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उच्च शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न का इतिहास और यूजीसी रेगुलेशंस-2026 

मंडल आयोग की सिफारिशों के आने के बाद शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न का रूप जहरीला होता चला गया। लेकिन उसे अंग्रेजी में रैगिंग कहा जा रहा था और जमीनी भाषा में नहीं बताया जा रहा था। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक दिखने और जमीन की बहुत कुछ सच्चाई को छिपाने के लिए किया जाता है। पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह विस्तृत आलेख

भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण का लंबा इतिहास है। अंग्रेजों की सत्ता से बेदखली के बाद उत्पीड़न की विचारधारा ने शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न के विविध रूपों को लागू किया। यह रूप उन्हीं रूपों का ‘शिक्षण संस्करण’ था जो कि समाज में आमतौर पर व्याप्त थे। चूंकि बहुजन मिथकों या धार्मिक ग्रंथों में उत्पीड़न के जो रूप हैं, उन्हें सबसे बड़े चिह्न के रूप में मानते हैं। जैसे एकलव्य, शंबूक आदि। उन्हें उत्पीड़न के नए-नए रूपों में सूचीबद्ध करना महत्वपूर्ण नहीं लगता है। लिहाजा उत्पीड़न की विचारधारा के विरुद्ध संगठन और संघर्ष की चेतना एक तरह से ठहराव के हालात में फंसी हुई है। इस पर एक लंबा अध्याय हो सकता है। फिलहाल यूजीसी रेगुलेशंस-2026 के संदर्भ तक इन बातों को सीमित रखते हैं। 

शिक्षण संस्थान का क्या मतलब है? सभी जानते व मानते हैं कि इस समाज को शिक्षित होने के अधिकार से वंचित करने के लिए नियम और कानून की तरह काम करता रहा है। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को उत्पीड़ित व दंडित करने की पूरी मशीनरी रही है। आधुनिक शिक्षण संस्थान वह माध्यम हैं जहां उनके बीच समाज को संगठित करने व समाज को निर्मित करने की क्षमताओं के प्रति भरोसा पैदा होता है जिन्हें इन अवसरों से वंचित रखा गया है। डॉ. आंबेडकर एक उदाहरण हैं। संविधान के लागू होने के बाद दो तरह की स्थितियां यहां थीं। एक तो संविधान सम्मत सत्ता संरचना को तैयार करना, जिसमें समतामूलक स्थितियों को उसका आधार माना गया है। दूसरा वह नियम, कानून और प्रथाएं जो कि समाज में गहरे स्तर पर जड़ जमाए हुए हैं और जिन्हें असमानता पर ही टिकाए रखना संभव रहा है। पूराने नियमों व प्रथाओं की विचारधारा को अपनी गति मानने वाले पक्ष ने संविधान को लागू करने के बजाय अपने लिए संविधान का इस्तेमाल करने का रास्ता चुना। इस रास्ते के लिए केवल यह जरूरी लगा कि संविधान को लागू करने की क्षमताओं को प्रदर्शित करने के दृश्य बनाने है। यह कितना सूक्ष्म हो सकता है कि असमानता की विचारधारा को सुरक्षित रखते हुए समानता के लिए संविधान को लागू करते हुए दिखने की पूरी कवायद, यह समझा जा सकता है। 

बहरहाल उत्पीड़न का पहला दृश्य ग्रामीण इलाकों में दिखते थे। न जाने कितने नरंसहार हुए, बहिष्कार और बलात्कार हुए। इसी बीच महाराष्ट्र में एक घटना खैरलांजी में हुई। वर्ष 2006 में भैयालाल भोटमंगे की पत्नी सुरेखा, उनकी बेटी प्रियंका और दो बेटों सुधीर और रोशन, जिनकी आंखों में रोशनी नही थी, की सामूहिक हत्या कर दी गई। यह उन लोगों के खिलाफ एक ऐसी घटनाओं के होने के संकेत दे रहा था जो कि थोड़े बेहतर स्थिति में किसी तरह से पहुंचे हैं। यह वह समय था जब नौकरियों में दिखने वाला बहुजनों का एक छोटा-सा हिस्सा अपनी अगली पीढ़ी को उच्च शिक्षण संस्थानों में भेजने के संदर्भ में बेचैनी महसूस कर रहा था। बहुजन चेहरे उच्च शिक्षण संस्थानों में उस अनुपात में नहीं दिखते थे जिस अनुपात में वे अपने बुनियादी सवालों को लेकर संगठित हो रहे थे। केंद्र की सरकार को 2006 में ही एक फैसला यह करना पड़ा कि शिक्षण संस्थानों में सामाजिक और शैक्षणिक वर्गों के दाखिले के लिए स्थानों को सुरक्षित किया जाए, जिसे आम भाषा में दाखिले के लिए आरक्षण कहा जाता है। 

हम यह पाते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में बहुजनों के विरुद्ध 1990 के बाद घटनाएं तेजी से बढ़ने लगीं। यानी एक साथ कई घटनाएं सामने आने लगीं। हालांकि इसके पहले भी कुछेक घटनाएं घटित हुई थीं। जैसे कि मैंने 1973-74 की एक घटना के बारे में सुना कि मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में टॉप करने वाले राम प्रकाश कोरी ने मेडिकल में दाखिले के लिए अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित किया। लेकिन दाखिले के थोड़े दिनों बाद ही उन्हें आत्महत्या के लिए विवश किया गया। लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण के फैसले के बाद घटनाओं ने ‘सामूहिक’ रूप ले लिया। ठीक वैसे ही जैसे सामूहिक नरसंहार की घटनाएं 1960 के दशक में ग्रामीण इलाकों में दिखने लगी थीं। 1990 के दशक के शुरुआती वर्ष में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया गया था। सामूहिक और सांस्थानिक हमले का इससे सीधा संबंध दिखता है। एक संस्था के तौर पर 1990 के दशक से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) उत्पीड़न के खिलाफ दिशा-निर्देश जारी कर रहा है। उत्पीड़न के खिलाफ 1996 में संसद को सरकार ने यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश की कि शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की रोकथाम के लिए समय-समय पर निर्देश जारी किए जाते हैं, क्योंकि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद छात्रों के उत्पीड़न के संसद में सवाल उठने लगे। संसद में रैगिंग से जुड़े सवाल उठाने वाले सदस्यों में दिल्ली और दूसरे शहरों से चुने जाने वाले सदस्यों के बजाय दलित सांसद रामदास अठावले, देवेंद्र प्रसाद यादव, राजो सिंह, रामजीवन सिंह के साथ अशोक कुमार पटेल, सुल्तान सलाउद्दीन ओवेसी, उमारेड्डी वेंकटश्वरलू, वीं. वेंटरीसेल्वन, रामपाल सिंह आदि नाम शामिल हैं। लेकिन यह महज सवाल उठाने की कवायद थी। उत्पीड़न की विचारधारा का राजनीतिक विरोध नहीं था। नतीजा यह हुआ कि शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राओं के खिलाफ भेदभाव, उत्पीड़न, शोषण के हालात दमन करने तक पहुंच गए थे। 

आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई के पूर्व निदेशक आर.के. राघवन की अगुवाई में एक समिति बनी। राघवन ने मुझे तब बताया था कि दुनिया में छात्र-छात्राओं के उत्पीड़न का इतना जहरीला रूप कहीं नहीं है। दुनिया में कहीं भी इस किस्म का उत्पीड़न नहीं किया जाता है। यहां इसका जितना जहरीला रूप देखा जाता है उसका उदाहरण कहीं और नहीं मिलता है। राघवन के अनुसार इसने हिंसक रूप ले लिया है, जिसमें साफ-साफ यौन उत्पीड़न (समलैंगिक) भी है। उन्होने यह भी जोर देकर कहा कि उत्पीड़न को रोकने को लेकर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के इरादे कमजोर रहें हैं। 

दरअसल, मंडल आयोग की सिफारिशों के आने के बाद शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न का रूप जहरीला होता चला गया। लेकिन उसे अंग्रेजी में रैगिंग कहा जा रहा था और जमीनी भाषा में नहीं बताया जा रहा था। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक दिखने और जमीन की बहुत कुछ सच्चाई को छिपाने के लिए किया जाता है। यह दोहरा काम भाषा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने के रूप में दिखता है, क्योंकि जमीनी भाषा से उत्पीड़न को संबोधित करने के साथ ही शिक्षण संस्थानों में वर्चस्व रखने वाली सोच और विचारों के राजनीतिक संबंधों पर बात शुरू हो जाती। यह जमीनी सच क्या है, इसे दो रिपोर्टों से समझा जा सकता है। एक तो राघवन वाली कमेटी थी। लेकिन राघवन से जब मैंने पूछा कि आप जांच के लिए एम्स क्यों नहीं गए। एम्स मतलब देश का सबसे बड़ा मेडिकल संस्थान। वहां लगातार छात्रों के उत्पीड़न की घटनाएं हो रही थीं। आत्महत्या की घटनाएं तो मेडिकल संस्थानों से न जाने कब से आनी शुरू हो गई थीं। राघवन ने एम्स नहीं जाने के सवाल का जवाब थोड़ी तल्खी में दिया कि देखिए हम कोई जांच एजेंसी तो थे नहीं। हम तो एक ऐसी कमेटी के सदस्य के रूप में काम कर रहे थे जिन्हें विभिन्न वर्गों से सुनना था और रैगिंग में की जाने वाली करतूतों के बारे में जानकारी हासिल करनी थी। शायद इसीलिए उन्होने छात्र-छात्राओं के उत्पीड़न में स्पष्ट तौर पर सामाजिक पूर्वाग्रहों के होने की बात को भी स्वीकार नहीं किया। लेकिन दूसरी कमेटी की रिपोर्ट उत्पीड़न को दमन और जहरीले होने का सामाजिक सच सामने ला रही थी। दूसरी रिपोर्ट है यूजीसी के पूर्व चैयरमैन सुखदेव थोराट की। वे दमन की जांच करने एम्स गए। 

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) से डाक्टर बनने वाले एक छात्र ने कमेटी को बताया कि एम्स में दो तरह के उत्पीड़न होते है। पहली तो अंग्रेजी वाली रैगिंग संस्थान में घुसते ही होती है। दूसरा उत्पीड़न उन जातियों के छात्रों के साथ होती है जिन्हें सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा माना जाता है। यह दूसरे तरह का उत्पीड़न कभी खत्म नहीं होता। यह हमेशा चलता रहता है। उसका सिलसिला छात्रावासों में सिमट जाता है। इसकी पूरी चर्चा यूजीसी के अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोराट की अगुवाई वाली तीन सदस्यों की कमेटी की रिपोर्ट में है। कमेटी में दो सदस्य आर.के. श्रीवास्तव व डॉ. के.एम. श्याम प्रसाद थे। 

एम्स में कमेटी के सामने ‘दलित-आदिवासी-रैगिग’ की दास्तान को दर्जनों छात्रों ने लिखित तौर पर बताया। ‘सीनियर’ द्वारा आरक्षित जातियों के छात्रों को छात्रावास में जमीन पर बैठाने, छात्रावास में कमरा बाहर से बंद करके सताने, पांच दिनों तक की प्रताड़ना के बाद उनसे छात्रावास का कमरा छोड़ देने आदि जैसे उत्पीड़न होते रहे। डॉ. अजय कुमार सिंह ने बताया कि छात्रावास में घुसने के पहले दिन से ही उनके खिलाफ क्रूरता शुरू हो गई। दर्जनों छात्रों ने बताया है कि छात्रावासों में उनके कमरे बंद कर दिए जाते। कमरे के बाहर गाली-गलौज लिखी जाती। उन्हें तरह-तरह से छात्रावास छोड़ने की धमकियां दी जातीं। एम्स जैसे संस्थान में स्थिति यह देखी गई कि दलित-आदिवासी छात्रों को छात्रावास के पहले और दूसरे तल को छोड़कर चौथे और पांचवें तल पर जाना पड़ता। केवल एम्स में कमेटी को उत्पीड़न के कई रूप देखने को मिले। सभी दलित-आदिवासी छात्रों को अपनी जाति बतानी पड़ती है और उनकी जाति को लगाकर खुलेआम उन्हें बहुत गंदी भाषा में बहुत कुछ बोला जाता है। दरअसल उनकी पूरी जाति की रैगिंग की जाती है। खेलों तक में भेदभाव किया जाता है। खाने के जो मेस गैर सरकारी रसोईयों द्वारा चलाया जाता है, उससे दलित-आदिवासी छात्रों को अलग रखा जाता।

यहां यह जरूरत लगती है कि एकलव्य-शंबूक की कहानी को बताने वाले यह भी शोध करें कि आधुनिक शिक्षण संस्थानों में अब तक कितने छात्रों ने जातीय उत्पीड़न के कारण आत्महत्याएं की है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी तो उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी व्यथा खुद सुनाई। बस फर्क यह कि उत्पीड़न-दमन को हत्या की जगह आत्महत्या कहा जाने लगा। पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने संसद में सरकार के एक जवाब के हवाले से सोशल मीडिया में लिखा कि “पिछले पांच वर्षों के दौरान आईआईटी, आईआईएम और दूसरे राष्ट्रीय महत्व के शिक्षण संस्थानों में लगभग 100 छात्रों ने आत्महत्याएं की हैं। इनमें प्राय: सभी दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक हैं।” 

एक रिसर्च स्कॉलर मेघा मालिनी पाठक ने बताया कि देश के शिक्षण संस्थानों से 2020 में 219 और 2021 में 511 उत्पीड़न की घटनाएं शिकायतों के रूप में आई। 2025-26 में यूजीसी ने बताया कि जातीय उत्पीड़न की शिकायतें कॉलेजों, विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थानों में 118 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गए हैं। 

बिहार की राजधानी पटना में यूजीसी रेगुलेशंस-2026 के समर्थन में सड़क पर उतरे दलित-बहुजन युवा

उत्पीड़न की विचारधारा बनाम सरकारी मशीनरी 

संसद में जब उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर सवाल उठने लगे तो 1996 में सरकार ने कहा कि शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की रोकथाम के लिए समय-समय पर निर्देश जारी किए जाते हैं। शिक्षण संस्थानों को कहा गया कि वे अपने यहां के नियमों में इस तरह से संशोधन करें ताकि दोषी पाए जाने वाले छात्र-छात्राओं को विश्वविद्यालयों से निकालने की सजा दी जा सके। ध्यान दें कि हाल के वर्षों में उत्पीड़न की शिकायत के आधार पर कितनों को सजा दी गई। दिल्ली में स्कूल ऑफ प्लांनिंग एंड आर्किटेक्चर में अगस्त, 2004 में गालियों, विभिन्न तरह की हरकतों से शारीरिक तौर पर प्रताड़ित करने की एक लिखित शिकायत की जांच करवाई तो आरोपित को तीन हफ्ते के लिए संस्थान से निलंबित कर दिया गया और जुर्माना लगाया गया, लेकिन तब से ऐसी मामूली कार्रवाई भी कितनी घटनाओं में हुई। जबकि बीसियों वर्ष पहले भी केंद्र सरकार ने कहा कि भारतीय दंड संहिता आईपीसी में क्रूर किस्म के उत्पीड़न के खिलाफ धारा 302, 304(ए), 307, 324, 325, 326, 339, 340, 341, 342, 343, 349, 350, 351 ,352, 353, 357, 358, 376, 377, 383, 509 और 511 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी तरफ कि समाज के किस वर्ग के छात्र-छात्रों को संस्थान से निकाले जाने व इंटरव्यू में फेल करने, कोई उम्मीदवार योग्य नहीं मानने यानी एनएफएस की घटनाएं, पीएचडी में दाखिले से वंचित करने में कितनी वृद्धि हुई है। 

1996 में ही सरकार ने सूचित किया कि नेशनल फैशन तकनीकि संस्थान में उत्पीड़न के खिलाफ जांच के लिए दो सदस्यों की एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई। 1998 में याचिका दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और विश्वविद्यालयों को भेजे गए। आईआईटी, दिल्ली ने भी एक कमेटी का गठन किया। एआईसीटीई ने भी सभी तकनीकी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और राज्यों में तकनीकी शिक्षा के सचिवों को उत्पीड़न रोकने के बारे में निर्देश दिए। ये सभी यूजीसी के दायरे से बाहर वाले संस्थान हैं। यूजीसी ने सिंतबर, 1999 में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में रैगिंग रोकने के इरादे से के.पी.एस. उन्नी की अगुवाई में विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई। उसकी रिपोर्ट सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को भेजी गई। उसमें संस्थाओं से रैगिंग के खिलाफ उनके द्वारा की गई कार्रवाईयों की जानकारी भी मांगी गई थी। महज 169 विश्वविद्यालयों ने अपने जवाब भेजे थे। यूजीसीकी जांच कमेटी ने यह अनुशंसा की थी कि केंद्र सरकार और प्रदेशों की सरकारें शिक्षा संस्थाओं में उत्पीड़न रोकने के लिए कानून बनाए। उस कानून में उत्पीड़न को संज्ञेय अपराध मानने और उस कानून में अपराध की नृशंसता के अनुसार सजा की व्यवस्था की जा सकती है। कानून बने भी। 

इन कानूनों की एक फेहरिस्त है। कर्नाटक का शिक्षा अधिनियम 1983 से लेकर त्रिपुरा का 1990 का अधिनियम, 1996 का तमिलनाडु अधिनियम और महाराष्ट्र, केरल, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर से लेकर नए राज्य झारखंड, छत्तीसगढ़ तक में कानून बने हैं। फिर भी घटनाएं बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में राघवन की अगुवाई में एक समिति का गठन करवाया जिसकी चर्चा और पूरी कहानी यहां सुनाई गई है। लेकिन फिर 2009 में अमन काचरू की मौत के बाद फिर सरकारी मशीनरी हिला-डुला लेकिन 2026 तक घटनाएं बढ़ने की खबरें ही छाई रहीं। 

यूजीसी के गाइंडलाइन से लेकर रेगुलेशंस का सच

सच तो यह है कि दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, आर्थिक स्तर पर कमजोर यानी ईडब्ल्यूएस, शरीर के अंगों के स्तर पर असमान, स्त्री, अल्पसंख्यक रेगुलेशन के लिए एक वस्तु जैसे हैं। अब तक के यूजीसी के रेगुलेशन पर शोध बता रहा है कि बार-बार जारी किए जाने वाले रेगुलेशनों में अलग कोई और बात नहीं है। केवल उत्पीड़ित समुदायों के नाम रेगुलेशन में जोड़े जाते रहे हैं। 2023 [यूजीसी (छात्रों की शिकायतों का निवारण) विनियम] में ही अन्य पिछड़ा वर्ग जोड़ा गया था। 2016 में स्त्री जोड़ी गई। 

13 जनवरी, 2026 के रेगुलेशन की असलियत 

गत 13 जनवरी, 2026 के रेगुलेशन में कोई नई बात नहीं है। 2009 के बाद के सभी रेगुलेशनों के आधार पर यह कहा जा सकता है। तब केरल यूनीवर्सिटी से जुड़ी एक याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई गाइडलाइंस के लिए सुझाव दिए थे और यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए गाइडलाइंस से अलग उत्पीड़न के लिए रेगुलेशन जारी किया था। रेगुलेशन की यह सीमा होती है कि शिक्षण संस्थानों में जो घटनाएं होती है और जिन स्थानों जैसे कैंटीन, अंडर ग्राउंड जैसी कोई जगह पर होने वाली घटनाओं के रूपों को ही उत्पीड़न मानता रहा है। 2009 में पहली बार बड़े ही दबे स्वरों में समुदाय विशेष के छात्रों की चर्चा की गई है लेकिन उन समुदाय विशेष को स्पष्ट नहीं किया गया है। 2012 के रेगुलेशन में स्पष्ट रूप से अनुसूचित जाति जिन्हें दलित कहा जाता है और अनुसूचित जनजाति जिन्हे आदिवासी कहा जाता है, के छात्रों के साथ होने वाले उत्पीड़न की बात की गई। 2015 में शिक्षण संस्थानों में स्त्रियों के उत्पीड़न की बात साफ-साफ दिखने लगी। इसी साल उत्पीड़न के स्थानों के नाम भी बढ़ गए। मसलन बैंक काउंटर, हेल्थ सेंटर जैसे स्थान भी शिक्षण परिसर की परिभाषा में शामिल किए गए। 2019 में दलित, आदिवासी, स्त्री, के साथ पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और शारीरिक स्तर पर असमान की शिकायतों पर सुनवाई के स्पष्ट निर्देश दिए गए। यानी उत्पीड़न जहां-जहां होने लगे और जिस-जिस रूप में दिखाई देने लगे, उनके नाम रेगुलेशन में जोड़े गए। इस तरह नौकरशाही के स्तर पर जमाखर्च देखने को मिलते हैं। उत्पीड़न रोकने की मशीनरी में भी महज हेर-फेर दिखता है। छात्र शिकायत निवारण समितियों से लेकर लोकपाल का गठन किए जाने के निर्देश संस्थानों को दिए गए। लेकिन यहां हम केवल 2023 के रेगुलेशन और 2026 के रेगुलेशन का तुलनात्मक अध्ययन करें। 2023 का रेगुलेशन का उद्देश्य दलित, पिछड़ा वर्ग, आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यक व दिव्यांग छात्रों से भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए शिक्षण संस्थानों को बताया गया। इसमें ये दो बातें शामिल थीं। पहला, छात्र शिकायत निवारण समिति में अध्यक्ष या एक महिला सदस्य को अनिवार्य किया गया और दूसरा, एक सदस्य या अध्यक्ष दलित, आदिवासी या पिछड़े वर्ग यानी तीनों में एक को अनिवार्य किया गया। दूसरी लोकपाल के लिए यह व्यवस्था की गई कि शिकायतों के झूठी होने पर वह शिकायतकर्ता के विरुद्ध उपयुक्त कार्रवाई कर सकता है। 

2026 के रेगुलेशन में उत्पीड़न के विरुद्ध कार्रवाई के लिए नया नामकरण समता अवसर केंद्र किया गया। समता अवसर केंद्र में एक समता समिति बनाने पर जोर दिया गया। रेगुलेशन का मुख्य शब्द समता है। हर स्तर पर इसका इस्तेमाल किया गया है। इस रेगुलेशन के उद्देश्य में धर्म, जाति, नस्ल, जन्म स्थान, दिव्यांगता, अनुसूचित जाति व अनुसचित जनजाति , सामाजिक एवं शैक्षणिक रुप से पिछडे वर्ग के साथ आर्थिक रुप से कमजोर वर्गों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन और सभी के बीच समता एवं समावेशन को बढ़ावा देना बताया गया है। गौर करें कि वह छात्र जो ईडल्ल्यूएस यानी गरीब सवर्ण है, को भी यहां शामिल किया गया है। समता समिति में पहले की तरह दस सदस्य कौन हो सकते हैं, यह उल्लेख किया गया है लेकिन उसमें यह भी शामिल किया गया है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यह भी प्रावधान है कि उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत के बाद समता समिति अपनी जांच करके जो रिपोर्ट देगा, उस रिपोर्ट के खिलाफ जिसके विरुद्ध शिकायत है, वह लोकपाल के समक्ष अपील कर सकता है। उसे अपील करने व लोकपाल के समक्ष सुनवाई के लिए बेहतर वकील मुहैया कराया जाएगा। वकील को संस्थान पैसे देगा। दूसरा रेगुलेशन में कोई सजा का प्रावधान नहीं है। किसी व्यक्ति के विरुद्ध तो कतई नहीं। यूजीसी केवल संस्थान को अपने दायरे से बाहर करने का फैसला कर सकता है। 

यहां एक दिलचस्प बात हैं कि केवल शिकायतों के लिए एक मशीनरी बनाने की बात की गई है। यूजीसी केवल यह करने का दावा कर रहा है कि यदि कोई शिक्षण संस्थान उसके विनियमों के किसी प्रावधान का अनुपालन नहीं करेगा तो वह इसकी जांच करेगा। जांच प्रमाणित करता है तो संस्थान यूजीसी की योजनाओं में भाग लेने से वंचित किया जाएगा और उसे उच्च शिक्षा संस्थान की सूची से हटा दिया जाएगा। दूसरी तरफ यह स्पष्ट नहीं है कि लोकपाल शिकायत के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई करेगा। लेकिन प्रचार यह किया गया कि जो शिकायतें मिलेंगीं, उन्हें पुलिस के समक्ष भेजा जाएगा। जबकि यह सरासर झूठ है। असलियत यह है कि केवल उन शिकायतों को जो अब भारतीय न्याय संहिता के तहत दर्ज की जाती हैं, जैसे हत्या, हत्या की कोशिश, हिंसक हमले आदि को ही पुलिस के समक्ष भेजा जा सकता है।

यूजीसी के नए रेगुलेशन को आने के बाद उसका विरोध हो रहा है। यह सवर्ण विरोध माना जा रहा है। यह विरोध रेगुलेशन की आड़ लेकर हो रहा है। रेगुलेशन में प्रावधानों को बताकर विरोध नहीं हो रहा है, क्योंकि प्रावधान केवल समता के विचारों को बढ़ावा देने पर जोर देता है। एक प्रचार सामग्री विरोध के लिए तैयार की गई है, जिसका रेगुलेशन से कोई रिश्ता नहीं दिखता है। यह सवर्ण विरोध सत्ताधारी दलों के नेताओं को भी जातिवादी मानसिकता से बुरी तरह से लताड़ रहा है। यह विरोध जातिवादी प्रतिक्रिया है। हमारे समाज में जातीय वर्चस्व को न्यूनतम स्तर पर भी समानता स्वीकार नहीं है। उसकी बात करना भी गंवारा नहीं है। उसका यह मानना है कि वह अधिकार की भाषा को ही स्वीकार नहीं कर सकता। उसका यह विरोध सत्ताधारी विचारधारा के भी विरुद्ध कतई नहीं है। वह सत्ताधारी नेताओं में से कुछेक की जातिवादी मानसिकता से आलोचना करता है। यह उसी नृशंस तरीके से आलोचना कर रहा है जिस नृशंस तरीके से शिक्षण संस्थानों में वह अपने हमले जारी रखना चाहता है। 

रेगुलेशन के आने से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उस पर रोक तक की राजनीति को समझना भी जरूरी है। रेगुलेशन का कथित विरोध करने वालों को राजनीतिक तौर पर दक्षिणपंथी विचारों के साथ ही रहना है क्योंकि वह वर्चस्व को बनाए रखने के लिए असंवैधानिक फैसले तक जा सकता है। आर्थिक आधार पर आरक्षण एक ऐसा ही फैसला है। दक्षिणपंथी विचारधारा को भारतीय समाज के उस हिस्से को अपने साथ करना है जो समानता की चेतना की जरूरत महसूस करती है लेकिन राजनीतिक तौर पर वह इसके रास्ते की पहचान करने में लगी है। दक्षिणपंथी विचारधारा और उसके संगठन सबसे ज्यादा समानता की विचारधारा का समर्थक होने का भ्रम तैयार करने में माहिर है। उनका उद्देश्य समानता या वर्चस्व के खिलाफ एक भ्रामक वातावरण तैयार करके उनकी चेतना में घुसपैठ करना होता है। सुप्रीम कोर्ट सामाजिक न्याय के हर बड़े फैसले के बाद से जो रूख बनाता है, उसी का अनुसरण वह इस रेगुलेशन के संदर्भ में भी अपनाए हुए है। 

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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