वर्तमान समय में कबीर की प्रासंगिकता कितनी है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘वर्तमान समय में कबीर की प्रासंगिकता’ विषय पर सुभाषचंद्र कुशवाहा का एक वक्तव्य 4 दिसंबर, 2025 को इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रस्तावित था। इसे बिना कोई कारण बताये विश्वविद्यालय प्रशासन ने रद्द कर दिया।
हालांकि इलाहाबाद नागरिक समाज, स्वराज विद्यापीठ, और याराने लालबहादुर ने मिलकर संयुक्त रूप से गत 11 जनवरी को इसी विषय पर सुभाषचंद्र कुशवाहा को बतौर वक्ता निमंत्रित करके कार्यक्रम का सफल आयोजन किया। इस कार्यक्रम की ख़ास बात, इसमें कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों की बड़ी संख्या में भागीदारी रही। यह कार्यक्रम इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा की स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रो. अंकित पाठक ने कहा कि आज की चुनौतियों का समाधान कबीर के पास है। इतिहासकार हेरम्ब चतुर्वेदी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
अपने शिक्षक लालबहादुर वर्मा को याद करते हुए लेखक सुभाषचंद्र कुशवाहा ने कहा कि “प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा साहेब ने मुझे पढ़ाया है। उस समय वे गोरखपुर यूनिवर्सिटी में थे। प्रोफ़ेसर वर्मा से हम थोड़ा डरते थे, क्योंकि हम छात्र थे। लेकिन वो हमसे ऐसा व्यवहार करने लगे कि लगा कि वो भी मूलतः छात्र ही हैं, प्रोफ़ेसर कम हैं। वो हमारे साथ ज़मीन पर बैठ जाते थे। नुक्कड़ नाटक में ख़ुद ही उतर जाते थे। और जब किसी आयोजन में खाने की व्यवस्था करनी होती और पैसे कम होते तो वो राय देते कि बाज़ार में जो सबसे सस्ती सब्ज़ी है बीजवाला बैंगन, उसे ख़रीद लाओ। और काटकर एक हंडे में उबाल दो और हल्दी, नमक और मिर्चा डाल दो। और पूड़ियां तलकर सभी लोग उसी हंडे में हाथ डालकर खा लो। पत्तल-दोने की भी ज़रूरत नहीं है।”
‘लोकरंग’ कार्यक्रम की एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि “एक बार बिना बुलाए वर्मा साहेब मेरे गांव (जोगिया जनूबी पट्टी, फाजिलनगर, उत्तर प्रदेश) ‘लोकरंग’ कार्यक्रम में पहुंच गए। मैं ख़ुद को शर्मिंदा महसूस करने लगा कि मैंने तो उन्हें बुलाया भी नहीं, और वो हाज़िर हो गए। मैंने मुख्य अतिथि बदलकर उन्हें बना दिया। वो दो दिन दो रात पूरे गांव में घूमे, सबसे बात किये, और चलते समय 2000 रुपए का नोट सहयोग राशि के रूप में मेरे हाथों में रख दी। यह कहकर कि यह मेरा सहयोग है ‘लोकरंग’ के लिए। मैंने जब लेने से इंकार कर दिया तो बोले– तुम ‘लोकरंग’ के माध्यम से लोगों को, जनता को तैयार कर रहे हो, इसके माध्यम से प्रशिक्षित कर रहे हो। यही तो मेरा काम है। तुम मेरा काम कर रहे हो। छात्रों को जनवादी धारा में कैसे जोड़े, एक पीढ़ी को कैसे तैयार करें, इसकी प्रोफ़ेसर वर्मा को चिंता रहती थी। वे कहते कि ये काम तुम्हें करना है अब। इस तरह वे अंतिम समय तक सबकी जिम्मेदारियां तय कर रहे थे। प्रोफ़ेसर वर्मा कबीर की विचारधारा को जीते थे।”

फिर कबीर पर बोलते हुए सुभाषचंद्र कुशवाहा ने कहा कि “संभव है कि आप मेरी बात से असहमत हों। और यही कबीर चाहते भी थे, वैचारिक विभिन्नता को सहमति पर लाने की बाध्यता वे नहीं रखते थे। वैचारिक बातों में अगर कोई मूल तत्त्व हो ज़िन्दगी का तो उसको रखा जाना चाहिए, कबीर उस विचारधारा से आगे चलते हैं।”
विश्वविद्यालयों में कबीर को पढ़ाने के नज़रिए पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि “कबीर को जिस तरह से विश्वविद्यालयों ने पढ़ाया है, और कबीर को जिस तरह मैंने पढ़ा है, मेरे पढ़ने का नज़रिया अलग है। हाईस्कूल में एक सवाल अक्सर आता है कि सिद्ध कीजिए कि कबीर एक समाज-सुधारक थे। मैंने उत्तर में लिखा– सवाल ही ग़लत है। समाज सुधारक तो वो है जो समाज में जो कुछ चल रहा है, उसमें जो कुछ ग़लतियां हो गईं हों तो उसमें सुधार करना चाहता है। कबीर तो ऐसा नहीं करते। वे तो समाज को ही उलट देना चाहते हैं। यह इसलिए कि उसमें सुधार कि कोई गुंजाइश ही नहीं है। कॉपी जांचने वाले मास्टर ने मुझे बुलाया, बहुत डांटा और कहा कि फेल हो जाओगे। आइंदा कॉपी में उल्टा-पुल्टा मत लिखना।”
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कुशवाहा ने कहा– “कबीर की प्रासंगिकता आज इतनी है कि सुभाषचंद्र कुशवाहा, एक अदना-सा विद्यार्थी जो कबीर को पढ़ता है, जब उसे व्याख्यान के लिए बुलाया जाता है तो विश्वविद्यालय मना कर देता है कि उसको बोलना नहीं है। यही कबीर की प्रासंगिकता है। आप कबीर को कक्षा 10 में पढ़ा सकते हैं, विश्वविद्यालय में पढ़ा सकते हैं। तो जो कबीर ने लिख दिया है उसके अलावा तो मैं कुछ नहीं कहने जा रहा। केवल उन्हीं बातों को कहूंगा, जिसे कबीर ने लिख दिया है और कबीर ने जो भुगता है। आप बार-बार उन बातों को पढ़ाते हैं। एक वक्ता और पढ़ा देगा और बोल देगा तो इसमें क्या एलर्जी है। इसलिए कबीर की प्रासंगकिता हमें याद दिलाती है और सोचने पर बाध्य करती है।”
प्रस्तुत है सुभाषचंद्र कुशवाहा के संबोधन का आंशिक तौर पर संपादित अंश–
कबीर के जन्म और मृत्यु को उलझा दिया गया
कबीर के साथ क्या वही वॉट्सअप यूनिवर्सिटी वाला खेल नहीं हुआ है? आज वॉट्सअप यूनिवर्सिटी से जो एक नॅरिटव आपके दिमाग़ में गढ़ा जाता है कि फलां पप्पू है, फलां 18 घंटे काम करता है। क्या कबीर के साथ इस समाज ने वह नॅरिटिव नहीं गढ़ा? मैं यह सवाल खड़ा करता हूं कि क्या कबीर को आपने स्वतः अपना लिया? क्या आपकी मंशा थी कबीर को अपनाने की? कतई नहीं थी। मैं वहां से शुरू करता हूं जहां से कबीर इस दुनिया को छोड़कर विदा होते हैं। कबीर का जीवनकाल ईस्वी 1440 से ईस्वी 1518 माना जाता है। पढ़ाने वाले तो 1398 ईस्वी से भी पढ़ाते हैं। इतना बड़ा जीवन दे देते हैं कबीर को। जबकि आज जब हम सारे विटामिन, सारे मिनरल्स खा रहे हैं तो भी 100 के पास पहुंचने में आपकी हालत खराब हो जाती है, तब आप कबीर को सवा सौ साल पहुंचा दे रहे हैं। रामानंद स्वामी को 300 साल तक पहुंचा दे रहे हैं। बातों को यदि वैज्ञानिक तरीक़े से नहीं रखा जाएगा तो विश्वविद्यालयों में आप कुछ भी पढ़ा लीजिए, कबीर को आप नहीं पढ़ाते हैं। आप केवल कोर्स को पूरा करते हैं। जब कबीर इस दुनिया को छोड़कर जाते हैं ठीक उसके कुछ वर्षों बाद ‘कबीर परचई’ और ‘कबीर कसौटी’ लिखी जाती है। जानते हैं कैसे लिखी जाती है? जैसे दलितों पर अत्याचार करना हो तो किसी दलित को किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दीजिए और फिर अत्याचार करिए। आदिवासियों पर ज़ुर्म करना है तो किसी आदिवासी को बड़े पद पर बिठा दीजिए। कबीर को नष्ट करना था तो नाभादास जी को आगे कर दिया गया, क्योंकि नाभाजी दलित समुदाय से आते थे। और एक किताब लिख दी गई– ‘कबीर परचई’। उसमें क्या-क्या लिखा गया, मैं उसकी बात नहीं करूंगा। लेकिन उसमें जो बात लिखी गई, वह कबीर मूलतः कबीर नहीं रहे। कबीर को भगवान बना दिया गया। स्वामी रामानंद को उनका गुरु बना दिया गया। उस प्रक्रिया के बाद मैं हिंदी के तमाम विद्वानों के साथ सवाल उठाता रहा हूं कि क्या आपने कबीर को स्वतः अपना लिया? कबीर 1812 में ब्रिटेन में छप रहे थे। 1841 में ‘ऑब्जर्वर’ अख़बार में छप रहे हैं। फिर 1841-1915 तक के अख़बारों के विवरण हैं।
भारत के बाहर जहां कबीर की भाषा नहीं थी, वे वहां छप रहे थे, लेकिन भारत में उन पर बात नहीं हो रही थी। रवींद्रनाथ टैगोर ने सबसे पहले 1915 में कबीर के 100 दोहों का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। इसी के आसपास अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’ ने कबीर के दोहों को प्रकाशित किया। डॉ. श्याम सुंदर ने ‘कबीर ग्रंथावली’ का संपादन 1928 में किया। और फिर 1960 में हज़ारी प्रसाद द्विवेदी कबीर पर लिखते हैं। ये मान ले रहे हैं कि कबीर संत थे, इसीलिए 120 वर्षों तक ज़िंदा रहे। सारी किताबों नें यह मुहिम छेड़ रखी है कि यह सिद्ध कर दिया जाए कि कबीर हिंदू मतावलंबी थे। कबीर ने जो कुछ भी ग्रहण किया है, वह हिंदू दर्शन वेदांत से ग्रहण किया है। अद्वैतवाद से ग्रहण किया है। और कहीं से नहीं किया है। भाई, एक मुसलमान परिवार में जन्मे व्यक्ति के बारे में आप क्यों ज़िद पकड़े हुए हैं और यह तय करने में लगे हुए हैं कि वे हिंदू थे। यह बात समझ में नहीं आती है। आप थोड़ा पलटकर भी पढ़ाना चाहते हैं कबीर को।
द्विवेदी जी एक जगह लिखते हैं कि कबीर का लालन-पालन जुलाहा परिवार में हुआ था। यह लिखकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं? आप क्यों नहीं लिखते कि कबीर का जन्म जुलाहा परिवार में हुआ था।

1440 बहुत पुरानी बात नहीं है। उस समय के तमाम लोगों के इतिहास तिथिवार दर्ज़ है। स्वयं गुरु नानक का जन्म 1469 में हुआ, यह दर्ज़ है। कबीर का जन्म नहीं तय हो सकता था क्या? ऐसा क्या है कि कबीर के जन्म और मृत्यु को इतना उलझा दिया गया है कि आज भी रिसर्च करते-करते थक जाएंगे, लेकिन कबीर की जन्म और मृत्यु कब हुई थी, यह कोई तय नहीं कर पाएगा?
ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले ही कहानी गढ़ दी गई है कि कबीर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे। विधवा के गर्भ से पैदा हुए थे, ये किसने देख लिया? अगर वो विधवा ब्राह्मणी थी, तो उसका नाम बता दो।
इसी तरह जो कथा गढ़ी गई है, वह अद्भुत, अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण है। एक लड़की एक व्यक्ति से जिद करती है कि मुझको स्वामी जी से मिलवा दो। वह ब्राह्मण अपनी विधवा बेटी को स्वामी जी से मिलवाने ले जाता है। स्वामी जी उसको दूर से ही आशीर्वाद देते हैं कि “पुत्रवती भव:”। जब लड़की के पिता बताते हैं कि उनकी बेटी तो विधवा है, आपने यह क्या आशीर्वाद दे दिया तब उसकी काट निकाली जाती है कि इससे जो बच्चा होगा वो इतना तेजस्वी होगा कि दुनिया को प्रकाशित करेगा।
चीज़ों का मूल्याकंन करते समय हम अपना पूरा दिमाग़ निकालकर अलग रख देते हैं। यदि स्वामी जी में इतना ही तेज़ था, प्रताप था कि उनके आशीर्वाद देने भर से बच्चा पैदा हो जाए (जो कि नहीं होता, हम सब जानते हैं) तो वो क्या यह पता नहीं कर सकते थे कि जो लड़की आई है, वह विधवा है।
कबीर के माता-पिता को भी उलझा दिया गया है कि वे पूर्व जन्म में ब्राह्मण थे। किसने देखा? कहां रिकार्ड है जो तुमने पूर्व जन्म का बता दिया। जबकि सीधे-सीधे दिखायी दे रहा है कि वे मुसलमान थे, जुलाहे थे। आप उस पर कोई बात नहीं करना चाह रहे हो। क्यों कहना चाह रहे हैं? सिर्फ़ इसलिए कि एक व्यक्ति जो 15वीं शताब्दी में मौजूद था, जिसे डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर ने भारतीय लूथर कहा।
ग्रियर्सन कहते हैं कि कबीर ने भारत में वैचारिक क्रांति ला दिया था। उसका ज्ञान इतना बड़ा था। अब आप सिद्ध करना चाहते हो कि ज्ञान हुआ है तो सिर्फ़ इसलिए हुआ है क्योंकि ये ब्राह्मण के ख़ून से पैदा हुआ है। वर्ना इतना ज्ञानी होता ही नहीं। ये मूर्ख ही बना रहता।
कबीर का जन्म इस धरती पर तब होता है जब मुग़ल काल नहीं आया था। उनका जन्म सल्तनत काल में हुआ था। उस समय कि क्या दशा थी इस देश में कर्मकांड को लेकर, पाखंड को लेकर, पोंगापंथ को लेकर? उस दौर में कबीर बनते हैं। ठीक उसी दौर में दूसरी दुनिया में भी अराजकता का दौर दिखायी देता है। यूरोप में रेनेशां का जो काल है, जो कि लाल बहादुर वर्मा का प्रिय विषय था, उसी के समय काल के क़रीब है कबीर का भारतीय रेनेशां। संतों का जो आंदोलन है, ये उसी के काल का है, जिसको आप भक्ति काल कह देते हैं। इस पर मुझे आपत्ति है कि किसकी भक्ति, कैसी भक्ति?
चार्वाक, सिद्धों, सूफियों, नाथों के परंपरा के वाहक हैं कबीर
कबीर की जो पूरी विचारधारा है, वह कबीर के रूप में एकाएक नहीं आती है। इस देश में वर्णवाद के ख़िलाफ़ एक समानांतर लड़ाई चल रही थी। एक तरफ़ वर्णवादियों का पूरा आंदोलन है, दूसरी ओर उसके विरोध में पूरा एक आंदोलन चला है। इस आंदोलन की शुरुआत चार्वाक से होती है। चार्वाक के बाद उसी आंदोलन की बागडोर बुद्ध के हाथों में आती है। फिर सिद्धों के पास आती है। सिद्धों का जो काल है आठवी शताब्दी का, उसी काल में सूफियों का आगमन भारत में हो चुका है। सूफियों और सिद्धों के द्वारा ही नाथों का पूरा काल आता है। नाथों के काल के बाद ही कबीर का निर्माण होता है।
जो सिद्धों ने कहा, उसको गोरखनाथ ने कहा। और जो गोरखनाथ ने कहा वही कबीर ने कहा। कोई अंतर नहीं है। तीनों एक ही बात कहते हैं। तो कबीर जिस धारा के कवि हैं, उसकी लड़ाई पहले से चली आ रही है। कबीर अकस्मात पैदा नहीं होते। यानी जो सिद्धों के यहां आपको मिलेगा, वही गोरखनाथ के यहां मिलेगा। वही कबीर के यहां आपको मिलेगा।
सिद्ध सरहपा ने एक कविता लिखी है, नौवीं सदी में–
पंडिअ सअल सत्थ बक्खाणइ।
देहहि बुद्ध बसंत ण जाणइ।
तरूफल दरिसणे णउ अग्घाइ।
पेज्ज देक्खि किं रोग पसाइ।
इसी तरह गोरखनाथ लिखते है– “पोथी पढ़ि पढ़ि पण्डित भया, योग न जान्या कोई।” इसी कविता को कबीर ऐसे कहते हैं– “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुया, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।” यानि जहां पर गोरखनाथ ‘योग’ शब्द लिखते हैं, वहीं कबीर ‘प्रेम’ लिखते हैं।
एक लंबी परंपरा है, जो सिद्धों से, नाथों से लेकर कबीर तक आ रही है। उन पंक्तियों को देखिए, जिसमें गोरखनाथ कहते हैं– “हिंदू ध्यावे देहुरा, मुस्लिम ध्यावे मसीत, जोगी ध्यावे परम पद, जहां देहुरा न मसीत।”
कबीर बड़े साफ़ शब्दों में सब खंडित कर रहे थे। वहीं हमारे आचार्य यह साबित करने में लगे थे कि कबीर पैदा हुए हैं तो हिंदू वेदांत से। वे सूफियों, सिद्धों, नाथों का दर्शन सब भूल जाते हैं। मुझे बहुत दुख होता है कि हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने एक किताब लिखी है। आपने ज़रूर पढ़ी होगी। यूनिवर्सिटी में सबसे ज़्यादा वही पढ़ी-पढ़ाई जाती है। उस किताब का 80 प्रतिशत हिस्सा यह समझाने में ख़र्च हो गया है कि हिंदू धर्म में अवधूत क्या होता है, निरंजन क्या होता है, हठयोग क्या होता है, नाथ संप्रदाय क्या होता है, जोगी क्या होता है, निर्गुण राम क्या होता है। ये सारे चैप्टर आपको मिलेंगे। कबीर के मूल तत्त्वों पर कोई बात नहीं होगी।
कबीर भी हुए हैं वॉट्सअप यूनिवर्सिटी के शिकार
कबीर की प्रासंगिकता तय करनी हो तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि कबीर के नाम पर जो कुछ भी लिखा गया है, वह कबीर का है, इस बात पर कतई विश्वास मत कीजिए, क्योंकि उसमें वॉटसअप यूनिवर्सिटी का बहुत सारा इतिहास डाला जा चुका है। यह उसी समय से डाला गया है जब कबीर थे। कबीर को जानना हो तो कबीर के विचारों पर ग़ौर कीजिए, कविता पर नहीं। कबीर के वर्णवाद की विरोध में खड़े विचारधारा की कविताओं के इकट्ठा कीजिए और तब कबीर को पढ़िए। कबीर के विचारों का घालमेल करने के लिए कितना कुछ कहा गया है।
एक कविता में कबीर कहते हैं– “माला जपूं न कर जपूं, मुख से कहूं न राम।” और बाक़ी आपको उसमें इतनी कविता डाल दी जाएगी जिससे लगेगा कि कबीर सिर्फ़ राम-राम ही कह रहे थे। हम मानने को तैयार हैं कि कबीर राम के भक्त थे, तो कबीर के कहे को स्वीकार कर लीजिए, फिर काहे की आफ़त आई हुई है। आप उनको लेकर इतना ज़्यादा डर रहे हैं। कबीर राम भक्त हैं तो कबीर को हर जगह स्वीकार कीजिए। लेकिन ऐसा नहीं है।
कबीर को बदनाम करने के लिए एक दूसरा तरीक़ा भी तैयार किया गया है। गांव में होली के क़रीब आते ही ‘जोगीरा कबीरा’ गाया जाता है। उसमें इतने अश्लील पद होते हैं कि स्त्रियां सुन नहीं सकती थीं। इतने गंदे पद होते हैं। फिर भी ये क्यों गाए गए? यह वही वॉट्सअप यूनिवर्सिटी का ज्ञान था, जो फैलाया गया था ताकि कबीर और जोगियों को कैसे बदनाम कर दिया जाए कि वो समाज में पुनः उस रूप में न रहें जिस रूप में उन्होंने वर्णवाद के विरोध में पूरी एक लड़ाई लड़ी है।
गोरखनाथ को भी नहीं छोड़ा गया है। कहते हैं लोग कि क्या गोरखधंधा फाने हो। ये मुहावरे अकारण नहीं पैदा हुए हैं, इन्हें पैदा करने के पीछे की मानसिकता रही है कि उन संतों को, जिन्होंने समाज में समानता की बात कही, प्रेम की बात कही, भाईचारा की बात कही, उनको कैसे बदनाम किया जाए। समाज में कैसे उनके स्थान को खारिज़ किया जाए।
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जब कबीर के दर्शन पर विचार करते हैं तो वे कहते हैं कि कबीर पर वेदांत का प्रभाव है, और जो अद्वैतवाद है, उससे बहुत कुछ ग्रहण करके कबीर अपनी बात रखते हैं।
बुद्ध, कबीर, गोरखनाथ के अवशेष साथ-साथ मिलेंगे
ब्रिटिश लाइब्रेरी में मैं एक अख़बार देख रहा था, जिसके बारे में मैंने अपनी किताब में कोट भी किया है। कबीर पर अद्वैतवाद से ज़्यादा सूफियो का प्रभाव है। उससे कई गुना कबीर पर पीरों का प्रभाव है। गोरखनाथ का पूरा निर्माण पीरों से हुआ है। गोरखनाथ, ग़ाज़ी मियां को मेहता समुदाय सबसे ज़्यादा मानता है। ग़ाज़ी मियां ने गौ-हत्या निषेध को लेकर एक आंदोलन चलाया और ग़ाज़ी मियां के गोरखनाथ से बहुत घने संबंध थे।
इसीलिए गोरखनाथ ने बार-बार कहा है– “उतपति हिंदू जरणा, जोगी, अकलि पीर मुसलमानी।” यहां गोरखनाथ कहते हैं कि मैं अपने को पीर मानता हूं। जो जोगी होता है, वह पीर होता है। हिंदू-मुस्लिम के बारे में गोरखनाथ के पदों को पढ़ेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि गोरखनाथ पर पीरो और सूफियो का प्रभाव पड़ता है।
अपनी किताब में जोगियों पर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने बहुत लंबा चैप्टर दिया है। बलरामपुर में खबरुआ गांव में 420 घर है जोगियों के, ये सभी पसमांदा मुसलमान हैं। जहां-जहां आपको बुद्ध के अवशेष मिलेंगे, जैसे कि श्रावस्ती, कुशीनगर, गया या जहां भी है, आपको गोरखनाथ के अवशेष मिलेंगे, कबीर के अवशेष मिलेंगे। सबसे ज़्यादा आपको जुलाहों की आबादी मिलेगी। सीतापुर में 40 लाख जोगी हैं। धीरे-धीरे वो अपना काम छोड़ते जा रहें, सारंगी रखते जा रहे हैं। गाना-बजाना बंद होता जा रहा है। जोगियों की पूरी परंपरा सूफियों से आती है। भिक्षाटन की प्रथा बुद्धों से आती है।
जोगियों से गोरखनाथ और कबीर सीखते हैं कि प्रेम किस तरीक़े से मनुष्यता के लिए ज़रूरी है। किस तरह हिंदू-मुस्लिम विभाजन को दूर किया जा सकता है। किस तरह से हिंदुस्तान में एक परम ब्रह्म की परिकल्पना करना अनिवार्य है। तो यह लड़ाई बहुदेववाद के विरुद्ध एक परम ब्रह्म की है।
कबीर के पूरे दर्शन का क्या निचोड़ है? वह है– ‘अमरदेसवा’। ‘अमरदेसवा’ के बारे में एक भी शब्द हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की किताब में नहीं है। कबीर का ‘अमरदेसवा’ ठीक उसी तरह से है, जिस तरह रैदास का ‘बेग़मपुरा’ है–
जहंवा से आयो अमर वह देसवा
पानी न पौन न धरती अकसवा, चांद सूर न रैन दिवसवा।
ब्राह्मन, छत्री न सूद्र वैसवा, मुगलि पठान न सैयद सेखवा
आदि जोति नहीं गौर गनेसवा, ब्रह्मा विस्नु महेस न सेसवा
जोगी न जंगम मुनि दरवेसवा, आदि न अंत न काल कलेसवा
दास कबीर ले आये संदेसवा, सार सब्द गहि चलैवहि देसवा
‘अमरदेसवा’ में कबीर कहते है कि हमारे देश में गौरी, गणेश, विष्णु, महेश नहीं रहेंगे। और आप कसम खाए बैठे हैं इन्हें सिद्ध करने के लिए कि रामानंद उनके गुरु थे? रामानंद कबीर के गुरु ठीक उसी तरह थे, जैसे आज हम लोग विश्वगुरु हैं। यदि हम कबीर का जन्म 1398 में मान भी लें तो भी, रामानंद की मृत्यु 1410 ईस्वी तक हो जाती है। तो यदि कबीर 1398 में पैदा हुए थे और 1410 में रामानंद स्वामी मर गए थे तो 12 साल की उम्र में कौन-सा ज्ञान दे दिया उन्होंने कबीर को। सबसे बड़ी बात उस ज्ञान देने की कहानी क्या है। तो क्या कबीर इतने मूर्ख थे कि किसी का पैर छाती पर पड़ गया तो उन्होंने उसको ज्ञान मान लिया। जो आदमी वैष्णव मार्गी है, वह कबीर का गुरु हो गया। तो कबीर को वैष्णव मार्गी होना चाहिए था, पर कबीर तो मूर्तिपूजा का निषेध करते हैं। कबीर तो ‘अमरदेसवा’ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों को ख़ारिज करते हैं।
राम प्रकाश गुप्ता ने लिखा है कि रामानंद उनके गुरु थे तो वे अपने शिष्य को क्या पढ़ा गए कि शिष्य ने चुन-चुनकर उनके पूरे दर्शन को ख़ारिज कर दिया। कबीर गुरु को भगवान से बड़ा मानते थे–
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
तो जो आदमी गुरु को इतना महान मानता हो क्या वो स्वामी रामानंद को महान मानने में संकोच करेगा? आप देखिए कि जितने संत हुए हैं उस समय, उन सबके गुरु रामानंद स्वामी हैं। रामानंद, दादू, रैदास, सबके गुरु हैं। यदि रामानंद को सबका गुरु साबित करने लगेंगे तो 300 वर्ष का जीवन लग जाएगा 14वीं से 16वीं सदी तक। तब जाकर वे सबके गुरु होंगे। तो कबीर को देखने की एक विचारधारा वह है जो हजारी प्रसाद द्विवेदी की है, हरिऔध जी की है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की है और दूसरी विचारधारा बहुजनों की है। कबीर को समझने के लिए दूसरी धारा में जाना पड़ेगा, जिसमें कंवल भारती हैं, बिहार के राजेंद्र प्रसाद सिंह, और अन्य लोग हैं। उनकी धारा अलग है।
अनंतानंद, सुरसुरानंद, सुखानंद आदि ऐसे नंद नाम के शिष्य हुए हैं रामानंद के। उनके जो शिष्य थे, उनके नाम के अंत में ‘नंद’ शब्द जुड़ता गया। लेकिन कबीर के साथ तो जुड़ा नहीं। रैदास के साथ जुड़ा नहीं तो वे कैसे उनके शिष्य हो गए। यह सिद्ध करने के लिए उनके पास एक ही दोहा है– “हम काशी में प्रकट हुए, रामानंद चेतायें।”
तो रामानंद कबीर को क्या चेताये, यह भी दो लाइन और लिख देते आगे। आख़िर कबीर की क्या ग़लती, क्या मूर्खता कर रहे थे, जो रामानंद जी ने चेता दिया? कबीर ने जो दर्शन आपके सामने रखा है, वह तो साफ़-साफ़ है–
“ब्राह्मण गुरु जगत् का, साधु का गुरु नाही।”
शर्की शासक का संरक्षण प्राप्त था कबीर को
आप कबीर के विचारों को पीछे करके, क्षेपकों, वाट्सअप यूनिवर्सिटी का ज्ञान जो उसमें डाला गया है उसको आगे करके कहते हैं कि कबीर के गुरु रामानंद थे। जबकि जौनपुर सल्तनत का सहयोग नहीं मिला होता तो कबीर होना आसान नहीं था। यह बात कहीं लिखी नहीं गई है। मैं तथ्यों के आधार पर उठा रहा हूं। जौनपुर के मस्जिद के बचे हुए अवशेष देखिए, तो आप पाएंगे कि वह हिंदू-मुस्लिम की साझी संस्कृति की बची हुई इमारतें है।
जौनपुर सल्तनत के शासक हुसैन शाह शर्की का लिखा एक दोहा है, जो आप पढ़ेंगे तो लगेगा कि कबीर ने लिखा है। इतनी समानता है कबीर से–
“मैं पिया के मनौली, न माने, पिया मोरे मनमानी रे
लोग कहे तू तो बावरी, आपै रोग पुरानी रे
पिया मोरे मैं पिया की सजनी, पिया के हाट बिकानी रे
शाह हुसैन बतावें, जंगल जाय समानी रे।”
1497 में जौनपुर के शर्की शासक का सामना सिकंदर लोधी से होता है। उससे पहले बनारस शर्की शासन के अंतर्गत ही आता था। काशी में रहकर कबीर इतना उट-पटांग बोल रहे थे, तो बग़ैर किसी सुरक्षागार्ड के नहीं बोल रहे थे। उनके साथ यदि हज़ार लठैतों का गैंग नहीं होता तो मार दिए जाते। कबीर को बचाने में शर्की सल्तनत का बड़ा हाथ था। जब सुल्तान लोधी की बात आती है, सिकंदर लोधी जौनपुर आया। इसके प्रमाण मौजूद हैं। हम दोहे की बात नहीं कर रहे। वैज्ञानिक ढंग से मूल्यांकन कीजिए कि कबीर के मरने के बाद क्या होता है। मरने के बाद कबीर की लाश नहीं मिलती है। कथा कही जाती है कि हिंदू, मुस्लिम अपने-अपने ढंग से कबीर का क्रिया-कर्म करने के लिए लड़ रहे थे। जब लाश से कपड़ा हटाया गया तो वहां लाश नहीं केवल कुछ फूल थे। जबकि कबीर हांड-मांस के आदमी थे। सिकन्दर लोधी से उनकी मुलाकात हुई थी। क्या यह संभव नहीं है कि सिकंदर लोधी ने कबीर को मरवाकर उनकी लाश नदी में फेंकवा दिया हो। उनकी लाश न मिली हो। ऐसी स्थिति में उनका अंतिम संस्कार करने के लिए विकल्प क्या था? यही कि फूल बांट लिया जाए। जब-जब हम तर्क और वैज्ञानिक ढंग से किसी बात को सत्यापित नहीं करेंगे, तो अवैज्ञानिक ढंग से कही गई बातों को मानकर, किसी चीज़ को स्वीकार कर लेंगे। कबीर अभिव्यक्ति की आज़ादी को सबसे पहले बुलंद आवाज़ देने वाले व्यक्ति हैं। आज अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सबसे ज़्यादा संकट है। कबीर हिंदू-मुस्लिम के विभाजन को नहीं मानते थे। कबीर ख़ुद को जुलाहा तो कहते हैं, पर कभी मुसलमान नहीं कहते। वो ख़ारिज करते हैं सांप्रदायिक विभाजन को।
कबीर श्रम को सम्मान देते हैं
कबीर कार्ल मार्क्स के पूर्व के वैचारिक कार्ल मार्क्स हैं। कबीर की रचनाओं का वो हिस्सा तो कभी पढ़ा ही नहीं जाता है, जिसमें उन्होंने वंचितों का उल्लेख किया है। कबीर की रचनाओं में जो श्रम के प्रति प्यार है वो कहीं नहीं मिलेगा। वो इसलिए नहीं मिलेगा क्योंकि हमारे यहां श्रम का पूरा-का-पूरा ढांचा ऐसे तैयार किया गया था कि श्रम के प्रति शर्म है। कबीर सम्मान देते हैं नाऊ को, जुलाहा को, लुहार को, कुम्हार को।
जुलाहे पर उनका एक दोहा है–
“हम काशी के जुलाहा, राम नाम रंग रांचा
ऐसा रंग लगा कबीरा, कबहुं न छूटे ख्वाजा।”
नाई के लिए वो कहते हैं–
“नाई के घर साबुन नाही। फिर भी उजली देह
मन का मैल उतार दे, सोई सच्चा सेह।”
कुम्हार के प्रति उनका भाव देखिए–
कहार कहूं या, कोऊ कहूं
सिर पर लादे भार, मन का बोझ उतार ले, तौ पहचाने।
कुम्हार पर उन्होंने लिखा है–
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गहि गहि काढ़े खोट
या
माटी कहे कुम्हार से, तू क्यों रौंदे मोहि, एक दिन ऐसा आएगा मैं रोदूंगी तोंहि।
निम्न जातियों के प्रति कबीर लगातार लिखते हैं। ऐसे ही लोहार के प्रति कबीर लिखते हैं–
लोहे को तपाय के घन मारे बारंबार, ऐसे मन हरि पाइये कहे कबीर विचार
या
साधु जैसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
लेकिन कबीर ने मुल्लाओं, पंडितों को सम्मान से पुकारा है क्या? एक भी पंक्ति हो तो बता दीजिए। वे तो “पाण्डे छूत कहां से आई” कहकर ललकारते है।
इसीलिए मैं कहता हूं कि कबीर हमेशा श्रमशील समाज के साथ खड़े हैं। जैसे आज धन इकट्ठा कर रहें हैं 10 पूंजीपतियों के पास देश की आधी सम्पत्ति इकठ्ठी हो गई है। कबीर कहते हैं– “साईं इतना दीजै, जामे कुटुम्ब समाय।” “ऊंचे कुल के जनमियां” कहकर वो ऊंचे कुल में जन्म लेने वालों को धिक्कारते हैं।
सिख धर्म और दीन-ए-इलाही पर कबीर का प्रभाव है
आप लोग विवेचना कीजिएगा कि आख़िर कबीर में कौन-सा ताप था, जिसको नानक पकड़ रहे थे। 1498 में नानक की मुलाकात कबीर से होती है। 27 वर्ष की उम्र में। नानक निकले थे हिंदू बेल्ट में उन दोहों को इकट्ठा करने जो वंचित समुदाय से हों। 1604 में आदि ग्रंथ का संपादन गुरु अर्जुनदेव करते हैं। और उसमें कबीर और रैदास के दोहों की भरमार है। कबीर के मरने के कुछ समय बाद ही ‘रामचरित मानस’ लिखा जा चुका था। लेकिन नानक एक भी पंक्ति वहां से नहीं उठाते हैं। जबकि वह इतना पोपुलर ग्रंथ था। कबीर की प्रासंगिकता को नानक समझ रहे थे। कबीर की प्रासंगिकता में एक धर्म पैदा हुआ, जो सिख धर्म है। कबीर की प्रासंगिकता से अकबर का दीन-ए-इलाही पैदा हुआ। दोनों पर कबीर की छाप है। दोनों धर्म मानव धर्म हैं, जिनमें कबीर दिखाई देते हैं। आज हम संकट के काल में है। हमारा वजूद, हमारी अभिव्यक्ति, हमारी भाईचारा सब कुछ ख़तरे में है। कोई भी मुल्क़ आगे नहीं बढ़ सकता है, जहां पढ़ाई न हो, ज्ञान न हो।
इसीलिए कबीर बार-बार कहते हैं– “संतो आई ज्ञान की आंधी रे, भ्रम की टाटी सबै उड़ाणी, माया रहै न बांधी।” कबीर भ्रम की टाटी तोड़ना चाहते हैं। कितनी वैज्ञानिक बात है। भ्रम तो वहां है, जहां अविज्ञान है। ज्ञान आ गया तो भ्रम टूट गया। कबीर ये सारी बातें कर क्यों रहे थे? इसलिए कि कबीर शूद्र समाज से हैं, जुलाहा समाज से आते हैं। ये जो धर्मांतरण हुआ था, पूर्वांचल के सारे-के-सारे शूद्र समाज में हुआ था। कबीर उससे आते हैं। पहले लोग जुलाहों से बर्तन नहीं छुआते थे। शूद्रों को पढ़ने का अधिकार ही नही था। कबीर अनपढ़ थे तो उनकी मुक्ति कैसे हो सकती थी। कबीर ने सबसे बड़ी ताक़त ज्ञान को माना है। ज्ञान ही नही मिला था शूद्रों को। कबीर ज्ञान की लड़ाई लड़ रहे थे। ज्ञान मिल गया तो सारा भेद-भाव मिट जाएगा। ऊंच-नीच मिट जाएगा। कबीर उस लड़ाई को लड़ रहे थे और लड़ते-लड़ते मारे गए। कबीर की प्रासंगिकता की लड़ाई आज भी मौजूद है। आज घोड़ी चढ़ने पर दलित समाज के लोगों को उतार दिया जाता है। दलित होने के नाते पेशाब पिला दिया जाता है। आज मुसलमान होना देश का सबसे बड़ा गुनाह बन चुका है। कबीर वह लड़ाई लड़ रहे थे कि हिंदू-मुस्लिम का कोई विभाजन न हो। तो इन सूत्रों से यदि हम कबीर को पढ़ें तो कबीर का एक नया पाठ हो सकता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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