h n

बिहार : बुलडोजरों से गरीबाें का घर ढाहने वाली सरकार आई

सदगुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन को बिहार सरकार ने पटना, गया, छपरा, सहरसा, भागलपुर और बेगूसराय जैसे छह शहरों में एलपीजी आधारित शवदाह गृह बनाने के लिए 1 रुपए की टोकन राशि पर 33 साल की लीज पर एक-एक एकड़ जमीन देने की मंजूरी दी है। लेकिन गरीबों के घर के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। पढ़ें, कुमार दिव्यम की यह रपट

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद राज्य भर में सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब और भूमिहीन परिवारों के घरों पर बुलडोज़र चलाकर ढाहने की कार्रवाईयां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दसवें कार्यकाल और भाजपा के पास गृह विभाग की बागडोर जाने के बाद प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने को नियमित अभियान बनाने का निर्णय लिया है। इस अभियान से कई जिले प्रभावित हैं, जहां झुग्गी-झोपड़ियों से लेकर पक्के मकानों तक को तोड़ा जा रहा है। नगर निगम और जिला प्रशासन ने हर महीने अतिक्रमण चिह्नित करने और कार्रवाई के लिए मासिक कैलेंडर बनाने का फैसला किया है।

शहरों एवं बाजारों में जहां एक ओर ठेले और खोमचे एवं छोटे दुकानदारों को हटाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में गरीबों की बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं। स्वाभाविक है कि बुलडोजर राज का शिकार दलित-बहुजन समाज हो रहा है।

वे कौन हैं जिनके घर ढाहे जा रहे हैं?

मसलन, नालंदा जिले के रहुई प्रखंड स्थित शिवनंदन नगर में बीते 26 नवंबर यानी संविधान दिवस को प्रशासन ने सरकारी जमीन खाली कराने के लिए 8 घरों को तोड़ दिया, जबकि 100 परिवारों को घर खाली करने का नोटिस जारी किया गया। यहां रहने वाले अधिकतर परिवार पासवान और मुसहर समुदाय के भूमिहीन लोग हैं, जो 1987 से इसी जगह रह रहे हैं। उन्हें बिजली, नल-जल सहित सभी सरकारी सुविधाएं घरों में उपलब्ध थीं।

सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई पटना हाई कोर्ट के 10 अक्टूबर, 2025 के आदेश के आधार पर किया जा रहा है। सीताराम प्रसाद बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एंड अदर्स मामले में हाई कोर्ट ने कहा था कि सरकारी और सार्वजनिक जमीन से आठ सप्ताह के भीतर अतिक्रमण हटाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी सरकारी नीति में पुनर्वास या वैकल्पिक भूमि का प्रावधान है तो उसे लागू किया जा सकता है।

शिवनंदन गांव की निवासी मुन्नी देवी रोते हुए बताती हैं कि “मेरी बेटी की शादी जनवरी में है। फिर भी हमारा पक्का मकान गिरा दिया गया, अब हम कहां जाएं? सरकार ने हमारी बात तक नहीं सुनी।”

सरकार के गठन के बाद बुलडोजर कार्रवाई का एक दृश्य

इसी गांव के विपिन पासवान, जो दिल्ली में मजदूरी करते हैं, कहते हैं कि “हम भूमिहीन हैं। सरकार 5 डिसमिल जमीन दे और घर बनाकर दे। बुलडोज़र चला तो काम छोड़कर गांव आना पड़ा। घर भी जा रहा, रोज़गार भी।” वे कहते हैं कि “विपक्ष के नेताओं का यहां आना-जाना लगा है तो प्रशासन अभी चुप है। वरना अब तक तोड़ दिया होता। विपिन गुस्साते हुए कहते हैं कि नीतीश कुमार नौकरी देने का वादा करके सरकार में आए हैं और अब घर भी उजाड़ रहे हैं।”

पटना जंक्शन के पास ठेला लगाने वाले शहजाद आलम पसमांदा समुदाय से आते हैं। वे फुटपाथी दुकानदारों का यूनियन चलाते हैं। वे कहते हैं कि “हमलोगों को सरकार ने वेंडिंग पहचान पत्र दिया है। इस पहचान पत्र पर प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत हमें लोन भी मिल जाता है, लेकिन अतिक्रमण के नाम पर हमारा ठेला और सारा सामान जब्त कर लिया जाता है, जिसकी कोई सुनवाई नहीं होती।”

जिंदा लोगों के लिए घर नहीं, शवदाह गृह की फिक्र

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि बिहार के भागलपुर जिले के पीरपैंती में एक रुपए प्रति एकड़ की दर से 1050 एकड़ जमीन अडानी ग्रुप को बिजली उत्पादन के लिए दे दिया गया और वहां लाखों पेड़ों को काटने की इजाजत भी दे दी गई, जबकि दूसरी तरफ गरीबों-भूमिहीनों के घर तोड़े जा रहे हैं?

इतना ही नहीं, सदगुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन को बिहार सरकार ने पटना, गया, छपरा, सहरसा, भागलपुर और बेगूसराय जैसे छह शहरों में एलपीजी आधारित शवदाह गृह बनाने के लिए 1 रुपए की टोकन राशि पर 33 साल की लीज पर एक-एक एकड़ जमीन देने की मंजूरी दी है। लेकिन गरीबों के घर के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। उल्टे सरकारी जमीनों पर बसे हुए लोगों को सरकार बेघर कर रही है।

बीते दिनों भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नीतिन नवीन के पटना आगमन पर स्वागत में बुलडोजरों पर सवार भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक

सरकार के इस अतिक्रमण की कारवाई की सराहना करते हुए गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने एक सभा में मंच से जोर देते हुए कहा कि सभी सरकारी जमीनों को खाली कराया जाएगा। यह एक तरीके से गरीबों भूमिहीनों को धमकी है, क्योंकि कार्रवाइयों पर गौर करें तो कोई ऐसी कार्रवाई नहीं दिखती जहां माफियाओं या सभ्रांत तबकों से सरकारी जमीनों को अतिक्रमणमुक्त कराया गया हो। सरकार के इस अतिक्रमणमुक्ति अभियान के निशाने पर भूमिहीन एवं वंचित समुदाय ही है।

सवर्णों के अतिक्रमण पर चुप्पी

एक उदाहरण राज्य की राजधानी पटना का है। पटना में खासमहल की लगभग 137 एकड़ जमीनों पर ऊंची जातियों का कब्जा है। इन जमीनों को 70 से 100 साल पहले लीज कराया गया था लेकिन लीज खत्म होने के बाद भी उसपर लोग रह रहे हैं। खरीद बिक्री की अनुमति नहीं होने के बावजूद भी इन जमीनों की खरीद-बिक्री की गई है और व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इतना सबकुछ होने के बावजूद सरकार उनपर बुलडोजर नहीं चलाती है।

सच से भागती सरकार

सदन में इस मुद्दे पर विपक्ष के सवालों के जवाब में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि बुलडोज़र कार्रवाई कोर्ट के निर्देश पर की जा रही है। हालांकि उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था देने के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की। हाई कोर्ट के आदेश का पालन जरूर सरकार करे, लेकिन बिना पुनर्वास और विकल्प दिए दशकों से बसे लोगों को हटाना सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में इस बात का जिक्र किया कि वैकल्पिक व्यवस्था करके हटाया जाए, लेकिन सरकार ने कोर्ट की इस टिप्पणी को एकदम नजरअंदाज कर दिया। 

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

कुमार दिव्यम

लेखक पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में स्नातकोत्तर छात्र व स्वतंत्र लेखक हैं

संबंधित आलेख

कॉकरोच जनता पार्टी का उभार : एक आंबेडकरवादी विश्लेषण
कोई भी आंदोलन हो, कोई भी पार्टी हो, कोई भी लीडर हो यह देखा जाना चाहिए कि इस पार्टी के मज़बूत होने से क्या...
ओमप्रकाश कश्यप, डॉ. रमाकांत ठाकुर व नवल किशोर कुमार को मिला संतराम बी.ए. स्मृति-सम्मान
संतराम बी.ए. सम्मान-2024 से सम्मानित डॉ. रमाकांत ठाकुर ने बहुजन वैचारिकी के बारे में विस्तार से बताया और इस बात पर एक तरह से...
आदिवासी पहचान को निगलने की साज़िश
आरएसएस समर्थित संगठन ‘जनजाति सुरक्षा’ मंच द्वारा पिछले 24 मई को दिल्ली में पृष्ठभूमि में भारत माता की फोटो के साथ ‘भगवान’ बिरसा मुंडा...
उत्तर प्रदेश : एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे केल्हड़िया गांव के कोल समुदाय के लोग
चंदौली के केल्हड़िया गांव में जल संकट केवल प्यास का संकट नहीं है। यह गरीबी का संकट है। यह स्वास्थ्य का संकट है। यह...
आदिवासियों के पुरखों की हत्या का जश्न मनाने वाले क्यों कर रहे हैं उनका सांस्कृतिक समागम?
यह कौतूहल जरूर होता है कि हिंदुओं के संपूर्ण पौराणिक वाङ्मय में जिन्हें अनार्य, राक्षस, असुर, दस्यु, दास, यहां तक कि मानवेतर वानर शब्द...