकर उनसे बंधी रहेगी। लेकिन अब तक का अनुभव तो यह है कि बहुत कुछ देने के आश्वासन के बावजूद झारखंडी जनता की नब्ज उनकी पकड़ में नहीं आया है। झारखंडी भावना, जो झारखंड निर्माण की उर्जा बन सकती थी, के साथ शासक वर्ग का कोई संबंध नहीं।

उनका कहना था कि हमें इस बात को याद रखना चाहिए कि अलग राज्य के रूप में झारखंड के गठन के पूर्व भी इस क्षेत्र का विकास हुआ था। बहुत सारे उद्योग-धंधे लगे थे। सार्वजनिक क्षेत्र में लगी कुल पूंजी का बड़ा भाग इसी राज्य में लगा। सिंदरी, बोकारो, एचईसी, बीसीसीएल, सीसीएल, डीवीसी आदि इसके उदाहरण हैं। लेकिन तमाम विकास बाहर से आए विकसित लोगों का चारागाह रहा। झारखंड के आदिवासियों का विकास नहीं हुआ, बल्कि उन्हें विस्थापन, उपेक्षा और शोषण का शिकार होना पड़ा। इसलिए झारखंडी जनता इस थोपे हुए विकास से नफरत करती है। जिस विकास में उनसे पूछा नहीं जाता, जिसमें उनकी कोई भागीदारी नहीं, उस विकास का वे विरोध करते हैं। किसी भी क्षेत्र का विकास उस क्षेत्र विशेष के जन समुदाय के सक्रिय सहयोग और उत्साह के बिना एक सीमा के ऊपर नहीं जा सकता। दरअसल झारखंड शुरू से ही एक आंतरिक उपनिवेश बन कर रहा और आंतरिक उपनिवेश एक दायरे से ऊपर उठ कर विकास की राह पर नहीं चल सकता। इसलिए तमाम कल-कारखानों, प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संपदा के बावजूद अपने गरीबी के अंदर ही रहा। और बिहार की भी गिनती देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्य के रूप में होती रही, क्योंकि आजादी तथा मुक्ति के बोध के जरिए समाज के अंदर जो ऊर्जा पैदा होती है, वही विकास की असली पूंजी है। बाहर से चाहे जितनी भी पूंजी लाई जाए, वह उस पूंजी की मददगार हो सकती है, उसका विकल्प नहीं। किसी भी तरह का बदलाव या आर्थिक-औद्योगिक क्रांति सामाजिक क्रांति के बगैर संभव नहीं। और यह तो झारखंड के विकास का सबसे जरूरी पहलू है।

कामरेड राय मानते थे कि एक आम झारखंडी मानसिकता हमेशा से एक सामाजिक मुक्ति की तरफ रही है। बिरसा मुंडा की लड़ाई का मुख्य बिंदु सत्ता नहीं थी, अंग्रेजों की दासता से मुक्ति का संघर्ष था। जो नए-नए ठेकेदार पैदा हो रहे थे, महाजन पैदा हो रहे थे, उससे मुक्ति की लड़ाई थी वह। इसी तरह सिदो-कान्हू का हूल, जिसका अर्थ क्रांति है, तमाम सामाजिक एवं राजनीतिक शोषण के विरुद्ध था। उस संघर्ष का चोट उस समय की कानून व्यवस्था पर पड़ा। परिणामस्वरूप उसके आंशिक निदान के लिए 1908 में छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र के लिए विशेष भू-कानून के रूप में टिनेंसी एक्ट आया। लोगों को उम्मीद थी और शहीदों का सपना भी था कि अलग राज्य बनने के बाद वे उन बंधनों से मुक्त होंगे, जिनसे आज भी वे जकड़े हुए हैं। उनका ध्यान इस बात पर केंद्रित नहीं था कि अलग राज्य बनने के बाद कितनी विदेशी कंपनियां राज्य में आएंगी और यहां पूंजी निवेश करेंगी। उनकी उम्मीद यह थी कि नए राज्य के गठन के बाद वे अपनी सोच, अपनी समझदारी से अपने विकास की योजनाएं बनायेंगे और अपने नेतृत्व में राज्य का विकास करेंगे।

लेकिन राज्य के गठन के बाद सरकार ने ऐसी नीति बनाई जो उनकी सोच के बिल्कुल विपरीत रही। झारखंडी जनता ऊपर से थोपा हुआ विकास नहीं चाहती है। लेकिन सरकार ने ऐसी नीति बनाई जो सिर्फ ऊपर से थोपा हुआ नहीं, बल्कि आसमान से उतरेगा। बाहर से बहुराष्ट्रीय कंपनियां आएंगीं, आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर उन्हें ऊपर उठा देंगी। यह कोशिश हो रही है कि विदेशी कंपनियां जो उपभोक्ता सामान बनाए, उसका खरीदार आदिवासी हो। यानी, वह उत्पादन करने वाला नहीं, उपभोक्ता बनें, माल के खरीदार बनें। टीवी और अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा जारी धुंआधार विज्ञापनों से आदिवासियों को आकर्षित किया जा रहा है और उनके चरित्र की शुद्धता को नष्ट करने की साजिश की जा रही है। यह विकास की एक ऐसी दिशा है जो समाज की जगह बाजार को स्थापित करना चाहता है और इससे आदिवासियों की पहचान ही मिट जाएगी। और यह सब झारखंडियों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर हो रहा है।

कामरेड राय की स्पष्ट धारणा थी कि झारखंडी नेतृत्व के अंदर समाजवादी एवं वामपंथी विचारधारा उनके अस्तित्व रक्षा के लिए नितांत जरूरी है। लेकिन एक साजिश के तहत इसे पीछे ढकेला जा रहा है और उसकी जगह संप्रदायवादी, जातिवादी और उपभोक्तावादी रुझान पैदा किया जा रहा है। हमें झारखंड की इस विशेषता को कभी नहीं भूलना चाहिए जो उसे नागालैंड, मिजोरम से अलग करता है। यहां आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों रहते हैं। अनेक भाषा और संस्कृति है और औद्योगिकरण की वजह से यहां औद्योगिक मजदूरों की एक विशाल आबादी है जिसका एक बड़ा हिस्सा बाहरी मजदूरों का है। लेकिन यहां कभी इनमें टकराव नहीं हुआ जैसा कि आज हम असम में देखते हैं। बाहरी मजदूरों ने भी हमेशा झारखंड आंदोलन का साथ दिया। 1970 के दशक में तो लाल हरे झंडे की मैत्री ने झारखंड आंदोलन को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। आज भी उसी एकता को कायम कर हम भटकाव से बच सकते हैं और झारखंड को एक नए स्वरूप में गढ़ सकते हैं।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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